श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 483, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय ४६७
कर्मबीज के साथ जल जाती हैं। उसी समय मेरी पूर्ण भक्ति भक्त के अंतःकरण में भर जाती है। बिना किसी
उपाय या प्रयास के, सहज स्थिति से उसमें मेरे प्रति भक्ति उत्पन्न होती है। उस समय वह जिस दृश्य व्यक्ति को
देखता है उसमें चिद्रूप मैं ही हूँ ऐसा उसे प्रतीत होता है। ऐसी भक्ति होने पर वह आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी इन
पंक्तियों से ऊपर उठ कर चिन्मात्रैक चौथी भक्ति प्राप्त करता है। सचमुच जिस भक्ति के कारण चारों मुक्तियाँ पैरों
पर लोटती हैं, वह स्वानंद मेरे भक्तों की देह में पूर्णतयः उल्हास प्राप्त करता है। उस समय उन्हें मुक्तता प्राप्त
करने का स्मरण भी नहीं होता। अथवा 'मेरा बन्धन समाप्त हो गया' यह भी उसे याद नहीं रहता। सारांश, मेरे
भजनसुख में ही वह सारे सुख और दुःख भूल जाता है और मेरी भक्ति के आनन्द में स्वानंद सुख में सन्तुष्ट
रहता है। इस प्रकार का 'नैष्ठिक' ब्रह्मचारी अपने स्वधर्म से मत्स्वरूप तक पहुँचता है। अस्तु! अब दूसरी स्थिति
अर्थात् 'उपकुर्वाण' ब्रह्मचर्य के बारे में तुझे बताता हूँ। सुनो।
अथानन्तरमावेक्ष्यन् यथा जिज्ञासितागमः ।
गुरवे दक्षिणां दत्त्वा स्नायाद् गुर्वनुमोदितः ॥ ३७ ॥
सारा अध्ययन पूर्ण होने पर, वेदशास्त्र में निपुण हो जाने के बाद यदि विषयोपभोग की इच्छा हो तो उसे
गुरु की आज्ञा लेकर व्रत का विसर्जन करना चाहिये। विषयोपभोग की इच्छा अथवा अनिच्छा—जैसी उसकी
प्रवृत्ति हो उसका अच्छी तरह विचार कर, जैसा शिष्य का अधिकार होता है, उसके अनुसार गुरु आज्ञा देते हैं।
जिसे गृहस्थाश्रम की इच्छा हो उसे गुरु को यथाशक्ति दक्षिणा देकर ब्रह्मचर्य व्रत की समाप्ति करनी चाहिये।
समावर्त्तन करने के लिये गुरु की आज्ञा लेकर मंगल स्नान करना चाहिये और तब व्रतबंध का विसर्जन करना
चाहिये। यहाँ श्रीकृष्ण अधिकार भेद का वर्णन कर रहे हैं। वैराग्य के सम्बन्ध में प्राप्त होने वाले उसी अधिकार
का अगले श्लोक में वर्णन करता हूँ।
गृहं वनं वोपविशेत् प्रव्रजेद् वा द्विजोत्तमः ।
आश्रमादाश्रमं गच्छेद्वान्यथा मत्परश्चरेत् ॥ ३८ ॥
जिसमें जरा भी वैराग्य नहीं है, अंतःकरण में स्त्री के उपभोग की चाह है उसे दूसरा अर्थात् गृहस्थाश्रम
स्वीकार करना चाहिये अथवा जिसे स्त्रीकाम तो अच्छा नहीं लगता किन्तु थोड़ा बहुत विवेक वैराग्य रहता है;
स्त्री सुख की विशेष चाह नहीं होती लेकिन विवेक-वैराग्यपूर्ण नहीं होता, ऐसी स्थिति हो तो उसे तत्काल
वानप्रस्थ की ओर प्रस्थान करना चाहिये। जो विवेक के तेज से देदीप्यमान हो, जिसके पास सदा वैराग्य जागृत
रहता हो, जो किसी भी विषय में बिलकुल विरक्त हो उसके लिये ही संन्यास आश्रम उपयुक्त है। जो जन्मतः
ब्राह्मण हो उसी को द्विजोत्तम कहना चाहिये। उसी के लिये चतुर्थाश्रम बताया गया है। वैश्य और क्षत्रियों के लिये
चतुर्थाश्रम का नियम नहीं बताया गया है। क्षत्रिय यदि संन्यास लें तो उन्हें तीर्थाटन पर जाना चाहिये, दण्ड-
कमण्डल का विधान उनके लिये नहीं है। ब्राह्मण को यदि ब्रह्मचर्याश्रम में ही प्रखर वैराग्य उत्पन्न हो जाय तो
उसे तत्काल संन्यास लेना चाहिये। विवाह के समय यदि भार्या के सामने पीढ़े पर बैठते ही वैराग्य उत्पन्न हो जाय
तो तत्काल संन्यास ले लेना चाहिये ऐसा श्रेष्ठ लोगों का कहना है। संन्यास ग्रहण के लिये जिसका वैराग्य पूरी
तरह परिपक्व नहीं है, उसे संन्यास ग्रहण की योग्यता ही नहीं है ऐसा समझना चाहिये। जिसे विषयोपभोग का
सुख अच्छा नहीं लगता उसी को संन्यास का अधिकार है। जिसे विषय विकार से जरा भी बाधा नहीं होती, वही
सचमुच संन्यासी है। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते समय यदि वैराग्य हाथ न लग रहा हो तो उसे गृहस्थ बनकर