श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 478, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें४६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सकती उसी प्रकार काम और क्रोध के जाने पर लोभ को रहने का ठिकाना ही नहीं मिलता। पति की मृत्यु जिस
प्रकार स्त्री का सौभाग्य ले जाती है उसी प्रकार कामक्रोध के बिना लोभ के लिये कोई ठिकाना नहीं रह जाता।
इसी का नाम है 'निलोभता'। सचमुच क्रोध और लोभ को बढ़ाने वाला काम ही है। जहाँ काम का कार्य अधूरा
रह जाता है वहीं क्रोध का तेज बढ़ता है और जब काम के मनोरथ पूर्ण होते हैं तो लोभ का विद्रोह नाचने लगता
है। जिस प्रकार दीपक की लौ तेज और काजल को एक साथ बढ़ाती है, उसी प्रकार क्रोध और लोभ का
बड़प्पन सदा काम के पास ही रहता है। जाड़े की ठंडक के साथ जिस प्रकार पसीना और ज्वर रहता है उसी
प्रकार काम भी सदा क्रोध और लोभ से युक्त रहता है। जहाँ काम का कोई मूल्य नहीं है वहाँ सहज ही क्रोध
और लोभ का त्याग होता है। स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं, यही उपाय सवसे उत्तम है। अब प्राणिमात्र का हित कैसे
साधा जा सकता है, यह भी बताता हूँ। जितना अपना सामर्थ्य हो उसके अनुसार प्राणिमात्र का हित करते रहना
चाहिये। उन्हें जिस वस्तु की जब-जब आवश्यकता हो उसे देते रहना चाहिये। अंतःकरण की ममता से अन्न,
वस्त्र, दान आदि देकर प्राणिमात्र के प्रति प्रिय आचरण करते रहना चाहिये। यह सभी का स्वधर्म है इसे ध्यान में
रखो। प्राणिमात्र का ऐसा प्रिय करना चाहिये जिससे उसका हित हो। जो प्रिय उसके हित के लिये बाधक हो उसे
कभी नहीं करना चाहिये। प्राणिमात्र का प्रिय और हित करने वाला संसार में जो भी पुरुष हो उसके घर में
भगवान सदा कल्याण ही करता है। वह प्राणिमात्र का प्रिय और हित कर रहा होता है तभी मैं श्रीकृष्ण उसके
संकटों की होली जला देता हूँ। जो सद्भाव से सचमुच प्राणियों का हित करते रहने के कारण समस्त प्राणिमात्र में
प्रिय रहता है उसका संसार में सबके अंतःकरण में रहने वाला परमात्मा सुखमय बना देता हूँ। अहिंसा आदि जो
सात गुण इस श्लोक में बताये गये हैं वह सभी का स्वधर्म है। सभी आश्रमों और सभी वर्णों के लिये मुख्य रूप
से यही धर्म है। अव हे उद्धव! अब मैं तुम्हें आश्रमों के धर्म के वारे में बताता हूँ। उसमें पहला धर्म है, ब्रह्मचर्य,
सुनो। ब्रह्मचर्य के दो प्रकार हैं, एक का नाम है पूर्ण 'नैष्ठिक्य' तथा दूसरा है 'उपकुर्वाण'। अब उन दोनों के
लक्षण सुनो। उपनयन के बाद वेदाध्ययन होने के बाद जो परमार्थ को लक्ष्य बनाकर गृहस्थाश्रम की ओर नहीं
देखता उसी का नाम है 'नैष्ठिक्य' ब्रह्मचर्य। दूसरा, वेदशास्त्र आदि का पठन पूर्ण कर गुरुदक्षिणा दे कर ब्रह्मचर्य
व्रत की समाप्ति कर तदुपरान्त यथाविधि स्त्री का पाणिग्रहण करना इसे 'उपकुर्वाण' कहते हैं।
द्वितीयं प्राप्यानुपूर्व्याज्जन्मोपनयनं द्विजः।
वसन् गुरुकुले दान्तो ब्रह्माधीयीत चाहूतः ॥ २२॥
मेखलाजिनदण्डाक्षब्रह्मसूत्रकमण्डलून् ।
जटिलोऽधौतदद्वासोऽरक्तपीठः कुशान् दधत्॥ २३॥
स्नानभोजनहोमेषु जपोच्चारे च वाग्यतः।
नच्छिद्यान्नखरोमाणि कक्षोपस्थगतान्यपि ॥ २४॥
गर्भाधान, पुंसवन, जातकर्म, अन्नप्राशन ये सारे कर्म चौल तक पहले भी होते थे। उसके बाद उपनयन तथा
गुरु द्वारा गायत्री मंत्रोपदेश होने के बाद उसका दूसरा 'सावित्र' जन्म होता है जिसे 'व्रतबंध' कहते हैं। इस प्रकार
गायत्री मंत्र से तीनों वर्ण के दो जन्म हो जाते हैं। यह ब्रह्मचर्याश्रम है। यह व्रतधारण केवल वेदाध्ययन के लिये
होता है। इसलिये वेदाध्ययन करने के निश्चय से ब्रह्मचारी गुरु के घर रहता है। वहाँ उसका व्रत किस प्रकार