श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 479, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंचलता है, सुनो। कमरबंध, जनेऊ, कृष्णाजिन, पलाश का दण्ड तथा पानी लाने के लिये कमण्डल रखना चाहिये।
केशवपन नहीं कराना चाहिये, तैलाभ्यंगस्नान नहीं करना चाहिये, दंतधावन नहीं करना चाहिये और केश में कंघी
नहीं लगानी चाहिये। नाखून नहीं निकालने चाहिये, काँख तथा गुप्त स्थान के केश नहीं काटने चाहिये। धोबी
द्वारा धोकर लाये कपड़े नहीं पहनने चाहिये। प्रातःकाल और दोपहर में बहते पानी के जलाशय में स्नान करना
चाहिये। श्वेत आसन पर सफेद वस्त्र बिछाना चाहिये और जप के लिये रुद्राक्ष की अथवा कमल के बीज की
माला रखनी चाहिये। कुश आदि के साथ पवित्र दर्भ हाथ में रखने चाहिये। अब मौन के सम्बन्ध में भी बताता
हूँ। उसे भी सुनो। मलमूत्रविसर्जन तथा स्नान करते समय तथा जप, होम, भजन और दोनों समय की संध्या करते
समय नियमतः मौनव्रत धारण करना चाहिये। अभ्यंग स्नान न करने से तथा बालों में कंघी का प्रयोग नहीं करने
से केशों में स्वयमेव जटाओं का निर्माण हो जाता है। यह नियमतः किया जाने वाला व्रत ब्रह्मचारी के लिये
बताया गया है। इनका पालन करते हुए गुरु की सेवा करनी चाहिये। गुरु जब कहे तभी वेदपाठन करना चाहिये।
उसकी आज्ञा शिरसावंद्य कर निष्कपट भाव से गुरु की सेवा करनी चाहिये। जल्दी-जल्दी पाठ नहीं पढ़ाता
इसलिये एक गुरु को छोड़कर दूसरे के पास जाने में महादोष है। गुरु को दया आये इसलिये दिन-रात उसकी
सेवा करनी चाहिये। उस दया से वही दिन-रात पढ़ा सकेगा। गुरुचरण पर भक्ति रखकर वेदशास्त्र का पठन करें
तथा परमार्थ बुद्धि से वेद का तत्वार्थ सम्पादित करना चाहिये।
रेतो नावकिरेज्जातु ब्रह्मव्रतधरः स्वयम्।
अवकीर्णेऽवगाह्याप्सु यतासुस्त्रिपदीं जपेत् ॥ २५ ॥
इस प्रकार ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। ब्रह्मचारी को जानबूझ कर वीर्य त्याग नहीं करना चाहिये।
यही ब्रह्मचर्य का प्रमुख व्रत है। स्वप्न में वीर्यपतन हो जाय तो शास्त्रोक्त पद्धति से स्नान करना चाहिये और फिर
प्रायश्चित्त के लिये गायत्री का स्मरण करना चाहिये। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी को जानबूझ कर वीर्य
त्याग करने का अधिकार नहीं है। ऐसा जो करेगा उसका आश्रमधर्म डूब जायेगा। स्वप्न में वीर्यपतन हो जाय तो
मृत्तिका लगा कर अभ्यंग स्नान करना चाहिये और फिर प्रायश्चित्त के लिये विधिपूर्वक जाप करना चाहिये।
अग्न्यर्काचार्यगोविप्रगुरुवृद्धसुराञ्छुचिः।
समाहित उपासीत संध्ये च यतवाग् जपन् ॥ २६ ॥
जो गायत्रीमंत्र देता है वह आचार्य है। माता और पिता भी गुरु ही हैं। अग्नि, सूर्य आदि समस्त देवतागण तथा
गौ, ब्राह्मण और ज्येष्ठ लोग, इन सबकी उपासना करने के लिये बाह्य शुद्धि और अन्तर का समाधान चाहिये।
गुरुचरणों की शरण में रहकर माता, पितरों की आज्ञा का पालन करना चाहिये। अग्नि में हवन करे, इन्द्रादि देवताओं
की स्तुति करें, ब्राह्मणों को निरन्तर पूज्य मानें तथा सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे। पिता को साष्टांग दण्डवत करे, गौ के
शरीर को सहलाये, सायं प्रातः संध्या में मौन रखे। मध्याह्न संध्या में मौन आवश्यक नहीं है। सद्गुरु की बात तो
बहुत बड़ी है; गुरुतत्त्व सब में श्रेष्ठ तथा सर्ववंद्य है, उसका प्रताप प्रसिद्ध है ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं।
आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।
न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत् सर्वदेवमयो गुरुः॥ २७॥
अंतर्यामी ईश्वर, विश्वात्मा, विश्वम्भर, अनंत और अपार मैं, वही शिष्य का श्रीगुरु है। जिसे गुरुनाम कहते
हैं वह सचमुच भगवान ही है। भजन का भक्तिभाव देखकर शिष्य का मनोरथ मैं ही पूर्ण करता हूँ। जिस सद्गुरु