श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय ४६१
हैं। देखो! जो ऐसे कामी या लोभी होते हैं उनके अंतःकरण में सदा क्रोध की आग भड़कती रहती है। इच्छा पूरी
नहीं हो रही है यह देख उसका गुस्सा प्रलयांत भड़क उठता है। शरीर क्रोध के अधीन होने के कारण शान्ति तो
क्षण भर के लिये भी नहीं मिलती, वृत्ति से सदा जलाभुना हुआ, ऐसा नीच स्वभाव होता है। प्राप्त सुख से सन्तुष्ट
न होना, जो सुने उस सुख के लिये निरन्तर मन में आस धर के रहना यह स्वभाव भी अत्यन्त नीच है। इन जिन
आठ गुणों के बारे में तुम्हें बताया वह किसी भी वर्ण वाले का स्वभाव क्यों न हो, उसमें अंत्यज भाव है यह
निश्चित रूप से जान लो। ये जो सारे दुर्गुण बतलाये उनमें से कोई भी एक नरक देने के लिये प्रसिद्ध है। फिर
जहाँ आठों गुण मिल जाय तो फिर उनसे कैसे छुटकारा मिले ? इन गुणों का त्याग करने के लिये ही मैंने तुम्हें
उनके लक्षण बताये। अरे! इन गुणों को जो स्वीकार करते हैं वह नरक जाते हैं और जो उनका त्याग करते हैं वे
मेरे पद तक पहुँचते हैं। अब जिससे मेरे पद की प्राप्ति हो और किसी भी वर्ण को उत्तम गति प्राप्त हो ऐसे गुणों
के लक्षण हे उद्धव ! तुम्हें बताता हूँ। जो सारे लक्षणों का सार है, समस्त गुह्य गुणों का भण्डार है और जिसके
योग से संसार से मुक्त हुआ जा सकता है उसे सुन लो। जो सारे वर्णों का सहजधर्म है, जिसके योग से परब्रह्म
की प्राप्ति होती है, जिसके योग से मन का भ्रम दूर होता है, वे उत्तम गुण सुनो।
अहिंसा सत्यमस्तेयमकामक्रोधलोभता।
भूतप्रियहितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिकः॥ २१॥
जिससे दूसरे को सुख प्राप्त हो ऐसे उपाय करना जिससे मुझे सुख प्राप्त हो। उसी गुण को मैं श्रीकृष्ण
वन्दनीय मानता हूँ। उसी प्रकार किसी को कष्ट न देना, परपीड़ा न देना, दूसरे को दुःख न देना इस योग से भी हे
उद्धव ! मुझे सुख प्राप्त होता है यह जान लो। दुःख न देकर सुख देना इसी को 'अहिंसा' कहते हैं जो पहला गुण
है। अब दूसरा गुण 'सत्य' है जिसके लक्षण सुनो। सत्य इस प्रकार का होता है— जिसका मन और वाणी, जागृति
स्वप्न अथवा सुषुप्तावस्था में असत्य का जरा भी स्पर्श नहीं करते, निन्दा और नरस्तुति तथा झूठ बोलना जिसे
नहीं आता, वाणी को जो पवित्र रखता है उसे 'सत्य' कहते हैं। अधर्म से एक कौड़ी से लेकर एक करोड़ लाभ
का भी वह विचार नहीं करता, दूसरे की कानी कौड़ी को भी वह स्पर्श नहीं करता, चोरी करने का अथवा किसी
की आँख बचाकर उसकी वस्तु ले लेना या बिना पूछे वस्तु ले लेना ऐसा विचार उसके मन में नहीं आता।
अन्याय से प्राप्त किये धन को वह स्वप्न में भी स्पर्श नहीं करता। उद्धव ! यह अचैर्य का लक्षण है। यही तीसरा
गुण है। स्वधर्म से हाथ में धन आ जाय इतना भी धनलोभ जिसमें नहीं होता, कामिनी-काम की वार्ता भी जिसके
कानों तक नहीं पहुँचती, परस्त्री को जो माता के समान मानता है, इतना ही नहीं अपनी स्त्री के प्रति भी जिसका
मन आसक्त नहीं होता, गृहस्थाश्रम में रहने के लिये ही स्त्री का पालन करना उद्धव ! इसी का नाम है 'अकामता'
अथवा अनिच्छा। यही चौथा लक्षण है। अब अक्रोध का लक्षण सुनो। जहाँ काम का जोर नहीं रहता वहाँ क्रोध
का भी कुछ नहीं चलता। जिस प्रकार आकाश को शस्त्र नहीं चुभता अथवा बीज कितना भी अच्छा हो लेकिन
जमीन के सिवा वह अन्यत्र कहीं अंकुरित नहीं होता उसी प्रकार काम के बिना क्रोध कभी नहीं बढ़ता। जिस
प्रकार गर्भवती स्त्री की मृत्यु के बाद गर्भ की भी मृत्यु हो जाती है उसी प्रकार काम के साथ क्रोध की भी
समाप्ति हो जाती है, मस्तक कट जाने पर जिस प्रकार हाथ-पैर की क्रिया बन्द हो जाती है उसी प्रकार काम
समाप्त होने पर क्रोध भी समाप्त हो जाता है और जहाँ काम-क्रोध ही न हो, वहाँ लोभ किस बात का होगा ?
जिसके जड़ में मिट्टी न हो वह वृक्ष कभी नहीं बढ़ेगा। सर का मुण्डन कराने से जिस प्रकार वहाँ जूँ नहीं रह