श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 475, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय ४५९
के ऊँचे स्थान तक पहुँच गये। इस प्रकार ब्राह्मण की सेवा बड़ी अलौकिक है। इस प्रकार क्षत्रियों के दस लक्षण
तुम्हें बतलाये। इसके मुख्य रूप से ब्राह्मण भजन ही सबके लिये श्रेयस्कर है। वैश्यों की प्रकृति के स्वाभाविक
पाँच लक्षण हैं जिन्हें यथार्थ रीति से श्रवण करो।
आस्तिक्यं दाननिष्ठा च अदम्भो ब्रह्मसेवनम्।
अतुष्टिरर्थोपचयैर्वैश्यप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १८ ॥
वैश्यों के स्वभाव में द्रव्यलोभ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कितने ही करोड़ का मालिक क्यों न हो जाय लेकिन
उसकी इच्छा तृप्त होना जानती ही नहीं। 'आस्तिकता' केवल द्रव्यसंग्रह की ही होती है। अधिक धन कमाऊँगा
इस विश्वास के साथ एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक माल ले जाता है। वेदशास्त्र पर अत्यधिक विश्वास यही मुख्य
रूप से वैश्य की 'आस्तिकता' है। वेद ने जो भी स्वधर्म बतलाया है उसके प्रति जरा भी उदासीन न रहना। वैश्य
का स्वधर्माचरण होता है, दान देना। प्राणांत के समय भी दान देने की प्रक्रिया अखण्ड चलती रहती है। परलोक
प्राप्ति का प्रमुख साधन है 'ब्राह्मण की सेवा'। ब्राह्मण की आज्ञा परम प्रमाण। उससे भी विशेष है गुरु की सेवा।
वेदशास्त्रों में भी 'सद्गुरु ही परब्रह्म' है, ऐसा प्रमाण है। ब्राह्मण भी तद्रूप ही हैं यह मानकर उनकी सेवा के लिये
प्राण भी दे देना। बड़े-बड़े लोगों में सम्मान प्राप्त हो अथवा समाज में प्रतिष्ठा बढ़े, इस प्रकार का दंभ वैश्यों को
स्पर्श नहीं करता। कपट छोड़कर, लोभ और दंभ का त्याग कर ब्राह्मण की सेवा में प्राण भी खर्च कर देना यही
वैश्यों का लक्षण है। इससे ही वैश्य जाति को परमार्थ की प्राप्ति होती है। सारांश वैश्य की ऐसी स्वाभाविक
प्रकृति होती है। हे उद्धव! शूद्र की प्रकृति के भी तीन प्रकार के कर्म होते हैं उन्हें भी तुम्हें निश्चय करके बताता
हूँ, सुनो।
शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया।
तत्र लब्धेन संतोषः शूद्रप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १९ ॥
शूद्र जाति का स्वधर्म यही है कि वह मनःपूर्वक ब्राह्मण की सेवा करे, उनकी सेवा निष्कपट भाव से करने
से, उनकी ही कृपा से उनकी उपजीविका चलती है। जहाँ घास और पानी हो वहाँ गृहस्थों की गायें ले जाये,
जंगली जानवर उन पर आक्रमण करें तो प्राण देकर भी उनकी रक्षा करे। गोरक्षा में प्राण देने पर उत्तम गति प्राप्त
होती है। जिसे गौ के प्रति दयाभाव रहता है, उसका मैं श्रीकृष्ण सदा सहायक होता हूँ। ब्राह्मण की चाकरी तथा
जानवरों की देखभाल का काम न मिले तो शूद्र उपजीविका चलाने के लिये मन्दिर में समार्जन करे। निष्कपट
भाव से श्रीहरि का आँगन झाडू पोंछा लगाकर लीप कर स्वच्छ रखे और वहाँ जो प्राप्ति हो उस पर निर्वाह करे।
वहाँ जब भी, जो भी मिले उससे अपना निर्वाह करे। यही शूद्र के स्वभाव की स्वधर्म कर्म स्थिति है। ब्राह्मण के
घर अग्निहोत्र आदि कर्म होते हैं और शूद्र इन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को प्रणाम करते हैं। इससे दोनों के ही धर्म का
निर्वाह होता है। गृहस्थाश्रम धर्म है तीनों आश्रमों को आश्रय देना, साथ ही तीनों आश्रमों के लोगों को अन्न-वस्त्र
देकर उनका संरक्षण करना। ब्रह्मचर्याश्रम का आचरण है गुरु की सेवा करना तथा वेदाध्ययन करते हुए जीवन-
यापन करना। उसे दान देने का अधिकार नहीं होता। ब्रह्मचारी को जो कुछ भी प्राप्त हो वह उसे गुरु को अर्पण
करना चाहिये। गुरु के सिवा यदि वह किसी अन्य को दानधर्म करेगा तो वह अधर्म होगा। वानप्रस्थाश्रम में
विशेषरूप से तप ही प्रमुख है। वेदोक्तविधि के अनुसार उसे अग्नि की सेवा करनी चाहिये। संन्यासी, ब्रह्मचारी
अथवा दीन-दुःखी आश्रम में आयें तो उन्हें यथाशक्ति अन्न देना चाहिये। यही वानप्रस्थ का आश्रमधर्म है।