श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
संन्यासी के लिये अहिंसा ही प्रमुख है। ज्ञान परिपाक से पूर्ण शान्ति प्राप्त होती है। जहाँ परिपथ न हो वहाँ जाकर
भिक्षा माँगना यही चतुर्थाश्रम का मुख्य धर्म है। अब इस वर्णाश्रम के बाहर के जो अंत्यज आदि लोग हैं उनके
स्वभाव का लक्षण भी भगवान बताते हैं।
अशौचमनृतं स्तेयं नास्तिक्यं शुष्कविग्रहः।
कामः क्रोधश्च तर्षश्च स्वभावोऽन्तेवसायिनाम्॥२०॥
इस श्लोक के आठ गुण त्यागने का जिसका मन नहीं होता वह भी अंत्यज की ही तरह है। स्वभाव का
यह लक्षण अत्यन्त निंदनीय है। जिसे स्नान, संध्या, स्वच्छता तथा अपना कर्तव्यकर्म अच्छा नहीं लगता, उसके
अन्तर में कृष्ण सर्प की तरह अपार विकल्प भरे रहते हैं। धतूरे का फल देखने में गोलमटोल होता है किन्तु
उसके अन्दर नशा और बाहर काँटे होते हैं। उसी प्रकार जो अंतर्बाह्य खरा है उसी का नाम है 'अशौच' अर्थात्
अमंगलता। शरीर श्वेत कुष्ट से भरा हुआ, नाक भी दिखाई न दे, मुँहफट अनर्गल पति की निंदा करने वाली स्त्री
जिस प्रकार अंतर्बाह्य अमंगल होती है वैसा ही अमंगल। इस प्रकार स्वभावतः ही जिसमें 'अशौचता' या
अमंगलता होती है वही अंत्यज का पहला गुण है। उसी प्रकार जिसके स्वभाव में दिन-रात नटखटपन नाचता
रहता है, वह अपने झूठे स्वभाव के कारण माँ, बाप तथा गुरु को भी ठगता है। होली के मौसम में जिस प्रकार
कोई रामकृष्ण नहीं कहता बल्कि आनंदोल्हास से जननेन्द्रिय दर्शक वीभत्स शब्दों का ही उच्चार करते हैं, उसी
प्रकार जिसे जागृति में, स्वप्न में अथवा सुषुप्तावस्था में असत्य ही अच्छा लगता है उसे प्रकृति स्वभाव के
अनुसार 'अंत्यज' ही समझना चाहिये। गाड़ कर रखी हुई माँ-बाप की दौलत भी एक बार देखने पर वह उसे
खोदकर निकालने से बाज नहीं आता वह बार-बार विश्वास दिलाकर गुरु की गठरी भी गायब कर देता है। कोई
धनवान मिल जाय तो नीचता के अनेक उपाय लगाकर अथवा बलात्कार से उसका सब कुछ लूट लेता है। इस
प्रकार दूसरे का माल हड़प करने के लिये चाहे जैसा अधर्म करने में जिसकी आसक्ति रहती है उसे 'चोरी' कहते
हैं। स्वधर्म कर्म पर जिसके मन में स्वभावतः ही विश्वास नहीं होता, जो वेद, शास्त्र, पुराण आदि को बकवास
समझता है, इसी का नाम है 'नास्तिकता'। उसमें स्वभाव से ही आस्तिक बुद्धि का अभाव रहता है। गाँठ में,
लाखों की दौलत होते हुए भी उसके मुँह में सदा 'नास्तिकता' ही भरी रहती है, परिवारजनों को भी विपत्तियों के
संकट में झोंकता है, यही अंत्यज का स्वभाव है। बिना कारण झगड़ा-टंटा, दूसरों का छल तथा हमेशा दाँत
कटकटाते रहना यह अंत्यज का जातिस्वभाव है। उसके पेट में सदा विद्रोह भड़कता रहता है, ऊपर से मीठी बातें
करता है, दृष्टि हमेशा क्रूर तथा पेट में द्वेष की आग भड़कती रहती है। कोई जीवनभर उपकार करे लेकिन जरा
सी बात पर उसका नाश करने का गुप्त संकल्प मन में धरता है। उपकार करने वाले पर अंत्यज प्राणांत भी
अपकार नहीं करता लेकिन उस प्रकार का द्वेष मन में रखता है जिसे 'शुष्कविग्रह' कहते हैं। जो इष्ट मित्रों में
फूट डालता है, बड़ों-बड़ों को संकट में डालता है, अमंगलता तथा नास्तिकता तो शिखर पर रहती है, ऐसे पुरुष
को 'अतिविग्रही' कहना चाहिये। अपना रत्तीभर लाभ न होते हुए भी दूसरे के कार्य का नाश करना, ऐसे व्यक्ति
को 'शुष्कविग्रही' कहते हैं। उद्धव ! जिसका ऐसा स्वभाव हो उससे अंत्यज भी डरते हैं। अब उसकी छलांग
कितनी लम्बी होती है, सुनो। कनक और कांता के लोभ की पराकाष्ठा रहती है। मन को क्षणभर के लिये भी
शान्ति नहीं रहती। स्त्री भोग की इच्छा के सम्बन्ध में तो पूछिये मत। बस, वह स्त्री हो इतना पर्याप्त है, फिर
सेव्यासेव्य का विचार मन को छूता भी नहीं। उसी प्रकार धन, फिर वह किसी भी मार्ग से क्यों न मिले। अनुचित
मार्ग से इच्छा की पूर्ति करना यही उसके स्वभाव की प्रवृत्ति होती है। उद्धव ! ऐसे जो हैं वे अंत्यज स्वभाव के