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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 484, कुल 869 में से

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पृष्ठ 484

४६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वधर्म का आचरण करना चाहिये। उसमें स्वधर्म के अनुरूप विषय सेवन कर वास्तविक विरक्तता साधे। यदि
उनमें भी वैराग्य न उत्पन्न हो तो वानप्रस्थ स्वीकार करना चाहिये। इस प्रकार एक आश्रम से दूसरे आश्रम में जाते
हुए वैराग्य सम्पादित कर फिर संन्यास ग्रहण करना चाहिये। लेकिन बिना किसी आश्रम के किसी को रहने का
अधिकार नहीं है। पूर्वाश्रम छोड़कर जो कोई दूसरे आश्रम में जाता है उसे उसके अगले आश्रम में जाने का
अधिकार है। लेकिन पुनः पिछले आश्रम में लौटने का विधि शास्त्र में नहीं है। जो मेरा भक्त तत्परता से मेरे भजन
में लग जाता है उसके लिये इन आश्रमों का नियम नहीं है। हे उद्धव! वह मेरे भजन से ही कृतकृत्य होता है यह
जान लो। सद्भाव से मेरी भक्ति करने से विवेक युक्त वैराग्य की योग्यता प्राप्त होती है, मेरी पूर्ण सत्ता ही उसके
हाथ लग जाती है, इसमें वह सायुज्यतामुक्ति देने पर भी उसे ग्रहण नहीं करता। ऐसे जो मेरे श्रेष्ठ भक्त हैं उन्हें
आश्रम का नियम लागू नहीं है। उनका सारा स्वधर्म मैं ही हूँ ऐसा श्रीकृष्ण ने कहा। उस श्रीपति ने पुनः कहा, हे
उद्धव! अब तुम्हें गृहस्थ के स्वधर्म का भी वर्णन करता हूँ, सुनो।
गृहार्थी सदृशीं भार्यामुद्वहेदजुगुप्सिताम्।
यवीयसीं तु वयसा तां सवर्णामनु क्रमात्॥ ३९॥
समापवर्तन करने के बाद व्रतबंध का भी विसर्जन करे और गुरु की आज्ञा लेकर विवाह कर ले। भार्या
अपने ही वर्ण की हो, अन्य तीन वर्णों की न हो। यदि अपने ही गोत्र की हो तो उसे वर्ज्य कर अपने ही वेदशाखा
की जाति की लड़की से विवाह करना चाहिये। जिसके माता और पिता दोनों पवित्र कुल के हों ऐसी दस लक्षणों
से युक्त अनिंद्य तथा जिसका कन्यादान करने में माता-पिता को आनन्द हो रहा हो वही उपयुक्त सम्बन्ध समझना
चाहिये। जन्मपत्रिका के अनुसार जो उम्र में पति से बड़ी है या समवयस्क है तो उन दोनों कन्याओं को त्याज्य
समझना चाहिये। जो लड़की पति से पाँच-सात वर्षों से छोटी हो उसी के साथ स्वधर्म के अनुसार विवाह करना
चाहिये। वही भार्या उत्तम है। कन्या आठ से लेकर दस वर्ष तक की हो उसी का पाणिग्रहण करना चाहिये।
इससे अधिक उम्र की लड़की 'वृषली' होती है ऐसा शास्त्रों ने निश्चित किया है। उसी प्रकार गर्भ धारण के लिये
आठ वर्ष से नीचे की भार्या अयोग्य है ऐसा शास्त्रों में लिखा है। ऐसे लक्षणों की जिसे बाधा नहीं है ऐसी पवित्र
कन्या देखकर उससे विवाह करें। अब शास्त्र के अविरुद्ध शुद्ध आश्रमधर्म कैसा होता है, सुनो।
इज्याध्ययनदानानि सर्वेषां च द्विजन्मनाम्।
प्रतिग्रहोऽध्यापनं च ब्राह्मणास्यैव याजनम्॥ ४०॥
ब्राह्मण को करने के लिये यजन, याजन, अध्ययन, अध्यापन, प्रतिग्रह और दान ये छः कर्म हैं। तीन वर्ण
द्विजन्मा हैं फिर भी वैश्य और क्षत्रिय को यजन, दान और अध्ययन इन तीन कर्मों का ही अधिकार है। किन्तु जो
जन्म से ब्राह्मण हैं उन्हें ही षट्कर्म का अधिकार है। इनमें से तीन अर्थात् यजन, अध्यापन और दान ये कर्म करने
से उन्हें परमार्थ की प्राप्ति होती है और शेष तीन कर्मों से उपजीविका चलती है। कौन से कर्म उपजीविका के
लिये उपयोगी हैं और किन कर्मों से परमार्थ की प्राप्ति होती है इन कर्मों का भेद तुम्हें बताता हूँ, सुनो। 'यजन'
अर्थात् यज्ञ करना, 'अध्ययन' अर्थात् वेद पठन करना और 'दान' अर्थात् दूसरों को धनधान्य देना ये तीन कर्म
परमार्थ का लाभ कराने वाले हैं। स्वयं गुरुत्व अर्थात् पौरोहित्य स्वीकार कर दूसरे से यज्ञ करवाना उसे 'याजन',
दूसरे को वेद पढ़ाना इसे अध्यापन और स्वयं दान देने को 'प्रतिग्रह' कहते हैं। अच्छे शिष्य मिल जाएँ तो इन
तीन कर्मों के योग से उपजीविका चलती है और गुरु बनने पर गुरुपूजा का सम्मान मिलता है जिससे जीविका भी