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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 480, कुल 869 में से

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पृष्ठ 480

४६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
के अंगुष्ट में ब्रह्मादिक अगणित देवताओं की भीड़ रहती है, जिसका नाम वैकुण्ठ और कैलाश में भी पूजनीय
है, जिसका नाम सुनते ही यम और काल थरथर काँपते हैं और ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर तीनों हाथ जोड़कर
खड़े रहते हैं, उसी प्रकार जो सारे वेदों का रहस्य है, वही सद्गुरु का स्वरूप है, यही शिष्य की निश्चित धारणा
होनी चाहिये। उसे साधारण मनुष्य समझ कर कभी उसका अनादर नहीं करना चाहिये। गुरु की निन्दा मुँह से
निकले तो समझ लो सर्वस्व नाश हो गया। यदि कोई निकट सम्बन्धी एकांत में सद्गुरु की निन्दा करने आये तो
जिस प्रकार धर्म परिवर्तन करने वाले का बहिष्कार किया जाता है, उसी प्रकार उसका त्याग करना चाहिये। यदि
यह सम्भव न हो तो स्वयं वहाँ से भाग जाये। यदि वह स्वयं ही सद्गुरु की निन्दा की बात करता है तो समझ
लो सब कुछ डूब गया, परमार्थ मिट्टी में मिल गया। ऐसे गुरु के प्रति पत्र, पुष्प, अन्न, धन इस सम्बन्ध में कभी
प्रवंचना न करे ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
सायं प्रातरुपानीय भैक्ष्यं तस्मै निवेदयेत्।
यच्चान्यदप्यनुज्ञातमुपयुञ्जीत संयतः ॥ २८॥
प्रातःकाल, दोपहर और सायंकाल अन्न, द्रव्य, पुष्प, फल आदि जो भी भिक्षा में प्राप्त हो उसे गुरु को देकर
उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहे। यदि गुरु आज्ञा दें तो उसमें से केवल उदर निर्वाह लायक अन्न लेकर ग्रहण
करें। ब्रह्मचारी को अन्न के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु ग्रहण नहीं करनी चाहिये। सुबह और शाम भोजन करना
ब्रह्मचारी के लिये विहित है। गुरु की आज्ञा से जितना भी अन्न मिले उससे क्षुधाशान्ति करनी चाहिये। उसे कभी
अच्छा या खराब नहीं कहना चाहिये। जिह्वा का लाड़ नहीं करना चाहिये। विषय विस्तार नहीं बढ़ाना चाहिये।
देह का निर्वाह हो इतना ही पर्याप्त है, ऐसी शिष्य की इच्छा होनी चाहिये। भोजन करते समय कुछ माँगना नहीं
चाहिये, उसके लिये मौन रहना चाहिये। अधिक अन्न खाने से वह गुरुसेवा में प्रतिबंध होता है। अधिक अन्न
खाने से निद्रा और आलस होता है और बहुत कम खाने से शरीर अपंग हो जाता है। गुरु सेवा के लिये वृत्ति
सावधान रखनी चाहिये। इसके लिये शिष्य का भोजन मर्यादित होना चाहिये। गुरु की सेवा के लिये शरीर सुदृढ़
रखना चाहिये। गुरुसेवा का यह लक्षण स्वयं जनार्दन बता रहे हैं।
शुश्रूषमाण आचार्यं सदोपासीत् नीचवत्।
यानशय्यासनस्थानैर्नातिदूरे कृताञ्जलिः ॥ २९ ॥
गुरुसेवा में तिलमात्र का भी अन्तर न करते हुए सदा उल्हास से तत्पर रहना चाहिये। गुरु यदि किसी वाहन
पर आरूढ़ हों तो स्वयं उनके साथ-साथ उत्साह से चलना चाहिये। वे यदि पैदल चल रहे हों तो उनका सामान
हाथ में लेकर उनके पीछे-पीछे चलना चाहिये। उनका मन देखकर उन्हें पानी, पान आदि देना चाहिये, वह जहाँ
बैठने वाले हों वहाँ आसन बिछाना चाहिये और उनके पैर दबाने चाहिये। सद्गुरु जब आसन पर बैठ जाएँ तो न
उनके बहुत निकट बैठना चाहिये और न बहुत दूर ही बैठना चाहिये। हमेशा उनके दृष्टिपथ में रहें। हाथ जोड़कर
सामने खड़े रहें। गुरु संकेत दें वह काम करना चाहिये। गुरु बिस्तर पर सोये हों उस समय उनके पास नहीं रहना
चाहिये। रात को यदि वे बुलायें तो सुनायी पड़े इतने अन्तर पर रहें। सेवा करने वाला एक मैं ही हूँ ऐसा
अभिमान करने से सारी सेवा व्यर्थ हो जायेगी। सेवा करते समय सारे सेवकों में मैं केवल रंकों में भी रंक हूँ यही
भाव रखना चाहिये। उसी प्रकार सेवा का कोई क्षुद्र काम करने में लज्जा नहीं करनी चाहिये। मन में किसी भी
प्रकार का आलस न धर गुरुजनों के प्रति सदा उल्लास का भाव रखना चाहिये।