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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 482, कुल 869 में से

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पृष्ठ 482

४६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मदन उनका वीर्यस्खलन करा देगा। उन स्त्रियों से हास्यविनोद करने से धर्म का मूल बीज ही नष्ट हो जायेगा।
इसलिये शुद्ध ज्ञानी लोग स्त्रीगुणों का वर्णन नहीं करते। स्त्रियों के हावभाव देखना, उनसे एकान्त करना, गुह्य
बातें करना, अनेक प्रकार के विनोद करना, शरीर से घर्षण करना, हँसी-मज़ाक अथवा श्रृंगारिक भाषण करना,
इतना भी यदि हो जाय तो वहाँ काम का आघात पड़ेगा और स्वधर्म डूब जायेगा तथा धैर्य का जो मूलतत्त्व है
उसका विनाश होगा। गृहस्थ की भी यदि परस्त्री से व्यवहार करने की यही प्रवृत्ति हो तो वह भी संकट में
पड़ेगा। स्त्री अग्नि के कुण्ड की तरह है और पुरुष घृत के घट की तरह है। अग्नि का सम्पर्क होते ही घृत
पिघलने लगता है। उसी प्रकार वृद्धावस्था में भी स्त्रियों के साथ एकान्त करने पर तथा हँसी मजाक की बातें
करने से उस पर भी काम का प्रहार हो सकता है। इसलिये स्त्रियों की संगत टालनी चाहिये, यही परमार्थ का
प्रमुख भाग है, यही बात श्रीकृष्ण ने अपने मुख से उद्धव को बतलायी। पराशर सरीखा महंत भी मत्स्योदरी से
रममाण हुआ। इससे स्त्री का एकान्त पुरुष के लिये अनर्थ का कारण है यह निश्चित रूप से समझना चाहिये।
पशु-पक्षी आदि मैथुन कर रहे हों तो उन्हें जानबूझ कर नहीं देखना चाहिये। देखने से काम उद्दीप्त होता है।
मत्स्य का मैथुन आँखों से देखने के कारण काम की ज्वाला भड़क उठी और ऋषिश्रेष्ठ सौभर ने मैथुन के लिये
करोड़ों तप नष्ट कर दिये। इसलिये काम का दर्शन या काम का स्मरण भी पुरुष के लिये बाधक है। इसलिये
काम का स्मरण भी नहीं करना चाहिये। हृदय में काम का संचार ही न हो ऐसा आचरण रखना चाहिये। श्रीकृष्ण
कहते हैं, सभी प्राणिमात्र मत्स्वरूप हैं यह मानना चाहिये। यही महत्व की बात है।
शौचमाचमनं स्नानं संध्योपासनमार्जवम्।
तीर्थसेवा जपोऽस्पृश्याभक्ष्यासम्भाष्यवर्जनम्॥ ३४॥
शौच, आचमन, स्नान, संध्या, तर्पण, पूजा, अर्चा, जपादि अनुष्ठान, भक्ति से करना चाहिये तथा तीर्थसेवन
आदि करना चाहिये। अधर्म का अथवा अकर्म का जरा भी स्पर्श नहीं होने देना चाहिये, संकटकाल होने पर भी
अभक्ष्य का सेवन नहीं करना चाहिये। जो व्रतस्थ हो उसे रजस्वला अथवा निंद्य लोगों से भाषण नहीं करना
चाहिये। निंदा अथवा स्तुति इस सम्बन्ध में मौन रखना चाहिये। श्रीकृष्ण कहते हैं, उद्धव! अब सभी आश्रमों के
स्वधर्म नियमों का क्या लक्षण होता है, उसे अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो।
सर्वाश्रमप्रयुक्तोऽयं नियमः कुलनन्दन।
मद्भावः सर्वभूतेषु मनावाक्कायसंयमः॥ ३५॥
हे यदुकुलदीपक सूज्ञ उद्धव! सुनो। सभी वर्णाश्रम धर्म लक्षणों की निष्ठा एक ही है। वह यही है कि
काया, वाचा तथा मन से अपना संयमन कर समस्त प्राणिमात्रों के प्रति ब्रह्मस्वरूप की अखण्ड भावना रखनी
चाहिये। श्रीहरि कहते हैं, इस प्रकार समस्त प्राणिभाग पर मत्स्वरूप की दृढ़ भावना अंकित होने पर ऐसे नैष्ठिक
ब्रह्मचारी को मोक्षफल की प्राप्ति होती है।
एवं बृहद्व्रतधरो ब्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन्।
मद्भक्तस्तीव्रतपसादग्धकर्माशयोऽमलः॥ ३६॥
इस प्रकार जो ब्रह्मचारी इस कठोर व्रत का पालन करता है, सभी प्राणियों के प्रति मेरी ही भावना रखता है
और वह भावना अंतःकरण में निरन्तर रखता है तथा इस प्रकार मेरे भजन करने के कारण उसकी वासनायें