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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

४४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
संख्यानं परमाणूनां कालेन क्रियते मया।
न तथा मे विभूतीनां सृजतोऽण्डानि कोटिशः ॥ ३९ ॥
कालरूप से मैं पृथ्वी के परमाणुओं की भी गणना कर सकता हूँ, किन्तु मेरी विभूतियों की संख्या की गणना
मैं भी नहीं कर सकता। मैंने अनन्त ब्रह्माण्डों का निर्माण किया है। उन्हें मैं नहीं गिन सकता, फिर मेरी सारी
विभूतियाँ कौन वाचाल गिन सकता है? मैं सर्वत्र नारायण हूँ, मेरी विभूतियाँ गिनने की शक्ति मुझमें नहीं है फिर
उनका वर्णन कैसे करें? हे उद्धव! मनुष्य में मेरी विभूति किस रूप में रहती है, उसके सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो।
तेजः श्रीः कीर्तिरैश्वर्यं ह्रीस्त्यागः सौभगं भगः।
वीर्यं तितिक्षा विज्ञानं यत्र यत्र समेऽशवः ॥ ४० ॥
जिसकी प्रतापशक्ति (ओजस्विता) अत्यन्त प्रबल है, जिसके पास लक्ष्मी निरन्तर वास करती है, जिसके
ऐश्वर्य की कोई सीमा नहीं है, स्वधर्म में जिसकी बहुत कीर्ति है, जिसके वैभव का सामर्थ्य इतना है कि वह सम्पूर्ण
त्रैलोक्य को अपनी आज्ञा में रखता है और जिसकी दान देने की तो कोई सीमा ही नहीं है, जिसका भाग्य निरन्तर
बहता ही रहता दिखाई देता है, जिसका सामर्थ्य अत्यन्त विलक्षण है और जिसकी बात का कोई उत्तर नहीं दे
सकता, जिसके भाग्य की शालीनता सभी लोगों के नेत्रों को मनोहारी लगती है, जिसे सहनशीलता के प्रति लगाव,
निंद्यकर्म के प्रति लज्जा होती है और व्यावहारिकता की जो साक्षात मूर्ति है, ऐसे लक्षण जिसमें होते हैं वह मेरी
विभूति है, यह जान लो। इतना ही क्यों, इनमें से एक भी लक्षण जिसमें हो वह भी मेरी विभूति है यह जान लो।
एतास्ते कीर्तिताः सर्वाः संक्षेपेण विभूतयः।
मनोविकारा एवैते यथा वाचाभिधीयते ॥ ४१ ॥
संक्षेप में ही जिन विभूतियों के सम्बन्ध में तुम्हें बताया उन्हें हे उद्धव! मनोविकारों के अनुभव के रूप में
ही जानना चाहिये। साधकों की साधनस्थिति को देखते हुए मेरी विभूतियों को सत्य ही जानना चाहिये।
परमार्थदृष्टि से विचार करने पर उन्हें काल्पनिक समझना चाहिये। वास्तव में मेरा स्वरूप अद्वैत है यह ध्यान में
रखो। मुझे नाम नहीं है, रूप नहीं है, गुण नहीं है और वर्ण भी नहीं है। अतः नाना प्रकार की विभूतियों का यदि
लक्षण बताना हो तो वह मिथ्या ही होगा।
वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणान् यच्छेन्द्रियाणि च।
आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्पसेऽध्वने ॥ ४२ ॥
मेरा स्वरूप नित्य निर्विकार होने के कारण मन को, बुद्धि को अथवा वाचा को भी उसकी थाह नहीं लग
पाती, फिर बेचारी इन्द्रियाँ क्या पार पायेंगी? प्राण को भी इस स्वरूप का ठीक-ठीक पता नहीं चलता। इसलिये
शमदम के अनुक्रम से मन, बुद्धि, वाणी और इन्द्रियों का संयम करो और प्राणधर्म के अनुसार प्राण का नियंत्रण
करो जिससे तुम आत्मस्वरूप तक पहुँचोगे। अब यदि मन, बुद्धि, वाचा आदि इन्द्रियों का नियमन करने का मर्म
नहीं जानता ऐसा कहोगे तो उसका अनुक्रम भी सुलभ रीति से बताता हूँ। वाणी का संयम मेरे नाम से करें, मन
का नियमन ध्यान सामर्थ्य से करें, प्राण का नियमन प्राणत्याग से करें और इन्द्रियों का नियमन दम से अर्थात्
संयम से करें और बुद्धि का नियमन आत्मविचार से करें, जीव का नियमन परमात्मसुख से करें। इतना करने पर
तुम सहज ही, निश्चित रूप से मत्स्वरूप हो जाओगे। एक बार मत्स्वरूप होने पर संसार दिखायी ही नहीं पड़ेगा।

सोलहवाँ अध्याय ४४९
जन्म-मरण की वार्ता समाप्त होगी और आने-जाने का क्रम समाप्त होगा। मैंने बतायी हुई नियम पद्धति के
अनुसार नियमन करने की बात जिसकी समझ में नहीं आती वह कोटि-कोटि दुःख भोगता है। उसका भी वर्णन
करता हूँ।
यो वै वाङ्मनसी सम्यगसंयच्छन् धिया यतिः।
तस्य व्रतं तपो दानं स्रवत्यामघटाम्बुवत्॥ ४३ ॥
मैंने बताये हुए नियमों के अनुसार जो मन, बुद्धि और इन्द्रियों का निष्ठापूर्वक नियमन नहीं करता उसके
साधन व्यर्थ हो जाते हैं। कच्ची मिट्टी के बर्तन का पानी जिस प्रकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार उसका व्रत,
तप, दान, योग, याग, शब्दज्ञान ये सब व्यर्थ हो जाते हैं। जिस प्रकार राख में होम करने से अथवा अमंगल स्थिति
में कर्मों का आचरण करे या कुपात्र को दान दें वैसी ही स्थिति साधनों की होती है। ऊसर पर बीज डालने से
अथवा भिखारी ब्राह्मण को भोजन का निमंत्रण दे अथवा बाँस को इच्छायें होने लगे उसी प्रकार उन साधनों की
स्थिति समझनी चाहिये। इस प्रकार हे उद्धव ! यदि मन में यदि विधिपूर्वक नियम का पालन न किया जाय तो
सारे साधन देखते-देखते व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये मन आदि इन्द्रियों की जो वृत्ति है उसका नियमन करना
चाहिये ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण उद्धव को बताते हैं।
तस्मान्मनोवचः प्राणान् नियच्छेन्मत्परायणः।
मद्भक्तियुक्तया बुद्ध्या ततः परिसमाप्यते॥ ४४ ॥
देखो! मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ तथा प्राण इनका नियमन अवश्य करना चाहिये, इसे ध्यान में रखो। इस प्रकार
वृत्ति को सावधान रखते हुए जो मेरा भजन करता है उसकी विषय वासनायें जल जाती हैं और मेरे भक्तिमार्ग पर
चलने से निर्विकल्प शान्ति उत्पन्न होती है। भक्तिमार्ग पर चलने से सारे साधन लज्जित हो जाते हैं। भक्ति के
कारण ही मैं लक्ष्मीपति प्रकट होकर मेरे भक्तों की संसार से निवृत्ति करता हूँ। यदि मेरे भक्तों को सांसारिक बाधा
होती है तो मुझ भगवान को ही उससे लज्जा होती है। मैं निजभक्तों को कष्ट में नहीं रहने देता। प्रह्लाद का छल
होते ही मैं नरसिंह रूप में शुष्क काष्ठ में प्रकट हुआ और गजेन्द्र के लिये वैकुण्ठ छोड़कर दौड़ पड़ा। कौरव
द्रौपदी का छल कर रहे थे अतः मैंने तत्काल उनके मुँह में कालिख पोत दी। अग्नि ने गोपालों को पीड़ा दी उस
समय मैं वह दावाग्नि पी गया। इन्द्र गोकुल को कष्ट दे रहा था, उस समय मैंने गोवर्धन पर्वत हाथ पर उठा
लिया। उसी प्रकार गोपियों का मनोरथ पूरा करने के लिये मैं श्रीपति कामी बन गया। अर्जुन की प्रतिज्ञा पूर्ण हो
इसलिये मैंने दिन में ही सूर्य को छिपा दिया और जयद्रथ को मारने का पराक्रम करा कर अर्जुन को बचाया।
अम्बरीष का गर्भवास मैंने आनन्दपूर्वक झेला। मैं श्रीकृष्ण कभी भी अपने भक्तों को नीचा नहीं देखने देता। भक्तों
के चरणों की धूल मैं श्रीपति अपने हृदय पर धारण करता हूँ। इतना ही नहीं, भक्ति के कारण मैंने भालू और
बन्दरों को भी अपने पास बिठाया। इसीलिये हे उद्धव ! मैं तुम्हें बार-बार कहता हूँ कि मेरी भक्ति करनी चाहिये।
मेरा भजन करने से भक्त सहज ही मद्भाव प्राप्त करता है। मेरी ही भावना मन में धारण कर भजन करने से मैं
अनन्त उसके हाथ आ जाता हूँ और बाद में उसका सेवक बन जाता हूँ। इतना प्यार है मुझे भक्ति से। यहाँ मेरी
भक्ति से सुलभ अन्य कोई साधन ही नहीं है यह जानकर ही मैंने तुम्हें भक्तिमार्ग पर लगाया है। सद्भक्ति प्राप्त हो
जाने पर संसार बिचारा क्या है? मेरे भक्त चारों मुक्तियों को दूर हटाकर आत्मसुख का उपभोग करते हैं। मेरे
भक्तों की महिमा अत्यन्त अतर्क्य और गहन है। इतना कहकर श्रीकृष्ण उद्धव को प्यार से सहलाने लगे। श्रीकृष्ण

४५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
के हाथ के स्पर्श से उद्धव को जाने क्या हुआ ? कुछ ऐसा ही हुआ जैसे अभी-अभी ब्यायी हुई गौ का बछड़ा माँ
के दूध से आह्लादित होता है। जिस प्रकार चकोर चन्द्रमा के किरणों से अंतर्बाह्य तृप्त रहता है अथवा मेघ को
देखकर मोर आनन्द से नाचने लगता है, उसी प्रकार उद्धव भी आत्मानंद में पूरी तरह रंग गया और यह भूल गया
कि मैं भगवान का भक्त हूँ और श्रीकृष्ण भी भूल गये कि वे भगवान हैं। इस प्रकार वे दोनों जब एकरूप होकर
मस्त हो गये थे, तभी वहाँ परमानन्द की पताका स्वानंद से फहराने लगी। इस भक्तिसुख का माधुर्य जिसके भाग्य
में है वही जाने। भजनरूपी व्यवसाय में उद्धव को श्रीकृष्ण का लाभ हुआ। एकनाथ जनार्दन की शरण में गया
इसीलिये भजनसुख का रहस्य और भक्तों के अंतःकरण का रहस्य अकेले उसकी समझ में आया। भक्तों के प्राण
उस परमात्मा ने गोकुल में ग्वाला बनकर तथा ग्वालों के साथ हिल-मिल कर गोपियों और गोपालों का उद्धार
किया। यदि केवल उनके ही खेल-खेल कर बालगोपालों का उद्धार किया तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
लेकिन उसकी अपूर्व कला और उदार लीला तो कुछ और ही है। उसे सुनिये। पर्वत, पाषाण, तृण, भृंग, मत्स्य,
मृग, मगर, उसी प्रकार व्याघ्र, वनचर, सर्प आदि विषैले प्राणी, कबूतर, मोर आदि गोकुल के प्राणियों का उस
कृपालु एवं सर्वसमर्थ श्रीकृष्ण ने स्वयं अपनी लीला से ही उद्धार किया। पिता के वचन के बहाने, सीता के
वियोग के कारण श्रीरामचन्द्र ने रीछ, बन्दर और राक्षसों का भी उद्धार किया। अब इससे भी बड़ी लीला सुनिये।
अयोध्या से लेकर लंका के बीच के मार्ग में जो भी वृक्ष, वनस्पति, ढोके, पत्थर, पर्वत, घास जैसी तुच्छ वनस्पति
और कृमि कीटक थे उन सबका श्रीरामचन्द्र ने अपनी लीला से ही उद्धार किया। इस प्रकार वह जनार्दन नाना
प्रकार के अवतार लेकर जब सभी का उद्धार करता रहता है तो उसने एक एकनाथ को पावन कर दिया, इसमें
आश्चर्य क्यों माना जाय ? लेकिन उसने एक बड़ा आश्चर्य किया कि मुझ जैसे मूढ़ के मुँह से श्रीमद्भागवत के
शब्द देशी भाषा में बुलवाये। इसका मुझे भी बहुत बड़ा आश्चर्य है। जिसकी ऐसी कृपा है उस जनार्दन की ही
शरण में यह एकनाथ है। उसके ही चरणों का स्मरण कर यह सोलहवाँ अध्याय वह पूर्ण करता है।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णार्जुन संवादे
एकाकार टीकायां विभूतियोग नाम षोडशोध्यायः ॥ १६ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु। श्री विट्ठलार्पणमस्तु।

सत्रहवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप सद्गुरु! तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम महामेरु स्वरूप हो। सूक्ष्म स्वरूप में तुम पर्वत हो
यह प्रतीत होने पर भी चैतन्यरूप में तुम अत्यन्त महान हो तथा सभी का आधार हो। वैकुण्ठ, कैलाश आदि
तुम्हारे आत्मज्ञान के अत्यन्त उच्च शिखर हैं। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर तुम्हारे ही सहारे वास करते हैं। यह
त्रैलोक्य और सारे लोक तुम्हारे ही आधार पर टिके हुए हैं। समस्त प्राणिमात्र की उत्पत्ति, स्थिति और अन्त में
विलय तुम्हारे में ही होता है। देवता, दैत्य, छोटे, बड़े, सौम्य, क्रूर आदि विविध प्रकार के भूत धारण करके भी
तुम्हारा स्वरूप निर्विकार है। उसमें विवेक का खेत है तथा चिद्रत्न की खानें हैं। उसका एक टुकड़ा भी हाथ लग
जाय तो साधारण आदमी बड़ा व्यापारी बन जायगा। उस पर्वत पर उगी औषधियों का तो बड़ा चमत्कार है।
उनका सेवन करने से वे उन्हें अजर-अमर कर देती हैं। उस पर ज्ञान गंगा के सोते भी निरन्तर बहते रहते हैं। जो
देवताओं तथा मनुष्यों का विश्राम स्थल है, जो ब्रह्मचर्यादि सभी आश्रमों का आश्रम है, जो क्रियाकर्मों का
नैष्कर्म्य है और जो जीवों का निजधाम है, जो भजन का क्षेत्र, भक्तों के जीवन का बगीचा है, जो पसन्द की भी
पसन्द है और जो आत्मानुभव से माधुर्य का भी माधुर्य है ऐसा वह सद्गुरु रूप महामेरु जो कठोरता के बिना ही
सबका आधार है, जिसके कारण साधकों का जीवन भी सुखमय हो जाता है, उन साधकों का समाधान, शिष्यों
के लिये तो आत्मानंद रूप मेघ, मुमुक्षुरूप चातकों का जीवन ऐसा जो जनार्दन स्वामी है वह प्रसन्न हो उठा।
उसके चरणों के कृपाप्रसाद से श्रीमद्भागवत के एकादशस्कंध का बड़े आनन्द से वर्णन किया। उसमें उद्धव ने
श्रीकृष्ण से विभूतियों के बारे में पूछा। उनका वर्णन सोलहवें अध्याय में लक्ष्मीपति ने भजनप्रीत्यर्थ यथार्थ रीति
से किया। उस विभूतिवर्णन की विशेष बात यह है कि उसमें श्रीकृष्ण ने कहा कि भक्तों का जो कर्म है, वह मैं
आत्माराम ही हूँ। उसमें एक शंका उत्पन्न हुई कि निरन्तर कर्म करते हुए कितने ही लोग केवल कर्मठ हो गये हैं,
जिनकी कोई गिनती नहीं है। तो कर्म से कैसे मुक्ति मिलती है ? इच्छा से कर्म करते समय कर्म में कर्तव्यता का
अभिमान न हो और कर्म से मोक्ष प्राप्ति हो ऐसा उपाय स्वयं पूछे। क्योंकि लक्ष्मीपति ने स्वयं ही बताया कि
सात्त्विक जो कर्म करते हैं वह कर्म ही मेरी विभूति है। यह बात सोलहवें अध्याय के अन्त में बतायी गयी है।
स्वयं होकर स्वकर्म का आचरण करने से वह कर्म ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है वह जो कर्मक्रिया का मर्म है उसे
सरल ढंग से बताने के लिये भगवान से कहें। उद्धव के मन में यही उद्देश्य था इसलिये इस शंका का समाधान
करने के लिये व भगवान से वर्णाश्रम की तथा स्वधर्म की पृष्ठभूमि ही पूछने लगा।
उद्धव उवाच
यस्त्वयाभिहितः पूर्वं धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः।
वर्णाश्रमाचारवतां सर्वेषा द्विपदामपि॥ १॥
उद्धव ने कहा, हे भक्तों के भगवान ! तुम्हारी आत्मविभूति का श्रवण करते हुए मेरे मन में आया कि स्वधर्म से
किस प्रकार भक्ति का उदय होगा। तुम तो कल्प के प्रारम्भ से ही अत्यन्त सहृदयता से कहते आ रहे हो कि स्वधर्म
कर्म से ही भक्ति प्राप्त होती है और इस सम्बन्ध में तुमने वर्णाश्रम का उत्कृष्ट प्रतिपादन किया है। सभी मनुष्यों को
उत्तम गति और भगवद्भक्ति स्वधर्म से प्राप्त होती है इसका तुमने ही यथार्थ और निश्चित निरूपण किया है।

४५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यथानुष्ठीयमानेन त्वयि भक्तिर्नृणां भवेत्।
स्वधर्मेणारविन्दाक्ष तत् समाख्यातुमर्हसि ॥२॥
हे कमलनयन अच्युत! सुनो। जिस स्वधर्म का आचरण करने से तुम्हारी भक्ति स्वाभाविक ढंग से भक्तों
को प्राप्त होती है उस कर्णकौशल्य का लक्षण, हे कमलनयन! माधव! कृपामूर्ति! मुझसे निवेदन करें। हे
लक्ष्मीपति! शायद तुम यह कहोगे कि मैंने कल्प के प्रारम्भ में स्वधर्म की यह स्थिति किसे बतायी ? तो इस
सम्बन्ध में मेरी विनती सुनो।
पुरा किल महाबाहो धर्मं परमकं प्रभो।
यत्तेन हंसरूपेण ब्रह्मणेऽभ्यात्थ माधव ॥३॥
जिसकी बाहों का प्रताप अद्भुत रहता है, जो विश्व का मर्यादा का धर्मसेतु व्यवस्थित रूप से रखना
जानता है उसे 'महाबाहु' कहते हैं। स्वधर्म कर्म का प्रकाशक अनादि वक्ता एक तुम ही हो और वर्णाश्रम का
विचार ब्रह्मदेव से कथन करने वाले उपदेशक भी तुम ही हो। तेरहवें अध्याय में तुमने हंस रूप में स्वधर्म का
निश्चित विचार विस्तारपूर्वक बताया और उसमें से ही आत्मज्ञान का रहस्य ढूँढ़कर मुझे उत्तम ढंग से बतलाया।
लेकिन तुमने हंसरूप से स्वयं ही जो स्वधर्म बतलाया उसमें के स्वधर्म का लक्षण और उसका निरूपण मेरी
समझ में नहीं आया। इसलिये सनत्कुमार ने तुम्हारे मुख से जिस आश्रमधर्म का भक्तिपूर्वक श्रवण किया, उसे
मुझे बतायें। अब तुम यदि यह कहोगे कि परम्परा से सनत्कुमार द्वारा ही धर्म का प्रसार हुआ है अतः उसको
समझ कर तुम उसका रहस्य जान लो। किन्तु हे श्रीकृष्ण! मुझसे यह नहीं होगा।
स इदानीं सुमहता कालेनामित्रकर्शन।
न प्रायो भविता मर्त्यलोके प्रागनुशासितः॥४॥
काम, क्रोध, लोभ, अभिमान आदि षड्रिपु भक्तों के बहुत बड़े बैरी हैं, उनका तुम संहार करते हो
इसीलिये तुम्हें अरिमर्दन कहते हैं। भक्तों के लिये शत्रु का नाश करने वाला तुम्हारे बिना त्रिभुवन में कोई नहीं है
इसलिये मैं अनन्य भाव से तुम्हारी शरण आया हूँ। कल्प के प्रारम्भ में तुमने सनकादिकों को उपदेश किया, उस
उपदेश को अब काफी लम्बा समय व्यतीत हो गया है इसलिये अब किसी के पास वह धर्म नहीं रह गया है।
आज के युग में लोग स्वधर्म में तत्पर नहीं रहते। स्वधर्म का विचार भूल कर वे कामासक्ति तथा उदरपूर्ति में ही
सादर लिप्त रहते हैं। इसलिये जिससे यथार्थ धर्म अंतःकरण पर अंकित हो सके ऐसा उपदेशक ही नहीं रह गया
है। इसलिये हे वैकुण्ठाधिपति! स्वधर्म की निष्ठा के बारे में मुझे तुम ही बताओ।
वक्ता कर्ताविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि।
सभायामपि वैरिञ्च्यां यत्र मूर्तिधराः कलाः॥५॥
कर्त्रावित्रा प्रवक्त्रा च भवता मधुसूदन।
त्यक्ते महीतले देव विनष्टं कः प्रवक्ष्यति ॥६॥
हे श्रीकृष्ण! इस संसार में जिसका ज्ञान मात्रा से आच्छादित नहीं है, ऐसा धर्मोपदेश तुम्हारे सिवा और कोई
नहीं दे सकता है। कुछ लोग शास्त्रवचन की मीमांसा कर कर्मों का प्रतिपादन करते हैं लेकिन उन कर्मों का
आचरण किस प्रकार किया जाय यह उनकी भी समझ में नहीं आता। इसीलिये हे भगवन्! धर्म का कर्ता, धर्म

सत्रहवाँ अध्याय ४५३

का वक्ता और धर्म का विस्तार कर उसका संरक्षण करने वाला तुम्हारे सिवा कोई और नहीं हो सकता। यदि इस
लोक में भी देखें तो तुम्हारे जैसा सर्वज्ञ कोई नहीं है, इतना ही नहीं यदि विस्तार में देखें तो तुम्हारे जैसा उपदेशक
त्रैलोक्य में भी नहीं है। यदि सत्यलोक में देखें तो वहाँ चारों वेद, षड्दर्शन, इतिहास, स्मृति, पुराण ये साक्षात
खड़े दिखायी देते हैं। लेकिन वहाँ भी सनकादिकों के प्रश्नों का उत्तर ब्रह्मदेव नहीं दे पाये। तब तुमने हंस रूप में
वहाँ आकर उनका समाधान किया। ब्रह्मदेव की सभा में भी तुम्हारे जैसा वक्ता नहीं है। तुम मूर्तिमंत ब्रह्म हो और
केवल भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये ही इस लोक में तुम्हारा अवतार हुआ है। तुमने सभी कर्मधर्म की
स्थापना कर उसके अनुसार आचरण भी कर दिखाया है। तुम्हारे निजधाम जाने पर फिर स्वधर्म का उपदेश कौन
करेगा ? सारांश, हे श्रीकृष्ण ! भक्ति से युक्त स्वधर्म का रहस्य यथार्थ रीति से प्रतिपादित करने का सामर्थ्य तुम्हारे
सिवा किसी अन्य में नहीं है। तुम जगज्जीवन भक्तों के सहायक हो, भक्तों के अभिमानरूपी मदमत्त हाथी का मद
शान्त करने वाले हो इसीलिये तुम्हें 'मधुसूदन' कहते हैं। ऐसी प्रार्थना कर उद्धव आगे बोलने लगा।
तत्त्वं नः सर्वधर्मज्ञ धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः।
यथा यस्य विधीयेत तथा वर्णय मे प्रभो ॥७॥
तुम सर्वज्ञ होते हुए ज्ञान की मूर्ति हो। अतः मनुष्य के कर्मों की गति तथा वर्णाश्रम धर्म का रहस्य मुझे
यथार्थ रूप में बतायें। उसी प्रकार वर्णबाह्य लोगों का कर्म तथा उनका जो विहित धर्म है उसके बारे में भी
बतायें। इस प्रकार उद्धव ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की, तब मेघश्याम श्रीकृष्ण प्रसन्न हुआ सभी लोगों के हित की
दृष्टि से उद्धव ने किया प्रश्न सुनकर योगेश्वर शुक्राचार्य भी आनन्द से अभिभूत हो गये। उन्होंने परीक्षित से
कहा, उद्धव की बुद्धि धन्य है क्योंकि उसने श्रीकृष्ण की प्रार्थना कर सारे संसार पर उपकार कर दिया है।
श्रीशुक उवाच
इत्थं स्वभृत्यमुख्येन पृष्टः स भगवान् हरिः।
प्रीतः क्षेमाय मर्त्यानां धर्मानाह सनातनान् ॥८॥
शुक्राचार्य बोले, हे परीक्षित! सावधान चित्त से सुनो। उस उद्धव का प्रश्न सचमुच ही धन्यवाद के योग्य
है। उसने स्वकर्म से ही मुक्ति के बारे में पूछा है। जो सारे सेवकों में अत्यन्त प्रिय और श्रीकृष्ण को अच्छा लगा,
जिसके बिना श्रीकृष्ण का मन कहीं नहीं लगता था, अपनी गुप्त बात श्रीकृष्ण उसको ही बताता था, उसके प्रश्न
का उत्तर देने में रमावल्लभ ने एक क्षण का भी विलम्ब नहीं किया। ब्रह्मदेव आदि को भी जो दुर्लभ है वह
परमात्मा उद्धव को बिलकुल सुलभ हो गया था। इसलिये सेवकों में प्रमुख स्थान इस संसार में उद्धव को प्राप्त
हुआ था इसलिये उसी ने भगवान की प्रार्थना कर, स्वकर्म से मुक्ति का उपाय क्या है यह प्रश्न पूछा था। श्रीकृष्ण
ने भी केवल उद्धव के लिये स्वधर्म से मोक्ष का मार्ग बताया। चातक का स्वर सुनते ही जिस प्रकार मेघ गर्जन-
सर्जन करके जल की वृष्टि करता है अथवा बछड़े का स्वर सुन कर गाय रंभाने लगती है, उसी प्रकार उद्धव का
भाषण सुनकर श्रीकृष्ण ने आत्मगर्जना की और प्रसन्न होकर कहने लगे।
श्रीभगवानुवाच
धर्म्य एष तव प्रश्नो नैःश्रेयसकरो नृणाम्।
वर्णाश्रमाचारवतां तमुद्धव निबोध मे॥९॥

४५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जिस प्रकार एकमेव पुत्र रहने पर माँ उसकी कोई बात अधूरी नहीं छोड़ती उसी प्रकार उद्धव श्रीकृष्ण का
लाडला था इसीलिये वह उसका भाषण व्यर्थ नहीं जाने देना चाहता था। श्रीहरि आनन्द से बोले, उद्धव! तुम्हारी
वाणी धन्य है। तुमने सबके लिये मोक्षमार्ग का यह सोपान ही तैयार कर दिया। तुम्हारे प्रश्न का उत्तर यह है कि
जो भी वर्णाश्रमी पुरुष हैं, उनके लिये स्वधर्म ही मोक्षदायी है। उद्धव! कल्प के प्रारम्भ से प्रवृत्त हुई स्वधर्म
संस्था की पुरातन युग से चली आ रही कथा तुम्हें सुनाता हूँ। ध्यान देकर सुनो।
आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृतः।
कृतकृत्याः प्रजा जात्या तस्मात् कृतयुगं विदुः ॥ १०॥
वेदः प्रणव एवाग्रे धर्मोऽहं वृषरूपधृक्।
उपासते तपोनिष्ठा हंसं मां मुक्तकिल्बिषाः ॥ ११॥
कृतयुग में स्थिति यह थी कि तब चार वर्ण नहीं थे, अनेक शास्त्रों का वेदाध्ययन अथवा कर्माचरण भी
नहीं था। उस समय सभी लोग ‘सोहं हंसा' अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ इसका निरन्तर ध्यान करते थे। इसलिये उस
काल में 'हंस' यही सबका वर्ण था। उस समय 'ओंकार' रूप से ही वेदपठन होता था और तप, दया, सत्य तथा
शुद्धता इन चार पैरों से वृषभरूपी धर्म मैं ही था। उस समय अधर्म का नाम भी नहीं था, यह जान लो। उस
समय सत्त्वगुण श्रेष्ठ था। इसलिये सब लोग सत्य पर ही चलते थे। सभी लोग धर्मपरायण थे। कपट का उस
समय जन्म ही नहीं हुआ था। उस काल के धर्मनिष्ठ लोगों के अंतःकरण में पराया धन और परायी स्त्री की
अभिलाषा स्पर्श भी नहीं करती थी। उस काल के धर्मनिष्ठ लोगों की आत्मस्वरूप निष्ठा 'परब्रह्म मैं हूँ' में रहती
थी। यही मेरा श्रेष्ठ भजन है और इसी को 'तपोनिष्ठा' कहते हैं। उस समय 'स्वर्ग' और 'नरक' की वार्ता ही
नहीं थी। अधर्म करने की बात स्वप्न में भी नहीं आती थी। इस प्रकार सारी प्रजा स्वधर्माचरण से ही कृतकृत्य
हो जाती थी। इसीलिये उसे 'कृतयुग' कहते हैं।
त्रेतामुखे महाभाग प्राणान्मे हृदयात्त्रयी।
विद्या प्रादुरभूत्तस्या अहमासं त्रिवृन्मुखः ॥ १२ ॥
हे उद्धव! इस कलियुग में तुम्हारे भाग्य पर मुझे आश्चर्य होता है। कृतयोग के लोगों की अपेक्षा तुम पर
मुझे अधिक विश्वास है। त्रेतायुग में कर्म प्रकट हुआ। मैं विराट्स्वरूप पुरुषोत्तम हूँ, मेरे श्वासोच्छ्वास से तीन
वेद उत्पन्न हुए और उन वेदों का विस्तार हुआ। तब तीन प्रकार की विद्या, उनके अनेक भेद, अनेक मंत्र और
अनेक छन्द तथा ऋग्वेद आदि मिलाकर तीनों वेदों का अपनी-अपनी शाखाओं के रूप में उदय हुआ। उन वेदों
से त्रिमेखला युक्त तीन यज्ञ उत्पन्न हुए। वे मद्रूप ही हैं। उस यज्ञ में अध्वर्यु उद्गाता का विशिष्ट कर्म होने लगा।
इस प्रकार का जो यज्ञकर्म है वह भी मद्रूप ही है। उनमें अधिकार का मर्म अर्थात् वर्णाश्रम का वर्णन अगले दो
श्लोकों में श्रीकृष्ण बतला रहे हैं।
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा मुखबाहूरुपादजाः।
वैराजात् पुरुषाज्जाता य आत्माचारलक्षणाः ॥ १३॥
विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण का जन्म हुआ, बाहुओं से क्षत्रिय और जाँघों से वैश्य। शूद्रों का जन्म पैरों
से हुआ, इसे ध्यान में रखो। इस प्रकार चारों वर्ण उत्पन्न हुए। वे अपने धर्म के अनुसार आचरण करें यही उनका

सत्रहवाँ अध्याय ४५५
मुख्य लक्षण है। इस प्रकार विराट पुरुष से चारों वर्णों की उत्पत्ति हुई है। अब चारों वर्णों की स्थिति बताता हूँ।
उसे सुनो।
गृहाश्रमो जघनतो ब्रह्मचर्यं हृदो मम।
वक्षःस्थानाद् वने वासो न्यासः शीर्षणि संस्थितः ॥ १४ ॥
मेरा कटि के नीचे का प्रदेश गृहस्थाश्रम का है। ब्रह्मचर्य मेरे हृदयस्थान में है और वानप्रस्थ की महिमा मैं
वक्षस्थल पर धारण करता हूँ। चतुर्थाश्रम, जिसे 'संन्यास' कहते हैं, वह वास्तव में मेरे मस्तक पर रहता है।
वर्णानामाश्रमाणां च जन्मभूम्यनुसारिणीः।
आसन् प्रकृतयो नृणां नीचैर्नीचोत्तमोत्तमाः ॥ १५ ॥
जैसा जन्म और स्थान रहता है उसके ही अनुसार उस वर्णाश्रम के गुण भी होते हैं। स्थान यदि उत्तम हो तो
गुण भी उत्तम होते हैं और स्थान क्षुद्र होने पर गुण भी क्षुद्र होते हैं। सत्त्वगुण प्रधान होने पर ब्राह्मण की उत्पत्ति
होती है; सत्त्व और रज के मिश्रण से क्षत्रिय उत्पन्न होते हैं; रज और तम के मिश्रण से वैश्य उत्पन्न होते हैं और
शूद्र तो केवल तमोगुणनिष्ठ होते हैं। ब्राह्मण आदि चारों वर्ण तथा उनके स्वभाव का लक्षण श्रीकृष्ण अगले श्लोक
में बताते हैं।
शमो दमस्तपः शौचं संतोषः क्षान्तिरार्जवम्।
मद्भक्तिश्च दया सत्यं ब्रह्मप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १६ ॥
श्रीकृष्ण उद्धव से बोले, ब्राह्मण के स्वभाव के दस लक्षण होते हैं, उसका वर्णन मैं तुम्हें बताता हूँ, ध्यान
देकर सुनो। मन आदि ज्ञानेन्द्रिय की जो वृत्तियाँ वे सदा बाह्य दृष्टि से ही विचरण करती रहती हैं। उन्हें विवेक से
नियंत्रित कर आत्मस्वरूप में स्थिर होना चाहिये। अब इस प्रकार की वृत्ति को नियंत्रित करना कृष्णसर्प के मुँह
को दबाने जैसा है। जब तक वह सर्प अपने को छुड़ाने का प्रयत्न कर रहा है तब तक उसका मुँह दबा कर
रखना चाहिये। इस प्रकार वैराग्य के सामर्थ्य से और गुरुवचन के विश्वास से आत्मस्वरूप में ऐक्य होने तक
अंतर्वृत्ती को रोक कर रखना चाहिये। गुरुवचन को ही प्रमुख मान कर उसमें ही बुद्धि को निमग्न रखना और मन
को भी तल्लीन रखना इसी का नाम 'शम' है। ब्राह्मण की प्रकृति में यह गुण स्वभावसिद्ध ही होता है। उसी गुण
का नाम 'शम' है। अब 'दम' का निरूपण सुनो। विषय प्रकृति बलवान होती है और कर्मेन्द्रियों का विद्रोह
भीषण होता है; इसलिये शास्त्रविधि से उसका मुँह बन्द कर उसे भड़कने नहीं देना चाहिये। वेदविधि के द्वारा
केवल देह के निर्वाह भर के लिये इन्द्रियों का पोषण करना यही 'दमगुण' है। उसमें 'शम' मुख्य राजा है और
'दम' उसकी प्रजा है ऐसा समझना चाहिये। अब तीसरा जो 'तपोनियम' है, उसे भी सुनो। शम से ज्ञानेन्द्रियों को
शान्ति और दम से कर्मेन्द्रियों को शान्ति प्राप्त होती है। इसके उपरान्त अर्थात् शमदम के बाद वेदों के अनुसार
कर्म करना यह ज्ञान भी प्रशंसनीय है। व्रत आदि के द्वारा शरीर का शोषण करने का नाम तप है लेकिन वह भाग्य
के अनुसार होता है। वास्तव में हृदय में श्रीहरि के सत्स्वरूप का चिंतन करना यही सारे तपों में श्रेष्ठ तप है। जो
स्वधर्म का आचरण करते हुए अंतःकरण में हरि का विस्मरण नहीं करता, जो दिन-रात मन में आत्मस्वरूप
निश्चय के सम्बन्ध में ही विचार करता रहता है, अथवा जिस प्रकार लोभी सदा धन की ही चिन्ता करता है
अथवा युवा स्त्री युवक का ही चिन्तन करती रहती है उसी प्रकार जिसका मन सदा आत्मस्वरूप का ही विचार
करता रहता है उसी को 'तपोनिष्ठ' कहते हैं। यह तप सभी तपों में श्रेष्ठ है। ब्राह्मण स्वभाव के इस श्रेष्ठ गुण को

४५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही 'उज्ज्वल तप' कहते हैं। अब 'शौच' का अर्थात् पवित्रता का विचार सुनो। वह दो प्रकार का है—अंतःकरण
में ज्ञान का निश्चय तथा बाहर वेदोक्त आचरण। शरीर पर जो बाह्य मैल होता है उसका क्षालन वेदविधान के
अनुसार मृत्तिका और जल आदि से करना चाहिये और आत्मनिष्ठा से अंतःकरण के मैल धो डालने चाहिये।
उद्धव! इस प्रकार अंतर्बाह्य निर्मलता प्राप्त करना यही शौच का मुख्य लक्षण है। अब संतोष का भी सम्पूर्ण
लक्षण बताता हूँ, सुनो। पुत्र का जन्म होता है तो आनन्द होता है लेकिन उसके जाते ही दुःख होने लगता है, धन
प्राप्त होने पर आनन्द होता है और उसके जाते ही तत्काल दुःख होता है। लेकिन जिस सुख की प्राप्ति होते ही
कोटि दुःख नष्ट हो जाते हैं उसी का नाम सच्चा और शाश्वत सुख है। इसके अतिरिक्त अन्य बकवास व्यर्थ है।
मेरी भक्ति से अंतःकरण में जो स्वाभाविक सुख प्राप्त होता है वह सम्पत्ति अथवा विपत्ति आने पर भी सर्वत्र
समभाव होने के कारण संतोष ही उत्पन्न करती है। इन शब्दों में कहीं-कहीं पाठभेद दिखायी देता है। बड़े-बड़े
विद्वान 'संतोष' की जगह 'तितिक्षा' शब्द का प्रयोग करते हैं। उसका भी अर्थ सुनो। उसका रहस्य यह है कि
ठंडक तथा धूप, मृदु तथा कठोर इनमें से कोई भी यदि शरीर पर प्रहार करे तो उसका मन विचलित नहीं होता।
इसका कारण यह है कि इस द्वंद्व में उसकी मद्भावना रहती है। संतोष अथवा तितिक्षा इस शब्द का निरूपण इस
श्लोक के पाँचवे शब्द का लक्षण है। इतना कह कर श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, अब शान्ति का निरूपण सुनो।
मन में मेरा निजबोध होने पर अंतःकरण के कामक्रोध नष्ट हो जाते हैं। कोई अपराध करता है तो उसके प्रति
उनकी कोई विपरीत भावना नहीं होती। बल्कि इसके विपरीत वह अपकार करने वाले के प्रति उपकारी होता है।
उसके अंतःकरण में विकार उत्पन्न ही नहीं होता, वही सच्ची शान्ति है। इस प्रकार की सर्वकाल परिपूर्ण शान्ति
होना ब्राह्मण का छठाँ लक्षण है। अब 'आर्जव' का लक्षण सुनो। बिलकुल अंतःकरण की पहचान ही बता देता
हूँ। देखो, भले ही माँ कुरूप हो लेकिन उसकी ममता में कुरुपता नहीं होती अथवा यदि सुवर्ण का नाग बनाया
जाय तो सुवर्ण नाग नहीं बन जाता। उसी प्रकार कुटिल से कुटिलता से व्यवहार करना चाहिये यह बताने पर भी
जिसके मन में कुटिलता नहीं आती वही सचमुच 'आर्जव' अर्थात् सरल है। गौ के लिये मीठा तथा बाघ के लिये
कडुवा यह भेद गंगोदक में नहीं होता। वही बात आर्जव की है। वह ऐक्यभाव से कुटिल के साथ मधुर ही रहता
है। इसी का नाम आर्जव है और यह ब्राह्मण का सातवाँ अद्भुत लक्षण है। अब देवाधिदेव निजभक्ति का लक्षण
बताते हैं। अरण्य, उद्यान और गंगाजल इन सबके लिये जिस प्रकार पृथ्वी का ही आधार है, उसी प्रकार हे
उद्धव! सारे लक्षणों का उत्पत्तिस्थान मेरी भक्ति ही है यह जान लो। सभी तरह का अनाज उत्पन्न होने के लिये
जिस प्रकार आधारभूत भूमि ही होती है, उसी प्रकार सभी लक्षणों की उत्पत्ति भक्ति में से होती है। उस भक्ति का
लक्षण सुनो। विषय का स्वार्थ छोड़कर जो जीव प्राण मुझसे भक्ति करता है, वही मेरा भक्त है। भक्त कहलाकर
धनार्जन करना यही भक्ति का सबसे बड़ा विघ्न है। उद्धव! धन के लोभी को शुद्ध अभक्त समझना चाहिये।
जिसके अंतःकरण में मेरी भक्ति नहीं है लेकिन जो मेरी भक्ति का पाखण्ड रचता है वह अन्धे गरुड़ की तरह
आकाश में उड़ान भरता है लेकिन बैठने का स्थानं वह नहीं जान पाता। जो मेरी भक्ति करता है उसमें मैं जाति या
कुल नहीं देखता। मैं भक्तों को भक्ति से ही तत्काल वश होता हूँ। जहाँ भक्तिभाव से मेरे प्रति प्रेम होता है वहाँ मैं
तत्काल कूद पड़ता हूँ। जिसने मेरी भक्ति की पताका फहरायी वही मेरी भक्ति 'का माधुर्य जानता है। जो भी
सामने दिखायी दे वह सब ईश्वर है, ऐसा जिसका भक्तिभाव है वही एक मेरा लाडला है। हे उद्धव! उसकी ही
भक्ति पर हम जीवित हैं। मेरा जीव प्राण वही है। उस पर मैं सब कुछ निछावर कर देता हूँ। ब्यायी हुई गाय
जिस प्रकार अपने बच्चे के वश में रहती है उसी प्रकार मैं भी उसके अधीन रहता हूँ। सारांश, हे उद्धव! भावुकता

सत्रहवाँ अध्याय ४५७
की असीम अवस्था का ही नाम है, मेरी भक्ति। अब दया का स्वरूप सुनो। बच्चा संकट में पड़ा देख जिस प्रकार
माँ दुःख असह्य होकर तत्काल सहायता के लिये उठ खड़ी होती है उसी प्रकार किसी दीन दुखी को देख कर
उसके मन में दया उपजती है और एक बार दया उत्पन्न होने पर अपना और पराया कौन पूछता है ? भीषण बाढ़
में डूबने वाले को दयालु व्यक्ति उसकी जाति नहीं पूछता, पहले बाढ़ में कूद कर उसकी जान बचाता है। इसी
का नाम है सच्ची दया। दीन पर दया करने के लिये वह आग में भी कूद पड़ता है, उसका मैं वंदन करता हूँ।
संसार में दयालु पुरुष धन्य है। ऐसी दया के गुण से वह मुझ अनन्त को जीव प्राण के साथ खरीद लेता है।
इसलिये मैं दयावान मनुष्य के घर किसी भी प्रकार का काम करता हूँ। दयालु पुरुष के ऊपर कोई संकट आता है
तो उसका निस्तारण मैं करता हूँ। उद्धव! जो दीनजन का विचार करता है, जो सचमुच दीनदयालु रहता है, वह
केवल मेरा ही भण्डार है। वह मेरे सुख का सार है। इसका नाम 'दया' है यह ध्यान में रखो। यही वह नववाँ
लक्षण है। अब तुम्हें सत्य का सम्पूर्ण लक्षण बताता हूँ। सत्य का सत्य यही है कि जिसे जागृत, स्वप्न अथवा
सुषुप्तावस्था में भी असत्य स्पर्श नहीं करता, वही परिपक्व सत्य है। इस प्रकार का सत्य जब अंतःकरण में पूरी
तरह पहुँचता है तो वाणी भी सत्य होती है और दृष्टि भी सत्य हो जाती है। अंतःकरण के सत्य से सारी सृष्टि ही
सत्यमय हो जाती है और असत्य शेष नहीं रह जाता। यह दसवाँ लक्षण है। यही ब्राह्मण का स्वभावसिद्ध
कर्माचरण है। ब्राह्मण प्रकृति के क्षेत्र में इन दस लक्षणों की उत्पत्ति होती रहती है। उद्धव! ब्राह्मणों की यह
स्थिति जन्मजात, सहज और अकृत्रिम होती है। इन दस लक्षणों से परिपूर्ण होने के कारण ब्राह्मण सभी वर्णों में
श्रेष्ठ और वन्दनीय हैं। हे उद्धव! अब क्षत्रियों की प्रकृति के जो गुण हैं उनका निरूपण सुनो।
तेजो बलं धृतिः शौर्यं तितिक्षौदार्यमुद्यमः ।
स्थैर्यं ब्रह्मण्यतैश्वर्यं क्षत्रप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १७॥
उद्धव! ब्राह्मणप्रकृति के उत्तमोत्तम दस गुण मैंने तुम्हें बताये। अब क्षात्रवृत्ति के दस गुण तुम्हें बताता हूँ,
सुनो। तेज अर्थात् प्रताप का सामर्थ्य; मानों भूतल पर का सूर्य हो। उसके प्रताप से सारे राजा निस्तेज हो जाते हैं।
क्षात्रधर्म का जो पहला गुण है उसका नाम है तेज ! अब क्षत्रिय के बल का चमत्कार सुनाता हूँ। उसके शरीर
सामर्थ्य का ऐसा चमत्कार होता है कि वह अकेला ही लाखों मनुष्यों पर टूट पड़ता है और मस्तक टूट जाने पर
केवल धड़ से शत्रु का मस्तक तोड़ता है। वह जब समरांगण में प्रवेश करता है तो यह नहीं देखता कि मेरा वहाँ
कोई सहायक है या नहीं। जंगली हाथियों के झुण्ड में जिस प्रकार सिंह घुस कर उनका संहार करता है उसी
प्रकार शत्रु की सेना में घुसकर वह बड़े-बड़े वीरों का सफाया करता है। सारा आकाश भले ही राक्षसों से भर
जाय, सारी पृथ्वी पर असुर फैल जाएँ बलवान शत्रुओं से वह भले ही घिर जाय फिर भी उसकी धैर्य बुद्धि में
कमी नहीं आती। आकाश भले ही धरती पर गिर पड़ने के लिये गड़गड़ाये, पृथ्वी उलट-पुलट होना चाहे लेकिन
उसके धैर्य का बाल बाँका नहीं होता। प्रलयकाल भले ही सामने दिखाई देने लगे लेकिन उसके मन में कोई भय
नहीं होता। इस प्रकार का जो स्वभावसिद्ध अटल धैर्य है उसी का नाम 'धृति' है। वह चौरासी प्रकार के
दण्डायुध चलाने में प्रवीण होता है और उसकी शास्त्रार्थ धारणाशक्ति भी उत्तम होती है, धर्म के अनुसार युद्ध
करने में वह निष्णात होता है, इसी का नाम क्षत्रियों की 'धृति' है। अब यदि यह पूछोगे कि शत्रु का शौर्य कैसा
होता है तो वह ऐसा है कि वह शत्रु का नाम भी नहीं रहने देता, उसे कहीं शत्रु दिखाई ही नहीं देता। इसी का
नाम है 'शौर्य'! उनकी शौर्य की वृत्ति धर्मयुद्ध की रहती है। इसीलिये उसे विजयश्री प्राप्त होती है। जो सावधान

४५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
नहीं है और निःशस्त्र है, उस पर वह आक्रमण नहीं करता, जो महाशूर होते हैं वे भागने वाले शत्रु पर भी प्रहार
नहीं करते। रणभूमि में शत्रु से सामना होने पर पीछे वे हटने का नाम नहीं लेते, अकेले ही हजारों वीरों का
सफाया कर देते हैं। स्वधर्म के अनुसार यही सच्ची वीरता है। सबसे बड़ा शत्रु मृत्यु है। उसके जैसा शत्रु अन्य
कोई नहीं है। वह उसी का विनाश कर देता है। उसकी वीरता का वर्णन देवदानव भी करते हैं। इस प्रकार अपने
शौर्य से सारी पृथ्वी को 'शत्रुरहित' कर देना यही 'शौर्य' है और यही क्षत्रिय धर्म के अनुसार क्षत्रियों का चौथा
गुण है। भले ही मस्तक पर शस्त्रों का प्रहार हो अथवा बाण शरीर में पूरी तरह घुस जाएँ लेकिन वह रणभूमि में
पीछे नहीं हटता यही क्षत्रियों की 'सहिष्णुता' है। हाथियों के झुण्ड सामने आ जाएँ, बड़े-बड़े वीर जोश में
सामना करने आ जाएँ लेकिन वह वीर शिरोमणि उनका वह आवेग सहन करता है। इसी का नाम है सच्ची
सहिष्णुता। समुद्र की लहरों के प्रहार से जिस प्रकार महापर्वत पीछे नहीं हटता, उसी प्रकार जो शत्रु की सेना के
प्रहार से रणभूमि से पीछे नहीं हटता अथवा यश अपयश, सुख-दुःख, हर्ष-विषाद क्षत्रिय के चित्त को बाधा नहीं
पहुँचाते। इसी को सम्पूर्ण सहिष्णुता कहते हैं। इसी को 'तितिक्षा' भी कहते हैं। यह क्षत्रियों का पाँचवाँ लक्षण
है। अब क्षत्रियों का औदार्य का गुण अर्थात् दातृत्व शक्ति के बारे में भी सुनो। क्षत्रियों के लिये धन तृणसमान
होता है इसलिये वे याचकों का मन तृप्त होने तक उसे दान देते रहते हैं। देश, काल, सत्पात्र देखकर
सम्मानपूर्वक तथा मन में किसी भी प्रकार का संकोच न लाकर विधिपूर्वक दान देना। चन्द्र एक बार चकोर को
देख भर ले फिर वह उसे अमृत देने में जिस प्रकार नहीं सकुचाता उसी प्रकार इसकी वृत्ति याचक के प्रति रहती
है। क्षत्रिय उससे कभी पीछे नहीं हटता। इस प्रकार स्वाभाविक रूप में दान देना यही क्षत्रियों का स्वाभाविक गुण
है। इसी का नाम है 'औदार्य'। यह क्षत्रियों का छठां लक्षण है। क्षत्रियों का परमार्थ प्राप्ति का उपाय है
स्वधर्मनिष्ठा। उसके अनुसार जो भी प्रयास किया जाता है उसे 'उद्यम' कहते हैं। अपने प्राण तक देकर गोब्राह्मण
की रक्षा करना, स्वधर्म से प्रजा का पालन करना और किसी को भी कष्ट न देकर पृथ्वी की रक्षा करना, इसी का
नाम 'उद्यम' है, इसे ध्यान में रखो। यही क्षत्रियों का सातवाँ लक्षण है। अब उनके धर्म के 'स्थैर्य' नामक गुण
का भी लक्षण सुनो। गोब्राह्मणों की रक्षा करते समय तथा स्वधर्म से प्रजा का पालन करते समय उनका मन थक
नहीं जाता। यही क्षत्रियों की स्थिरता है। स्वधर्म के प्रति यह 'स्थिरत्व' ही क्षत्रियों का आठवाँ लक्षण है। अब
उनका ब्राह्मण भक्ति का लक्षण बताता हूँ, सुनो। क्षत्रियों को परमार्थ प्राप्ति के लिये ब्राह्मण 'गुरु' है। उस ब्राह्मण
का ब्रह्मभाव से भजन करना चाहिये। ब्राह्मण के प्रति ब्रह्मभावना रखकर, यथाविधि उनका सम्मान कर जो
प्रतिदिन भक्तिभाव से ब्राह्मण का पूजन करेगा उसमें मेरे ही प्रति भावना होगी, वह ब्राह्मणों को संतोष प्रदान
करेगा। उद्धव! यह मेरी आत्मा है। उसने मुझ श्रीकृष्ण की ही पूजा की ऐसा समझ लो। क्षत्रिय सम्मान के साथ
ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, इसीलिये उन्हें ऐश्वर्य प्राप्त होता है। ब्राह्मण ब्राह्मणों का ही द्वेष करते हैं इसलिये वे
दारिद्रय का दुःख भोगते हैं। इस प्रकार ब्राह्मण का भजन करने से मैं परब्रह्म उसके अधीन हो जाता हूँ। उसका
ऐश्वर्य का चिह्न यही दसवाँ लक्षण है। ब्राह्मण का भजन न करें तो ऐश्वर्य नहीं प्राप्त होगा; मैंने ब्राह्मण के पैर
अपने पेट से लगा लिये इसीलिये षड्गुण ऐश्वर्य सम्पन्न हो गया हूँ। ब्राह्मण भजन के मार्ग पर लगने पर
ब्रह्मसायुज्य पैरों का स्पर्श करता है फिर भी ब्राह्मण भजन के लिये भक्त उसे स्वीकार नहीं करते। ब्राह्मण भजन
करने से अपने आप ही मेरी सत्ता उनके पास आती है। इसलिये सचमुच ही उसकी आज्ञा देवदानव भी
शिरसावंद्य करते हैं। उसकी आज्ञा के भय से अकाल भी नहीं पड़ता। न्याय से प्रजा का पालन और धर्म का
संरक्षण भी उसके ही कारण होता है। इसी अत्यन्त उत्कृष्ट स्वधर्म के योग से भरत, पुरुरवा, जनक आदि ऐश्वर्य

सत्रहवाँ अध्याय ४५९
के ऊँचे स्थान तक पहुँच गये। इस प्रकार ब्राह्मण की सेवा बड़ी अलौकिक है। इस प्रकार क्षत्रियों के दस लक्षण
तुम्हें बतलाये। इसके मुख्य रूप से ब्राह्मण भजन ही सबके लिये श्रेयस्कर है। वैश्यों की प्रकृति के स्वाभाविक
पाँच लक्षण हैं जिन्हें यथार्थ रीति से श्रवण करो।
आस्तिक्यं दाननिष्ठा च अदम्भो ब्रह्मसेवनम्।
अतुष्टिरर्थोपचयैर्वैश्यप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १८ ॥
वैश्यों के स्वभाव में द्रव्यलोभ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। कितने ही करोड़ का मालिक क्यों न हो जाय लेकिन
उसकी इच्छा तृप्त होना जानती ही नहीं। 'आस्तिकता' केवल द्रव्यसंग्रह की ही होती है। अधिक धन कमाऊँगा
इस विश्वास के साथ एक द्वीप से दूसरे द्वीप तक माल ले जाता है। वेदशास्त्र पर अत्यधिक विश्वास यही मुख्य
रूप से वैश्य की 'आस्तिकता' है। वेद ने जो भी स्वधर्म बतलाया है उसके प्रति जरा भी उदासीन न रहना। वैश्य
का स्वधर्माचरण होता है, दान देना। प्राणांत के समय भी दान देने की प्रक्रिया अखण्ड चलती रहती है। परलोक
प्राप्ति का प्रमुख साधन है 'ब्राह्मण की सेवा'। ब्राह्मण की आज्ञा परम प्रमाण। उससे भी विशेष है गुरु की सेवा।
वेदशास्त्रों में भी 'सद्गुरु ही परब्रह्म' है, ऐसा प्रमाण है। ब्राह्मण भी तद्रूप ही हैं यह मानकर उनकी सेवा के लिये
प्राण भी दे देना। बड़े-बड़े लोगों में सम्मान प्राप्त हो अथवा समाज में प्रतिष्ठा बढ़े, इस प्रकार का दंभ वैश्यों को
स्पर्श नहीं करता। कपट छोड़कर, लोभ और दंभ का त्याग कर ब्राह्मण की सेवा में प्राण भी खर्च कर देना यही
वैश्यों का लक्षण है। इससे ही वैश्य जाति को परमार्थ की प्राप्ति होती है। सारांश वैश्य की ऐसी स्वाभाविक
प्रकृति होती है। हे उद्धव! शूद्र की प्रकृति के भी तीन प्रकार के कर्म होते हैं उन्हें भी तुम्हें निश्चय करके बताता
हूँ, सुनो।
शुश्रूषणं द्विजगवां देवानां चाप्यमायया।
तत्र लब्धेन संतोषः शूद्रप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १९ ॥
शूद्र जाति का स्वधर्म यही है कि वह मनःपूर्वक ब्राह्मण की सेवा करे, उनकी सेवा निष्कपट भाव से करने
से, उनकी ही कृपा से उनकी उपजीविका चलती है। जहाँ घास और पानी हो वहाँ गृहस्थों की गायें ले जाये,
जंगली जानवर उन पर आक्रमण करें तो प्राण देकर भी उनकी रक्षा करे। गोरक्षा में प्राण देने पर उत्तम गति प्राप्त
होती है। जिसे गौ के प्रति दयाभाव रहता है, उसका मैं श्रीकृष्ण सदा सहायक होता हूँ। ब्राह्मण की चाकरी तथा
जानवरों की देखभाल का काम न मिले तो शूद्र उपजीविका चलाने के लिये मन्दिर में समार्जन करे। निष्कपट
भाव से श्रीहरि का आँगन झाडू पोंछा लगाकर लीप कर स्वच्छ रखे और वहाँ जो प्राप्ति हो उस पर निर्वाह करे।
वहाँ जब भी, जो भी मिले उससे अपना निर्वाह करे। यही शूद्र के स्वभाव की स्वधर्म कर्म स्थिति है। ब्राह्मण के
घर अग्निहोत्र आदि कर्म होते हैं और शूद्र इन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को प्रणाम करते हैं। इससे दोनों के ही धर्म का
निर्वाह होता है। गृहस्थाश्रम धर्म है तीनों आश्रमों को आश्रय देना, साथ ही तीनों आश्रमों के लोगों को अन्न-वस्त्र
देकर उनका संरक्षण करना। ब्रह्मचर्याश्रम का आचरण है गुरु की सेवा करना तथा वेदाध्ययन करते हुए जीवन-
यापन करना। उसे दान देने का अधिकार नहीं होता। ब्रह्मचारी को जो कुछ भी प्राप्त हो वह उसे गुरु को अर्पण
करना चाहिये। गुरु के सिवा यदि वह किसी अन्य को दानधर्म करेगा तो वह अधर्म होगा। वानप्रस्थाश्रम में
विशेषरूप से तप ही प्रमुख है। वेदोक्तविधि के अनुसार उसे अग्नि की सेवा करनी चाहिये। संन्यासी, ब्रह्मचारी
अथवा दीन-दुःखी आश्रम में आयें तो उन्हें यथाशक्ति अन्न देना चाहिये। यही वानप्रस्थ का आश्रमधर्म है।

४६० श्रीमद् एकनाथी भागवत
संन्यासी के लिये अहिंसा ही प्रमुख है। ज्ञान परिपाक से पूर्ण शान्ति प्राप्त होती है। जहाँ परिपथ न हो वहाँ जाकर
भिक्षा माँगना यही चतुर्थाश्रम का मुख्य धर्म है। अब इस वर्णाश्रम के बाहर के जो अंत्यज आदि लोग हैं उनके
स्वभाव का लक्षण भी भगवान बताते हैं।
अशौचमनृतं स्तेयं नास्तिक्यं शुष्कविग्रहः।
कामः क्रोधश्च तर्षश्च स्वभावोऽन्तेवसायिनाम्॥२०॥
इस श्लोक के आठ गुण त्यागने का जिसका मन नहीं होता वह भी अंत्यज की ही तरह है। स्वभाव का
यह लक्षण अत्यन्त निंदनीय है। जिसे स्नान, संध्या, स्वच्छता तथा अपना कर्तव्यकर्म अच्छा नहीं लगता, उसके
अन्तर में कृष्ण सर्प की तरह अपार विकल्प भरे रहते हैं। धतूरे का फल देखने में गोलमटोल होता है किन्तु
उसके अन्दर नशा और बाहर काँटे होते हैं। उसी प्रकार जो अंतर्बाह्य खरा है उसी का नाम है 'अशौच' अर्थात्
अमंगलता। शरीर श्वेत कुष्ट से भरा हुआ, नाक भी दिखाई न दे, मुँहफट अनर्गल पति की निंदा करने वाली स्त्री
जिस प्रकार अंतर्बाह्य अमंगल होती है वैसा ही अमंगल। इस प्रकार स्वभावतः ही जिसमें 'अशौचता' या
अमंगलता होती है वही अंत्यज का पहला गुण है। उसी प्रकार जिसके स्वभाव में दिन-रात नटखटपन नाचता
रहता है, वह अपने झूठे स्वभाव के कारण माँ, बाप तथा गुरु को भी ठगता है। होली के मौसम में जिस प्रकार
कोई रामकृष्ण नहीं कहता बल्कि आनंदोल्हास से जननेन्द्रिय दर्शक वीभत्स शब्दों का ही उच्चार करते हैं, उसी
प्रकार जिसे जागृति में, स्वप्न में अथवा सुषुप्तावस्था में असत्य ही अच्छा लगता है उसे प्रकृति स्वभाव के
अनुसार 'अंत्यज' ही समझना चाहिये। गाड़ कर रखी हुई माँ-बाप की दौलत भी एक बार देखने पर वह उसे
खोदकर निकालने से बाज नहीं आता वह बार-बार विश्वास दिलाकर गुरु की गठरी भी गायब कर देता है। कोई
धनवान मिल जाय तो नीचता के अनेक उपाय लगाकर अथवा बलात्कार से उसका सब कुछ लूट लेता है। इस
प्रकार दूसरे का माल हड़प करने के लिये चाहे जैसा अधर्म करने में जिसकी आसक्ति रहती है उसे 'चोरी' कहते
हैं। स्वधर्म कर्म पर जिसके मन में स्वभावतः ही विश्वास नहीं होता, जो वेद, शास्त्र, पुराण आदि को बकवास
समझता है, इसी का नाम है 'नास्तिकता'। उसमें स्वभाव से ही आस्तिक बुद्धि का अभाव रहता है। गाँठ में,
लाखों की दौलत होते हुए भी उसके मुँह में सदा 'नास्तिकता' ही भरी रहती है, परिवारजनों को भी विपत्तियों के
संकट में झोंकता है, यही अंत्यज का स्वभाव है। बिना कारण झगड़ा-टंटा, दूसरों का छल तथा हमेशा दाँत
कटकटाते रहना यह अंत्यज का जातिस्वभाव है। उसके पेट में सदा विद्रोह भड़कता रहता है, ऊपर से मीठी बातें
करता है, दृष्टि हमेशा क्रूर तथा पेट में द्वेष की आग भड़कती रहती है। कोई जीवनभर उपकार करे लेकिन जरा
सी बात पर उसका नाश करने का गुप्त संकल्प मन में धरता है। उपकार करने वाले पर अंत्यज प्राणांत भी
अपकार नहीं करता लेकिन उस प्रकार का द्वेष मन में रखता है जिसे 'शुष्कविग्रह' कहते हैं। जो इष्ट मित्रों में
फूट डालता है, बड़ों-बड़ों को संकट में डालता है, अमंगलता तथा नास्तिकता तो शिखर पर रहती है, ऐसे पुरुष
को 'अतिविग्रही' कहना चाहिये। अपना रत्तीभर लाभ न होते हुए भी दूसरे के कार्य का नाश करना, ऐसे व्यक्ति
को 'शुष्कविग्रही' कहते हैं। उद्धव ! जिसका ऐसा स्वभाव हो उससे अंत्यज भी डरते हैं। अब उसकी छलांग
कितनी लम्बी होती है, सुनो। कनक और कांता के लोभ की पराकाष्ठा रहती है। मन को क्षणभर के लिये भी
शान्ति नहीं रहती। स्त्री भोग की इच्छा के सम्बन्ध में तो पूछिये मत। बस, वह स्त्री हो इतना पर्याप्त है, फिर
सेव्यासेव्य का विचार मन को छूता भी नहीं। उसी प्रकार धन, फिर वह किसी भी मार्ग से क्यों न मिले। अनुचित
मार्ग से इच्छा की पूर्ति करना यही उसके स्वभाव की प्रवृत्ति होती है। उद्धव ! ऐसे जो हैं वे अंत्यज स्वभाव के

सत्रहवाँ अध्याय ४६१
हैं। देखो! जो ऐसे कामी या लोभी होते हैं उनके अंतःकरण में सदा क्रोध की आग भड़कती रहती है। इच्छा पूरी
नहीं हो रही है यह देख उसका गुस्सा प्रलयांत भड़क उठता है। शरीर क्रोध के अधीन होने के कारण शान्ति तो
क्षण भर के लिये भी नहीं मिलती, वृत्ति से सदा जलाभुना हुआ, ऐसा नीच स्वभाव होता है। प्राप्त सुख से सन्तुष्ट
न होना, जो सुने उस सुख के लिये निरन्तर मन में आस धर के रहना यह स्वभाव भी अत्यन्त नीच है। इन जिन
आठ गुणों के बारे में तुम्हें बताया वह किसी भी वर्ण वाले का स्वभाव क्यों न हो, उसमें अंत्यज भाव है यह
निश्चित रूप से जान लो। ये जो सारे दुर्गुण बतलाये उनमें से कोई भी एक नरक देने के लिये प्रसिद्ध है। फिर
जहाँ आठों गुण मिल जाय तो फिर उनसे कैसे छुटकारा मिले ? इन गुणों का त्याग करने के लिये ही मैंने तुम्हें
उनके लक्षण बताये। अरे! इन गुणों को जो स्वीकार करते हैं वह नरक जाते हैं और जो उनका त्याग करते हैं वे
मेरे पद तक पहुँचते हैं। अब जिससे मेरे पद की प्राप्ति हो और किसी भी वर्ण को उत्तम गति प्राप्त हो ऐसे गुणों
के लक्षण हे उद्धव ! तुम्हें बताता हूँ। जो सारे लक्षणों का सार है, समस्त गुह्य गुणों का भण्डार है और जिसके
योग से संसार से मुक्त हुआ जा सकता है उसे सुन लो। जो सारे वर्णों का सहजधर्म है, जिसके योग से परब्रह्म
की प्राप्ति होती है, जिसके योग से मन का भ्रम दूर होता है, वे उत्तम गुण सुनो।
अहिंसा सत्यमस्तेयमकामक्रोधलोभता।
भूतप्रियहितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिकः॥ २१॥
जिससे दूसरे को सुख प्राप्त हो ऐसे उपाय करना जिससे मुझे सुख प्राप्त हो। उसी गुण को मैं श्रीकृष्ण
वन्दनीय मानता हूँ। उसी प्रकार किसी को कष्ट न देना, परपीड़ा न देना, दूसरे को दुःख न देना इस योग से भी हे
उद्धव ! मुझे सुख प्राप्त होता है यह जान लो। दुःख न देकर सुख देना इसी को 'अहिंसा' कहते हैं जो पहला गुण
है। अब दूसरा गुण 'सत्य' है जिसके लक्षण सुनो। सत्य इस प्रकार का होता है— जिसका मन और वाणी, जागृति
स्वप्न अथवा सुषुप्तावस्था में असत्य का जरा भी स्पर्श नहीं करते, निन्दा और नरस्तुति तथा झूठ बोलना जिसे
नहीं आता, वाणी को जो पवित्र रखता है उसे 'सत्य' कहते हैं। अधर्म से एक कौड़ी से लेकर एक करोड़ लाभ
का भी वह विचार नहीं करता, दूसरे की कानी कौड़ी को भी वह स्पर्श नहीं करता, चोरी करने का अथवा किसी
की आँख बचाकर उसकी वस्तु ले लेना या बिना पूछे वस्तु ले लेना ऐसा विचार उसके मन में नहीं आता।
अन्याय से प्राप्त किये धन को वह स्वप्न में भी स्पर्श नहीं करता। उद्धव ! यह अचैर्य का लक्षण है। यही तीसरा
गुण है। स्वधर्म से हाथ में धन आ जाय इतना भी धनलोभ जिसमें नहीं होता, कामिनी-काम की वार्ता भी जिसके
कानों तक नहीं पहुँचती, परस्त्री को जो माता के समान मानता है, इतना ही नहीं अपनी स्त्री के प्रति भी जिसका
मन आसक्त नहीं होता, गृहस्थाश्रम में रहने के लिये ही स्त्री का पालन करना उद्धव ! इसी का नाम है 'अकामता'
अथवा अनिच्छा। यही चौथा लक्षण है। अब अक्रोध का लक्षण सुनो। जहाँ काम का जोर नहीं रहता वहाँ क्रोध
का भी कुछ नहीं चलता। जिस प्रकार आकाश को शस्त्र नहीं चुभता अथवा बीज कितना भी अच्छा हो लेकिन
जमीन के सिवा वह अन्यत्र कहीं अंकुरित नहीं होता उसी प्रकार काम के बिना क्रोध कभी नहीं बढ़ता। जिस
प्रकार गर्भवती स्त्री की मृत्यु के बाद गर्भ की भी मृत्यु हो जाती है उसी प्रकार काम के साथ क्रोध की भी
समाप्ति हो जाती है, मस्तक कट जाने पर जिस प्रकार हाथ-पैर की क्रिया बन्द हो जाती है उसी प्रकार काम
समाप्त होने पर क्रोध भी समाप्त हो जाता है और जहाँ काम-क्रोध ही न हो, वहाँ लोभ किस बात का होगा ?
जिसके जड़ में मिट्टी न हो वह वृक्ष कभी नहीं बढ़ेगा। सर का मुण्डन कराने से जिस प्रकार वहाँ जूँ नहीं रह

४६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सकती उसी प्रकार काम और क्रोध के जाने पर लोभ को रहने का ठिकाना ही नहीं मिलता। पति की मृत्यु जिस
प्रकार स्त्री का सौभाग्य ले जाती है उसी प्रकार कामक्रोध के बिना लोभ के लिये कोई ठिकाना नहीं रह जाता।
इसी का नाम है 'निलोभता'। सचमुच क्रोध और लोभ को बढ़ाने वाला काम ही है। जहाँ काम का कार्य अधूरा
रह जाता है वहीं क्रोध का तेज बढ़ता है और जब काम के मनोरथ पूर्ण होते हैं तो लोभ का विद्रोह नाचने लगता
है। जिस प्रकार दीपक की लौ तेज और काजल को एक साथ बढ़ाती है, उसी प्रकार क्रोध और लोभ का
बड़प्पन सदा काम के पास ही रहता है। जाड़े की ठंडक के साथ जिस प्रकार पसीना और ज्वर रहता है उसी
प्रकार काम भी सदा क्रोध और लोभ से युक्त रहता है। जहाँ काम का कोई मूल्य नहीं है वहाँ सहज ही क्रोध
और लोभ का त्याग होता है। स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं, यही उपाय सवसे उत्तम है। अब प्राणिमात्र का हित कैसे
साधा जा सकता है, यह भी बताता हूँ। जितना अपना सामर्थ्य हो उसके अनुसार प्राणिमात्र का हित करते रहना
चाहिये। उन्हें जिस वस्तु की जब-जब आवश्यकता हो उसे देते रहना चाहिये। अंतःकरण की ममता से अन्न,
वस्त्र, दान आदि देकर प्राणिमात्र के प्रति प्रिय आचरण करते रहना चाहिये। यह सभी का स्वधर्म है इसे ध्यान में
रखो। प्राणिमात्र का ऐसा प्रिय करना चाहिये जिससे उसका हित हो। जो प्रिय उसके हित के लिये बाधक हो उसे
कभी नहीं करना चाहिये। प्राणिमात्र का प्रिय और हित करने वाला संसार में जो भी पुरुष हो उसके घर में
भगवान सदा कल्याण ही करता है। वह प्राणिमात्र का प्रिय और हित कर रहा होता है तभी मैं श्रीकृष्ण उसके
संकटों की होली जला देता हूँ। जो सद्भाव से सचमुच प्राणियों का हित करते रहने के कारण समस्त प्राणिमात्र में
प्रिय रहता है उसका संसार में सबके अंतःकरण में रहने वाला परमात्मा सुखमय बना देता हूँ। अहिंसा आदि जो
सात गुण इस श्लोक में बताये गये हैं वह सभी का स्वधर्म है। सभी आश्रमों और सभी वर्णों के लिये मुख्य रूप
से यही धर्म है। अव हे उद्धव! अब मैं तुम्हें आश्रमों के धर्म के वारे में बताता हूँ। उसमें पहला धर्म है, ब्रह्मचर्य,
सुनो। ब्रह्मचर्य के दो प्रकार हैं, एक का नाम है पूर्ण 'नैष्ठिक्य' तथा दूसरा है 'उपकुर्वाण'। अब उन दोनों के
लक्षण सुनो। उपनयन के बाद वेदाध्ययन होने के बाद जो परमार्थ को लक्ष्य बनाकर गृहस्थाश्रम की ओर नहीं
देखता उसी का नाम है 'नैष्ठिक्य' ब्रह्मचर्य। दूसरा, वेदशास्त्र आदि का पठन पूर्ण कर गुरुदक्षिणा दे कर ब्रह्मचर्य
व्रत की समाप्ति कर तदुपरान्त यथाविधि स्त्री का पाणिग्रहण करना इसे 'उपकुर्वाण' कहते हैं।
द्वितीयं प्राप्यानुपूर्व्याज्जन्मोपनयनं द्विजः।
वसन् गुरुकुले दान्तो ब्रह्माधीयीत चाहूतः ॥ २२॥
मेखलाजिनदण्डाक्षब्रह्मसूत्रकमण्डलून् ।
जटिलोऽधौतदद्वासोऽरक्तपीठः कुशान् दधत्॥ २३॥
स्नानभोजनहोमेषु जपोच्चारे च वाग्यतः।
नच्छिद्यान्नखरोमाणि कक्षोपस्थगतान्यपि ॥ २४॥
गर्भाधान, पुंसवन, जातकर्म, अन्नप्राशन ये सारे कर्म चौल तक पहले भी होते थे। उसके बाद उपनयन तथा
गुरु द्वारा गायत्री मंत्रोपदेश होने के बाद उसका दूसरा 'सावित्र' जन्म होता है जिसे 'व्रतबंध' कहते हैं। इस प्रकार
गायत्री मंत्र से तीनों वर्ण के दो जन्म हो जाते हैं। यह ब्रह्मचर्याश्रम है। यह व्रतधारण केवल वेदाध्ययन के लिये
होता है। इसलिये वेदाध्ययन करने के निश्चय से ब्रह्मचारी गुरु के घर रहता है। वहाँ उसका व्रत किस प्रकार

चलता है, सुनो। कमरबंध, जनेऊ, कृष्णाजिन, पलाश का दण्ड तथा पानी लाने के लिये कमण्डल रखना चाहिये।
केशवपन नहीं कराना चाहिये, तैलाभ्यंगस्नान नहीं करना चाहिये, दंतधावन नहीं करना चाहिये और केश में कंघी
नहीं लगानी चाहिये। नाखून नहीं निकालने चाहिये, काँख तथा गुप्त स्थान के केश नहीं काटने चाहिये। धोबी
द्वारा धोकर लाये कपड़े नहीं पहनने चाहिये। प्रातःकाल और दोपहर में बहते पानी के जलाशय में स्नान करना
चाहिये। श्वेत आसन पर सफेद वस्त्र बिछाना चाहिये और जप के लिये रुद्राक्ष की अथवा कमल के बीज की
माला रखनी चाहिये। कुश आदि के साथ पवित्र दर्भ हाथ में रखने चाहिये। अब मौन के सम्बन्ध में भी बताता
हूँ। उसे भी सुनो। मलमूत्रविसर्जन तथा स्नान करते समय तथा जप, होम, भजन और दोनों समय की संध्या करते
समय नियमतः मौनव्रत धारण करना चाहिये। अभ्यंग स्नान न करने से तथा बालों में कंघी का प्रयोग नहीं करने
से केशों में स्वयमेव जटाओं का निर्माण हो जाता है। यह नियमतः किया जाने वाला व्रत ब्रह्मचारी के लिये
बताया गया है। इनका पालन करते हुए गुरु की सेवा करनी चाहिये। गुरु जब कहे तभी वेदपाठन करना चाहिये।
उसकी आज्ञा शिरसावंद्य कर निष्कपट भाव से गुरु की सेवा करनी चाहिये। जल्दी-जल्दी पाठ नहीं पढ़ाता
इसलिये एक गुरु को छोड़कर दूसरे के पास जाने में महादोष है। गुरु को दया आये इसलिये दिन-रात उसकी
सेवा करनी चाहिये। उस दया से वही दिन-रात पढ़ा सकेगा। गुरुचरण पर भक्ति रखकर वेदशास्त्र का पठन करें
तथा परमार्थ बुद्धि से वेद का तत्वार्थ सम्पादित करना चाहिये।
रेतो नावकिरेज्जातु ब्रह्मव्रतधरः स्वयम्।
अवकीर्णेऽवगाह्याप्सु यतासुस्त्रिपदीं जपेत् ॥ २५ ॥
इस प्रकार ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। ब्रह्मचारी को जानबूझ कर वीर्य त्याग नहीं करना चाहिये।
यही ब्रह्मचर्य का प्रमुख व्रत है। स्वप्न में वीर्यपतन हो जाय तो शास्त्रोक्त पद्धति से स्नान करना चाहिये और फिर
प्रायश्चित्त के लिये गायत्री का स्मरण करना चाहिये। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी को जानबूझ कर वीर्य
त्याग करने का अधिकार नहीं है। ऐसा जो करेगा उसका आश्रमधर्म डूब जायेगा। स्वप्न में वीर्यपतन हो जाय तो
मृत्तिका लगा कर अभ्यंग स्नान करना चाहिये और फिर प्रायश्चित्त के लिये विधिपूर्वक जाप करना चाहिये।
अग्न्यर्काचार्यगोविप्रगुरुवृद्धसुराञ्छुचिः।
समाहित उपासीत संध्ये च यतवाग् जपन् ॥ २६ ॥
जो गायत्रीमंत्र देता है वह आचार्य है। माता और पिता भी गुरु ही हैं। अग्नि, सूर्य आदि समस्त देवतागण तथा
गौ, ब्राह्मण और ज्येष्ठ लोग, इन सबकी उपासना करने के लिये बाह्य शुद्धि और अन्तर का समाधान चाहिये।
गुरुचरणों की शरण में रहकर माता, पितरों की आज्ञा का पालन करना चाहिये। अग्नि में हवन करे, इन्द्रादि देवताओं
की स्तुति करें, ब्राह्मणों को निरन्तर पूज्य मानें तथा सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे। पिता को साष्टांग दण्डवत करे, गौ के
शरीर को सहलाये, सायं प्रातः संध्या में मौन रखे। मध्याह्न संध्या में मौन आवश्यक नहीं है। सद्गुरु की बात तो
बहुत बड़ी है; गुरुतत्त्व सब में श्रेष्ठ तथा सर्ववंद्य है, उसका प्रताप प्रसिद्ध है ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण बताते हैं।
आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।
न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत् सर्वदेवमयो गुरुः॥ २७॥
अंतर्यामी ईश्वर, विश्वात्मा, विश्वम्भर, अनंत और अपार मैं, वही शिष्य का श्रीगुरु है। जिसे गुरुनाम कहते
हैं वह सचमुच भगवान ही है। भजन का भक्तिभाव देखकर शिष्य का मनोरथ मैं ही पूर्ण करता हूँ। जिस सद्गुरु

४६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
के अंगुष्ट में ब्रह्मादिक अगणित देवताओं की भीड़ रहती है, जिसका नाम वैकुण्ठ और कैलाश में भी पूजनीय
है, जिसका नाम सुनते ही यम और काल थरथर काँपते हैं और ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर तीनों हाथ जोड़कर
खड़े रहते हैं, उसी प्रकार जो सारे वेदों का रहस्य है, वही सद्गुरु का स्वरूप है, यही शिष्य की निश्चित धारणा
होनी चाहिये। उसे साधारण मनुष्य समझ कर कभी उसका अनादर नहीं करना चाहिये। गुरु की निन्दा मुँह से
निकले तो समझ लो सर्वस्व नाश हो गया। यदि कोई निकट सम्बन्धी एकांत में सद्गुरु की निन्दा करने आये तो
जिस प्रकार धर्म परिवर्तन करने वाले का बहिष्कार किया जाता है, उसी प्रकार उसका त्याग करना चाहिये। यदि
यह सम्भव न हो तो स्वयं वहाँ से भाग जाये। यदि वह स्वयं ही सद्गुरु की निन्दा की बात करता है तो समझ
लो सब कुछ डूब गया, परमार्थ मिट्टी में मिल गया। ऐसे गुरु के प्रति पत्र, पुष्प, अन्न, धन इस सम्बन्ध में कभी
प्रवंचना न करे ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
सायं प्रातरुपानीय भैक्ष्यं तस्मै निवेदयेत्।
यच्चान्यदप्यनुज्ञातमुपयुञ्जीत संयतः ॥ २८॥
प्रातःकाल, दोपहर और सायंकाल अन्न, द्रव्य, पुष्प, फल आदि जो भी भिक्षा में प्राप्त हो उसे गुरु को देकर
उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहे। यदि गुरु आज्ञा दें तो उसमें से केवल उदर निर्वाह लायक अन्न लेकर ग्रहण
करें। ब्रह्मचारी को अन्न के अतिरिक्त अन्य कोई वस्तु ग्रहण नहीं करनी चाहिये। सुबह और शाम भोजन करना
ब्रह्मचारी के लिये विहित है। गुरु की आज्ञा से जितना भी अन्न मिले उससे क्षुधाशान्ति करनी चाहिये। उसे कभी
अच्छा या खराब नहीं कहना चाहिये। जिह्वा का लाड़ नहीं करना चाहिये। विषय विस्तार नहीं बढ़ाना चाहिये।
देह का निर्वाह हो इतना ही पर्याप्त है, ऐसी शिष्य की इच्छा होनी चाहिये। भोजन करते समय कुछ माँगना नहीं
चाहिये, उसके लिये मौन रहना चाहिये। अधिक अन्न खाने से वह गुरुसेवा में प्रतिबंध होता है। अधिक अन्न
खाने से निद्रा और आलस होता है और बहुत कम खाने से शरीर अपंग हो जाता है। गुरु सेवा के लिये वृत्ति
सावधान रखनी चाहिये। इसके लिये शिष्य का भोजन मर्यादित होना चाहिये। गुरु की सेवा के लिये शरीर सुदृढ़
रखना चाहिये। गुरुसेवा का यह लक्षण स्वयं जनार्दन बता रहे हैं।
शुश्रूषमाण आचार्यं सदोपासीत् नीचवत्।
यानशय्यासनस्थानैर्नातिदूरे कृताञ्जलिः ॥ २९ ॥
गुरुसेवा में तिलमात्र का भी अन्तर न करते हुए सदा उल्हास से तत्पर रहना चाहिये। गुरु यदि किसी वाहन
पर आरूढ़ हों तो स्वयं उनके साथ-साथ उत्साह से चलना चाहिये। वे यदि पैदल चल रहे हों तो उनका सामान
हाथ में लेकर उनके पीछे-पीछे चलना चाहिये। उनका मन देखकर उन्हें पानी, पान आदि देना चाहिये, वह जहाँ
बैठने वाले हों वहाँ आसन बिछाना चाहिये और उनके पैर दबाने चाहिये। सद्गुरु जब आसन पर बैठ जाएँ तो न
उनके बहुत निकट बैठना चाहिये और न बहुत दूर ही बैठना चाहिये। हमेशा उनके दृष्टिपथ में रहें। हाथ जोड़कर
सामने खड़े रहें। गुरु संकेत दें वह काम करना चाहिये। गुरु बिस्तर पर सोये हों उस समय उनके पास नहीं रहना
चाहिये। रात को यदि वे बुलायें तो सुनायी पड़े इतने अन्तर पर रहें। सेवा करने वाला एक मैं ही हूँ ऐसा
अभिमान करने से सारी सेवा व्यर्थ हो जायेगी। सेवा करते समय सारे सेवकों में मैं केवल रंकों में भी रंक हूँ यही
भाव रखना चाहिये। उसी प्रकार सेवा का कोई क्षुद्र काम करने में लज्जा नहीं करनी चाहिये। मन में किसी भी
प्रकार का आलस न धर गुरुजनों के प्रति सदा उल्लास का भाव रखना चाहिये।

सत्रहवाँ अध्याय ४६५
एवंवृत्ता गुरुकुले वसेद् भोगविवर्जितः।
विद्या समाप्यते यावद् बिभ्रद् व्रतमखण्डितम्॥ ३०॥
सारे सुखोपभोग त्याग कर गुरु के घर रह कर वहाँ गुरु की सेवा के व्रत से ही वह सबका प्रिय बन जाता
है। इस प्रकार गुरुसेवा कर तथा अखण्ड ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर, वेदशास्त्र में प्रवीण होकर सारा अध्ययन
समाप्त हो जाता है और सारी विद्या जब पूर्ण हो जाती है तो नैष्ठिक और उपकुर्वाण व्रत का पालन कैसे किया
जाय यह श्रीकृष्ण अगले श्लोक में बता रहे हैं।
यद्यसौ छन्दसां लोकमारोक्ष्यन् ब्रह्मविष्टपम्।
गुरवे विन्यसेद् देहं स्वाध्यायार्थं बृहद्व्रतः॥ ३१॥
ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते समय जो उसी आश्रम को निरन्तर चलते रखने का निश्चय करता है व वेदों
में लिखे अनुसार सत्यलोक से वैकुण्ठ तक मेरी प्राप्ति की इच्छा करता है। उसे स्वयं जीवनपर्यंत गुरुभजन
व्यवस्थित होने के लिये सारा देह ही गुरुचरण में अर्पित करना चाहिये। रोज नये प्रेम से गुरु का भजन करना
चाहिये। गुरुचरणों में आत्मभावना रखने से उसी की लगन लग जाती है। ऐसा पुरुष पहले से रखा हुआ
ब्रह्मचर्यव्रत आगे चालू रखता है और उसी को दृढ़ करता है। वही 'नैष्ठिक' ब्रह्मचारी बनता है और गुरुभजन पर
ही निश्चय रखता है। वह मानसम्मान की इच्छा नहीं करता, विषय से प्रेम नहीं रखता, संसार से मोह नहीं
रखता; अपने व्रत में दृढ़तापूर्वक लगा रहता है। ऐसे व्रत का पालन कर जो महान व्रतधारी बनता है, उसकी
गुरुजनों पर वैसी ही निष्ठा जमती है और वह सद्गुरु के साथ स्वाध्यायपूर्वक वेदांतरहस्य का ही विचार करता
रहता है। 'स्व' का अर्थ है आत्मा यह ध्यान में रखो। उसी का नित्य अनुसंधान करना, इसी को ज्ञानीजन
'स्वाध्याय' कहते हैं। इस प्रकार के साधक के लिये सर्वत्र ब्रह्म की ही भावना रखना उचित होता है। यही बात
श्रीकृष्ण अपने मुख से अगले श्लोक में बता रहे हैं।
अग्नौ गुरावात्मनि च सर्वभूतेषु मां परम्।
अपृथग्धीरुपासीत ब्रह्मवर्चस्यकल्मषः॥ ३२॥
इस प्रकार ब्रह्मचर्यव्रत धारण करने से शरीर पर ब्रह्मतेज चढ़ता है। सद्गुरु के भजन से तथा आत्मवृत्ति से
वह निष्पाप हो जाता है। उसे अग्नि, गुरु, स्वयं तथा समस्त प्राणिमात्र में अभिन्न ब्रह्मभावना धारण कर निरन्तर
वही अनुसन्धान करते रहना चाहिये। ऐसा करने से जब भी कोई दृश्य पदार्थ उसकी दृष्टि के सामने आता है उसे
वह शुद्ध ब्रह्मरूप ही लगता है। इस प्रकार ब्रह्मस्वरूप होकर सद्भाव के साथ वह मेरी उपासना करता रहता है।
सारांश नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का व्रत वानप्रस्थ तथा संन्यासियों जैसा ही होता है। इसमें आचरण का जो प्रमुख धर्म है
उसका मर्म है त्याग।
स्त्रीणां निरीक्षणस्पर्शसंलापक्ष्वेलनादिकम्।
प्राणिनो मिथुनीभूतानगृहस्थोऽग्रतस्त्यजेत्॥ ३३॥
नैष्ठिक ब्रह्मचारी, संन्यासी तथा वन में रहने वाले वानप्रस्थ इन्हें मुख्य रूप से स्त्रियों की ओर नहीं देखना
चाहिये, यही उनका मुख्य धर्म है। यदि स्त्री दिखायी पड़े तो तत्काल अपनी झोपड़ी छोड़कर भाग जाना चाहिये।
फिर उससे बात करना कैसे सम्भव होगा? इन तीनों को स्वप्न में भी स्त्री का स्पर्श नहीं करना चाहिये। करने से

४६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
मदन उनका वीर्यस्खलन करा देगा। उन स्त्रियों से हास्यविनोद करने से धर्म का मूल बीज ही नष्ट हो जायेगा।
इसलिये शुद्ध ज्ञानी लोग स्त्रीगुणों का वर्णन नहीं करते। स्त्रियों के हावभाव देखना, उनसे एकान्त करना, गुह्य
बातें करना, अनेक प्रकार के विनोद करना, शरीर से घर्षण करना, हँसी-मज़ाक अथवा श्रृंगारिक भाषण करना,
इतना भी यदि हो जाय तो वहाँ काम का आघात पड़ेगा और स्वधर्म डूब जायेगा तथा धैर्य का जो मूलतत्त्व है
उसका विनाश होगा। गृहस्थ की भी यदि परस्त्री से व्यवहार करने की यही प्रवृत्ति हो तो वह भी संकट में
पड़ेगा। स्त्री अग्नि के कुण्ड की तरह है और पुरुष घृत के घट की तरह है। अग्नि का सम्पर्क होते ही घृत
पिघलने लगता है। उसी प्रकार वृद्धावस्था में भी स्त्रियों के साथ एकान्त करने पर तथा हँसी मजाक की बातें
करने से उस पर भी काम का प्रहार हो सकता है। इसलिये स्त्रियों की संगत टालनी चाहिये, यही परमार्थ का
प्रमुख भाग है, यही बात श्रीकृष्ण ने अपने मुख से उद्धव को बतलायी। पराशर सरीखा महंत भी मत्स्योदरी से
रममाण हुआ। इससे स्त्री का एकान्त पुरुष के लिये अनर्थ का कारण है यह निश्चित रूप से समझना चाहिये।
पशु-पक्षी आदि मैथुन कर रहे हों तो उन्हें जानबूझ कर नहीं देखना चाहिये। देखने से काम उद्दीप्त होता है।
मत्स्य का मैथुन आँखों से देखने के कारण काम की ज्वाला भड़क उठी और ऋषिश्रेष्ठ सौभर ने मैथुन के लिये
करोड़ों तप नष्ट कर दिये। इसलिये काम का दर्शन या काम का स्मरण भी पुरुष के लिये बाधक है। इसलिये
काम का स्मरण भी नहीं करना चाहिये। हृदय में काम का संचार ही न हो ऐसा आचरण रखना चाहिये। श्रीकृष्ण
कहते हैं, सभी प्राणिमात्र मत्स्वरूप हैं यह मानना चाहिये। यही महत्व की बात है।
शौचमाचमनं स्नानं संध्योपासनमार्जवम्।
तीर्थसेवा जपोऽस्पृश्याभक्ष्यासम्भाष्यवर्जनम्॥ ३४॥
शौच, आचमन, स्नान, संध्या, तर्पण, पूजा, अर्चा, जपादि अनुष्ठान, भक्ति से करना चाहिये तथा तीर्थसेवन
आदि करना चाहिये। अधर्म का अथवा अकर्म का जरा भी स्पर्श नहीं होने देना चाहिये, संकटकाल होने पर भी
अभक्ष्य का सेवन नहीं करना चाहिये। जो व्रतस्थ हो उसे रजस्वला अथवा निंद्य लोगों से भाषण नहीं करना
चाहिये। निंदा अथवा स्तुति इस सम्बन्ध में मौन रखना चाहिये। श्रीकृष्ण कहते हैं, उद्धव! अब सभी आश्रमों के
स्वधर्म नियमों का क्या लक्षण होता है, उसे अच्छी तरह ध्यान देकर सुनो।
सर्वाश्रमप्रयुक्तोऽयं नियमः कुलनन्दन।
मद्भावः सर्वभूतेषु मनावाक्कायसंयमः॥ ३५॥
हे यदुकुलदीपक सूज्ञ उद्धव! सुनो। सभी वर्णाश्रम धर्म लक्षणों की निष्ठा एक ही है। वह यही है कि
काया, वाचा तथा मन से अपना संयमन कर समस्त प्राणिमात्रों के प्रति ब्रह्मस्वरूप की अखण्ड भावना रखनी
चाहिये। श्रीहरि कहते हैं, इस प्रकार समस्त प्राणिभाग पर मत्स्वरूप की दृढ़ भावना अंकित होने पर ऐसे नैष्ठिक
ब्रह्मचारी को मोक्षफल की प्राप्ति होती है।
एवं बृहद्व्रतधरो ब्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन्।
मद्भक्तस्तीव्रतपसादग्धकर्माशयोऽमलः॥ ३६॥
इस प्रकार जो ब्रह्मचारी इस कठोर व्रत का पालन करता है, सभी प्राणियों के प्रति मेरी ही भावना रखता है
और वह भावना अंतःकरण में निरन्तर रखता है तथा इस प्रकार मेरे भजन करने के कारण उसकी वासनायें

सत्रहवाँ अध्याय ४६७
कर्मबीज के साथ जल जाती हैं। उसी समय मेरी पूर्ण भक्ति भक्त के अंतःकरण में भर जाती है। बिना किसी
उपाय या प्रयास के, सहज स्थिति से उसमें मेरे प्रति भक्ति उत्पन्न होती है। उस समय वह जिस दृश्य व्यक्ति को
देखता है उसमें चिद्रूप मैं ही हूँ ऐसा उसे प्रतीत होता है। ऐसी भक्ति होने पर वह आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी इन
पंक्तियों से ऊपर उठ कर चिन्मात्रैक चौथी भक्ति प्राप्त करता है। सचमुच जिस भक्ति के कारण चारों मुक्तियाँ पैरों
पर लोटती हैं, वह स्वानंद मेरे भक्तों की देह में पूर्णतयः उल्हास प्राप्त करता है। उस समय उन्हें मुक्तता प्राप्त
करने का स्मरण भी नहीं होता। अथवा 'मेरा बन्धन समाप्त हो गया' यह भी उसे याद नहीं रहता। सारांश, मेरे
भजनसुख में ही वह सारे सुख और दुःख भूल जाता है और मेरी भक्ति के आनन्द में स्वानंद सुख में सन्तुष्ट
रहता है। इस प्रकार का 'नैष्ठिक' ब्रह्मचारी अपने स्वधर्म से मत्स्वरूप तक पहुँचता है। अस्तु! अब दूसरी स्थिति
अर्थात् 'उपकुर्वाण' ब्रह्मचर्य के बारे में तुझे बताता हूँ। सुनो।
अथानन्तरमावेक्ष्यन् यथा जिज्ञासितागमः ।
गुरवे दक्षिणां दत्त्वा स्नायाद् गुर्वनुमोदितः ॥ ३७ ॥
सारा अध्ययन पूर्ण होने पर, वेदशास्त्र में निपुण हो जाने के बाद यदि विषयोपभोग की इच्छा हो तो उसे
गुरु की आज्ञा लेकर व्रत का विसर्जन करना चाहिये। विषयोपभोग की इच्छा अथवा अनिच्छा—जैसी उसकी
प्रवृत्ति हो उसका अच्छी तरह विचार कर, जैसा शिष्य का अधिकार होता है, उसके अनुसार गुरु आज्ञा देते हैं।
जिसे गृहस्थाश्रम की इच्छा हो उसे गुरु को यथाशक्ति दक्षिणा देकर ब्रह्मचर्य व्रत की समाप्ति करनी चाहिये।
समावर्त्तन करने के लिये गुरु की आज्ञा लेकर मंगल स्नान करना चाहिये और तब व्रतबंध का विसर्जन करना
चाहिये। यहाँ श्रीकृष्ण अधिकार भेद का वर्णन कर रहे हैं। वैराग्य के सम्बन्ध में प्राप्त होने वाले उसी अधिकार
का अगले श्लोक में वर्णन करता हूँ।
गृहं वनं वोपविशेत् प्रव्रजेद् वा द्विजोत्तमः ।
आश्रमादाश्रमं गच्छेद्वान्यथा मत्परश्चरेत् ॥ ३८ ॥
जिसमें जरा भी वैराग्य नहीं है, अंतःकरण में स्त्री के उपभोग की चाह है उसे दूसरा अर्थात् गृहस्थाश्रम
स्वीकार करना चाहिये अथवा जिसे स्त्रीकाम तो अच्छा नहीं लगता किन्तु थोड़ा बहुत विवेक वैराग्य रहता है;
स्त्री सुख की विशेष चाह नहीं होती लेकिन विवेक-वैराग्यपूर्ण नहीं होता, ऐसी स्थिति हो तो उसे तत्काल
वानप्रस्थ की ओर प्रस्थान करना चाहिये। जो विवेक के तेज से देदीप्यमान हो, जिसके पास सदा वैराग्य जागृत
रहता हो, जो किसी भी विषय में बिलकुल विरक्त हो उसके लिये ही संन्यास आश्रम उपयुक्त है। जो जन्मतः
ब्राह्मण हो उसी को द्विजोत्तम कहना चाहिये। उसी के लिये चतुर्थाश्रम बताया गया है। वैश्य और क्षत्रियों के लिये
चतुर्थाश्रम का नियम नहीं बताया गया है। क्षत्रिय यदि संन्यास लें तो उन्हें तीर्थाटन पर जाना चाहिये, दण्ड-
कमण्डल का विधान उनके लिये नहीं है। ब्राह्मण को यदि ब्रह्मचर्याश्रम में ही प्रखर वैराग्य उत्पन्न हो जाय तो
उसे तत्काल संन्यास लेना चाहिये। विवाह के समय यदि भार्या के सामने पीढ़े पर बैठते ही वैराग्य उत्पन्न हो जाय
तो तत्काल संन्यास ले लेना चाहिये ऐसा श्रेष्ठ लोगों का कहना है। संन्यास ग्रहण के लिये जिसका वैराग्य पूरी
तरह परिपक्व नहीं है, उसे संन्यास ग्रहण की योग्यता ही नहीं है ऐसा समझना चाहिये। जिसे विषयोपभोग का
सुख अच्छा नहीं लगता उसी को संन्यास का अधिकार है। जिसे विषय विकार से जरा भी बाधा नहीं होती, वही
सचमुच संन्यासी है। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते समय यदि वैराग्य हाथ न लग रहा हो तो उसे गृहस्थ बनकर