श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 467, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय
हे ओंकारस्वरूप सद्गुरु! तुम्हें मेरा नमस्कार है। तुम महामेरु स्वरूप हो। सूक्ष्म स्वरूप में तुम पर्वत हो
यह प्रतीत होने पर भी चैतन्यरूप में तुम अत्यन्त महान हो तथा सभी का आधार हो। वैकुण्ठ, कैलाश आदि
तुम्हारे आत्मज्ञान के अत्यन्त उच्च शिखर हैं। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर तुम्हारे ही सहारे वास करते हैं। यह
त्रैलोक्य और सारे लोक तुम्हारे ही आधार पर टिके हुए हैं। समस्त प्राणिमात्र की उत्पत्ति, स्थिति और अन्त में
विलय तुम्हारे में ही होता है। देवता, दैत्य, छोटे, बड़े, सौम्य, क्रूर आदि विविध प्रकार के भूत धारण करके भी
तुम्हारा स्वरूप निर्विकार है। उसमें विवेक का खेत है तथा चिद्रत्न की खानें हैं। उसका एक टुकड़ा भी हाथ लग
जाय तो साधारण आदमी बड़ा व्यापारी बन जायगा। उस पर्वत पर उगी औषधियों का तो बड़ा चमत्कार है।
उनका सेवन करने से वे उन्हें अजर-अमर कर देती हैं। उस पर ज्ञान गंगा के सोते भी निरन्तर बहते रहते हैं। जो
देवताओं तथा मनुष्यों का विश्राम स्थल है, जो ब्रह्मचर्यादि सभी आश्रमों का आश्रम है, जो क्रियाकर्मों का
नैष्कर्म्य है और जो जीवों का निजधाम है, जो भजन का क्षेत्र, भक्तों के जीवन का बगीचा है, जो पसन्द की भी
पसन्द है और जो आत्मानुभव से माधुर्य का भी माधुर्य है ऐसा वह सद्गुरु रूप महामेरु जो कठोरता के बिना ही
सबका आधार है, जिसके कारण साधकों का जीवन भी सुखमय हो जाता है, उन साधकों का समाधान, शिष्यों
के लिये तो आत्मानंद रूप मेघ, मुमुक्षुरूप चातकों का जीवन ऐसा जो जनार्दन स्वामी है वह प्रसन्न हो उठा।
उसके चरणों के कृपाप्रसाद से श्रीमद्भागवत के एकादशस्कंध का बड़े आनन्द से वर्णन किया। उसमें उद्धव ने
श्रीकृष्ण से विभूतियों के बारे में पूछा। उनका वर्णन सोलहवें अध्याय में लक्ष्मीपति ने भजनप्रीत्यर्थ यथार्थ रीति
से किया। उस विभूतिवर्णन की विशेष बात यह है कि उसमें श्रीकृष्ण ने कहा कि भक्तों का जो कर्म है, वह मैं
आत्माराम ही हूँ। उसमें एक शंका उत्पन्न हुई कि निरन्तर कर्म करते हुए कितने ही लोग केवल कर्मठ हो गये हैं,
जिनकी कोई गिनती नहीं है। तो कर्म से कैसे मुक्ति मिलती है ? इच्छा से कर्म करते समय कर्म में कर्तव्यता का
अभिमान न हो और कर्म से मोक्ष प्राप्ति हो ऐसा उपाय स्वयं पूछे। क्योंकि लक्ष्मीपति ने स्वयं ही बताया कि
सात्त्विक जो कर्म करते हैं वह कर्म ही मेरी विभूति है। यह बात सोलहवें अध्याय के अन्त में बतायी गयी है।
स्वयं होकर स्वकर्म का आचरण करने से वह कर्म ही ब्रह्मस्वरूप हो जाता है वह जो कर्मक्रिया का मर्म है उसे
सरल ढंग से बताने के लिये भगवान से कहें। उद्धव के मन में यही उद्देश्य था इसलिये इस शंका का समाधान
करने के लिये व भगवान से वर्णाश्रम की तथा स्वधर्म की पृष्ठभूमि ही पूछने लगा।
उद्धव उवाच
यस्त्वयाभिहितः पूर्वं धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः।
वर्णाश्रमाचारवतां सर्वेषा द्विपदामपि॥ १॥
उद्धव ने कहा, हे भक्तों के भगवान ! तुम्हारी आत्मविभूति का श्रवण करते हुए मेरे मन में आया कि स्वधर्म से
किस प्रकार भक्ति का उदय होगा। तुम तो कल्प के प्रारम्भ से ही अत्यन्त सहृदयता से कहते आ रहे हो कि स्वधर्म
कर्म से ही भक्ति प्राप्त होती है और इस सम्बन्ध में तुमने वर्णाश्रम का उत्कृष्ट प्रतिपादन किया है। सभी मनुष्यों को
उत्तम गति और भगवद्भक्ति स्वधर्म से प्राप्त होती है इसका तुमने ही यथार्थ और निश्चित निरूपण किया है।