श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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ही 'उज्ज्वल तप' कहते हैं। अब 'शौच' का अर्थात् पवित्रता का विचार सुनो। वह दो प्रकार का है—अंतःकरण
में ज्ञान का निश्चय तथा बाहर वेदोक्त आचरण। शरीर पर जो बाह्य मैल होता है उसका क्षालन वेदविधान के
अनुसार मृत्तिका और जल आदि से करना चाहिये और आत्मनिष्ठा से अंतःकरण के मैल धो डालने चाहिये।
उद्धव! इस प्रकार अंतर्बाह्य निर्मलता प्राप्त करना यही शौच का मुख्य लक्षण है। अब संतोष का भी सम्पूर्ण
लक्षण बताता हूँ, सुनो। पुत्र का जन्म होता है तो आनन्द होता है लेकिन उसके जाते ही दुःख होने लगता है, धन
प्राप्त होने पर आनन्द होता है और उसके जाते ही तत्काल दुःख होता है। लेकिन जिस सुख की प्राप्ति होते ही
कोटि दुःख नष्ट हो जाते हैं उसी का नाम सच्चा और शाश्वत सुख है। इसके अतिरिक्त अन्य बकवास व्यर्थ है।
मेरी भक्ति से अंतःकरण में जो स्वाभाविक सुख प्राप्त होता है वह सम्पत्ति अथवा विपत्ति आने पर भी सर्वत्र
समभाव होने के कारण संतोष ही उत्पन्न करती है। इन शब्दों में कहीं-कहीं पाठभेद दिखायी देता है। बड़े-बड़े
विद्वान 'संतोष' की जगह 'तितिक्षा' शब्द का प्रयोग करते हैं। उसका भी अर्थ सुनो। उसका रहस्य यह है कि
ठंडक तथा धूप, मृदु तथा कठोर इनमें से कोई भी यदि शरीर पर प्रहार करे तो उसका मन विचलित नहीं होता।
इसका कारण यह है कि इस द्वंद्व में उसकी मद्भावना रहती है। संतोष अथवा तितिक्षा इस शब्द का निरूपण इस
श्लोक के पाँचवे शब्द का लक्षण है। इतना कह कर श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा, अब शान्ति का निरूपण सुनो।
मन में मेरा निजबोध होने पर अंतःकरण के कामक्रोध नष्ट हो जाते हैं। कोई अपराध करता है तो उसके प्रति
उनकी कोई विपरीत भावना नहीं होती। बल्कि इसके विपरीत वह अपकार करने वाले के प्रति उपकारी होता है।
उसके अंतःकरण में विकार उत्पन्न ही नहीं होता, वही सच्ची शान्ति है। इस प्रकार की सर्वकाल परिपूर्ण शान्ति
होना ब्राह्मण का छठाँ लक्षण है। अब 'आर्जव' का लक्षण सुनो। बिलकुल अंतःकरण की पहचान ही बता देता
हूँ। देखो, भले ही माँ कुरूप हो लेकिन उसकी ममता में कुरुपता नहीं होती अथवा यदि सुवर्ण का नाग बनाया
जाय तो सुवर्ण नाग नहीं बन जाता। उसी प्रकार कुटिल से कुटिलता से व्यवहार करना चाहिये यह बताने पर भी
जिसके मन में कुटिलता नहीं आती वही सचमुच 'आर्जव' अर्थात् सरल है। गौ के लिये मीठा तथा बाघ के लिये
कडुवा यह भेद गंगोदक में नहीं होता। वही बात आर्जव की है। वह ऐक्यभाव से कुटिल के साथ मधुर ही रहता
है। इसी का नाम आर्जव है और यह ब्राह्मण का सातवाँ अद्भुत लक्षण है। अब देवाधिदेव निजभक्ति का लक्षण
बताते हैं। अरण्य, उद्यान और गंगाजल इन सबके लिये जिस प्रकार पृथ्वी का ही आधार है, उसी प्रकार हे
उद्धव! सारे लक्षणों का उत्पत्तिस्थान मेरी भक्ति ही है यह जान लो। सभी तरह का अनाज उत्पन्न होने के लिये
जिस प्रकार आधारभूत भूमि ही होती है, उसी प्रकार सभी लक्षणों की उत्पत्ति भक्ति में से होती है। उस भक्ति का
लक्षण सुनो। विषय का स्वार्थ छोड़कर जो जीव प्राण मुझसे भक्ति करता है, वही मेरा भक्त है। भक्त कहलाकर
धनार्जन करना यही भक्ति का सबसे बड़ा विघ्न है। उद्धव! धन के लोभी को शुद्ध अभक्त समझना चाहिये।
जिसके अंतःकरण में मेरी भक्ति नहीं है लेकिन जो मेरी भक्ति का पाखण्ड रचता है वह अन्धे गरुड़ की तरह
आकाश में उड़ान भरता है लेकिन बैठने का स्थानं वह नहीं जान पाता। जो मेरी भक्ति करता है उसमें मैं जाति या
कुल नहीं देखता। मैं भक्तों को भक्ति से ही तत्काल वश होता हूँ। जहाँ भक्तिभाव से मेरे प्रति प्रेम होता है वहाँ मैं
तत्काल कूद पड़ता हूँ। जिसने मेरी भक्ति की पताका फहरायी वही मेरी भक्ति 'का माधुर्य जानता है। जो भी
सामने दिखायी दे वह सब ईश्वर है, ऐसा जिसका भक्तिभाव है वही एक मेरा लाडला है। हे उद्धव! उसकी ही
भक्ति पर हम जीवित हैं। मेरा जीव प्राण वही है। उस पर मैं सब कुछ निछावर कर देता हूँ। ब्यायी हुई गाय
जिस प्रकार अपने बच्चे के वश में रहती है उसी प्रकार मैं भी उसके अधीन रहता हूँ। सारांश, हे उद्धव! भावुकता