श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ अध्याय ४५३
का वक्ता और धर्म का विस्तार कर उसका संरक्षण करने वाला तुम्हारे सिवा कोई और नहीं हो सकता। यदि इस
लोक में भी देखें तो तुम्हारे जैसा सर्वज्ञ कोई नहीं है, इतना ही नहीं यदि विस्तार में देखें तो तुम्हारे जैसा उपदेशक
त्रैलोक्य में भी नहीं है। यदि सत्यलोक में देखें तो वहाँ चारों वेद, षड्दर्शन, इतिहास, स्मृति, पुराण ये साक्षात
खड़े दिखायी देते हैं। लेकिन वहाँ भी सनकादिकों के प्रश्नों का उत्तर ब्रह्मदेव नहीं दे पाये। तब तुमने हंस रूप में
वहाँ आकर उनका समाधान किया। ब्रह्मदेव की सभा में भी तुम्हारे जैसा वक्ता नहीं है। तुम मूर्तिमंत ब्रह्म हो और
केवल भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये ही इस लोक में तुम्हारा अवतार हुआ है। तुमने सभी कर्मधर्म की
स्थापना कर उसके अनुसार आचरण भी कर दिखाया है। तुम्हारे निजधाम जाने पर फिर स्वधर्म का उपदेश कौन
करेगा ? सारांश, हे श्रीकृष्ण ! भक्ति से युक्त स्वधर्म का रहस्य यथार्थ रीति से प्रतिपादित करने का सामर्थ्य तुम्हारे
सिवा किसी अन्य में नहीं है। तुम जगज्जीवन भक्तों के सहायक हो, भक्तों के अभिमानरूपी मदमत्त हाथी का मद
शान्त करने वाले हो इसीलिये तुम्हें 'मधुसूदन' कहते हैं। ऐसी प्रार्थना कर उद्धव आगे बोलने लगा।
तत्त्वं नः सर्वधर्मज्ञ धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः।
यथा यस्य विधीयेत तथा वर्णय मे प्रभो ॥७॥
तुम सर्वज्ञ होते हुए ज्ञान की मूर्ति हो। अतः मनुष्य के कर्मों की गति तथा वर्णाश्रम धर्म का रहस्य मुझे
यथार्थ रूप में बतायें। उसी प्रकार वर्णबाह्य लोगों का कर्म तथा उनका जो विहित धर्म है उसके बारे में भी
बतायें। इस प्रकार उद्धव ने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की, तब मेघश्याम श्रीकृष्ण प्रसन्न हुआ सभी लोगों के हित की
दृष्टि से उद्धव ने किया प्रश्न सुनकर योगेश्वर शुक्राचार्य भी आनन्द से अभिभूत हो गये। उन्होंने परीक्षित से
कहा, उद्धव की बुद्धि धन्य है क्योंकि उसने श्रीकृष्ण की प्रार्थना कर सारे संसार पर उपकार कर दिया है।
श्रीशुक उवाच
इत्थं स्वभृत्यमुख्येन पृष्टः स भगवान् हरिः।
प्रीतः क्षेमाय मर्त्यानां धर्मानाह सनातनान् ॥८॥
शुक्राचार्य बोले, हे परीक्षित! सावधान चित्त से सुनो। उस उद्धव का प्रश्न सचमुच ही धन्यवाद के योग्य
है। उसने स्वकर्म से ही मुक्ति के बारे में पूछा है। जो सारे सेवकों में अत्यन्त प्रिय और श्रीकृष्ण को अच्छा लगा,
जिसके बिना श्रीकृष्ण का मन कहीं नहीं लगता था, अपनी गुप्त बात श्रीकृष्ण उसको ही बताता था, उसके प्रश्न
का उत्तर देने में रमावल्लभ ने एक क्षण का भी विलम्ब नहीं किया। ब्रह्मदेव आदि को भी जो दुर्लभ है वह
परमात्मा उद्धव को बिलकुल सुलभ हो गया था। इसलिये सेवकों में प्रमुख स्थान इस संसार में उद्धव को प्राप्त
हुआ था इसलिये उसी ने भगवान की प्रार्थना कर, स्वकर्म से मुक्ति का उपाय क्या है यह प्रश्न पूछा था। श्रीकृष्ण
ने भी केवल उद्धव के लिये स्वधर्म से मोक्ष का मार्ग बताया। चातक का स्वर सुनते ही जिस प्रकार मेघ गर्जन-
सर्जन करके जल की वृष्टि करता है अथवा बछड़े का स्वर सुन कर गाय रंभाने लगती है, उसी प्रकार उद्धव का
भाषण सुनकर श्रीकृष्ण ने आत्मगर्जना की और प्रसन्न होकर कहने लगे।
श्रीभगवानुवाच
धर्म्य एष तव प्रश्नो नैःश्रेयसकरो नृणाम्।
वर्णाश्रमाचारवतां तमुद्धव निबोध मे॥९॥