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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 869 में से

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पृष्ठ 470

४५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जिस प्रकार एकमेव पुत्र रहने पर माँ उसकी कोई बात अधूरी नहीं छोड़ती उसी प्रकार उद्धव श्रीकृष्ण का
लाडला था इसीलिये वह उसका भाषण व्यर्थ नहीं जाने देना चाहता था। श्रीहरि आनन्द से बोले, उद्धव! तुम्हारी
वाणी धन्य है। तुमने सबके लिये मोक्षमार्ग का यह सोपान ही तैयार कर दिया। तुम्हारे प्रश्न का उत्तर यह है कि
जो भी वर्णाश्रमी पुरुष हैं, उनके लिये स्वधर्म ही मोक्षदायी है। उद्धव! कल्प के प्रारम्भ से प्रवृत्त हुई स्वधर्म
संस्था की पुरातन युग से चली आ रही कथा तुम्हें सुनाता हूँ। ध्यान देकर सुनो।
आदौ कृतयुगे वर्णो नृणां हंस इति स्मृतः।
कृतकृत्याः प्रजा जात्या तस्मात् कृतयुगं विदुः ॥ १०॥
वेदः प्रणव एवाग्रे धर्मोऽहं वृषरूपधृक्।
उपासते तपोनिष्ठा हंसं मां मुक्तकिल्बिषाः ॥ ११॥
कृतयुग में स्थिति यह थी कि तब चार वर्ण नहीं थे, अनेक शास्त्रों का वेदाध्ययन अथवा कर्माचरण भी
नहीं था। उस समय सभी लोग ‘सोहं हंसा' अर्थात् मैं ही ब्रह्म हूँ इसका निरन्तर ध्यान करते थे। इसलिये उस
काल में 'हंस' यही सबका वर्ण था। उस समय 'ओंकार' रूप से ही वेदपठन होता था और तप, दया, सत्य तथा
शुद्धता इन चार पैरों से वृषभरूपी धर्म मैं ही था। उस समय अधर्म का नाम भी नहीं था, यह जान लो। उस
समय सत्त्वगुण श्रेष्ठ था। इसलिये सब लोग सत्य पर ही चलते थे। सभी लोग धर्मपरायण थे। कपट का उस
समय जन्म ही नहीं हुआ था। उस काल के धर्मनिष्ठ लोगों के अंतःकरण में पराया धन और परायी स्त्री की
अभिलाषा स्पर्श भी नहीं करती थी। उस काल के धर्मनिष्ठ लोगों की आत्मस्वरूप निष्ठा 'परब्रह्म मैं हूँ' में रहती
थी। यही मेरा श्रेष्ठ भजन है और इसी को 'तपोनिष्ठा' कहते हैं। उस समय 'स्वर्ग' और 'नरक' की वार्ता ही
नहीं थी। अधर्म करने की बात स्वप्न में भी नहीं आती थी। इस प्रकार सारी प्रजा स्वधर्माचरण से ही कृतकृत्य
हो जाती थी। इसीलिये उसे 'कृतयुग' कहते हैं।
त्रेतामुखे महाभाग प्राणान्मे हृदयात्त्रयी।
विद्या प्रादुरभूत्तस्या अहमासं त्रिवृन्मुखः ॥ १२ ॥
हे उद्धव! इस कलियुग में तुम्हारे भाग्य पर मुझे आश्चर्य होता है। कृतयोग के लोगों की अपेक्षा तुम पर
मुझे अधिक विश्वास है। त्रेतायुग में कर्म प्रकट हुआ। मैं विराट्स्वरूप पुरुषोत्तम हूँ, मेरे श्वासोच्छ्वास से तीन
वेद उत्पन्न हुए और उन वेदों का विस्तार हुआ। तब तीन प्रकार की विद्या, उनके अनेक भेद, अनेक मंत्र और
अनेक छन्द तथा ऋग्वेद आदि मिलाकर तीनों वेदों का अपनी-अपनी शाखाओं के रूप में उदय हुआ। उन वेदों
से त्रिमेखला युक्त तीन यज्ञ उत्पन्न हुए। वे मद्रूप ही हैं। उस यज्ञ में अध्वर्यु उद्गाता का विशिष्ट कर्म होने लगा।
इस प्रकार का जो यज्ञकर्म है वह भी मद्रूप ही है। उनमें अधिकार का मर्म अर्थात् वर्णाश्रम का वर्णन अगले दो
श्लोकों में श्रीकृष्ण बतला रहे हैं।
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा मुखबाहूरुपादजाः।
वैराजात् पुरुषाज्जाता य आत्माचारलक्षणाः ॥ १३॥
विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण का जन्म हुआ, बाहुओं से क्षत्रिय और जाँघों से वैश्य। शूद्रों का जन्म पैरों
से हुआ, इसे ध्यान में रखो। इस प्रकार चारों वर्ण उत्पन्न हुए। वे अपने धर्म के अनुसार आचरण करें यही उनका