श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 465, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ अध्याय ४४९
जन्म-मरण की वार्ता समाप्त होगी और आने-जाने का क्रम समाप्त होगा। मैंने बतायी हुई नियम पद्धति के
अनुसार नियमन करने की बात जिसकी समझ में नहीं आती वह कोटि-कोटि दुःख भोगता है। उसका भी वर्णन
करता हूँ।
यो वै वाङ्मनसी सम्यगसंयच्छन् धिया यतिः।
तस्य व्रतं तपो दानं स्रवत्यामघटाम्बुवत्॥ ४३ ॥
मैंने बताये हुए नियमों के अनुसार जो मन, बुद्धि और इन्द्रियों का निष्ठापूर्वक नियमन नहीं करता उसके
साधन व्यर्थ हो जाते हैं। कच्ची मिट्टी के बर्तन का पानी जिस प्रकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार उसका व्रत,
तप, दान, योग, याग, शब्दज्ञान ये सब व्यर्थ हो जाते हैं। जिस प्रकार राख में होम करने से अथवा अमंगल स्थिति
में कर्मों का आचरण करे या कुपात्र को दान दें वैसी ही स्थिति साधनों की होती है। ऊसर पर बीज डालने से
अथवा भिखारी ब्राह्मण को भोजन का निमंत्रण दे अथवा बाँस को इच्छायें होने लगे उसी प्रकार उन साधनों की
स्थिति समझनी चाहिये। इस प्रकार हे उद्धव ! यदि मन में यदि विधिपूर्वक नियम का पालन न किया जाय तो
सारे साधन देखते-देखते व्यर्थ हो जाते हैं। इसलिये मन आदि इन्द्रियों की जो वृत्ति है उसका नियमन करना
चाहिये ऐसा स्वयं श्रीकृष्ण उद्धव को बताते हैं।
तस्मान्मनोवचः प्राणान् नियच्छेन्मत्परायणः।
मद्भक्तियुक्तया बुद्ध्या ततः परिसमाप्यते॥ ४४ ॥
देखो! मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ तथा प्राण इनका नियमन अवश्य करना चाहिये, इसे ध्यान में रखो। इस प्रकार
वृत्ति को सावधान रखते हुए जो मेरा भजन करता है उसकी विषय वासनायें जल जाती हैं और मेरे भक्तिमार्ग पर
चलने से निर्विकल्प शान्ति उत्पन्न होती है। भक्तिमार्ग पर चलने से सारे साधन लज्जित हो जाते हैं। भक्ति के
कारण ही मैं लक्ष्मीपति प्रकट होकर मेरे भक्तों की संसार से निवृत्ति करता हूँ। यदि मेरे भक्तों को सांसारिक बाधा
होती है तो मुझ भगवान को ही उससे लज्जा होती है। मैं निजभक्तों को कष्ट में नहीं रहने देता। प्रह्लाद का छल
होते ही मैं नरसिंह रूप में शुष्क काष्ठ में प्रकट हुआ और गजेन्द्र के लिये वैकुण्ठ छोड़कर दौड़ पड़ा। कौरव
द्रौपदी का छल कर रहे थे अतः मैंने तत्काल उनके मुँह में कालिख पोत दी। अग्नि ने गोपालों को पीड़ा दी उस
समय मैं वह दावाग्नि पी गया। इन्द्र गोकुल को कष्ट दे रहा था, उस समय मैंने गोवर्धन पर्वत हाथ पर उठा
लिया। उसी प्रकार गोपियों का मनोरथ पूरा करने के लिये मैं श्रीपति कामी बन गया। अर्जुन की प्रतिज्ञा पूर्ण हो
इसलिये मैंने दिन में ही सूर्य को छिपा दिया और जयद्रथ को मारने का पराक्रम करा कर अर्जुन को बचाया।
अम्बरीष का गर्भवास मैंने आनन्दपूर्वक झेला। मैं श्रीकृष्ण कभी भी अपने भक्तों को नीचा नहीं देखने देता। भक्तों
के चरणों की धूल मैं श्रीपति अपने हृदय पर धारण करता हूँ। इतना ही नहीं, भक्ति के कारण मैंने भालू और
बन्दरों को भी अपने पास बिठाया। इसीलिये हे उद्धव ! मैं तुम्हें बार-बार कहता हूँ कि मेरी भक्ति करनी चाहिये।
मेरा भजन करने से भक्त सहज ही मद्भाव प्राप्त करता है। मेरी ही भावना मन में धारण कर भजन करने से मैं
अनन्त उसके हाथ आ जाता हूँ और बाद में उसका सेवक बन जाता हूँ। इतना प्यार है मुझे भक्ति से। यहाँ मेरी
भक्ति से सुलभ अन्य कोई साधन ही नहीं है यह जानकर ही मैंने तुम्हें भक्तिमार्ग पर लगाया है। सद्भक्ति प्राप्त हो
जाने पर संसार बिचारा क्या है? मेरे भक्त चारों मुक्तियों को दूर हटाकर आत्मसुख का उपभोग करते हैं। मेरे
भक्तों की महिमा अत्यन्त अतर्क्य और गहन है। इतना कहकर श्रीकृष्ण उद्धव को प्यार से सहलाने लगे। श्रीकृष्ण