श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
के हाथ के स्पर्श से उद्धव को जाने क्या हुआ ? कुछ ऐसा ही हुआ जैसे अभी-अभी ब्यायी हुई गौ का बछड़ा माँ
के दूध से आह्लादित होता है। जिस प्रकार चकोर चन्द्रमा के किरणों से अंतर्बाह्य तृप्त रहता है अथवा मेघ को
देखकर मोर आनन्द से नाचने लगता है, उसी प्रकार उद्धव भी आत्मानंद में पूरी तरह रंग गया और यह भूल गया
कि मैं भगवान का भक्त हूँ और श्रीकृष्ण भी भूल गये कि वे भगवान हैं। इस प्रकार वे दोनों जब एकरूप होकर
मस्त हो गये थे, तभी वहाँ परमानन्द की पताका स्वानंद से फहराने लगी। इस भक्तिसुख का माधुर्य जिसके भाग्य
में है वही जाने। भजनरूपी व्यवसाय में उद्धव को श्रीकृष्ण का लाभ हुआ। एकनाथ जनार्दन की शरण में गया
इसीलिये भजनसुख का रहस्य और भक्तों के अंतःकरण का रहस्य अकेले उसकी समझ में आया। भक्तों के प्राण
उस परमात्मा ने गोकुल में ग्वाला बनकर तथा ग्वालों के साथ हिल-मिल कर गोपियों और गोपालों का उद्धार
किया। यदि केवल उनके ही खेल-खेल कर बालगोपालों का उद्धार किया तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।
लेकिन उसकी अपूर्व कला और उदार लीला तो कुछ और ही है। उसे सुनिये। पर्वत, पाषाण, तृण, भृंग, मत्स्य,
मृग, मगर, उसी प्रकार व्याघ्र, वनचर, सर्प आदि विषैले प्राणी, कबूतर, मोर आदि गोकुल के प्राणियों का उस
कृपालु एवं सर्वसमर्थ श्रीकृष्ण ने स्वयं अपनी लीला से ही उद्धार किया। पिता के वचन के बहाने, सीता के
वियोग के कारण श्रीरामचन्द्र ने रीछ, बन्दर और राक्षसों का भी उद्धार किया। अब इससे भी बड़ी लीला सुनिये।
अयोध्या से लेकर लंका के बीच के मार्ग में जो भी वृक्ष, वनस्पति, ढोके, पत्थर, पर्वत, घास जैसी तुच्छ वनस्पति
और कृमि कीटक थे उन सबका श्रीरामचन्द्र ने अपनी लीला से ही उद्धार किया। इस प्रकार वह जनार्दन नाना
प्रकार के अवतार लेकर जब सभी का उद्धार करता रहता है तो उसने एक एकनाथ को पावन कर दिया, इसमें
आश्चर्य क्यों माना जाय ? लेकिन उसने एक बड़ा आश्चर्य किया कि मुझ जैसे मूढ़ के मुँह से श्रीमद्भागवत के
शब्द देशी भाषा में बुलवाये। इसका मुझे भी बहुत बड़ा आश्चर्य है। जिसकी ऐसी कृपा है उस जनार्दन की ही
शरण में यह एकनाथ है। उसके ही चरणों का स्मरण कर यह सोलहवाँ अध्याय वह पूर्ण करता है।
इति श्री भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे श्रीकृष्णार्जुन संवादे
एकाकार टीकायां विभूतियोग नाम षोडशोध्यायः ॥ १६ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु। श्री विट्ठलार्पणमस्तु।