सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 473, कुल 869 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 473

सत्रहवाँ अध्याय ४५७
की असीम अवस्था का ही नाम है, मेरी भक्ति। अब दया का स्वरूप सुनो। बच्चा संकट में पड़ा देख जिस प्रकार
माँ दुःख असह्य होकर तत्काल सहायता के लिये उठ खड़ी होती है उसी प्रकार किसी दीन दुखी को देख कर
उसके मन में दया उपजती है और एक बार दया उत्पन्न होने पर अपना और पराया कौन पूछता है ? भीषण बाढ़
में डूबने वाले को दयालु व्यक्ति उसकी जाति नहीं पूछता, पहले बाढ़ में कूद कर उसकी जान बचाता है। इसी
का नाम है सच्ची दया। दीन पर दया करने के लिये वह आग में भी कूद पड़ता है, उसका मैं वंदन करता हूँ।
संसार में दयालु पुरुष धन्य है। ऐसी दया के गुण से वह मुझ अनन्त को जीव प्राण के साथ खरीद लेता है।
इसलिये मैं दयावान मनुष्य के घर किसी भी प्रकार का काम करता हूँ। दयालु पुरुष के ऊपर कोई संकट आता है
तो उसका निस्तारण मैं करता हूँ। उद्धव! जो दीनजन का विचार करता है, जो सचमुच दीनदयालु रहता है, वह
केवल मेरा ही भण्डार है। वह मेरे सुख का सार है। इसका नाम 'दया' है यह ध्यान में रखो। यही वह नववाँ
लक्षण है। अब तुम्हें सत्य का सम्पूर्ण लक्षण बताता हूँ। सत्य का सत्य यही है कि जिसे जागृत, स्वप्न अथवा
सुषुप्तावस्था में भी असत्य स्पर्श नहीं करता, वही परिपक्व सत्य है। इस प्रकार का सत्य जब अंतःकरण में पूरी
तरह पहुँचता है तो वाणी भी सत्य होती है और दृष्टि भी सत्य हो जाती है। अंतःकरण के सत्य से सारी सृष्टि ही
सत्यमय हो जाती है और असत्य शेष नहीं रह जाता। यह दसवाँ लक्षण है। यही ब्राह्मण का स्वभावसिद्ध
कर्माचरण है। ब्राह्मण प्रकृति के क्षेत्र में इन दस लक्षणों की उत्पत्ति होती रहती है। उद्धव! ब्राह्मणों की यह
स्थिति जन्मजात, सहज और अकृत्रिम होती है। इन दस लक्षणों से परिपूर्ण होने के कारण ब्राह्मण सभी वर्णों में
श्रेष्ठ और वन्दनीय हैं। हे उद्धव! अब क्षत्रियों की प्रकृति के जो गुण हैं उनका निरूपण सुनो।
तेजो बलं धृतिः शौर्यं तितिक्षौदार्यमुद्यमः ।
स्थैर्यं ब्रह्मण्यतैश्वर्यं क्षत्रप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १७॥
उद्धव! ब्राह्मणप्रकृति के उत्तमोत्तम दस गुण मैंने तुम्हें बताये। अब क्षात्रवृत्ति के दस गुण तुम्हें बताता हूँ,
सुनो। तेज अर्थात् प्रताप का सामर्थ्य; मानों भूतल पर का सूर्य हो। उसके प्रताप से सारे राजा निस्तेज हो जाते हैं।
क्षात्रधर्म का जो पहला गुण है उसका नाम है तेज ! अब क्षत्रिय के बल का चमत्कार सुनाता हूँ। उसके शरीर
सामर्थ्य का ऐसा चमत्कार होता है कि वह अकेला ही लाखों मनुष्यों पर टूट पड़ता है और मस्तक टूट जाने पर
केवल धड़ से शत्रु का मस्तक तोड़ता है। वह जब समरांगण में प्रवेश करता है तो यह नहीं देखता कि मेरा वहाँ
कोई सहायक है या नहीं। जंगली हाथियों के झुण्ड में जिस प्रकार सिंह घुस कर उनका संहार करता है उसी
प्रकार शत्रु की सेना में घुसकर वह बड़े-बड़े वीरों का सफाया करता है। सारा आकाश भले ही राक्षसों से भर
जाय, सारी पृथ्वी पर असुर फैल जाएँ बलवान शत्रुओं से वह भले ही घिर जाय फिर भी उसकी धैर्य बुद्धि में
कमी नहीं आती। आकाश भले ही धरती पर गिर पड़ने के लिये गड़गड़ाये, पृथ्वी उलट-पुलट होना चाहे लेकिन
उसके धैर्य का बाल बाँका नहीं होता। प्रलयकाल भले ही सामने दिखाई देने लगे लेकिन उसके मन में कोई भय
नहीं होता। इस प्रकार का जो स्वभावसिद्ध अटल धैर्य है उसी का नाम 'धृति' है। वह चौरासी प्रकार के
दण्डायुध चलाने में प्रवीण होता है और उसकी शास्त्रार्थ धारणाशक्ति भी उत्तम होती है, धर्म के अनुसार युद्ध
करने में वह निष्णात होता है, इसी का नाम क्षत्रियों की 'धृति' है। अब यदि यह पूछोगे कि शत्रु का शौर्य कैसा
होता है तो वह ऐसा है कि वह शत्रु का नाम भी नहीं रहने देता, उसे कहीं शत्रु दिखाई ही नहीं देता। इसी का
नाम है 'शौर्य'! उनकी शौर्य की वृत्ति धर्मयुद्ध की रहती है। इसीलिये उसे विजयश्री प्राप्त होती है। जो सावधान