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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 869 में से

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पृष्ठ 468

४५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यथानुष्ठीयमानेन त्वयि भक्तिर्नृणां भवेत्।
स्वधर्मेणारविन्दाक्ष तत् समाख्यातुमर्हसि ॥२॥
हे कमलनयन अच्युत! सुनो। जिस स्वधर्म का आचरण करने से तुम्हारी भक्ति स्वाभाविक ढंग से भक्तों
को प्राप्त होती है उस कर्णकौशल्य का लक्षण, हे कमलनयन! माधव! कृपामूर्ति! मुझसे निवेदन करें। हे
लक्ष्मीपति! शायद तुम यह कहोगे कि मैंने कल्प के प्रारम्भ में स्वधर्म की यह स्थिति किसे बतायी ? तो इस
सम्बन्ध में मेरी विनती सुनो।
पुरा किल महाबाहो धर्मं परमकं प्रभो।
यत्तेन हंसरूपेण ब्रह्मणेऽभ्यात्थ माधव ॥३॥
जिसकी बाहों का प्रताप अद्भुत रहता है, जो विश्व का मर्यादा का धर्मसेतु व्यवस्थित रूप से रखना
जानता है उसे 'महाबाहु' कहते हैं। स्वधर्म कर्म का प्रकाशक अनादि वक्ता एक तुम ही हो और वर्णाश्रम का
विचार ब्रह्मदेव से कथन करने वाले उपदेशक भी तुम ही हो। तेरहवें अध्याय में तुमने हंस रूप में स्वधर्म का
निश्चित विचार विस्तारपूर्वक बताया और उसमें से ही आत्मज्ञान का रहस्य ढूँढ़कर मुझे उत्तम ढंग से बतलाया।
लेकिन तुमने हंसरूप से स्वयं ही जो स्वधर्म बतलाया उसमें के स्वधर्म का लक्षण और उसका निरूपण मेरी
समझ में नहीं आया। इसलिये सनत्कुमार ने तुम्हारे मुख से जिस आश्रमधर्म का भक्तिपूर्वक श्रवण किया, उसे
मुझे बतायें। अब तुम यदि यह कहोगे कि परम्परा से सनत्कुमार द्वारा ही धर्म का प्रसार हुआ है अतः उसको
समझ कर तुम उसका रहस्य जान लो। किन्तु हे श्रीकृष्ण! मुझसे यह नहीं होगा।
स इदानीं सुमहता कालेनामित्रकर्शन।
न प्रायो भविता मर्त्यलोके प्रागनुशासितः॥४॥
काम, क्रोध, लोभ, अभिमान आदि षड्रिपु भक्तों के बहुत बड़े बैरी हैं, उनका तुम संहार करते हो
इसीलिये तुम्हें अरिमर्दन कहते हैं। भक्तों के लिये शत्रु का नाश करने वाला तुम्हारे बिना त्रिभुवन में कोई नहीं है
इसलिये मैं अनन्य भाव से तुम्हारी शरण आया हूँ। कल्प के प्रारम्भ में तुमने सनकादिकों को उपदेश किया, उस
उपदेश को अब काफी लम्बा समय व्यतीत हो गया है इसलिये अब किसी के पास वह धर्म नहीं रह गया है।
आज के युग में लोग स्वधर्म में तत्पर नहीं रहते। स्वधर्म का विचार भूल कर वे कामासक्ति तथा उदरपूर्ति में ही
सादर लिप्त रहते हैं। इसलिये जिससे यथार्थ धर्म अंतःकरण पर अंकित हो सके ऐसा उपदेशक ही नहीं रह गया
है। इसलिये हे वैकुण्ठाधिपति! स्वधर्म की निष्ठा के बारे में मुझे तुम ही बताओ।
वक्ता कर्ताविता नान्यो धर्मस्याच्युत ते भुवि।
सभायामपि वैरिञ्च्यां यत्र मूर्तिधराः कलाः॥५॥
कर्त्रावित्रा प्रवक्त्रा च भवता मधुसूदन।
त्यक्ते महीतले देव विनष्टं कः प्रवक्ष्यति ॥६॥
हे श्रीकृष्ण! इस संसार में जिसका ज्ञान मात्रा से आच्छादित नहीं है, ऐसा धर्मोपदेश तुम्हारे सिवा और कोई
नहीं दे सकता है। कुछ लोग शास्त्रवचन की मीमांसा कर कर्मों का प्रतिपादन करते हैं लेकिन उन कर्मों का
आचरण किस प्रकार किया जाय यह उनकी भी समझ में नहीं आता। इसीलिये हे भगवन्! धर्म का कर्ता, धर्म