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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 869 में से

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पृष्ठ 464

४४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
संख्यानं परमाणूनां कालेन क्रियते मया।
न तथा मे विभूतीनां सृजतोऽण्डानि कोटिशः ॥ ३९ ॥
कालरूप से मैं पृथ्वी के परमाणुओं की भी गणना कर सकता हूँ, किन्तु मेरी विभूतियों की संख्या की गणना
मैं भी नहीं कर सकता। मैंने अनन्त ब्रह्माण्डों का निर्माण किया है। उन्हें मैं नहीं गिन सकता, फिर मेरी सारी
विभूतियाँ कौन वाचाल गिन सकता है? मैं सर्वत्र नारायण हूँ, मेरी विभूतियाँ गिनने की शक्ति मुझमें नहीं है फिर
उनका वर्णन कैसे करें? हे उद्धव! मनुष्य में मेरी विभूति किस रूप में रहती है, उसके सम्बन्ध में बताता हूँ, सुनो।
तेजः श्रीः कीर्तिरैश्वर्यं ह्रीस्त्यागः सौभगं भगः।
वीर्यं तितिक्षा विज्ञानं यत्र यत्र समेऽशवः ॥ ४० ॥
जिसकी प्रतापशक्ति (ओजस्विता) अत्यन्त प्रबल है, जिसके पास लक्ष्मी निरन्तर वास करती है, जिसके
ऐश्वर्य की कोई सीमा नहीं है, स्वधर्म में जिसकी बहुत कीर्ति है, जिसके वैभव का सामर्थ्य इतना है कि वह सम्पूर्ण
त्रैलोक्य को अपनी आज्ञा में रखता है और जिसकी दान देने की तो कोई सीमा ही नहीं है, जिसका भाग्य निरन्तर
बहता ही रहता दिखाई देता है, जिसका सामर्थ्य अत्यन्त विलक्षण है और जिसकी बात का कोई उत्तर नहीं दे
सकता, जिसके भाग्य की शालीनता सभी लोगों के नेत्रों को मनोहारी लगती है, जिसे सहनशीलता के प्रति लगाव,
निंद्यकर्म के प्रति लज्जा होती है और व्यावहारिकता की जो साक्षात मूर्ति है, ऐसे लक्षण जिसमें होते हैं वह मेरी
विभूति है, यह जान लो। इतना ही क्यों, इनमें से एक भी लक्षण जिसमें हो वह भी मेरी विभूति है यह जान लो।
एतास्ते कीर्तिताः सर्वाः संक्षेपेण विभूतयः।
मनोविकारा एवैते यथा वाचाभिधीयते ॥ ४१ ॥
संक्षेप में ही जिन विभूतियों के सम्बन्ध में तुम्हें बताया उन्हें हे उद्धव! मनोविकारों के अनुभव के रूप में
ही जानना चाहिये। साधकों की साधनस्थिति को देखते हुए मेरी विभूतियों को सत्य ही जानना चाहिये।
परमार्थदृष्टि से विचार करने पर उन्हें काल्पनिक समझना चाहिये। वास्तव में मेरा स्वरूप अद्वैत है यह ध्यान में
रखो। मुझे नाम नहीं है, रूप नहीं है, गुण नहीं है और वर्ण भी नहीं है। अतः नाना प्रकार की विभूतियों का यदि
लक्षण बताना हो तो वह मिथ्या ही होगा।
वाचं यच्छ मनो यच्छ प्राणान् यच्छेन्द्रियाणि च।
आत्मानमात्मना यच्छ न भूयः कल्पसेऽध्वने ॥ ४२ ॥
मेरा स्वरूप नित्य निर्विकार होने के कारण मन को, बुद्धि को अथवा वाचा को भी उसकी थाह नहीं लग
पाती, फिर बेचारी इन्द्रियाँ क्या पार पायेंगी? प्राण को भी इस स्वरूप का ठीक-ठीक पता नहीं चलता। इसलिये
शमदम के अनुक्रम से मन, बुद्धि, वाणी और इन्द्रियों का संयम करो और प्राणधर्म के अनुसार प्राण का नियंत्रण
करो जिससे तुम आत्मस्वरूप तक पहुँचोगे। अब यदि मन, बुद्धि, वाचा आदि इन्द्रियों का नियमन करने का मर्म
नहीं जानता ऐसा कहोगे तो उसका अनुक्रम भी सुलभ रीति से बताता हूँ। वाणी का संयम मेरे नाम से करें, मन
का नियमन ध्यान सामर्थ्य से करें, प्राण का नियमन प्राणत्याग से करें और इन्द्रियों का नियमन दम से अर्थात्
संयम से करें और बुद्धि का नियमन आत्मविचार से करें, जीव का नियमन परमात्मसुख से करें। इतना करने पर
तुम सहज ही, निश्चित रूप से मत्स्वरूप हो जाओगे। एक बार मत्स्वरूप होने पर संसार दिखायी ही नहीं पड़ेगा।