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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 869 में से

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पृष्ठ 471

सत्रहवाँ अध्याय ४५५
मुख्य लक्षण है। इस प्रकार विराट पुरुष से चारों वर्णों की उत्पत्ति हुई है। अब चारों वर्णों की स्थिति बताता हूँ।
उसे सुनो।
गृहाश्रमो जघनतो ब्रह्मचर्यं हृदो मम।
वक्षःस्थानाद् वने वासो न्यासः शीर्षणि संस्थितः ॥ १४ ॥
मेरा कटि के नीचे का प्रदेश गृहस्थाश्रम का है। ब्रह्मचर्य मेरे हृदयस्थान में है और वानप्रस्थ की महिमा मैं
वक्षस्थल पर धारण करता हूँ। चतुर्थाश्रम, जिसे 'संन्यास' कहते हैं, वह वास्तव में मेरे मस्तक पर रहता है।
वर्णानामाश्रमाणां च जन्मभूम्यनुसारिणीः।
आसन् प्रकृतयो नृणां नीचैर्नीचोत्तमोत्तमाः ॥ १५ ॥
जैसा जन्म और स्थान रहता है उसके ही अनुसार उस वर्णाश्रम के गुण भी होते हैं। स्थान यदि उत्तम हो तो
गुण भी उत्तम होते हैं और स्थान क्षुद्र होने पर गुण भी क्षुद्र होते हैं। सत्त्वगुण प्रधान होने पर ब्राह्मण की उत्पत्ति
होती है; सत्त्व और रज के मिश्रण से क्षत्रिय उत्पन्न होते हैं; रज और तम के मिश्रण से वैश्य उत्पन्न होते हैं और
शूद्र तो केवल तमोगुणनिष्ठ होते हैं। ब्राह्मण आदि चारों वर्ण तथा उनके स्वभाव का लक्षण श्रीकृष्ण अगले श्लोक
में बताते हैं।
शमो दमस्तपः शौचं संतोषः क्षान्तिरार्जवम्।
मद्भक्तिश्च दया सत्यं ब्रह्मप्रकृतयस्त्विमाः ॥ १६ ॥
श्रीकृष्ण उद्धव से बोले, ब्राह्मण के स्वभाव के दस लक्षण होते हैं, उसका वर्णन मैं तुम्हें बताता हूँ, ध्यान
देकर सुनो। मन आदि ज्ञानेन्द्रिय की जो वृत्तियाँ वे सदा बाह्य दृष्टि से ही विचरण करती रहती हैं। उन्हें विवेक से
नियंत्रित कर आत्मस्वरूप में स्थिर होना चाहिये। अब इस प्रकार की वृत्ति को नियंत्रित करना कृष्णसर्प के मुँह
को दबाने जैसा है। जब तक वह सर्प अपने को छुड़ाने का प्रयत्न कर रहा है तब तक उसका मुँह दबा कर
रखना चाहिये। इस प्रकार वैराग्य के सामर्थ्य से और गुरुवचन के विश्वास से आत्मस्वरूप में ऐक्य होने तक
अंतर्वृत्ती को रोक कर रखना चाहिये। गुरुवचन को ही प्रमुख मान कर उसमें ही बुद्धि को निमग्न रखना और मन
को भी तल्लीन रखना इसी का नाम 'शम' है। ब्राह्मण की प्रकृति में यह गुण स्वभावसिद्ध ही होता है। उसी गुण
का नाम 'शम' है। अब 'दम' का निरूपण सुनो। विषय प्रकृति बलवान होती है और कर्मेन्द्रियों का विद्रोह
भीषण होता है; इसलिये शास्त्रविधि से उसका मुँह बन्द कर उसे भड़कने नहीं देना चाहिये। वेदविधि के द्वारा
केवल देह के निर्वाह भर के लिये इन्द्रियों का पोषण करना यही 'दमगुण' है। उसमें 'शम' मुख्य राजा है और
'दम' उसकी प्रजा है ऐसा समझना चाहिये। अब तीसरा जो 'तपोनियम' है, उसे भी सुनो। शम से ज्ञानेन्द्रियों को
शान्ति और दम से कर्मेन्द्रियों को शान्ति प्राप्त होती है। इसके उपरान्त अर्थात् शमदम के बाद वेदों के अनुसार
कर्म करना यह ज्ञान भी प्रशंसनीय है। व्रत आदि के द्वारा शरीर का शोषण करने का नाम तप है लेकिन वह भाग्य
के अनुसार होता है। वास्तव में हृदय में श्रीहरि के सत्स्वरूप का चिंतन करना यही सारे तपों में श्रेष्ठ तप है। जो
स्वधर्म का आचरण करते हुए अंतःकरण में हरि का विस्मरण नहीं करता, जो दिन-रात मन में आत्मस्वरूप
निश्चय के सम्बन्ध में ही विचार करता रहता है, अथवा जिस प्रकार लोभी सदा धन की ही चिन्ता करता है
अथवा युवा स्त्री युवक का ही चिन्तन करती रहती है उसी प्रकार जिसका मन सदा आत्मस्वरूप का ही विचार
करता रहता है उसी को 'तपोनिष्ठ' कहते हैं। यह तप सभी तपों में श्रेष्ठ है। ब्राह्मण स्वभाव के इस श्रेष्ठ गुण को