श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
द्वितीय अध्याय २९
नौ पुरुषों के नाम यथागौरव बताता हूँ। उनका नाम सुनते ही काल कम्पित होकर पीछे से ही भाग जाता है,
जिनके नाम का स्मरण करने से संसार माथा नहीं उठा पाता। हे परीक्षित! जिनका नाम लेने से भक्तजनों को
निश्चित रूप से मुक्ति ही मिलती है, उनके नाम की कीर्ति के सम्बन्ध में तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
कविर्हरिरन्तरिक्षः प्रबुद्धः पिप्पलायनः ।
आविर्होत्रोऽथ द्रुमिलश्चमसः करभाजनः ॥ २१ ॥
कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध पिप्पलायन, आविर्होत्र, सुलक्षणी द्रुमिल निर्दोष चमस तथा करभाजन इस
प्रकार उन नौ के नौ नाम थे। इन नामों का स्मरण करने से सभी पापों का विनाश होता है ऐसी उनकी महिमा है।
उनकी परमहंस स्थिति मैं तुम्हें बताता हूँ। जिनके कारण सारी पृथ्वी पावन हो जाय ऐसी वे पुण्य पूज्य नौ
मूर्तियाँ थीं।
एते वै भगवद्रूपं विश्वं सदसदात्मकम्।
आत्मनोऽव्यतिरेकेण पश्यन्तो व्यचरन्महीम् ॥ २२ ॥
वे नौ यद्यपि शरीर से अलग दिखाई देते थे लेकिन भगवद्रूप से वे एक ही थे। चाहे सृष्ट हो या दुष्ट हो
वे सबको अपनी ही तरह एक ही दृष्टि से देखते थे। क्योंकि उनमें असाधुत्व जैसी कोई चीज शेष नहीं रह गयी
थी, सब कुछ चिन्मय हो जाने के कारण 'संत' कहने लायक भेद उनमें रह ही नहीं गया था। सारा संसार ही
जहाँ भगवान से भरा हुआ है वहाँ हम उनसे अलग कैसे रह सकते हैं। इसलिये वे सब भूतमात्र तथा पंचमहाभूतों
को भगवत्स्वरूप में ही देखते थे। देखना और देखने का पदार्थ भी स्वयं ही बन जाना, होना न होना आवागमन
इन सारे लक्षणों को निगल कर वे संसार में विचरण करते थे।
अव्याहतेष्टगतयः सुरसिद्धसाध्यगन्धर्वयक्षनरकिन्नरनागलोकान्।
मुक्ताश्चरन्ति मुनिचारणभूतनाथविद्याधरद्विजगवां भुवनानि कामम् ॥ २३ ॥
वैकुण्ठ, कैलाश, उसी प्रकार देवता तथा सिद्ध (साध्य, गंधर्व, यक्ष, नर, किन्नर, नाग, मुनि, चारण,
भूतनाथ, विद्याधर, द्विज, गौएँ) आदि के स्थान, सारांश सप्तस्वर्ग तथा सप्त पातालादि अर्थात् श्लोकों में वर्णित
चौदह लोकों में वे अबाध गति से विचरण करते थे। उनके मन में विषयासक्ति न होने के कारण उनकी गति
कहीं बाधित नहीं होती थी। स्वेच्छानुसार कहीं भी जाने का सामर्थ्य उनमें होने के कारण वे निष्काम भाव से
कहीं भी विचरण करते रहते थे।
तं एकदा निमेः सत्रमुपजग्मुर्यदृच्छया।
वितायमानमृषिभिरजनाभेर्महात्मनः ॥ २४ ॥
जहाँ मन का प्रवेश भी निषिद्ध है, वहाँ वे पग से चल कर जाते। इस प्रकार वे इच्छागमनी पुरुष स्वेच्छा से
विचरण करते-करते एक बार कर्मभूमि पर आये ओर पृथ्वी पर के 'अजनाभ' खण्ड पर (भारतवर्ष) पहुँचे। वहाँ
राजा जनक का यज्ञ चल रहा था और असंख्य बड़े-बड़े ऋषि वहाँ एकत्र थे। यज्ञ वैदिक विधि से शास्त्रोक्त ढंग
से चल रहा था। कुण्ड, मण्डप, वेदिका, दिशासाधन, अनुष्ठान की पीठिका अर्थात् यज्ञ की पूर्व तैयारी कर सभी
कर्म पवित्र रीति से चल रहे थे। स्त्रुक, स्त्रुवा आदि यज्ञपात्र, त्रिसंधान अर्थात् तीन जगह जोड़ी हुई दर्भ की डोरी
तथा दर्भ के परिस्तरण फैलाकर अखण्ड घृत की धार कुण्ड में देते हुए ऋषि लोग होम कर रहे थे। होम समाप्त
३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
होकर पूर्णाहूति का समय आ ही रहा था कि तभी ये नौ पुरुष (आर्षभयोगी) तेज से देदीप्यमान होकर वहाँ आते
दिखाई पड़े।
तान् दृष्ट्वा सूर्यसंकाशान्महाभागवतान् नृप।
यजमानोऽग्नयो विप्राः सर्व एवोपतिष्ठिरे ॥ २५ ॥
जिसके अंगूठे के नाखून के तेज के सामने करोड़ों सूर्यों का तेज लुप्त हो जाता है, उस भगवान को
जिन्होंने अपने हृदय में सुरक्षित कर लिया है उनके अलौकिक तेज का क्या वर्णन किया जाय ? उनकी देहकांति
के सामने सूर्य का तेज भी निष्प्रभ हो जाता था। अपने शरीर की कान्ति से प्रभा को ही शोभायमान करने वाले वे
नौ पुरुष मानों साकार चैतन्य का सार ही थे। इन नौ पुरुषों को भगवद्भाव का वैभव, भगवान का गौरव अथवा
नवविधा भक्ति की साकार मूर्त्तियाँ कहना ही उचित होगा। मानों वे नौ पुरुष नवखण्ड पृथ्वी के अलंकार,
नवनिधि का सार अथवा नवरत्नों का निज भण्डार ही साकाररूप लेकर आये थे। अथवा नौ नारायण वहाँ
स्वयमेव प्रकट हो गये थे अथवा नौ नृसिंह ही देदीप्यमान रूप लेकर वहाँ आ गये थे। उन यज्ञकुण्डों में
दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि तथा आहवनीयाग्नि इन तीन अग्नियों का आवाहन हुआ था। वे इन्हें देखकर उठ कर
खड़े हो गये। उन्हें केवल इन नौ भागवतों ने ही देखा अन्य लोग उन अग्निदेवताओं को नहीं देख पाये। ऐसी उन
तेजःपुंज मूर्तियों को देखकर ऋत्विज और आचार्य उठ कर खड़े हो गये। राजा जनक तो दौड़ कर ही उनकी
अगवानी में आये और उन्होंने उनका स्वागत किया। उन्होंने दौड़कर ही उन्हें दण्डवत् किया और मुकुट उतार
कर मस्तक से चरणों का वन्दन कर अत्यन्त सत्कारपूर्वक उन्हें यज्ञमण्डप में ले आये।
विदेहस्तानभिप्रेत्य नारायणपरायणान्।
प्रीतः संपूजयाञ्चक्रे आसनस्थान् यथार्हतः ॥ २६ ॥
अतिथि भागवत परायण थे यह जानकर जनक को अत्यन्त आनन्द हुआ और उसने स्वयं उनकी पूजा
करने की तैयारी शुरू की। उन्होंने परम श्रद्धा से उनके चरण धोये, फिर धूप, दीप, चन्दन, पुष्प आदि साहित्य से
मधुपर्क विधान से उनकी यथायोग्य पूजा की।
तारोचमानान्स्वरुचा ब्रह्मपुत्रोपमान्नव।
पप्रच्छ परमप्रीतः प्रश्रयावनतो नृपः ॥ २७॥
अपने अंगों की निज प्रभा से उनके शरीर की शोभा बढ़ रही थी। उनका शरीर विचित्र तेज से शोभायमान
ब्रह्मविद्या का गाभा थी। मानों उनके शरीर का ब्रह्मज्ञान परिपक्व होकर प्रकाशमान हो गया था और उनके शरीर
का भूषण था। अन्य भूषण उन्हें अनावश्यक थे। मुकुट, कुण्डल, सुवर्ण के कड़े ये आभूषण मूर्खों के शरीर पर
कितने भी क्यों न हों लेकिन उन अलंकारों की शोभा उन पर विलुप्त हो जाती है और उनके अन्दर की मूर्खता ही
बाहर प्रकट होती है। यह ज्ञानधन वैसा नहीं था। पूर्ण ब्रह्मत्व से ही वह सुशोभित होता था। वही उनके शरीर का
भूषण था। अन्य भूषण वे नहीं धारण करते थे। वे ब्रह्मानुभव से पूर्ण होते थे और वही अनुभव उनके इन्द्रियों के
द्वारा भी प्रस्फुटित होता था। पूर्णानुभव से आने वाली शान्ति ही उनका भूषण था। उसके आगे मुकुट और कंगन
तुच्छ होते थे। पहले सनकादिकों का वर्णन किया है। ये उनकी ही योग्यता के थे या अधिक थे, यह पूछें तो
उनमें और इनमें कोई भेद नहीं ऐसा समझना चाहिए। उनकी और इनकी गति एक थी, उनकी और इनकी स्थिति
द्वितीयं अध्याय ३१
एक थी और उनकी और इनकी शान्ति भी एक जैसी ही थी, वास्तव में उनमें भेद कुछ भी नहीं था। उनकी ही
तरह ये भी सगे भाई थे, उनकी ही तरह बोध इनका भी था, चाल-चलन, ढंग, व्यवहार उनके ही जैसा था,
अन्तर कुछ भी नहीं। वे चार और ये नौ लेकिन सबका ब्रह्मज्ञान एक जैसा, उनकी और इनकी शान्ति एक जैसी।
ये बातें जनक ने जान लीं। उनकी यह परिपूर्ण स्थिति देखकर राजा को बड़ा संतोष प्राप्त हुआ और उन्होंने
अत्यन्त विनम्र होकर मृदु-मंजुल वाणी से उनकी विनती की।
विदेह उवाच
मन्ये भगवतः साक्षात् पार्षदान्वो मधुद्विषः।
विष्णोर्भूतानि लोकानां पावनाय चरन्ति हि॥ २८॥
सार्वभौम चक्रवर्ती होते हुएं भी विदेह ऐसा राजा जनक उन ऋषभपुत्रों से अत्यन्त प्रेम से विनती करने
लगा। उनसे भेंट होते ही राजा जनक को असीम आनन्द हुआ और उस सुख संतोष के आवेग में उसने उनसे
प्रेमपूर्वक विनती की। उसने कहा—आप का सामर्थ्य देखा जाय तो आप ईश्वरस्वरूप हैं, देहभाव से देखा जाय
तो भगवान के भक्त हैं, मानों आप श्रीहरी के पार्षद हैं। देवता स्वयं अपना ही भक्त है ऐसा जो ध्वनितार्थ
उपनिषद में है, उसका प्रत्यक्ष अनुभव आप में हो रहा है। "शिव होकर ही शिव की पूजा करनी चाहिए"—
("शिवो भूत्वा शिवं यजेत") यह उपनिषद रहस्य आप में ही शोभा दे रहा है। अन्य लोग केवल मुँह से इन
बातों का उच्चार करें। लेकिन उस बात का कोई अर्थ नहीं दिखाई देता। श्रीविष्णु संसार में जो भी कुछ उत्पन्न
करते हैं, वह सब पवित्र करने के लिए, केवल दीन-दुखियों का उद्धार करने के लिए। इसीलिए आप कृपापूर्वक
पृथ्वी पर संचार करते रहते हैं। आप संसार के कल्याण के लिए ही विचरण करते रहते हैं, किन्तु जब भाग्योदय
होता है तभी आप से भेंट होती है। आज मुझे आपकी सेवा का लाभ मिला इसका अर्थ मैं सचमुच ही बड़ा
भाग्यवांन हूँ। धन्य है मेरा भाग्य और धन्य है मेरा वैभव। आज आपके चरणों का अपूर्व लाभ होने से मैं सचमुच
ही धन्य हो गया हूँ।
दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्॥ २९॥
सभी प्रकार के देहों में नरदेह अत्यन्त दुर्लभ है। उसकी प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है। जब पाप और पुण्य
समान रहता है तभी यह कर्मभूमि अर्थात् यह नरदेह प्राप्त होता है। पुण्य और पाप की मात्रा यदि कम अथवा
अधिक हो तो उसे स्वर्ग या नरक प्राप्त होता है। कर्म समान होने पर नरदेह प्राप्त होता है। किन्तु सभी की बुद्धि
एक जैसी नहीं होती, उस समता में भी गाढी विषमता कैसे हो जाती है वह बताता हूँ। पाप का एक बहुत बड़ा
हिस्सा एक पलड़े में रखें और दूसरे पलड़े में पुण्य डालें और दोनों का भार यदि समान भी हो तो भी उस जन्म
में उस व्यक्ति में पापबुद्धि ही होगी। जिस प्रकार बालू और सुवर्ण तौल में यदि समान भी हो तो उस स्वर्ण को
खरीदने के लिए लोग धन खर्च करते हैं और बालू कोई मुफ्त में भी नहीं लेता। उसी प्रकार किसी का पुण्य बहुत
बड़ा होता है और उसकी बराबरी में दूसरे पलड़े में छोटे-छोटे पाप डाले जाते हैं और उनका भार समान हो जाता
है। ऐसा कर्म लेकर जो जन्म लेते हैं उनका प्रेम पुण्य के प्रति अधिक रहता है। पुण्य ओर पाप जब पूरी तरह
नष्ट हो जाते हैं तभी नित्यमुक्ति प्राप्त होती है। मनुष्य देह की प्राप्ति भी महान संकट है। वहाँ कनक-कांता रूपी
विषय का अभिमान उत्पन्न होता है। जिस प्रकार प्यासा अपनी प्यास बुझाने के लिए अमृत देकर मद्यरस पीए
३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करे, उसी प्रकार लोग अमूल्य मानव जीवन में विषयों में लिप्त रहते हैं। जैसे कोई चिन्तामणि देकर गन्धर्व नगर
अर्थात् आकाश में दिखाई देने वाले बादलों की आकृतियों का चयन करे उसी प्रकार वे मिथ्या विषय साधनों के
लिए नरदेह का सत्यानाश कर लेते हैं। जैसे कल्पतरु का बगीचा उजाड़ कर कोई उसे जंगल समझ कर दूर फेंक
दे और उसके स्थान पर भांग के पौधे लगा दे उसी प्रकार प्राणी नरदेह प्राप्त कर उसका विनाश कर लेते हैं।
शिश्नोदर के लिए सारा दिन प्रयास, नहीं तो उपहास, निंदा आदि हर रोज गृहस्थी की कचकच, वासनाओं की
तृप्ति के लिए प्रयास और यदि इतने पर भी समय बच जाय तो चौपड़ की बाजी बिछाना। हर तरह के हँसी-
मजाक, विषय वासनाओं की ही बकवास। ऐसे लोगों को राम का नाम लेते समय मुँह बन्द हो जाता है। जैसे
कामधेनु घर आने पर, उसे खिला नहीं सकते इसलिये उसे घर से निकाल देते हैं उसी प्रकार श्रीरामनाम का जप
न करने के कारण प्राणि नरदेह प्राप्त कर भी व्यर्थ चला जाता है। इस नरदेह का अहंकार किया जाय तो वह तो
क्षणभंगुर है। यहाँ तो भगवान से एकरूप हुए भक्तों का मिलना ही भाग्य की बात है। जिन्हें भगवद्भक्ति से प्रेम
रहता है उन पर भगवान का भी अत्यन्त प्रेम रहता है। ऐसे भगवद्भक्तों से साक्षात मिलन तभी होता है जब
अनेक कोटि पुण्य साथ में खड़े हों। जिसके प्रेम की लालसा के कारण ही भगवान ने अपना निजनिर्गुण रूप
त्याग कर जन्म लिया, जिनके प्रेम के कारण उस पद्मनाभ को दशावतार की शोभा प्राप्त हुई। ऐसे जो कृष्ण कृपा
के कारण उनके अत्यन्त चहेते बन गये, ऐसे लोगों की भेंट तभी होती है जब भाग्य का उदय होता है। शरीर
निष्काम हो, आत्मस्वरूप की ओर दृष्टि हो और कोटि-कोटि पुण्य राशि का साथ हो,तभी हरि के प्रियजनों से
भेंट होती है। एक समय बाघ और सिंह का दूध मिल जाएगा, चन्द्रामृत भी प्राप्त हो सकेगा किन्तु हरिप्रियों से
भेंट नहीं हो सकेगी। उसके लिए अत्यन्त दुर्लभ भाग्य की आवश्यकता होती है। बाघ और सिंह के दूध से मनुष्य
अत्यन्त शक्तिशाली और पुष्ट हो जाएगा लेकिन उस दूध से जन्म-मरण से छुटकारा नहीं प्राप्त होगा। कहते हैं
कि जो चन्द्रामृत का सेवन करता है वह निरोगी होता है लेकिन चन्द्र स्वयं ही मूलरूप से क्षयरोगी है उसका
अमृत दूसरे को कैसे निरोगी करेगा? बाघ और सिंह के दूध से यदि प्राणी अजर-अमर हो जाते तो फिर उसी दूध
से जिनकी उत्पत्ति होती है वे बाघ और सिंह क्यों मरते ? लेकिन जब हरिभक्तों की भेंट होती है, तब सांसारिक
संकटों की बाधा नहीं होती। जन्म-मरण का फेरा पूरी तरह समाप्त हो जाता है। सारांश यह कि उनसे भेंट होने
के लिए अत्यन्त भाग्य की आवश्यकता होती है। आज वह सारा भाग्य मेरे हिस्से में आया है क्योंकि मुझे आपके
दर्शन हुए। इसलिए 'आत्यंतिक क्षेम' का क्या अर्थ है, यह मुझे समझाइये।
अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघाः।
संसारेऽस्मिन् क्षणार्धोऽपि सत्सङ्गःशेवधिर्नृणाम्॥ ३०॥
आप निष्पाप और निर्मल हैं आपके दर्शन से कलिमल तत्काल नष्ट हो जाता है। आप स्वाभाविक रूप से
ही पवित्र हैं। गंगा में स्नान करने से वह सबको पवित्र कर देती है लेकिन वह गंगा भी अपना पातक नष्ट होने
के लिए आपके ही चरण स्पर्श की कामना करती है। आपके दर्शन का लाभ ही चित्स्वरूप गंगा है। संसार में
वह अत्यन्त समर्थ है। केवल दर्शन से ही संसार ताप को नष्ट कर डालता है। फिर जन्म-मरण का प्रश्न ही कहाँ
उठता है? आपके इस दर्शन के आगे गंगा की क्या बिसात है? उसके सामने तीर्थों की महिमा की कोई प्रतिष्ठा
नहीं है। तीर्थ भी भवदोष से लिप्त हैं। वह दोष आपकी दृष्टि से नष्ट होता है। ऐसी पवित्रता आप अपनी दृष्टि
से ही बढ़ाते हैं। मैं तो आज अत्यन्त पवित्र हो गया हूँ। क्योंकि आज आप दीन दयाल से मेरी भेंट हुई। ऐसी
द्वितीय अध्याय ३३
पवित्र और कृपामूर्त्ति का साथ मुझे आज भाग्य से ही प्राप्त हुआ है। सत्संगति के माहात्म्य का वर्णन करते समय
श्रुतियाँ भी मौन हो जाती हैं। ब्रह्म स्वयं निर्धर्म है, अपना धर्म वह नहीं जानता, साधुओं के मुख से ही ब्रह्म को
ब्रह्मत्व प्राप्त होता है। उस सत्संग की महिमा अत्यन्त महान और निरुपम है। सत्संग को यदि निधि की उपमा दी
जाय तो उसके खोने का भय है किन्तु सत्संग की महिमा ऐसी है कि वह साधकों को पूरी तरह सद्रूप करता है।
अच्छी निधि प्राप्त होने पर उससे विषय भोग बढ़ता है। लेकिन महाराज! सत्संग में वह बात नहीं है। वह
विषयरहित तथा अत्यन्त सुख देने वाला है। इन्द्रिय रहित स्वानन्द तथा विषयरहित परमानन्द प्राप्त होने का ही वे
बोध कराते हैं। इसलिए साधुओं की महिमा अगाध है। सत्संग यदि निमिष मात्र के लिए भी हो जाए तो उससे
भवसंग हो जाता है इसलिए सत्संग का भाग्य भाग्यवान साधक ही जानते हैं। संत चरणों में जिनका भाव है, उन
पर उस भाव के कारण ही संत स्वयमेव प्रसन्न होते हैं। संतों के सान्निध्य मात्र से संसार अपने आप व्यर्थ हो जाता
है। अनेक प्रकार के विकार, विषयों की भरमार आदि से संसार की बाधा तीव्र हो उठती है। उस संसार को
समाप्त करने के लिए सत्संग यही एकमात्र रामबाण उपाय है। दीप की संगति से जिस प्रकार कर्पूर का कर्पूरत्व
नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार सत्संगति प्राप्त होने पर क्षणार्ध में ही संसार की अर्थात् जन्ममरण परम्परा की तथा
देहात्म बुद्धि की निवृत्ति हो जाती है। वह आपका सत्संग मुझे आज अनायास ही मिल गया है तो अब यह बताएँ
कि प्राणी 'आत्यंतिक क्षेम' अर्थात् शाश्वत कल्याण कैसे प्राप्त करते हैं। यदि आप कहें कि भागवत धर्म ही
आत्यंतिक क्षेम का मूलमंत्र है तो महाराज! उस धर्म का अनुक्रम सुगम करके बताएँ।
धर्मान् भागवतान् ब्रूत यदि नः श्रुतये क्षमम्।
यैः प्रसन्नः प्रपन्नाय दास्यत्यात्मानमप्यजः ॥ ३१ ॥
यदि भागवत धर्म सुनने का हमें अधिकार हो, तो महाराज! आप हमें सम्पूर्ण भागवतधर्म सुनाइये। इस
भागवत धर्म की ख्याति कुछ विचित्र है। इसे यदि प्रेम से स्वीकार किया जाय तो श्रीपति उससे संतुष्ट होकर
स्वयं सेवकों के अधीन हो जाता है। वेदशास्त्रों के अनुसार श्रीकृष्ण की ख्याति 'अजन्मा' है लेकिन भक्तों के
लिए वे अनेक जन्म लेते हैं। ऐसे इस भागवत धर्म की शरण में जो भी कोई अनन्य भाव से जाता है, उस पर
नारायण प्रसन्न होकर अपना सर्वस्व अर्पण करता है। अब यदि मुझे भागवत धर्म श्रवण करने का अधिकार न हो
तो सचमुच ही मैं अनन्य भाव से आपकी शरण आया हूँ और आप सब अत्यन्त कृपालु हैं। भूत दया तो आप में
परिपक्व हो रही है। आप दया के सागर हैं, आपके कारण दीनों का उद्धार होता है। जिस पर आपकी पूर्ण कृपा
रहती है वहाँ जन्ममरण नहीं रहता, सारे अधिकार सहज ही प्राप्त होते हैं। अर्थात् आपकी कृपा जैसा कोई
सामर्थ्य ही नहीं है यह जानकर मैं निश्चयपूर्वक आपकी शरण में आया हूँ। अज्ञान की लज्जा से क्या लाभ है?
यहाँ मेरा सारा कार्य आपकी ही कृपा से होने वाला है। इस प्रकार जनकराजा ने प्रार्थना कर उन ब्राह्मणों की
चरणरज अपने माथे से लगायी। जनक राजा का नम्रतापूर्वक पूछा गया यह प्रश्न सुनकर वे सभी नौ पुरुष संतुष्ट
हुए। वही कथा नारद मुनि अपने मुख से वसुदेव को सुना रहे हैं।
श्रीनारद उवाच
एवं ते निमिना पृष्टा वसुदेव महत्तमाः।
प्रतिपूज्याब्रुवन् प्रीत्या ससदस्यार्त्वित्वजं नृपम् ॥ ३२ ॥
जो जगत की स्थिति और गति का जानकार है, जो हरिहर का लाडला है, जो निज आत्मज्ञान में परिपूर्ण
३४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है, उस नारद ने वसुदेव से कहा, वसुदेव! इस प्रकार जनक राजा द्वारा मार्मिक प्रश्न पूछे जाने पर उन महानुभावों
को अत्यन्त संतोष हुआ। उन्होंने जनकराजा को धन्य-धन्य कहा। यज्ञ के ऋत्विजों को तथा सभासदों को परमार्थ
श्रवण की उत्सुकता बढ़ने लगी। उन्हें भी योग्य अनुमोदन देकर उन नौ असामियों ने बोलना प्रारम्भ किया।
जनक के नौ प्रश्न इस कथा का प्रमुख विषय है। भागवत धर्म किसे कहते हैं, भगवद्भक्त कैसे होते हैं? 'माया'
किस तरह विराजती है? अज्ञानियों को उससे तरने के क्या उपाय हैं? उसी प्रकार परब्रह्म कैसा होता है? 'कर्म'
किसे कहते हैं? अवतार चरित्र संख्या परम, अभक्तों को 'अधोगति' क्यों प्राप्त होती है? और किस युग में कैसा
धर्म होता है? इन सबका अच्छी तरह निरूपण करें। इस प्रकार नौ मार्मिक प्रश्न राजा जनक ने पूछे। उन नौ
पुरुषों ने उनके क्रम से उत्तर दिये। उनमें से पहले प्रश्न का कवि ने उत्तर दिया।
कविरुवाच
मन्येऽकुतश्चिद्भयमच्युतस्य पादाम्बुजोपासनमत्र नित्यम्।
उद्विग्नबुद्धेरसदात्मभावाद् विश्वात्मना यत्र निवर्तते भीः॥३३॥
राजा ने 'आत्यंतिक क्षेम' अर्थात् अत्यन्त कल्याण किसमें हैं यह प्रश्न किया। कवि तो उस विषय का
परमज्ञाता ही था। उसने आत्यंतिक क्षेम का अर्थ अर्थात् 'भागवत धर्म' का प्रतिपादन करना प्रारम्भ किया।
उसने कहा, राजा! एक चमत्कार ध्यान में रखो। हमारा संकल्प ही हमारा बैरी है। वही शरीर में देहबुद्धि
(साढ़े तीन हाथ का देह मैं ही हूँ, यह भावना) बढ़ाकर संसार का भय दृढ़ करता रहता है। जिसके पास
देहबुद्धि होती है, उसके भाग्य में सुख तो नहीं ही होता। ऐसे लोग सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि द्वंद्वों के बीच
में तथा व्याधियों के महासागर में डूब जाते हैं। क्योंकि देहबुद्धि वालों के पास दुःखों की राशि तो रखी ही
रहती है। रात दिन चारों ओर से महाभय के भूत उसे सताते रहते हैं। 'मैं ही देह हूँ' मानने वाले को चिन्ता
का बहुत अधिक भय लगता है। उस पर ममता द्वारा संकल्प-विकल्पों की मार निरन्तर पड़ती रहती है। देह-
बुद्धिवालों को अणु के बराबर भी सुख नहीं प्राप्त होता। ऐसा होते हुए भी जो सुख मानते हैं वे महामूर्ख हैं।
देहबुद्धि दुःखजनक है। दीपक की संगत करने वाले पतंग के भाग्य में केवल दुःख ही रहता है, फिर भी वह
उसे गले लगाने के लिए आगे बढ़ता है, उसी प्रकार देहबुद्धि विषयों की ओर भागती है। इस प्रकार देहबुद्धि
बहुत खराब है। वह विषयों के प्रति रुचि बढ़ाती है। इससे महाभय उत्पन्न होकर जन्ममरण के फेरे बढ़ जाते
हैं। जो यह जानता है कि देहबुद्धि में इतना संताप और महापाप है वह इन विषयों में जरा भी नहीं उलझता।
विषयों के प्रति कोटि-कोटि जन्म मरण सहने पड़ते हैं यह बात जो जानता है वह उस भय से विषयों का
त्याग करता है और उन्हें इन्द्रियों में बन्द कर देता है। लेकिन विषय इन्द्रियों में बन्द होना नहीं चाहते। विषय
छूटते नहीं है और निरन्तर कष्ट देते रहते हैं। इसीलिए वेदों ने हरिभक्ति प्रकट की है। इसमें इन्द्रियों को बन्द
नहीं करना पड़ता और विषयासक्ति अपने आप रुक जाती है। हे राजाधिराज! इतना अद्भुत सामर्थ्य हरिभक्ति में
है यह स्मरण रखो। योगी लोग इन्द्रियों का दमन करते हैं किन्तु भक्त लोग उन्हीं इन्द्रियों को भगवान की भक्ति
में लगाते हैं। योगी जिन विषयों का त्याग करते हैं, उन्हें ही भक्तगण भगवान को अर्पण करते हैं। योगी विषयों
का त्याग करते हैं लेकिन उस त्याग से शरीर को दुःख होता है और भक्त वही विषय भगवान को अर्पण करते
रहने के कारण नित्यमुक्त हो जाते हैं। कुछ विकल्पी लोग इसे सम्भव नहीं मानते। इसलिए यहाँ 'कायेन वाचा'
यह कृष्णार्पण द्योतक श्लोक बताया गया है। घरबार, बाल-बच्चे और प्राण भी भगवान को अर्पण करने
द्वितीय अध्याय ३५
चाहिए यही सम्पूर्ण भागवतधर्म है और इसी का नाम 'मुख्य भजन' है। अब ग्यारहों इन्द्रियों को किस प्रकार
भगवद्भक्ति की ओर लगाया जाए उसके विषय में संक्षेप में बताता हूँ। 'मन' से हरि का ध्यान करना चाहिए,
'कानों' से उसकी कीर्ति का श्रवण करना चाहिए, 'जिह्वा' से नामस्मरण करना चाहिए और दिन रात उसके
कीर्तन में मग्न रहना चाहिए। 'हाथों' से हरि का पूजन करना चाहिए, पैरों से मन्दिर में जाना चाहिए, नाक से
तुलसी निर्माल्य की गन्ध लेनी चाहिए। जो मस्तक पर नित्य निर्माल्य धारण करता है और पेट में चरणतीर्थ
तथा हरिप्रसाद एकत्र करता है उसे देखकर संसार भय दूर भागता है। बढ़ते हुए सद्भाव तथा बढ़ते प्रेम के
कारण जिसके भाग्य में श्रीकृष्ण का अखण्ड भजन रहता है उसे संसार का बन्धन नहीं रहता। सभी भयों में
संसार भय अत्यन्त कठोर है। वह बेचारा भी हरिभक्ति के सामने किंकर हो जाता है। फिर वह सामने कैसे
खड़ा हो पाएगा ? रामकृष्ण का स्मरण करने से जहाँ जन्म-मरण उठकर भागने लगते हैं वहाँ भव भय का
साहस कौन धीर कर सकता है ? जहाँ हरिचरण भजन से प्रेम है, वहीं संसारभय की निवृत्ति है। इस प्रकार
हमारे विवेक के अनुसार भगवद्भक्ति ही परम निर्भय है। तुम निश्चयपूर्वक जान लो कि यह हमारा दृढ़
निश्चय है और वेद, शास्त्र, पुराण इसके साक्षी हैं। सारांश यही कि सभी प्राणियों के लिए भगवद्भजन ही
सबसे अधिक निर्भय स्थान है। वेद, शास्त्र, पुराण भले ही एक ओर रहें लेकिन प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण ने अपने मुख
से यही कहा है कि मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूँ। इससे भगवान के कथन में भक्ति ही प्रधान है। इतना ही
नहीं, बल्कि साक्षात श्रीकृष्ण ने अपने चारों हाथ उठाकर निज आत्म प्राप्ति का उपाय बताते समय
'भक्त्याहमेकन्या ग्राह्यः' अर्थात् केवल भक्ति से ही मैं वश में आने वाला हूँ, यह बात बतायी है।
ये वै भगवता प्रोक्ता उपाया ह्यात्मलब्धये।
अंजः पुंसामविदुषां विद्धि भागवतान् हि तान् ॥ ३४॥
जिनके पास वेद शास्त्र का ज्ञान नहीं है, ऐसे अज्ञानी लोगों को ईश्वर प्राप्ति सुगम हो और वे ब्रह्मस्वरूप
प्राप्त कर सकें इसलिए भगवान ने ही यह हरिभक्ति प्रकट की है। वेदशास्त्र का अध्ययन किये बिना किस
जड़-मूढ़ ने भवसागर पार किया ऐसा यदि पूछें तो उन्मत्त गजेन्द्र का उद्धार हुआ है। परीक्षित का गर्भावस्था में
संरक्षण हुआ है। अम्बरीष का गर्भ निवारण भक्ति के ही कारण हुआ। 'अहं भक्तपराधीनः' अर्थात् मैं भक्त के
वश में हूँ यह बात स्वयं नारायण ने कही है। इस भगवद्भक्ति से वनचर, वानर जाने कितने तर गये। भालुओं
का उद्धार करने के लिए भगवान ने जंगल में जाकर भक्ति से जांबवती से विवाह किया फिर यह भी याद करो
कि अविवेकी ग्वाले, गोधन और गोपाल जो कृष्ण के सखा थे वे भी प्रबल अनन्य प्रीति के ही कारण तर गये।
शास्त्र विरुद्ध अविवेक के कारण, जार भावना से ही क्यों न हो लेकिन श्रीकृष्ण से अत्यन्त प्रेम रखने के कारण
कितनी गोपियों का उद्धार हुआ उनकी तो कोई गिनती ही नहीं है। अनेक प्रकार के शास्त्र पढ़े बिना सुलभ
उपाय से ब्रह्मप्राप्ति हो सके और दुर्बल भी पार लग सकें इसलिए भगवान ने अपनी भक्ति प्रकट की। राजा !
वही यह भागवत है, जिसमें मुख्य रूप से भक्ति ही प्रधान है। शुद्ध भावना से भगवद्भजन करने से अज्ञानी
जनों का उद्धार हो जाता है। यह भागवत नहीं बल्कि दीन अज्ञानी लोगों के लिए खुला हुआ पौसरा है।
भजनभाव से संसार सागर पार करने के लिए भगवान ने यह बहुत बड़ी नौका ही बना कर रख दी है। भजन
भाव से जो इस भागवत रूपी महानौका में बैठ कर निकल पड़े उन्हें भजन स्वभाव के कारण संसार भय के
हिंचकोले नहीं लगते। स्त्री, शूद्र आदि सभी को एक ही बार में भजन भाव से उस तट तक ले जाया जा सकता
३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। भक्तिभाव से इस नौका को खेने से कर्माकर्म रूपी क्रूर जल को काट कर आत्मबोध के प्रवाह की दशा से
वह एक ही समय उस किनारे तक पहुँचाती है। वैराग्य के नाविक चारों ओर अटल बैठे रहने के कारण वे
विषयों की चट्टानों से बचाते हुए सुगमता से किनारे तक पहुँचाते हैं। संचित क्रियमाण की लहरों को काट कर
सही रास्ते पर लगाते हैं और भाग्य का संचय समाप्त कर आत्मस्वरूप के तट पर पहुँचाते हैं। इसमें यदि कुछ
न्यूनाधिक हो जाए तो गुरुवचन के अनुसार सँभाल कर भूतदया की डोर से आत्मविश्वास के साथ खींचते हैं।
तब बड़ी शीघ्रता से वह नौका परात्पर तट पर जा लगती है। सबको एकाएक परतीर पर उतारते हैं और फिर
आत्मसाक्षात्कार हो जाने के कारण पुनरावृत्ति रुक जाती है और आवागमन नहीं करना पड़ता। एक भक्तिभाव
होने से, फिर जिसे 'डूबना' कहते हैं, वह मिथ्या हो जाता है। फिर जहाँ पहुँचना चाहता है, वह स्थान वह
स्वयं हो जाता है। यहाँ बिना पहुँचे ही तर जाना है और बिना प्रयास के ही प्राप्ति होनी है। अर्थात् सहज उपाय
से ब्रह्म की प्राप्ति हो, इसलिए नारायण ने भक्ति प्रकट की है। भागवत धर्म की स्थिति ही कुछ ऐसी है कि
सीधे-सादे लोग भी संसार सागर को पार कर जाते हैं। सुलभ रीति से किस प्रकार ब्रह्मप्राप्ति होती है, वही अब
श्लोकार्थ में स्पष्ट रूप से बताते हैं।
यानास्थाय नरो राजन्न प्रमाद्येत कर्हिचित्।
धावन्निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पते दिह ॥ ३५ ॥
जिसे श्रुति-स्मृति की समझ नहीं है, लेकिन केवल भक्तिभाव से भगवन्मार्ग अर्थात् भागवत धर्म का
अनुसरण करता है, उसे विधि निषेध की बाधा नहीं होती और उससे स्वप्न में भी गलती नहीं होती। सप्रेम
सद्भाव से यदि भागवत धर्म का आचरण करें तो कर्माकर्म की बाधा नहीं होती। उसकी भक्ति से ही पुरुषोत्तम
सदा सन्तुष्ट रहता है। श्रुति और स्मृति ये दो आँखें हैं। इनके बिना जो अन्धे हैं, वे भी भक्ति के बल के कारण
हरिभजन में दौड़ते समय गिरते या लड़खड़ाते नहीं हैं। हे राजा! ध्यान में रखो कि प्रेम के बिना श्रुति स्मृति का
ज्ञान, प्रेम के बिना ध्यान पूजा, प्रेम के बिना श्रवण-कीर्तन यह सब व्यर्थ है। माँ को देखते ही शिशु आँखें बन्द
कर ही उसकी ओर झपटता है, लेकिन उसके साथ माँ भी उतने ही प्रेम से उसकी ओर झपटती है और शिशु को
थाम लेती है। उसी प्रकार जो भक्त भगवान को प्रेमपूर्वक भजता है, उसके उस भजन के साथ ही भगवान भी
आनन्दपूर्वक चलने लगता है और पग-पग पर उसे सँभालता है। इस प्रकार भागवत धर्म का आचरण करते
समय उसे कर्माकर्म की बाधा नहीं हो सकती। क्योंकि जिसने कर्म में आज्ञा और नियम बनाये हैं वह पुरुषोत्तम
ही उसके भजन में उपस्थित रहता है। इस प्रकार स्वानंदकंद गोविन्द जहाँ भागवत धर्म से सन्तुष्ट होकर विचरण
करता रहता है वहाँ विधि-निषेधों का प्रवेश कैसे हो सकता है? उसके भक्त को कभी भी प्रमाद की बाधा नहीं
होती। जिस प्रकार पहरेदार मालिक के लड़के को नहीं रोक सकता उसी प्रकार जो भागवत धर्म से भजन करने
वाला है उसे कर्म की रुकावट बाधक नहीं होती। जिसे भगवद्भजन में विश्वास है, उसके तो विधिनिषेध दास
ही बन जाते हैं। उसका भजन विलास देखकर स्वयं जगन्निवास परम सन्तुष्ट होते हैं। भागवत धर्म से कर्म जैसे-
जैसे छूटते जाते हैं, वैसे-वैसे पुरुषोत्तम सन्तुष्ट ही होता है। लोगों को व्यर्थ ही भ्रान्ति है कि भक्तों को कर्म की
बाधा होती है। कर्म यदि भक्त से प्रमाद कराता है तो उसी प्रमाद में भगवान प्रकट हो जाते हैं। इसलिए हरिभक्तों
को कर्म का विधि निषेध बाधक नहीं होता। अजामिल को उसका कर्म 'बाधक हुआ था, वह यमपाश में बँध
गया, इतने में केवल नाम लेने से भगवान वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने उसे पावन किया। स्वधर्म कर्म जब
द्वितीय अध्याय ३७
निजसत्ता के वाहक बन जाते हैं तब भजनरूपी पालकी में शयन करने वाला भक्त यदि गिर पड़ता है तो स्वधर्म
कर्मों को ही दण्ड मिलता है। इस प्रकार भजन प्रताप के योग से स्वधर्म कर्मों को भी दण्ड दिया जा सकता है।
वर्णाश्रम का अस्तित्व मिटा कर कर्मों का भी विनाश किया जा सकता है। सारांश यह कि जो भागवत धर्म का
सेवन करने वाले हैं उनके स्वधर्म कर्म तुच्छ सेवक हैं। जिनमें भक्तों के सामने खड़े रहने का भी साहस नहीं है
वे भक्तों के लिए बांधक कैसे हो सकते हैं? भागवत धर्म कैसा है? भगवान के प्रति कर्म कैसे अर्पण होता है?
हे राजन! यह अत्यन्त गोपनीय निजभजन कर्म तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वाऽनुसृतः स्वभावात्।
करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत्॥ ३६॥
सोद्देश्य हो या निरुद्देश्य हो, वैदिक हो लौकिक हो या स्वाभाविक हो, ये सारे कर्म भगवान के प्रति अर्पण
करना, इसी को 'भागवत धर्म' कहते हैं, इसे ध्यान में रखो। पानी की तरंग अत्यन्त चंचल होती है, लेकिन वह
जहाँ भी कहीं जाती है, वह जल में ही मिलती है। उसी प्रकार भक्त के सारे कर्म तत्काल भगवान के ही चरणों
में अर्पित होते हैं अर्थात् भगवद्रूप ही हो जाते हैं। इस श्लोक में पहले मानसिक कर्मों के अर्पण के बारे में
बतलाया गया है तथा बाद में इन्द्रिय, बुद्धि, अहंकार आदि के कर्मों का तथा अन्त में कायिक कर्मों का अर्पण
बताया गया है। भागवत धर्म की वास्तविक स्थिति अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि इन्द्रिय वृत्तियाँ हैं
तथा उन्हें भगवान के प्रति अर्पण करना है। यह कैसे किया जाता है सुनो। हे राजा! भक्त को स्वधर्म कर्म की
बाधा क्यों नहीं होती इसका रहस्य बताता हूँ। अति निस्सीम आत्मबोध से मन में ही पुरुषोत्तम प्रकट होते हैं
जिससे संकल्प विकल्प भगवद्रूप हो जाते हैं जिसके कारण भक्त निष्पाप ही रहते हैं। वे हरी की तरह
सत्यसंकल्पी होते हैं। जिस प्रकार शतरंज के खेल में राजा, प्रधान, हाथी, पैदल ये सब रहते हैं लेकिन वे सब
केवल लकड़ी के टुकड़े होते हैं, इसलिए भगवान के भक्त के संकल्प भगवद्रूप ही हो जाते हैं। उसका संकल्प
जिस विषय की अभिलाषा करता है वह विषय आत्माराममय ही हो जाता है जिससे भजन का उल्हास अपने
आप ही बढ़ जाता है। जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में भजन होने लगता है और शरीर में
आत्मबोध पूरी तरह भर जाने के कारण अनुसंधान अखण्ड रहता है। जब मन को समाधान प्राप्त होता है तो
उससे भजन भी बढ़ जाता है। अनुसंधान पूरी तरह बढ़ने के कारण ध्येय, ध्याता और ध्यान एकरूप होकर भजन
चलता रहता है। भक्त, तुर्या, साक्षी और उन्मनी को भी भगवद्भजन में लगाते हैं। इस प्रकार भावना के बिना ही
जो भाव उत्पन्न होता है वह तत्काल भगवान स्वरूप ही हो जाता है। फिर अर्पण का आश्चर्यभाव किसलिए?
अर्पण किये बिना ही वह अपने आप भगवदर्पण होता है। स्वरूपानुभव से स्वप्न मिथ्या हो जाता है, जागृति
छील कर ज्ञान बाहर निकालती है, सुषुप्ति का सुखसमाधान छाँट कर पूरी तरह एकत्रित करने से स्वयं मन ही
आत्मार्पण करता है। ऐसी स्थिति का सुखसमाधान ज्ञानी भक्त ही जानते हैं। इस प्रकार मानसिक व्यापार स्वरूप
में सहज ही अर्पण हो जाता है यह जान लो। घर में जब दीपक जलाया जाता है तो उसी का प्रकाश खिड़कियों
से बाहर आता है। उसी प्रकार मन में श्रीहरि प्रकट होने पर वही इन्द्रियों में भजनानन्द के रूप में प्रकट होता है।
इन्द्रियों का वही व्यापार विस्तारपूर्वक बताता हूँ। इन्द्रिय व्यापार भी परब्रह्मस्वरूप में भजनरूप हो जाते हैं। दृष्टि
जब दृश्य वस्तु को देखती है, उस समय उसे उसमें भगवान ही दिखाई देता है। इस प्रकार भजन सत्ता से
दृश्यदर्शन के साथ दृष्टि का विषय भी भगवान को अर्पित हो जाता है। दृश्य को दृश्य रूप में जो शक्ति प्रकट
३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करती है वह दृष्टि में दर्शनरूप हो जाती है। ऐसे अभिन्न भाव से दर्शनार्पण कर भक्तगण भजन करते हैं। एकत्व
में तीनों भाग हैं और तीनों में एक ही रूप है। इस प्रकार सुन्दर देखना ही पूर्ण समर्पण है। आँखें नित्य विविध
प्रकार के अनेक पदार्थ देखती हैं लेकिन भक्तों को उन सब में परमात्मा का ही रूप दिखाई देता है और इस
प्रकार वे दृष्टि के अर्पण का वैभव भोगते हैं। इस प्रकार भक्त दृष्टि का दर्शन ब्रह्मार्पण करते रहते हैं। अब हे
राजा! अब तुम्हें बताता हूँ कि श्रवण का ब्रह्मा में किस प्रकार अर्पण होता है। जो शब्दों का मुँह से उच्चार
कराता है वही कानों में सुनने वाला बनकर बैठा हुआ है और अर्थ जानने वाला भी वही है। अर्थात् यहाँ श्रवण
भी ब्रह्मार्पण हो जाता है। मुँह से शब्द निकल रहा है तभी शब्द का उच्चार कराने वाला उसके पीछे-पीछे प्रकट
होता है। इससे वह भजन प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होता है और श्रवण सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है। शब्दोच्चार
होते ही अर्थ की वृद्धि होने लगती है इतने में जो शब्द का उच्चार कराने वाला होता है वही शब्दार्थ का माधुर्य
ग्रहण करता है और इस प्रकार श्रवणार्पण से ही हरिभजन में रुचि उत्पन्न होती है। कान पर शब्द पड़ते ही
शब्दार्थ के कारण भजन बढ़ता है और इस प्रकार शब्दों के प्रवर्तक से जुड़ जाता है अर्थात् अर्पित हो जाता है।
जो शब्दों को मुँह से निकलवाता है, उससे एकात्मता निश्चित करने से भजन श्रवण के हाथ में आता है और
सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है। सद्गुरु का वचन कान पर पड़ते ही मन का मनपन मन में ही विलीन हो जाता
है। वही श्रवण ब्रह्मार्पण होकर भगवद्भजन में सार्थकता आती है। इस प्रकार श्रवण से ही श्रवण करने पर उसे
ब्रह्मार्पणता प्राप्त होकर सहज ही हेतुरहित भगवद्भजन हो जाता है। भजन से सन्तुष्ट होने वाला जगन्निवास गन्ध
का गन्ध बन कर रहता है और परेश घ्राण के द्वारा ब्रह्मार्पण से सुवास ग्रहण करता है। जो पुष्प को पुष्पत्व देता
है और फिर अनेक प्रकार की सुगन्धता का ब्रह्मार्पण भोग करता है। नासिका में अवकाश स्वयं ही ग्राहक्ता बन
जाने के कारण वह भोग स्वयं ही कृष्णार्पण होता है। अब 'रस' के अर्पण के सम्बन्ध में बताता हूँ। जिह्वा
रसग्रहण करने जाती है तो भगवान स्वयं ही रसास्वाद बन जाते हैं, जिससे रसना में रसोपभोग की वृत्ति ब्रह्मार्पण
हो जाती है। जिह्वा जो भी स्वाद ग्रहण करती है, वह हरिरूप होकर पूर्ण रूप से मधुर हो जाती है। इस प्रकार
जिह्वा अपना रसानुभव ब्रह्मार्पण कर देती है। रस, रसना और रसास्वाद का निजस्वरूप में अभेद ही है। ऐसी
भावना से रस का सेवन करने से स्वानन्द कन्द इन्द्रियद्वार के बाहर आता है। अर्थात् ऐसे रससेवन से परमानन्द
का साक्षात्कार होता है। कडुवा, मधुर आदि जो अनेक रस हैं उनका रसना धीरे-धीरे सेवन करती है लेकन वह
सारा 'ब्रह्मरस' ही होने के कारण उसके स्वाद में मधुर परमानन्द ही प्रकट होता है। इस प्रकार रसना भी रसभोग
द्वारा कृष्णार्पण में ही रत होती है। अब हे राजा! 'स्पर्श' इस विषय की व्यवस्था ब्रह्मार्पण में किस प्रकार होती
है, सुनो! अपने शरीर से स्पर्श करने जाओ तो देह में विदेही आत्मा ही प्रकट होता है। इसलिए जिसे भी स्पर्श
करने जाओ, वह स्पर्शभोग ब्रह्मार्पण होने लगता है। स्पर्शास्पर्श से अर्थात् त्वचा से किसी को स्पर्श करने का
विचार करें तो वहाँ स्पर्श करने के लिए कुछ नहीं रहता। उस ऐक्यरूप के कारण कृष्णार्पणरूपी भजन ही प्रकट
होता है। इसलिए जो भी पदार्थ लेने जाओ, वह पदार्थ सर्वसत्ताधीश परमात्मा ही बनकर रह जाता है इस प्रकार
उस भजन से निजभक्ति का स्वार्थ अर्थात् परमार्थ ही पल्ले पड़ता है। अब हाथ के अर्पण के बारे में बता रहे हैं।
हाथ भगवान को जब कुछ देने जाते हैं, तब वह देते समय भजन किस प्रकार हो जाता है, देखें। तो देनेवाला,
लेने वाला और दान ये तीनों बातें भगवान स्वयं हो जाता है। अब 'पैर' का अर्पण सुनिये। भक्त हर तरफ पैर से
चल कर आता है वह मार्ग भगवान स्वयं हो जाता है इसलिए ब्रह्मार्पण के कारण पग-पग पर निजभजन होता
द्वितीय अध्याय
३९
है। चरणों को चलने के लिए जो गति देता है, वही पृथ्वी की धारणा शक्ति है ऐसी युक्ति धारण कर चलने से,
चलने का वह कर्म ब्रह्मस्थिति को पहुँच जाता है। अभी तक ज्ञानेन्द्रियों में से श्रोतेन्द्रियों के सम्बन्ध में बतलाया,
अब कर्मेन्द्रियों में से वागिन्द्रिय के सम्बन्ध में सुनिये। बोल और बुलवाने वाले की भेंट बोलने में होती है। उसे
देखकर बोल लज्जा करता है। उसे दूर कर ही बोलना प्रकट होता है इसलिए ब्रह्मार्पण के साथ निजभजन बढ़ता
रहता है। निःशब्द में शब्द का विलय होता है निःशब्द बात ही शब्दों से कही जाती है। अर्पणकर्ता के साथ
वास्तविक अर्पण विधि इसे ही समझो। बोल बुलाने वाला बोल के भीतर ही है यह मान लेने पर वह बोल
कृष्णार्पण ही हो जाते हैं। इस प्रकार शब्द रूप से ही भजन होकर ब्रह्मार्पण के साथ परमार्थ प्रकट होता है। अब
अभिमान का अर्पण बताते हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है, मन से कर्म से और वचन से जो भगवद्भजन में दृढ़
होता है वही उस भजन को अभिमान के साथ दृढ़तर थाम कर रहता है। समुद्र के भीतर रहने वाली लहर कहती
है कि वास्तव में देखा जाए तो जगत को शान्त करने वाला और पोसने वाला तथा चातक की तृष्णा को हरण
करने वाला जो मेघ है उसकी उत्पत्ति मुझ से ही है। मेरे ही कारण फसल पकती है, मेरे ही कारण नदियाँ जल
से भरकर बहती हैं और फिर समुद्र में मिल कर मुझसे ही मिल जाती हैं। इस न्याय के अनुसार भगवद्भक्त मूल
का पूर्णत्व पाकर उस पूर्णत्व के अभिमान से भजने लगता है। उस भजन का लक्षण ध्यान देकर सुनो। वह
कहता है कि त्रिभुवन का कर्ता मैं हूँ, कर्म करके अकर्ता तथा सभी प्रकार के भोग भोगकर नित्य अभोक्ता रहने
वाला भी मैं हूँ, सभी लोकों में मेरी ही सत्ता है, सभी में सब का नियंता भी मैं ही हूँ, सब को सभी प्रकार से
प्रकाशित करने वाला भी मैं ही हूँ, उसी प्रकार सबका रास्ता भी मैं ही हूँ। सकल प्राणियों में मैं ही एकमेव हूँ,
व्याप्य और व्यापक मैं ही हूँ, उत्पन्न होने वाला और उत्पन्न करने वाला मैं ही हूँ। एकता भंग किये बिना जगद्रूप
होनेवाला मैं ही हूँ। देवों का आदिदेव मैं हूँ, देवों में जो देवत्व है वह मेरा ही तत्व है। विनाशवान पदार्थों में
अव्यय और अज मैं हूँ। अक्षरों में जो अक्षरधर्म दिखाई देता है वह मेरे ही कारण है। ईश्वर में निहित जो भी
सत्ता है, वह सब मेरे ही सामर्थ्य के कारण है। ईश्वर में जो भी ईश्वरत्व है वह मेरे ही कारण है। जलरूप में
रसरूप मैं हूँ, प्रकृतिपुरुषों का जनक मैं हूँ, सृष्टि रचना की संकल्पना मेरी है किन्तु मैं निर्विकल्प हूँ। सभी
कारणों का अनादि कारण मैं हूँ, समाधि की मूल समाधि मैं हूँ, आत्मशुद्धि को मेरे ही कारण शुद्धि प्राप्त हुई।
अभिमान का कृष्णार्पण इसी प्रकार होता है। मैं अजन्मा होते हुए, बिना जन्म लिये जन्म लेता हूँ। मैं अकर्मा होते
हुए कर्म किये बिना कर्म करता हूँ। पुरुषोत्तम को 'उत्तम' की महिमा मेरे ही कारण प्राप्त हुई है। 'सत्' शब्द से
मेरा ही बोध होता है। 'चित्' शब्द से तो स्पष्ट रूप से 'मैं' ही हूँ। सत्, चित् और 'आनन्द' ये तीन भिन्न धर्म न
होकर निर्व्यंग जो 'आनन्द' है, वह मैं हूँ। मेरे ही कारण सूर्य में प्रकाश है, मुझमें ही चिदाकाश का आकाश है।
जगन्निवास मेरे ही कारण जगत में आनन्द से विचरण करता है। मैं अज हूँ। मेरे अजत्व के कारण ही माया को
अजत्व प्राप्त हुआ है। निःशेष निर्बीज पदार्थों का बीज मैं हूँ। मेरे ही स्वरूप से आत्मस्वरूप प्रकट होकर नाचता
रहता है। अधिष्ठान का वास मुझमें ही है। जगदीश्वर का पूर्ण ईश्वर मैं हूँ। परमपुरुष का पुरुष मैं हूँ और परेश
का परेश भी स्वयं मैं हूँ। असत् पदार्थ मेरे कारण सत्तावान होते हैं। अचित् अर्थात् जड़ वस्तुओं को मेरे कारण
चेतनता प्राप्त होती है। निजानंद को भी मेरे ही कारण आनन्दत्व प्राप्त होता है। सभी सिद्धियों की मूल सिद्धि मैं
हूँ, बुद्धि की सर्वांग सुन्दर बुद्धि मैं ही हूँ। मोक्ष की उपाधि भी मेरे कारण ही सिद्ध होती है। सच्चा धर्म मैं हूँ।
मुझमें निहित ब्रह्म से कर्म का विस्मरण होता है। ब्रह्म समाधि की परमावधि जो परब्रह्म है, वह मैं हूँ।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर ये भी वास्तव में मेरा ही अंश धारण करते हैं। दशावतारों का अवतारी मैं ही हूँ। मेरी
महत्ता स्वयं मैं भी नहीं जानता। इस प्रकार अनेक विचारों के अभिमान से वह भगवद्भजन करता है और 'अहं
ब्रह्मास्मि' अर्थात् मैं ब्रह्म हूँ इस दृढ़ भावना से स्वयं अपने जीव को ही पूर्णत्व से समर्पण करता है। पूर्णत्व में
डालकर अभिमान जो भी कल्पना करता है वह सब वह स्वयं ही हो जाता है और वह पूर्णत्व भी अपने मूल के
पूर्णत्व में अर्पण करता है। 'ब्रह्माहमस्मि' जो वचन है, उस अहंता को भगवद्भजन कहते हैं। लेकिन यह तो तद्रूप
हो कर और अभिमान ब्रह्मार्पण करके ही भजन करने लगता है। देहबुद्धि का कचरा झाड़ कर ऐसे भजन से जो
अहंकार उत्पन्न होता है वही अपरोक्ष आत्मस्वरूप का साक्षात्कार है। इस प्रकार पूरी तरह निश्चिंत होकर वह
पूर्णत्व से विचरण करने लगता है। इसलिए मनन का मनन मैं ही हूँ, चित्त को चिन्तन धर्म के बिना जो
आत्मचिन्तन होता है, वह मैं ही हूँ। जिसकी सहज प्राप्ति नहीं होती उसका निजचित्त को चिन्तन करना चाहिए।
इस प्रकार जब चित्त स्वानुभव से भजने लगता है तो जो अप्राप्य सा लगता है उसकी भी प्राप्ति हो जाती है।
इसलिए चित्त निश्चय करके जो भी चिन्तन करता है, वह सब वह स्वयं ही बन जाता है। इस साक्षात्कार से
चित्त निजबोध से युक्त होकर भजने लगता है। जो अस्तित्व में नहीं है उसकी चिन्ता करना 'अतिचिंता' है और
जो अस्तित्व में है, उसकी चिन्ता करना 'निश्चितता' है। इन दोनों का चिन्तन छोड़ देने से न भजते ही भजन हो
जाता है। चित्त, चिन्त्य और चिन्तन इन तीनों का समाधान होने पर, वह समाधान भी पूर्णतः सहज ही
कृष्णार्पण हो जाता है। ऐसी भगवद्भजनों की विधि से बुद्धि भजनशील होने पर सकल कर्मों में भी सहज ही
समाधि प्राप्त होती है। कुछ लोग कहते हैं कि 'कर्माचरण में समाधि कभी सम्भव नहीं होती। तो हे राजा जनक,
समझ लो कि उन्हें आत्मस्वरूप का बोध हुआ ही नहीं है। जो 'तटस्थ' भाव को ही समाधि कहते हैं, उसकी
बुद्धि काम नहीं कर रही है, ऐसा समझना चाहिए क्योंकि वह वास्तविक 'समाधि' न होकर केवल 'मूर्च्छा' है।
जो तटस्थता से जागृत होता है वह समाधि भी खो देता है। अर्थात् यह बात एकतरफा है। मतिमंद लोग भी इस
बात को स्वीकार नहीं करेंगे। 'समाधि' और वह भी एकतरफा यह कहना भी लज्जास्पद है। ऐसा होते हुए भी
जो इसे सच मानेंगे, उसमें केवल शब्द पाण्डित्य ही होगा। उन्हें शुद्ध स्वरूप की पहचान नहीं है, यही कहना
होगा। यहाँ प्रारब्ध अत्यन्त समर्थ होने के कारण वह मूर्च्छा लाकर निश्चेष्ट करता है। सच पूछा जाय तो चलते-
फिरते समाधिस्थ वसिष्ठादिक ऋषि हैं। देवर्षि नारद को ही देखिये। उनके विनोद कर्म से भी कभी समाधि भंग
नहीं होती। याज्ञवल्क्य के समाधि के सम्बन्ध में तो प्रसिद्ध ऋषियों ने परीक्षा भी ली है। स्वरूप देखकर जो
मूर्च्छित होता है वह स्वयं तरता है किन्तु स्वयं तरकर दूसरों को भी तारने का ज्ञान शुकवामदेव आदि ने ही प्रकट
किया है। इसलिए समाधि और व्युत्थान इन दोनों ही अवस्थाओं में बुद्धि ब्रह्मार्पण होती है, वही अखण्ड और
परिपूर्ण समाधि है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मसमाधि देकर शीघ्र ही घनघोर युद्ध में झोंक दिया किन्तु उस
करुणानिधि श्रीकृष्ण ने उसे तटस्थता का स्पर्श भी नहीं होने दिया। समस्त प्रकार के कर्मों में भी समाधि होनी
चाहिए यह ज्ञान बुद्धि को केवल सद्गुरु ही देते हैं, इसलिए युद्ध जैसे 'घोर' कर्म में भी समाधि का भंग नहीं
होता। बुद्धि द्वारा परब्रह्म का आकलन करने पर कोई भी कर्म अहेतुक ही चलता है, यही बुद्धि का सच्चा अर्पण
है। अन्य जो आनुमानिक ज्ञान है, वह भ्रम है। स्वरूप में असीमित तन्मय दृष्टि तथा कभी न टूटने वाली
समबुद्धि जिसकी रहती है उसे कर्म करते समय भी अज्ञान की बाधा नहीं होती। ऐसी ही स्थिति का नाम
'परम-समाधि' है। देहबुद्धि पूरी तरह समाप्त होने पर स्वस्वरूपानुभव से अहंकार की बाधा नहीं होती।
सदासर्वदा स्वस्वरूप में बुद्धि भजनशील होने पर वह किसी भी कर्म में स्वयं ही श्रीकृष्णार्पण होती है। मन की
छटपटाहट बिलकुल शान्त होती है, उसी का नाम है 'परमसमाधि'। 'देहबुद्धि' का त्याग किये बिना प्राणवायु
द्वितीय अध्याय ४१
को बन्द कर समाधि लगाना यह काष्ठ की तरह जड़ अर्थात् मूर्च्छावस्था जैसी ही स्थिति है, ऐसा समझना
चाहिए। अब 'कायिक' कर्म का लक्षण बताते हैं। जिसकी मन को जानकारी नहीं होती लेकिन इन्द्रियों का
व्यापार चलता रहता है, ऐसा जो कर्म होता रहता है, उसे सहज ही 'कायिक' अर्थात् केवल काया का कर्म
समझना चाहिए। श्वासोच्छ्वास अथवा आँखों का खुलना बन्द होना भी नारायण के ही लिए होता है। घर, शरीर
तथा वर्णाश्रम धर्म के अनुसार उसके हिस्से में जो भी कर्म आते हैं, उन उन कर्मों को वह कर्तव्य बुद्धि से
अभिमान रहित होकर करता रहता है। यदि चीनी का बड़ा सा कैरैला बनाया जाय तो उसका डंठल तथा काँटे
भी मीठे ही होंगे। उसी प्रकार समस्त इन्द्रियों का कर्म ब्रह्मार्पण के योग से ब्रह्म में मधुर अर्थात् ब्रह्मरूप हो
जाता है। वह पूरे कर्मसमूह का विधिपूर्वक निर्वाह कर उसका गौरव बढ़ाता है। लेकिन मन में कर्तापन का भाव
नहीं रखता। मैंने सत्कर्म का पालन किया, मेरा आचरण अत्यन्त उत्तम था, मैंने जन्ममरण को समाप्त किया, यह
स्वाभाविक देहभाव उसमें उत्पन्न ही नहीं होता। वह देह के साथ विचरण अवश्य करता है, लेकिन देहधर्म को
धारण नहीं करता। उसे ज्ञान का अहंकार नहीं होता, इसलिए सहजभजन में वह अहंकार रहित होकर ही
विचरण करता रहता है। उससे जो कुछ भी उत्पन्न होता है वह सब मेरा मधुर खाद्य है, ऐसा भगवान कहते हैं।
इस प्रकार ब्रह्मार्पणत्व के कारण ऐसे भक्त के सारे स्वभाव अर्पण नहीं करने होते बल्कि सहज ही अर्पण हो जाते
हैं। पारस की कसौटी पर जो भी सोना चढ़ता है वह अत्यन्त शुद्ध सोना ही बनता है उसी प्रकार उसके शरीर से
जो भी कर्म होता है वह सच्चा परब्रह्म होता है। उसका खेल ही उसकी महापूजा है, उसका बड़बड़ाना ही
महास्तुति है, इस प्रकार उसके स्वाभाविक कर्म से स्वानंदपूर्ण श्रीनारायण सुखी होता है। जिस राह की ओर वह
देखता है उसी राह पर भगवान प्रसन्नतापूर्वक खड़े हो जाते हैं। फिर वह देखे या न देखे, उसे स्वाभाविक रूप से
भगवान ही दिखाई देता है। वह जिस मार्ग पर चलता है, वह मार्ग ही स्वयं श्रीरंग बन जाता है। अर्थात् वह
भगवान के पेट पर मस्ती से चलता है। उससे स्वाभाविक रूप से जो कर्म होता है, वह अहेतुक ब्रह्मार्पण ही
होता है। इसी का नाम है निर्दोष 'भजन' और यही है शुद्ध भागवत धर्म। स्वाभाविक रूप से.जो व्यवहार होता है
वह ब्रह्मार्पण ही होता है। इसी का नाम है शुद्ध 'आराधन'। हे राजा जनक ! पूर्ण 'भागवत धर्म' जिसे कहा जाता
है, समझ लो कि वह यही है। इस प्रकार के भगवद्भजन मार्ग पर किसी बात का भय नहीं है। हे नृपनाथ ! तुमने
'अभय' के सम्बन्ध में पूछा था। वह इस भजन से ही निश्चित रूप से प्राप्त होता है। राजा ! इसमें भय का
कारण क्या है, यह अगर पूछते हो तो वह भी बताता हूँ। हे श्रवणसौभाग्यनिधे ! सावधान होकर सुनो।
भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः ।
तन्माययाऽतो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ॥ ३७॥
आत्मा पूर्ण रूप से सर्वत्र एक ही है। फिर भी 'उससे मैं भिन्न हूँ' यह कहना ही भयजनक अज्ञान है।
उसमें भेद-भाव उत्पन्न होने के कारण वह अत्यन्त दुःखदायी होता है। यदि दृढ़ अज्ञान ही भय का मूल कारण है
और ज्ञान ही उस अज्ञान का निवर्त्तक है तो फिर वहाँ भगवद्भजन कहाँ से आये ? पण्डितों को ऐसा ज्ञानाभिमान
होता है। इसलिए हे राजा ! तुम्हें जो कहता हूँ वह सुनो। हमारा दृढ़ विश्वास है कि ज्ञान का मुख्य कारण भक्ति
है। 'माया' ही अज्ञान का मूल कारण है। ब्रह्मादिक भी उसे नहीं सँभाल पाते। वह त्रिगुणात्मक है तथा प्राणियों
के पीछे लगी हुई है और वह अत्यन्त दुस्तर है यह जान लो। स्वस्वरूप को आवृत करना यही उस माया का
प्रमुख लक्षण है। द्वैत का उभरना ही 'मूल माया' है। ब्रह्म अद्वैत से परिपूर्ण है। हे राजा ! उस अद्वैतरूप में 'मैं'
का जो भाव उत्पन्न होता है वही वास्तव में माया का जन्मस्थान है यह जान लो। उस माया के पेट में भय, शोक
और दुःख का भण्डार है। वह जब ब्रह्मदेव और शंकर जैसों का भी पीछा नहीं छोड़ती तो फिर अन्य की क्या
बिसात है ? उस महामाया की निवृत्ति करने के लिए केवल भगवद्भक्ति ही समर्थ है। गीता में स्वयं श्रीकृष्ण ने
अर्जुन से यही बात कही है। भगवद्गीता का वह वचन—"मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते" (माया
भगवान की शक्ति है, उसकी निवृत्ति करने के लिए भगवद्भजन ही चाहिए, वहाँ अन्य उपाय नही चलेंगे। जो
भगवान के भक्त होते हैं वही हरि की माया सुख से तर जाते हैं। अपने अन्तर की यही गुप्त बात श्रीकृष्ण ने
अर्जुन के सामने प्रकट की। माया का यह सबसे बड़ा गुण है कि वह प्राणि की दृष्टि को स्वस्वरूप से विन्मुख
करती है और द्वैतभाव से बलवान होकर हमेशा भ्रम के त्रिगुट (दृश्य, दर्शन, द्रष्टा यह भावना) को बढ़ाती रहती
है। द्वैत का भान ही भय का जनक तथा माया द्वैत की जननी है, यह जान लो। ऐसी उस माया का निवर्तक
ब्रह्मज्ञान है, ऐसा ज्ञान सम्पन्न साधु संत बताते हैं। लेकिन यह श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञान, भक्ति का ही पोष्यपुत्र है यह जान
लो। यदि भगवद्भजन नहीं किया तो ब्रह्मज्ञान कभी प्राप्त नहीं होगा। भले ही वेदशास्त्र सम्पन्न हों लेकिन यदि
उन्होंने भगवद्भजन नहीं किया तो माया को परावृत्त करने वाला ब्रह्मज्ञान उन्हें भी कभी प्राप्त नहीं होगा।
शब्दज्ञान की व्युत्पत्ति लौकिक ज्ञान बढ़ाने में भले ही समर्थ हो लेकिन माया की निवृत्ति करनेवाला ज्ञान
हरिभक्ति के सिवाए कभी प्राप्त नहीं होगा। हरिगुण की रसाल कथा ही ब्रह्मज्ञान की जननी है। हरिनाम का गजर
सुनते ही माया प्राण बचाकर वहाँ से भागती है लेकिन वह भाग नहीं सकती क्योंकि हरिनाम के भय से वह
अपने ही स्थान पर घुल जाती है। इसलिए हरि की माया हरिभक्तों के लिए बाधक नहीं होती। हरिनाम की शक्ति
विचित्र है, उसके आगे माया की कुछ नहीं चलती इसलिए हरिभक्त सुख से माया को तर जाते हैं ऐसा स्वयं
श्रीपतिजी ने कहा है। सलोकता, समीपता, सरूपता तथा सायुज्यता इन चारों मुक्तियों को भगवद्भक्ति अपनी गोद
में खिलाती है। इस प्रकार यदि अनन्यभाव से भक्ति नहीं की गयी तो शास्त्रज्ञ लोगों को कभी भी मुक्ति नहीं मिल
सकेगी। जो हरिभजन से विमुख होते हैं उनके सामने द्वैत सर्वदा खड़ा रहता है। उनका महाभयंकर तथा
दुःखदायी प्रपंच बढ़ता ही जाता है। जिस प्रकार अचानक दिशा भूलने वाला व्यक्ति पश्चिम को ही पूर्व .कहता है
उसी प्रकार परब्रह्म से विमुख होने पर मिथ्या अद्वैत का बोलबाला हो जाता है। द्वैत के भेदरूपी कुएँ में से
संकल्प-विकल्प के सोते फूटते हैं और जन्म-मरण की बाढ़ में सारा ब्रह्माण्ड डूब जाता है। जन्म मरण के
आकर्षण से अनेक प्रकार के दुःखों की राशि और संकटों का सामना अभक्त लोगों को ही करना होता है क्योंकि
हरिभक्तों को स्वप्न में भी जन्म-मरण का आकर्षण नहीं होता। भक्ति की महिमा अगाध है, उसमें संसार बन्धन
प्रवेश नहीं करता। ऐसे भगवद्भजन को साधने के लिए सद्गुरु के चरणों की सेवा करनी पड़ती है। अपने शिष्य
की मृत्यु की चिन्ता का जो निवारण करता है, वही सच्चा सद्गुरु है। इसके अतिरिक्त अन्य प्रकार के गुरु केवल
मंत्र-तंत्र उपदेश तक ही सीमित समझने चाहिए। मंत्र-तंत्र का उपदेश करने वाले गुरु घर-घर में दिखाई देते हैं
लेकिन जो शिष्य को सद्वस्तु दिलाते हैं उसी को श्रीकृष्ण सद्गुरु मानते हैं। गुरु ही देव है, गुरु ही माता-पिता है,
गुरु ही आत्मा है और गुरु ही ईश्वर है। गुरु सभी दृष्टियों से परमात्मा ही है। तात्विक दृष्टि से देखा जाए तो गुरु
परब्रह्म ही है। गुरु की उपमा देने लायक संसार में अन्य कुछ मिलने वाला नहीं है। गुरु की महिमा अगाध है।
भाग्य के बिना उसकी भेंट नहीं हो सकती। निष्काम पुण्यराशि तथा असीम वैराग्य का साथ हो, तथा नित्यानित्य
विवेक की चाह हो तभी सद्गुरु कृपा प्राप्त होती है। सद्गुरु कृपा प्राप्त हो जाए तो भक्ति के भण्डार खुल जाते
हैं, फिर उसके सामने जहाँ कलिकाल भी भागने लगता है तो वहाँ संसारभय क्या कर लेगा ? गुरु को माता-पिता
भी नहीं कह सकते क्योंकि उनका साथ तो केवल एक ही जन्म का होता है लेकिन गुरु तो हर जन्म में माँ-बाप
द्वितीय अध्याय ४३
की तरह होता है। अधोद्वार से जन्म देने वाले लौकिक दृष्टि से माता-पिता होते हैं किन्तु अधोद्वार का स्पर्श न
होने देने वाले जो गुरु हैं वही सच्चे अर्थ में माता-पिता हैं। गुरु को कुलदेवता कहा जाय तो उसकी पूजनीयता
केवल कुलधर्म के कर्मों में ही होती है, लेकिन गुरु सभी कर्मों में अकर्ता होने के कारण सदासर्वदा और सभी
दृष्टियों से पूजनीय है। गुरु को देवतातुल्य कहा जाय तो देवता को देवत्व भी उसी के कारण आता है, इसलिए
देवता की भी तुलना सद्गुरु के साथ नहीं हो सकती। इसे ध्यान में रखो। गुरु और ब्रह्म को यदि समान कहा
जाए तो वह उपमा भी कुछ कम ही होगी क्योंकि ब्रह्म को ब्रह्मत्व गुरुवाक्य से ही आता है। अद्वय रूप में वह
अवश्य सद्गुरु के समान होगा। इसलिए गुरु की महत्ता अगाध है। वह अनुपम है। ब्रह्मा के सम्बन्ध में ब्रह्मत्व-
प्रमाण-प्रमा-प्रमेय आदि वाक्य-महिमा सद्गुरु की है। ब्रह्म सबका प्रकाशक है लेकिन सद्गुरु उसका भी
प्रकाशक है। इसलिए गुरु से पूज्य और कुछ भी नहीं है। इसलिए हे राजा! सद्गुरु को कभी भी मनुष्य भावना से
नहीं देखना चाहिए। ऐसी भावार्थ बुद्धि से रहने से अच्छे शिष्य की सहज ही चित्तशुद्धि होती है। जिसकी गुरु
चरणों पर असीम भक्ति रहती है, उसके मनोरथ भगवान पूरे करते हैं क्योंकि सद्गुरु की आज्ञा का पालन भगवान
भी करते हैं। गुरु के कहने से वह जड़, मूढों का भी उद्धार करता है। ब्रह्म भावना से जो गुरु की सेवा करते हैं,
उनकी आज्ञा का पालन भगवान भी करते हैं। उन्हें वह सदा सर्वदा निज स्वरूप का सुख प्रदान करता है। इस
गुरु मर्यादा का भगवान कभी उल्लंघन नहीं करता। गुरु की आज्ञा का पालन भगवान स्वयं करते हैं और गुरु भी
भगवान को महानता प्रदान करता है। इसलिए वे दोनों ही अभिन्न भाव से भावार्थी लोगों के तारनहार होते हैं।
अन्तःकरण में सद्भाव न होते हुए भी जो भक्ति का ढोंग करते हैं वे अपनी भावना के अनुसार संसार सागर में
अनेक प्रकार से डूबते-उतराते रहते हैं। वे मानवता से हाथ धोते हैं, आत्मत्व को खो देते हैं और ब्रह्मप्राप्ति में भी
ठगे जाते हैं। हरिभक्ति कभी भी दंभ से नहीं उत्पन्न होती। यहाँ शुद्ध भाव के बिना परमार्थ कभी हाथ नहीं आता।
यह बात तुम ध्यान में रखो कि समस्त साधनों में सद्भाव ही एक श्रेष्ठ साधन है। सूखे खम्भे के पास सद्भाव
रखते ही वहाँ देवाधिदेव प्रकट हो गया, फिर सद्गुरु तो स्वयं साक्षात परब्रह्म हैं। इसलिए गुरुभजन जैसा भजने
के लिए सरल मार्ग नहीं है। सचमुच जिसे ज्ञान-भक्ति कहते हैं वह वास्तव में गुरुभक्ति ही है। गुरु की अपेक्षा
ब्रह्म श्रेष्ठ है, यदि ऐसा कहें तो गुरुत्व की महिमा कम होती है। ऐसा विषम भाव रखने से शिष्य के मन में
ब्रह्मसाम्य का उद्गम नहीं होगा। हमारे लिए सद्गुरु ही परब्रह्म है, ऐसी सप्रेम भावना रखना ही उत्तम गुरुसेवा
है। ऐसी सेवा से अर्थात् ऐसे निजभाव से शिष्य स्वयं परब्रह्म हो जाता है। ऐसी ही गुरुसेवा से प्रह्लाद द्वंद्वातीत हो
गया और नारद परब्रह्म से ऐक्य प्राप्त कर निजानन्द से नाचते-गाते देवदानवों के बीच विचरण करता रहता है।
ऐसी ही गुरु सेवा करने से अम्बरीष की गर्भव्यथा समाप्त हो गयी। उस गर्भव्यथा को भगवान ने सहन किया।
अपने भक्त को उसने संसार की व्यथा नहीं होने दी। ऐसी अभिन्न भावना से जो सुबुद्धिमंत गुरुचरणों का भजन
करते हैं वे जनार्दन के प्रिय बन जाते हैं। वे उन्हें संसार भावना का स्पर्श नहीं होने देते। गुरु और ब्रह्म ये दोनों
एक हैं, उसी प्रकार शिष्य भी तत्स्वरूप ही है। जो कोई भेद भावना से भिन्नता मानते हैं वे माया के कारण ऐसा
करते हैं, ऐसा कवि का कहना है।
अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयोर्ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथौ यथा।
तत् कर्मसङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निरुन्ध्यादभयं ततः स्यात्॥ ३८॥
जिस प्रकार कोई व्यक्ति सोते समय स्वप्न में संसार की कल्पना करता है, उसी प्रकार पुरुष को जो प्रपंच
दिखाई देता है वह वास्तव में न होते हुए मिथ्या भासित होता है। मनुष्य जब नींद में रहता है, उस समय उसे
४४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
स्वप्न दिखाई देता है, वही जब जागृत हो जाता है तो मनोरथ का चिन्तन करने लगता है, और उसे अवास्तव जन
वन दिखाई देने लगता है। अथवा जो आसन लगाकर मूर्ति का चिन्तन करता है उसे ध्येय, ध्याता, ध्यान, उपचार
आदि का व्यर्थ का आभास होने लगता है। जिस प्रकार धन के लोभी का धन गायब होने पर भी उसकी वासना
धन धान्य को नहीं छोड़ पाती उसी प्रकार उसका मन धन का स्मरण करने से द्रव्य लोभ से पागल हो जाता है।
मन स्वयं भले ही धन न हो लेकिन वह धन के खजाने का स्मरण करता है और स्मृति लोप होकर धन लोभ से
पूरी तरह पागल हो जाता है। उसी प्रकार मोह द्वारा पूरी तरह ग्रस्त होने पर मिथ्या देहादि के द्वैत का आभास होने
लगता है, उसे अहंभाव से सच मान लेने पर संसार का भय शरीर पर अचूक प्रहार करता है। यह बात ध्यान में
रखो कि भवभय का प्रमुख कारण हमारे मन की कल्पना ही है। उस मन का निरोध करने के लिए सद्गुरु के
वचन तथा उनके प्रति दृढ़ निष्ठा रखनी चाहिए। यह जानकर जो सच्छिष्य ज्ञाता होते हैं, वे गुरु की बात पर
विश्वास रखकर विवेक और वैराग्य के बल से अपने मन को सँभाल कर रखते हैं। राजा ! उस नियंत्रण की क्या
युक्ति है, उसे मैं संक्षेप में तुम्हें बताता हूँ। सद्गुरुवचन आत्मबोध से मन को सावधान करता रहता है। सद्गुरु पर
तथा उसके वचन पर दृढ़ निष्ठा रखने से चंचलता से विषयचिन्तन करते हुए मन जो देखता है वह सब ब्रह्मार्पण
होता जाता है। गुरुकृपा का ऐसा सामर्थ्य है कि विषय का जो भी स्वार्थ मन में रखो वह सब परमार्थ रूप ही हो
जाता है। भूमि भय से जो भागता है उसे सब जगह भूमि ही दिखाई देती है। ऐसा होने से आना-जाना अपने
आप ही बन्द हो जाता है और वह एक ही स्थान पर ठहर जाता है। इस प्रकार मन को एक मर्म दिखला देना
चाहिए और वह यह है कि वह जिसे भी देखता है वह सब ब्रह्म ही है। ऐसा करने से वह जो भी कर्म करने
लगेगा, वहाँ पुरुषोत्तम सहज प्रकट हो जाएगा। इस प्रकार गुरुपदेश के अनुभव के प्रभाव से इन्द्रियों की वृत्तियों
पर नियन्त्रण हो जाता है और ब्रह्मरूप अधिष्ठान से ऐक्य मिलाकर बाह्य प्रवृत्तियों पर लगाम कस जाती है। इस
प्रकार बाह्य कर्मों पर नियन्त्रण होकर मन का द्वैतभाव टूटता है और बाहर भी परब्रह्मरूप चिदाकाश चारों ओर भर
जाता है। इस प्रकार के भजन से मन पर नियन्त्रण करने से, उन भक्तों को कल्पांत काल में भी भय नहीं रहता।
वे निर्भय होकर विचरण करते रहते हैं। लेकिन यह अगाध निष्ठा भोले भाले लोगों से नहीं सध पाती, इसलिए
एक और सरल साधन बताता हूँ।
शृण्वन् सुभद्राणि रथाङ्गपाणेर्जन्मानि कर्माणि च यानि लोके।
गीतानि नामानि तदर्थकानि गायन्विलज्जो विचरेदसङ्गः ॥ ३९॥
भोले-भाले लोगों के लिए तरने का प्रमुख साधन चित्तशुद्धि ही है। हरि के जन्म, कर्म और गुण के सम्बन्ध
में अत्यन्त आदर से श्रवण करना चाहिए। खोये हुए पुत्र के मिलने की वार्त्ता माँ जितनी उत्कंठा से सुनती है,
उतनी ही उत्कंठा से जीवन को सार्थक करने वाली हरिकथा सुननी चाहिए। हरि के जन्म-कर्म तथा गुण अनन्त
हैं, वह सब कहाँ सुनने को मिलेगा? तो इसका उपाय यह है कि जो भी प्रसिद्ध पुराण हो, उसे पूरी श्रद्धा से
सुनना चाहिए। पुराणों में अनेक देवताओं का उल्लेख है वे सब भी जिसका चरणस्पर्श करते हैं, वेदों और पुराणों
ने भी जिसका वन्दन किया है वह चक्रपाणि श्रीकृष्ण ही एक समर्थ अर्थात् श्रेष्ठ है। उसके अत्यन्त अद्भुत जन्म
तथा परमार्थ युक्त जो भी कर्म भगवान ने स्वमुख से सुनाये हैं, उन सबका ज्ञानप्राप्ति के लिए श्रवण करना
चाहिए। लेकिन जिस किसी पुराण का भी वह श्रवण करे यदि वह उसका मनन नहीं करता तो सब व्यर्थ है।
इसलिए श्रवण की हुई बात का अच्छी तरह मनन करते रहना चाहिए। पैसा देकर गाय खरीदी जाए और उसके
दूध का सेवन स्वयं किया जाए तो वह विषयभोग होता है लेकिन यदि उसी गाय को दान में दिया जाए तो वह
द्वितीय अध्याय ४५
परमामृत का दूध अर्थात् मोक्ष प्रदान करती है। उसी प्रकार जो श्रवण किया जाए वह मनन से ही परमपावन होता
है। अगर श्रवण की उपेक्षा की जाए तो वह निष्फल होता है। हरि का नाम कान में पड़ते ही कितने ही लोगों के
मुख से वह बाहर निकलता है तो कितनों के इस कान से दूसरे कान में से निकल पड़ता है। परन्तु हरि का नाम
कान में पड़ते ही, जिसके अन्तःकरण में प्रवेश करता है उसका सारा पाप धुल जाता है और वह हरि के चरणों में
लिपट जाता है। इस प्रकार हमेशा श्रवण के प्रति मननयुक्त श्रद्धा रखने से, विकल्प की कभी भी बाधा नहीं
उत्पन्न होती और चित्तवृत्ति अपने आप शुद्ध हो जाती है। इस प्रकार मननयुक्त श्रवण करने से पूर्णानन्द उफनने
लगता है और आनन्द के उस आवेग में वह हरिकीर्तन करने लगता है। तानमुद्रा-पदबंधयुक्त हरि का अगाध
चरित्र कीर्तन के माध्यम से गाकर जब वे उनका विवेचन करने लगते हैं तो परमानन्द मानों बहने लगता है।
जिसका जन्म नहीं है उसके जन्मों का वर्णन करते हैं, जिसका कोई कर्म नहीं है उसके कर्म अर्थात् लीलाओं को
गाते हैं और जिसका कोई नाम नहीं है उसके नाम का संकीर्तन कर प्रेम से गर्दन हिलाते हैं। अपना हित साधने
के लिए लौकिक की लज्जा छोड़ प्रसन्नता से नाचते रहते हैं। कीर्तन के योग से दोषों का निर्दलन होता है, जप,
तप निराश हो जाते हैं, यमलोक उजाड़ हो जाता है और तीर्थों की आशा निष्फल हो जाती है, यम नियमों का
उपवास हो जाता है, योगाभ्यास की मरने जैसी अवस्था हो जाती है, कीर्तन का गजर शुरु होते ही, परमात्मा
श्रीकृष्ण नाममात्र से ही सारे दोष नष्ट कर देता है। कीर्तन की घड़घड़ाहट शुरु होते ही चारों ओर आनन्द छा
जाता है। श्रीविष्णु आनन्द से गर्दन हिलाने लगते हैं और आनन्द के उस आवेग में शंकर तो ताण्डव नृत्य करने
लगते हैं। इस प्रकार हरिकीर्तन मन को अत्यन्त आनन्द प्रदान करता है। यह भक्ति का राजमार्ग है। इस मार्ग में
स्वयं चक्रपाणि सुरक्षा करता रहता है। वह चक्र लेकर उससे कहता है, "भक्त के स्थान पर तुम्हारी क्या
आवश्यकता है ? संसार में मेरा तो कोई शत्रु नहीं है लेकिन जो भक्तों से द्वेष करता है, उसका मैं अपने शस्त्र से
विनाश करता हूँ।" चक्र से अहंकार की लुगदी बना देता हूँ। गदा तो मोहमाया का विनाश करती है, शंख से
आत्मबोध को जागृत करता हूँ, और कमल से हमेशा अपने भक्तों की पूजा करता हूँ। जहाँ चक्रपाणी ही सुरक्षा
कर रहे हैं, वहाँ संसारभय की कथावार्ता भी नहीं सुनाई पड़ती। श्रीहरि स्वयं कीर्ति गाने वाले की सुरक्षा करते
रहते हैं। जो कथा श्रवण नहीं कर सकते हों, उन्हें 'राम, कृष्ण, गोविन्द' का नामस्मरण करना चाहिए। 'अच्युत'
नाम की महिमा ही कुछ ऐसी है कि उसकी गर्जना करने से कल्पांत में भी 'च्युति' अर्थात् अधोगति नहीं हो
सकती। इस नाम का जो नित्य स्मरण करते हैं वे सचमुच अच्युत के ही अवतार हैं। जिनकी वाणी रामकृष्णादि
नामों का अखण्ड जप करती है, गर्जना करती है, उनके चरणों को साक्षात तीर्थ दण्डवत करते हैं और बड़े-बड़े
देवतागण भी उनके चरण छूते हैं। नाम का तेज ही विलक्षण है। उसे लेने वाले की चरण रज यमराज भी अपने
मस्तक पर धारण करते हैं। नाम के पास चतुर्भुज श्रीकृष्ण सदासर्वदा खड़े रहते हैं। नाम के प्रभाव के सामने
संसारभय नगण्य है। नाम का सामना करने का साहस कलिकाल में भी नहीं है। नाम में जितनी शक्ति है उतना
पाप पूरे त्रैलोक्य में नहीं है। हे जनकराजा! चारों भक्तियाँ नाम के पास ही रहती हैं, यह ध्यान में रखो। नाम से
सुगम अन्य कोई साधन नहीं है। श्रीधर के नाम का, उसके जन्मों का तथा कर्मों का श्रवण करने से पापी का भी
उद्धार होता है। इसलिए शास्त्रों के पण्डित हरि की लीला कल्याणकारी है इस प्रकार वर्णन करते हैं। ऐसा
भक्तियोग जिनके अंतःकरण में रहता है, उनमें ज्ञान का अहंकार नहीं रहने पाता। अहंकार की ममता छोड़ वे
निःसंग होकर हरिकीर्तन करते रहते हैं। हरिकीर्ति का श्रवण और हरिनाम का स्मरण करने से सप्रेम भक्ति की
वृद्धि होती है और भक्त को देह का भान ही नहीं रहता। राजा! उस स्थिति का भी वर्णन करता हूँ।
४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः ।
हसत्यथो रोदिति रौति गायत्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥
हरिनाम का तथा गुण-कीर्तनों का वर्णन जागृति में तो उत्तम है ही, लेकिन जब स्वप्न में भी वही स्थिति
होती है तो यह समझना चाहिए कि हरिभक्ति मन में अच्छी तरह रच-बस गयी है। इस रीति से भक्तियुक्त
होकर, जिसका व्रत धीरे-धीरे दृढ़तर होता जाता है, वैसे-वैसे उसका चित्त अधिकाधिक द्रवित होकर हरिनाम
कीर्त्ति की प्रीति विचित्र ढंग से बढ़ने लगती है। परमप्रिय जो आत्मा है वही हरि है। उसकी नामकीर्तिका हर्ष
अपार, नित्य नयी चाह उभरे, इस योग से अंतर्बाह्य हरि ही प्रकट होता है। किसी संकट में माँ से बेटा बिछड़
जाता है और काफी अन्तराल के बाद दोनों की भेंट होती है उस समय लड़का फुक्का फाड़कर रोने लगता है
और माँ से लिपट जाता है। उसी प्रकार भक्ति मार्ग पर जब जीव की शिव से भेंट होती है और दोनों में
आत्मसाक्षात्कार का आलिंगन होता है उस समय अनिवार्य रूपसे रुदन शुरू हो जाता है। परमात्मा को आलिंगन
होता है, इसलिए जोर की सिसकियाँ आने लगती हैं और प्रेम से परिपूर्ण होने के कारण वह रोमांचित होकर
जोर-जोर से सिसकियाँ लेकर रोने लगता है। फिर दूसरे ही क्षण जोर-जोर से हँसने लगता है और कहता है,
अरे ! मैं तो मुझमें ही हूँ। गलती हो गयी, भेंट हुई यह कहना मेरा ही पागलपन था, यह सोच कर वह हँसने
लगता है। मैं तो स्वयं अखण्ड रूप से सर्वत्र व्याप्त हूँ, पूर्ण अभेद के कारण मैं अनादि जैसा था, वैसा ही हूँ।
उसी प्रकार मैं अव्यय होकर जनमा और मर गया इसका स्मरण होते ही वह गर्दन हिलाकर हँसने लगता है।
रस्सी को साँप समझ कर, घबरा कर भागते हुए लड़खड़ा कर गिर पड़ता है, तभी उस रस्सी को पहचान कर
अपने आप ही हँसने लगता है। उसी प्रकार संसार मिथ्या है तथा देहभाव पूरी तरह झूठा है, ऐसा होते हुए मैं
व्यर्थ की ममता और अहंभाव में था। धन्य है वह गुरुवचन जो मेरे लिए तारक बना। देह में होते हुए मैं विदेही
बना। मेरे चारों देह मिथ्या क्यों हो गये ? ऐसे अनुभवोद्गारों की गर्जना करने लगता है। वह कहता है, "धन्य है
वह भगवद्भक्ति। उसने चारों मुक्तियों को भी मिथ्या सिद्ध कर दिया। परमात्मा तो मैं ही हूँ यह निश्चित है।"
ऐसे उल्लासपूर्ण गर्जन से त्रिभुवन को निनादित कर देता है। धन्य है भगवान का नाम। उस नाम ने मुझे नित्य
निष्काम कर दिया। संसार भ्रम पूर्णतया मिथ्या सिद्ध हुआ। इस प्रकार जोर-जोर से गर्जना कर पुकारता है। अब
त्रिभुवन में अन्य कुछ भी नहीं है, जो कुछ भी दिखायी देता है, वह मैं ही हूँ, कहकर जोर की आवाज लगाता
है। जिसके कारण दुर्धर भवबन्ध नष्ट हो गया, उस सद्गुरु की स्तुति में ही, अपनी अलौकिक वाणी में गरजता
है। 'अरे ! यह संसार मिथ्या हो गया, जन्म-मरण का अभाव हो गया, कलिकाल का अस्तित्व ही समाप्त हो
गया' की रट लगाता है। इस प्रकार एक के बाद एक रट लगाने लगता है। उसी क्षण आत्म सुख का गीत गाता
है और स्वानन्द से डोलता रहता है। अपने प्रिय की मधुर कथा जब सुनाने लगता है तो उसका समाधान ही नहीं
होता, उसी प्रकार आत्मानुभव से जब हरिकथा गाने लगता है तो उसे संतोष ही नहीं होता। उसका गायन सुनते
समय ज्ञानी श्रोता सुस्वरूप होता है, मुमुक्षु को उसका गाना सुनकर प्रेम उमड़ आता है। इस प्रकार वह जब गाने
लगता है उस समय उसमें निजसुख का ज्वार उमड़ आता है और जब हर्ष पेट में नहीं समा पाता तो वह
अलौकिक भाव से नाचने लगता है। दूजेपन का काम छोड़कर लौकिक की लाज छोड़कर वह अहंभाव त्याग
कर सहज आनन्द से बड़े मजे से नाचता है। जो खरीद कर शराब पीता है, वह भी दारू की बेहोशी में गाता है
और नाचता है, फिर जिसने ब्रह्मानन्द रस का सेवन किया हो, वह होश में कैसे रह पायेगा ? इसलिए ब्रह्मानन्द
के उन्माद में लौकिक छोड़कर वह स्वयं नाचता-गाता रहता है। लोग उसे पागल कहते हैं। यह बात पण्डितों
की समझ में नहीं आती। राजा, उसे भगवान के सिवाए अन्य कोई लोकाचार दिखायी ही नहीं देता। उसके निज
बोध की कथा सुनाता हूँ। सुनो।
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन् ।
सरित्समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत्किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यः ॥ ४१ ॥
स्वानन्द के बोध से तथा ब्रह्मोन्माद के परमानन्द से वह जिधर भी कहीं देखता है, उधर उसे सारा चराचर
पूर्णानन्द से भरा हुआ और स्वानन्द से सराबोर दिखाई देता है। पृथ्वी, आप, तेज, वायु, आकाश ये सब उसे
हरिस्वरूप ही दिखाई देने लगते हैं। भूतों अथवा महाभूतों की प्रतिभा के अंकुर उसे अभिन्न, एकरूप ही दिखाई
देने लगते हैं। जिस प्रकार केले का पेड़ बिना खाद के ही फल और पत्तों के रूप में विकसित होता है, उसी
प्रकार हे राजा परीक्षित ! परब्रह्म भूत-भौतिकात्मक रूप में प्रकट होता है। अथवा स्फटिक गृह की दीवार पर
उकेरे गये हाथी, घोड़े आदि के चित्र भीतर के दीपक के कारण ही वैसे के वैसे दिखाई पड़ते हैं, उसी प्रकार
तेजःपुंज सूर्यचन्द्र आदि में चमकने वाला अग्नि तथा नक्षत्रों में दिखाई देने वाली चमक तथा प्राणियों की आँखों
में दिखाई देने वाला तेज यह सब आत्मज्योति के ही कारण तेजस्वी दिखाई देता है। आतिशबाजी का सामान,
जैसे गन्धक, कोयला आदि वस्तुओं को युक्ति से मिलाया जाए तो अग्नि फूलों की तरह दिखाई देता है। उसी
प्रकार परब्रह्म स्वलीला से सूर्यचन्द्राकार होकर विविध रूपों में परिभाषित होता है। पृथ्वी स्वयं गन्धरूप है,
लेकिन वह सुगन्ध कस्तूरी आदि पदार्थों में ही प्रकट होता है। उसी प्रकार भगवान की सत्ता सर्वत्र है लेकिन वह
सात्विक प्रवृत्ति के लोगों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसलिए सात्विक व्यक्ति में जो तत्त्व है, वह भगवत्तत्व
ही है, ऐसा समझ लो। सत्ववान लोगों को सत्व के ही कारण महत्त्व और हरिरूप से मान्यता प्राप्त होती है।
पृथ्वी के चारों ओर जल का आवरण है उसे 'चतुःसमुद्र' कहते हैं। उसी प्रकार दसों दिशाओं में होने वाला ईश्वर
का अंश ही 'दिशा' इस नाम से जाना जाता है। पूर्व-पश्चिम आदि जो प्रकार हैं वह दसदिशाओं के ही भाग हैं,
ईश्वर का ही अंग है। उस रूप में श्रीरंग ही मूर्तिमंत दिखाई देता है। घास, दूब, दर्भ, पेड़ आदि को देखकर वह
उन्हें श्रीहरि के केश ही कहता है। सबके शरीर में सम हरिरूप होते हुए भी, न पहचानने वाले के लिए वह सब
विषम ही दिखाई देता है। उँगलियाँ गिनने से वे अलग-अलग मालूम होती हैं लेकिन वे मूलतः हमारे शरीर के
एक ही अंग में चिपकी रहती हैं। इस प्रकार वन, बेलें, दर्भ, जंगल आदि को देखकर ये सब हरि का ही स्वरूप
है, ऐसा वह कहता है। यह सारा वह ऐक्य भाव से ही देखता है, उसमें उसे निराला अंश नहीं दिखाई देता। वह
कहता है, चाहे दूब हो, पेड़-पौधे हों या जंगल की लतर हों, यह अनन्त कोटि केशों की राशि श्रीहरि के ही
शरीर पर बढ़ी है, और उसे श्रीहरि के स्वरूप से शोभा आयी हुई है। वट की लटकने वाली जड़ें अलग-अलग
बढ़ती हैं, फिर भी वे वट के ही वृक्ष की होती हैं, वह अपने वटत्व से अलग नहीं हो जातीं। उसी प्रकार चैतन्य
से, नदियों के रूप में अनेक प्रवाह निकले हुए हैं, उसमें भी चैतन्य ही ओतप्रोत रहता है और वे चिद्रूप से ही
निरन्तर बहती रहती हैं। अथवा चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब का अमृत जिस प्रकार बिम्ब में बिम्बरूप होकर ही रहता है
उसी प्रकार भगवान में संसार का आभास होता है और वह भजन विश्वास से भगवद्रूप ही हो जाता है। उसी
प्रकार सृष्टि के अलग-अलग भाग देखते समय जिस प्रकार मन उल्लसित होता है, उसी प्रकार सारा संसार मानों
भगवान ही पूर्ण रूप से आभूषित हैं, ऐसा अनुभव उसे होने लगता है। इसलिए वह समस्त प्राणिमात्रों के हृदय में
इस प्रकार लीन हो जाता है मानो समुद्र के जल में नमक घुल-मिल गया है। उस अवस्था में वह चींटी को
४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
देखकर भी उसे हरिस्वरूप समझ कर प्रणाम करता है। यह तो कुछ भी नहीं, लेकिन किसी मक्खी को भी
भगवान का स्वरूप समझकर अनन्यभाव से शरणागत होकर दण्डवत करता है। गाय हो या गधा हो, चाण्डाल हो
या श्वान हो, लोक जिन्हें अत्यन्त निंद्य और कनिष्ट समझते हैं, उन्हें भी पूर्ण भगवद्रूप मानकर अनन्य भाव से
दण्डवत करता है। पाषाण को भी हरिरूप समझता है। तृण को भी भगवत्स्वरूप समझकर उसका वन्दन करता
है। स्थावरजंगमादिकों को भी चिदैक्य भाव से दण्डवत करता है। हरिनाम स्मरण की महिमा से इतना लाभ कैसे
होता है यह पूछोगे तो, ऐ राजा ! उसका मर्म सुनो। विधिपूर्वक पूजा, अथवा श्रवण, स्मरण, कीर्तन करते हुए
जिसकी सर्वकाल 'चिदैक्य भावना' रहती है, उसे ही 'पूर्णप्राप्ति' साध्य होती है।
भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र चैष त्रिक एककालः।
प्रपद्यमानस्य यथाश्नतः स्युस्तुष्टिः पुष्टिः क्षुदपायोऽनुघासम् ॥ ४२ ॥
हे चक्रवर्ती राजा जनक, सुनो ! जहाँ ऐसी भगवद्भक्ति रहती है, वहाँ गोवत्स न्याय के अनुसार विषय-
विरक्ति भी दौड़ कर आती है। जिस प्रकार जुड़वाँ फल एक दूसरे को नहीं छोड़ सकते उसी प्रकार भक्ति और
विरक्ति साथ-साथ ही उत्पन्न होती हैं और उनके सामर्थ्य से भक्त भी समर्थ हो जाते हैं। जहाँ भक्ति और विरक्ति
सहज स्थिति में एक साथ रह सकती हैं, वहीं पूर्ण-प्राप्ति भी सदा सर्वकाल दासी की तरह सेवा करती है। इस
प्रकार भगवद्भक्ति त्रिभुवन में अत्यन्त समर्थ है और भक्ति-विरक्ति की एकता के कारण भक्तों के घर प्राप्ति भी
रहने लगती है। अब भक्ति, विरक्ति और अनुभव प्राप्ति ये तीनों एक ही समय कैसे उत्पन्न होती हैं, वह स्थिति
भी तुम्हें विस्तार से बताता हूँ। जैसे-जैसे भगवद्भक्ति की जाती है, वैसे-वैसे विषयों के प्रति विरक्ति उत्पन्न होती
जाती है और उसी के अनुसार अनुभव स्थिति भी भक्तों को उसी समय प्राप्त होती है। भूखे व्यक्ति के सामने
षड्रसयुक्त भोजन की थाली रखने से उसे प्रत्येक ग्रास में पुष्टि, तुष्टि तथा क्षुधानाश का अनुभव होता है। जितना
ग्रास खाया जाए उतना ही क्षुधा का नाश होता है और जितना अधिक पेट भरता है उसी के अनुसार सुख और
समाधान भी उतना ही बढ़ता जाता है। पुष्टि, तुष्टि तथा क्षुधानाश ये तीनों चीजें जिस प्रकार भोजन करने वाले
को एक साथ प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार भगवद्भजन में भक्ति का त्रिकूट अर्थात् भक्ति, विरक्ति और अनुभव
प्राप्ति ये तीनों एक साथ उत्पन्न होती है। हे राजा ! सद्भाव से भगवद्भक्ति करने से भक्ति, विरक्ति तथा अनुभव
प्राप्ति ये तीनों एक साथ उत्पन्न होते हैं। हे राजा ! सद्भाव से भगवद्भक्ति करने से भक्ति, विरक्ति और
भगवत्प्राप्ति ये तीनों उपर्युक्त न्याय से एक ही समय प्राप्त होती है। भक्ति का अर्थ है समस्त प्राणियों के प्रति
सप्रेम भावना और प्राप्ति का अर्थ है अपरोक्ष साक्षात्कार, अर्थात् भगवद्रूप की तीव्र स्फूर्ति अब विरक्ति ऐसी जैसे
मेरी स्त्री, मेरा पुत्र, मेरी देह आदि जो ममत्व और अहंकार होता है, वह जहाँ समूल मिथ्या हो जाता है उसी का
नाम राजा विरक्ति है। इस प्रकार भजन से भक्ति, विरक्ति और भगवत्प्राप्ति ये तीनों ऐक्यभाव से सद्भक्त में भजन
दृष्टि के कारण एक ही समय उत्पन्न होती है। इसलिए राजा ! स्वहित के लिए हरि की भक्ति अवश्य करनी
चाहिए। वहाँ निश्चय ही भगवत्प्राप्ति होती है।
इत्यच्युताङ्घ्रिं भजतोऽनुवृत्त्या भक्तिर्विरक्तिर्भगवत्प्रबोधः।
भवन्ति वै भागवतस्य राजंस्ततः परां शान्तिमुपैति साक्षात् ॥ ४३ ॥
इस प्रकार जो सदा समस्त भूतों के प्रति अनन्य भक्ति करते हैं, वे भक्ति, विरक्ति और भगवत्प्राप्ति
अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं। हे राजा ! हरिभक्ति यह एक उत्तम अंजन है। सद्भक्त अपने नेत्रों में यह अंजन