श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करे, उसी प्रकार लोग अमूल्य मानव जीवन में विषयों में लिप्त रहते हैं। जैसे कोई चिन्तामणि देकर गन्धर्व नगर
अर्थात् आकाश में दिखाई देने वाले बादलों की आकृतियों का चयन करे उसी प्रकार वे मिथ्या विषय साधनों के
लिए नरदेह का सत्यानाश कर लेते हैं। जैसे कल्पतरु का बगीचा उजाड़ कर कोई उसे जंगल समझ कर दूर फेंक
दे और उसके स्थान पर भांग के पौधे लगा दे उसी प्रकार प्राणी नरदेह प्राप्त कर उसका विनाश कर लेते हैं।
शिश्नोदर के लिए सारा दिन प्रयास, नहीं तो उपहास, निंदा आदि हर रोज गृहस्थी की कचकच, वासनाओं की
तृप्ति के लिए प्रयास और यदि इतने पर भी समय बच जाय तो चौपड़ की बाजी बिछाना। हर तरह के हँसी-
मजाक, विषय वासनाओं की ही बकवास। ऐसे लोगों को राम का नाम लेते समय मुँह बन्द हो जाता है। जैसे
कामधेनु घर आने पर, उसे खिला नहीं सकते इसलिये उसे घर से निकाल देते हैं उसी प्रकार श्रीरामनाम का जप
न करने के कारण प्राणि नरदेह प्राप्त कर भी व्यर्थ चला जाता है। इस नरदेह का अहंकार किया जाय तो वह तो
क्षणभंगुर है। यहाँ तो भगवान से एकरूप हुए भक्तों का मिलना ही भाग्य की बात है। जिन्हें भगवद्भक्ति से प्रेम
रहता है उन पर भगवान का भी अत्यन्त प्रेम रहता है। ऐसे भगवद्भक्तों से साक्षात मिलन तभी होता है जब
अनेक कोटि पुण्य साथ में खड़े हों। जिसके प्रेम की लालसा के कारण ही भगवान ने अपना निजनिर्गुण रूप
त्याग कर जन्म लिया, जिनके प्रेम के कारण उस पद्मनाभ को दशावतार की शोभा प्राप्त हुई। ऐसे जो कृष्ण कृपा
के कारण उनके अत्यन्त चहेते बन गये, ऐसे लोगों की भेंट तभी होती है जब भाग्य का उदय होता है। शरीर
निष्काम हो, आत्मस्वरूप की ओर दृष्टि हो और कोटि-कोटि पुण्य राशि का साथ हो,तभी हरि के प्रियजनों से
भेंट होती है। एक समय बाघ और सिंह का दूध मिल जाएगा, चन्द्रामृत भी प्राप्त हो सकेगा किन्तु हरिप्रियों से
भेंट नहीं हो सकेगी। उसके लिए अत्यन्त दुर्लभ भाग्य की आवश्यकता होती है। बाघ और सिंह के दूध से मनुष्य
अत्यन्त शक्तिशाली और पुष्ट हो जाएगा लेकिन उस दूध से जन्म-मरण से छुटकारा नहीं प्राप्त होगा। कहते हैं
कि जो चन्द्रामृत का सेवन करता है वह निरोगी होता है लेकिन चन्द्र स्वयं ही मूलरूप से क्षयरोगी है उसका
अमृत दूसरे को कैसे निरोगी करेगा? बाघ और सिंह के दूध से यदि प्राणी अजर-अमर हो जाते तो फिर उसी दूध
से जिनकी उत्पत्ति होती है वे बाघ और सिंह क्यों मरते ? लेकिन जब हरिभक्तों की भेंट होती है, तब सांसारिक
संकटों की बाधा नहीं होती। जन्म-मरण का फेरा पूरी तरह समाप्त हो जाता है। सारांश यह कि उनसे भेंट होने
के लिए अत्यन्त भाग्य की आवश्यकता होती है। आज वह सारा भाग्य मेरे हिस्से में आया है क्योंकि मुझे आपके
दर्शन हुए। इसलिए 'आत्यंतिक क्षेम' का क्या अर्थ है, यह मुझे समझाइये।
अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघाः।
संसारेऽस्मिन् क्षणार्धोऽपि सत्सङ्गःशेवधिर्नृणाम्॥ ३०॥
आप निष्पाप और निर्मल हैं आपके दर्शन से कलिमल तत्काल नष्ट हो जाता है। आप स्वाभाविक रूप से
ही पवित्र हैं। गंगा में स्नान करने से वह सबको पवित्र कर देती है लेकिन वह गंगा भी अपना पातक नष्ट होने
के लिए आपके ही चरण स्पर्श की कामना करती है। आपके दर्शन का लाभ ही चित्स्वरूप गंगा है। संसार में
वह अत्यन्त समर्थ है। केवल दर्शन से ही संसार ताप को नष्ट कर डालता है। फिर जन्म-मरण का प्रश्न ही कहाँ
उठता है? आपके इस दर्शन के आगे गंगा की क्या बिसात है? उसके सामने तीर्थों की महिमा की कोई प्रतिष्ठा
नहीं है। तीर्थ भी भवदोष से लिप्त हैं। वह दोष आपकी दृष्टि से नष्ट होता है। ऐसी पवित्रता आप अपनी दृष्टि
से ही बढ़ाते हैं। मैं तो आज अत्यन्त पवित्र हो गया हूँ। क्योंकि आज आप दीन दयाल से मेरी भेंट हुई। ऐसी