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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 53, कुल 869 में से

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पृष्ठ 53

द्वितीय अध्याय ३७
निजसत्ता के वाहक बन जाते हैं तब भजनरूपी पालकी में शयन करने वाला भक्त यदि गिर पड़ता है तो स्वधर्म
कर्मों को ही दण्ड मिलता है। इस प्रकार भजन प्रताप के योग से स्वधर्म कर्मों को भी दण्ड दिया जा सकता है।
वर्णाश्रम का अस्तित्व मिटा कर कर्मों का भी विनाश किया जा सकता है। सारांश यह कि जो भागवत धर्म का
सेवन करने वाले हैं उनके स्वधर्म कर्म तुच्छ सेवक हैं। जिनमें भक्तों के सामने खड़े रहने का भी साहस नहीं है
वे भक्तों के लिए बांधक कैसे हो सकते हैं? भागवत धर्म कैसा है? भगवान के प्रति कर्म कैसे अर्पण होता है?
हे राजन! यह अत्यन्त गोपनीय निजभजन कर्म तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वाऽनुसृतः स्वभावात्।
करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत्॥ ३६॥
सोद्देश्य हो या निरुद्देश्य हो, वैदिक हो लौकिक हो या स्वाभाविक हो, ये सारे कर्म भगवान के प्रति अर्पण
करना, इसी को 'भागवत धर्म' कहते हैं, इसे ध्यान में रखो। पानी की तरंग अत्यन्त चंचल होती है, लेकिन वह
जहाँ भी कहीं जाती है, वह जल में ही मिलती है। उसी प्रकार भक्त के सारे कर्म तत्काल भगवान के ही चरणों
में अर्पित होते हैं अर्थात् भगवद्रूप ही हो जाते हैं। इस श्लोक में पहले मानसिक कर्मों के अर्पण के बारे में
बतलाया गया है तथा बाद में इन्द्रिय, बुद्धि, अहंकार आदि के कर्मों का तथा अन्त में कायिक कर्मों का अर्पण
बताया गया है। भागवत धर्म की वास्तविक स्थिति अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि इन्द्रिय वृत्तियाँ हैं
तथा उन्हें भगवान के प्रति अर्पण करना है। यह कैसे किया जाता है सुनो। हे राजा! भक्त को स्वधर्म कर्म की
बाधा क्यों नहीं होती इसका रहस्य बताता हूँ। अति निस्सीम आत्मबोध से मन में ही पुरुषोत्तम प्रकट होते हैं
जिससे संकल्प विकल्प भगवद्रूप हो जाते हैं जिसके कारण भक्त निष्पाप ही रहते हैं। वे हरी की तरह
सत्यसंकल्पी होते हैं। जिस प्रकार शतरंज के खेल में राजा, प्रधान, हाथी, पैदल ये सब रहते हैं लेकिन वे सब
केवल लकड़ी के टुकड़े होते हैं, इसलिए भगवान के भक्त के संकल्प भगवद्रूप ही हो जाते हैं। उसका संकल्प
जिस विषय की अभिलाषा करता है वह विषय आत्माराममय ही हो जाता है जिससे भजन का उल्हास अपने
आप ही बढ़ जाता है। जागृति, स्वप्न, सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में भजन होने लगता है और शरीर में
आत्मबोध पूरी तरह भर जाने के कारण अनुसंधान अखण्ड रहता है। जब मन को समाधान प्राप्त होता है तो
उससे भजन भी बढ़ जाता है। अनुसंधान पूरी तरह बढ़ने के कारण ध्येय, ध्याता और ध्यान एकरूप होकर भजन
चलता रहता है। भक्त, तुर्या, साक्षी और उन्मनी को भी भगवद्भजन में लगाते हैं। इस प्रकार भावना के बिना ही
जो भाव उत्पन्न होता है वह तत्काल भगवान स्वरूप ही हो जाता है। फिर अर्पण का आश्चर्यभाव किसलिए?
अर्पण किये बिना ही वह अपने आप भगवदर्पण होता है। स्वरूपानुभव से स्वप्न मिथ्या हो जाता है, जागृति
छील कर ज्ञान बाहर निकालती है, सुषुप्ति का सुखसमाधान छाँट कर पूरी तरह एकत्रित करने से स्वयं मन ही
आत्मार्पण करता है। ऐसी स्थिति का सुखसमाधान ज्ञानी भक्त ही जानते हैं। इस प्रकार मानसिक व्यापार स्वरूप
में सहज ही अर्पण हो जाता है यह जान लो। घर में जब दीपक जलाया जाता है तो उसी का प्रकाश खिड़कियों
से बाहर आता है। उसी प्रकार मन में श्रीहरि प्रकट होने पर वही इन्द्रियों में भजनानन्द के रूप में प्रकट होता है।
इन्द्रियों का वही व्यापार विस्तारपूर्वक बताता हूँ। इन्द्रिय व्यापार भी परब्रह्मस्वरूप में भजनरूप हो जाते हैं। दृष्टि
जब दृश्य वस्तु को देखती है, उस समय उसे उसमें भगवान ही दिखाई देता है। इस प्रकार भजन सत्ता से
दृश्यदर्शन के साथ दृष्टि का विषय भी भगवान को अर्पित हो जाता है। दृश्य को दृश्य रूप में जो शक्ति प्रकट