श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० श्रीमद् एकनाथी भागवत
होकर पूर्णाहूति का समय आ ही रहा था कि तभी ये नौ पुरुष (आर्षभयोगी) तेज से देदीप्यमान होकर वहाँ आते
दिखाई पड़े।
तान् दृष्ट्वा सूर्यसंकाशान्महाभागवतान् नृप।
यजमानोऽग्नयो विप्राः सर्व एवोपतिष्ठिरे ॥ २५ ॥
जिसके अंगूठे के नाखून के तेज के सामने करोड़ों सूर्यों का तेज लुप्त हो जाता है, उस भगवान को
जिन्होंने अपने हृदय में सुरक्षित कर लिया है उनके अलौकिक तेज का क्या वर्णन किया जाय ? उनकी देहकांति
के सामने सूर्य का तेज भी निष्प्रभ हो जाता था। अपने शरीर की कान्ति से प्रभा को ही शोभायमान करने वाले वे
नौ पुरुष मानों साकार चैतन्य का सार ही थे। इन नौ पुरुषों को भगवद्भाव का वैभव, भगवान का गौरव अथवा
नवविधा भक्ति की साकार मूर्त्तियाँ कहना ही उचित होगा। मानों वे नौ पुरुष नवखण्ड पृथ्वी के अलंकार,
नवनिधि का सार अथवा नवरत्नों का निज भण्डार ही साकाररूप लेकर आये थे। अथवा नौ नारायण वहाँ
स्वयमेव प्रकट हो गये थे अथवा नौ नृसिंह ही देदीप्यमान रूप लेकर वहाँ आ गये थे। उन यज्ञकुण्डों में
दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि तथा आहवनीयाग्नि इन तीन अग्नियों का आवाहन हुआ था। वे इन्हें देखकर उठ कर
खड़े हो गये। उन्हें केवल इन नौ भागवतों ने ही देखा अन्य लोग उन अग्निदेवताओं को नहीं देख पाये। ऐसी उन
तेजःपुंज मूर्तियों को देखकर ऋत्विज और आचार्य उठ कर खड़े हो गये। राजा जनक तो दौड़ कर ही उनकी
अगवानी में आये और उन्होंने उनका स्वागत किया। उन्होंने दौड़कर ही उन्हें दण्डवत् किया और मुकुट उतार
कर मस्तक से चरणों का वन्दन कर अत्यन्त सत्कारपूर्वक उन्हें यज्ञमण्डप में ले आये।
विदेहस्तानभिप्रेत्य नारायणपरायणान्।
प्रीतः संपूजयाञ्चक्रे आसनस्थान् यथार्हतः ॥ २६ ॥
अतिथि भागवत परायण थे यह जानकर जनक को अत्यन्त आनन्द हुआ और उसने स्वयं उनकी पूजा
करने की तैयारी शुरू की। उन्होंने परम श्रद्धा से उनके चरण धोये, फिर धूप, दीप, चन्दन, पुष्प आदि साहित्य से
मधुपर्क विधान से उनकी यथायोग्य पूजा की।
तारोचमानान्स्वरुचा ब्रह्मपुत्रोपमान्नव।
पप्रच्छ परमप्रीतः प्रश्रयावनतो नृपः ॥ २७॥
अपने अंगों की निज प्रभा से उनके शरीर की शोभा बढ़ रही थी। उनका शरीर विचित्र तेज से शोभायमान
ब्रह्मविद्या का गाभा थी। मानों उनके शरीर का ब्रह्मज्ञान परिपक्व होकर प्रकाशमान हो गया था और उनके शरीर
का भूषण था। अन्य भूषण उन्हें अनावश्यक थे। मुकुट, कुण्डल, सुवर्ण के कड़े ये आभूषण मूर्खों के शरीर पर
कितने भी क्यों न हों लेकिन उन अलंकारों की शोभा उन पर विलुप्त हो जाती है और उनके अन्दर की मूर्खता ही
बाहर प्रकट होती है। यह ज्ञानधन वैसा नहीं था। पूर्ण ब्रह्मत्व से ही वह सुशोभित होता था। वही उनके शरीर का
भूषण था। अन्य भूषण वे नहीं धारण करते थे। वे ब्रह्मानुभव से पूर्ण होते थे और वही अनुभव उनके इन्द्रियों के
द्वारा भी प्रस्फुटित होता था। पूर्णानुभव से आने वाली शान्ति ही उनका भूषण था। उसके आगे मुकुट और कंगन
तुच्छ होते थे। पहले सनकादिकों का वर्णन किया है। ये उनकी ही योग्यता के थे या अधिक थे, यह पूछें तो
उनमें और इनमें कोई भेद नहीं ऐसा समझना चाहिए। उनकी और इनकी गति एक थी, उनकी और इनकी स्थिति