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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 869 में से

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पृष्ठ 52

३६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
है। भक्तिभाव से इस नौका को खेने से कर्माकर्म रूपी क्रूर जल को काट कर आत्मबोध के प्रवाह की दशा से
वह एक ही समय उस किनारे तक पहुँचाती है। वैराग्य के नाविक चारों ओर अटल बैठे रहने के कारण वे
विषयों की चट्टानों से बचाते हुए सुगमता से किनारे तक पहुँचाते हैं। संचित क्रियमाण की लहरों को काट कर
सही रास्ते पर लगाते हैं और भाग्य का संचय समाप्त कर आत्मस्वरूप के तट पर पहुँचाते हैं। इसमें यदि कुछ
न्यूनाधिक हो जाए तो गुरुवचन के अनुसार सँभाल कर भूतदया की डोर से आत्मविश्वास के साथ खींचते हैं।
तब बड़ी शीघ्रता से वह नौका परात्पर तट पर जा लगती है। सबको एकाएक परतीर पर उतारते हैं और फिर
आत्मसाक्षात्कार हो जाने के कारण पुनरावृत्ति रुक जाती है और आवागमन नहीं करना पड़ता। एक भक्तिभाव
होने से, फिर जिसे 'डूबना' कहते हैं, वह मिथ्या हो जाता है। फिर जहाँ पहुँचना चाहता है, वह स्थान वह
स्वयं हो जाता है। यहाँ बिना पहुँचे ही तर जाना है और बिना प्रयास के ही प्राप्ति होनी है। अर्थात् सहज उपाय
से ब्रह्म की प्राप्ति हो, इसलिए नारायण ने भक्ति प्रकट की है। भागवत धर्म की स्थिति ही कुछ ऐसी है कि
सीधे-सादे लोग भी संसार सागर को पार कर जाते हैं। सुलभ रीति से किस प्रकार ब्रह्मप्राप्ति होती है, वही अब
श्लोकार्थ में स्पष्ट रूप से बताते हैं।
यानास्थाय नरो राजन्न प्रमाद्येत कर्हिचित्।
धावन्निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पते दिह ॥ ३५ ॥
जिसे श्रुति-स्मृति की समझ नहीं है, लेकिन केवल भक्तिभाव से भगवन्मार्ग अर्थात् भागवत धर्म का
अनुसरण करता है, उसे विधि निषेध की बाधा नहीं होती और उससे स्वप्न में भी गलती नहीं होती। सप्रेम
सद्भाव से यदि भागवत धर्म का आचरण करें तो कर्माकर्म की बाधा नहीं होती। उसकी भक्ति से ही पुरुषोत्तम
सदा सन्तुष्ट रहता है। श्रुति और स्मृति ये दो आँखें हैं। इनके बिना जो अन्धे हैं, वे भी भक्ति के बल के कारण
हरिभजन में दौड़ते समय गिरते या लड़खड़ाते नहीं हैं। हे राजा! ध्यान में रखो कि प्रेम के बिना श्रुति स्मृति का
ज्ञान, प्रेम के बिना ध्यान पूजा, प्रेम के बिना श्रवण-कीर्तन यह सब व्यर्थ है। माँ को देखते ही शिशु आँखें बन्द
कर ही उसकी ओर झपटता है, लेकिन उसके साथ माँ भी उतने ही प्रेम से उसकी ओर झपटती है और शिशु को
थाम लेती है। उसी प्रकार जो भक्त भगवान को प्रेमपूर्वक भजता है, उसके उस भजन के साथ ही भगवान भी
आनन्दपूर्वक चलने लगता है और पग-पग पर उसे सँभालता है। इस प्रकार भागवत धर्म का आचरण करते
समय उसे कर्माकर्म की बाधा नहीं हो सकती। क्योंकि जिसने कर्म में आज्ञा और नियम बनाये हैं वह पुरुषोत्तम
ही उसके भजन में उपस्थित रहता है। इस प्रकार स्वानंदकंद गोविन्द जहाँ भागवत धर्म से सन्तुष्ट होकर विचरण
करता रहता है वहाँ विधि-निषेधों का प्रवेश कैसे हो सकता है? उसके भक्त को कभी भी प्रमाद की बाधा नहीं
होती। जिस प्रकार पहरेदार मालिक के लड़के को नहीं रोक सकता उसी प्रकार जो भागवत धर्म से भजन करने
वाला है उसे कर्म की रुकावट बाधक नहीं होती। जिसे भगवद्भजन में विश्वास है, उसके तो विधिनिषेध दास
ही बन जाते हैं। उसका भजन विलास देखकर स्वयं जगन्निवास परम सन्तुष्ट होते हैं। भागवत धर्म से कर्म जैसे-
जैसे छूटते जाते हैं, वैसे-वैसे पुरुषोत्तम सन्तुष्ट ही होता है। लोगों को व्यर्थ ही भ्रान्ति है कि भक्तों को कर्म की
बाधा होती है। कर्म यदि भक्त से प्रमाद कराता है तो उसी प्रमाद में भगवान प्रकट हो जाते हैं। इसलिए हरिभक्तों
को कर्म का विधि निषेध बाधक नहीं होता। अजामिल को उसका कर्म 'बाधक हुआ था, वह यमपाश में बँध
गया, इतने में केवल नाम लेने से भगवान वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने उसे पावन किया। स्वधर्म कर्म जब