श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहत्ता स्वयं मैं भी नहीं जानता। इस प्रकार अनेक विचारों के अभिमान से वह भगवद्भजन करता है और 'अहं
ब्रह्मास्मि' अर्थात् मैं ब्रह्म हूँ इस दृढ़ भावना से स्वयं अपने जीव को ही पूर्णत्व से समर्पण करता है। पूर्णत्व में
डालकर अभिमान जो भी कल्पना करता है वह सब वह स्वयं ही हो जाता है और वह पूर्णत्व भी अपने मूल के
पूर्णत्व में अर्पण करता है। 'ब्रह्माहमस्मि' जो वचन है, उस अहंता को भगवद्भजन कहते हैं। लेकिन यह तो तद्रूप
हो कर और अभिमान ब्रह्मार्पण करके ही भजन करने लगता है। देहबुद्धि का कचरा झाड़ कर ऐसे भजन से जो
अहंकार उत्पन्न होता है वही अपरोक्ष आत्मस्वरूप का साक्षात्कार है। इस प्रकार पूरी तरह निश्चिंत होकर वह
पूर्णत्व से विचरण करने लगता है। इसलिए मनन का मनन मैं ही हूँ, चित्त को चिन्तन धर्म के बिना जो
आत्मचिन्तन होता है, वह मैं ही हूँ। जिसकी सहज प्राप्ति नहीं होती उसका निजचित्त को चिन्तन करना चाहिए।
इस प्रकार जब चित्त स्वानुभव से भजने लगता है तो जो अप्राप्य सा लगता है उसकी भी प्राप्ति हो जाती है।
इसलिए चित्त निश्चय करके जो भी चिन्तन करता है, वह सब वह स्वयं ही बन जाता है। इस साक्षात्कार से
चित्त निजबोध से युक्त होकर भजने लगता है। जो अस्तित्व में नहीं है उसकी चिन्ता करना 'अतिचिंता' है और
जो अस्तित्व में है, उसकी चिन्ता करना 'निश्चितता' है। इन दोनों का चिन्तन छोड़ देने से न भजते ही भजन हो
जाता है। चित्त, चिन्त्य और चिन्तन इन तीनों का समाधान होने पर, वह समाधान भी पूर्णतः सहज ही
कृष्णार्पण हो जाता है। ऐसी भगवद्भजनों की विधि से बुद्धि भजनशील होने पर सकल कर्मों में भी सहज ही
समाधि प्राप्त होती है। कुछ लोग कहते हैं कि 'कर्माचरण में समाधि कभी सम्भव नहीं होती। तो हे राजा जनक,
समझ लो कि उन्हें आत्मस्वरूप का बोध हुआ ही नहीं है। जो 'तटस्थ' भाव को ही समाधि कहते हैं, उसकी
बुद्धि काम नहीं कर रही है, ऐसा समझना चाहिए क्योंकि वह वास्तविक 'समाधि' न होकर केवल 'मूर्च्छा' है।
जो तटस्थता से जागृत होता है वह समाधि भी खो देता है। अर्थात् यह बात एकतरफा है। मतिमंद लोग भी इस
बात को स्वीकार नहीं करेंगे। 'समाधि' और वह भी एकतरफा यह कहना भी लज्जास्पद है। ऐसा होते हुए भी
जो इसे सच मानेंगे, उसमें केवल शब्द पाण्डित्य ही होगा। उन्हें शुद्ध स्वरूप की पहचान नहीं है, यही कहना
होगा। यहाँ प्रारब्ध अत्यन्त समर्थ होने के कारण वह मूर्च्छा लाकर निश्चेष्ट करता है। सच पूछा जाय तो चलते-
फिरते समाधिस्थ वसिष्ठादिक ऋषि हैं। देवर्षि नारद को ही देखिये। उनके विनोद कर्म से भी कभी समाधि भंग
नहीं होती। याज्ञवल्क्य के समाधि के सम्बन्ध में तो प्रसिद्ध ऋषियों ने परीक्षा भी ली है। स्वरूप देखकर जो
मूर्च्छित होता है वह स्वयं तरता है किन्तु स्वयं तरकर दूसरों को भी तारने का ज्ञान शुकवामदेव आदि ने ही प्रकट
किया है। इसलिए समाधि और व्युत्थान इन दोनों ही अवस्थाओं में बुद्धि ब्रह्मार्पण होती है, वही अखण्ड और
परिपूर्ण समाधि है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मसमाधि देकर शीघ्र ही घनघोर युद्ध में झोंक दिया किन्तु उस
करुणानिधि श्रीकृष्ण ने उसे तटस्थता का स्पर्श भी नहीं होने दिया। समस्त प्रकार के कर्मों में भी समाधि होनी
चाहिए यह ज्ञान बुद्धि को केवल सद्गुरु ही देते हैं, इसलिए युद्ध जैसे 'घोर' कर्म में भी समाधि का भंग नहीं
होता। बुद्धि द्वारा परब्रह्म का आकलन करने पर कोई भी कर्म अहेतुक ही चलता है, यही बुद्धि का सच्चा अर्पण
है। अन्य जो आनुमानिक ज्ञान है, वह भ्रम है। स्वरूप में असीमित तन्मय दृष्टि तथा कभी न टूटने वाली
समबुद्धि जिसकी रहती है उसे कर्म करते समय भी अज्ञान की बाधा नहीं होती। ऐसी ही स्थिति का नाम
'परम-समाधि' है। देहबुद्धि पूरी तरह समाप्त होने पर स्वस्वरूपानुभव से अहंकार की बाधा नहीं होती।
सदासर्वदा स्वस्वरूप में बुद्धि भजनशील होने पर वह किसी भी कर्म में स्वयं ही श्रीकृष्णार्पण होती है। मन की
छटपटाहट बिलकुल शान्त होती है, उसी का नाम है 'परमसमाधि'। 'देहबुद्धि' का त्याग किये बिना प्राणवायु