श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय ४१
को बन्द कर समाधि लगाना यह काष्ठ की तरह जड़ अर्थात् मूर्च्छावस्था जैसी ही स्थिति है, ऐसा समझना
चाहिए। अब 'कायिक' कर्म का लक्षण बताते हैं। जिसकी मन को जानकारी नहीं होती लेकिन इन्द्रियों का
व्यापार चलता रहता है, ऐसा जो कर्म होता रहता है, उसे सहज ही 'कायिक' अर्थात् केवल काया का कर्म
समझना चाहिए। श्वासोच्छ्वास अथवा आँखों का खुलना बन्द होना भी नारायण के ही लिए होता है। घर, शरीर
तथा वर्णाश्रम धर्म के अनुसार उसके हिस्से में जो भी कर्म आते हैं, उन उन कर्मों को वह कर्तव्य बुद्धि से
अभिमान रहित होकर करता रहता है। यदि चीनी का बड़ा सा कैरैला बनाया जाय तो उसका डंठल तथा काँटे
भी मीठे ही होंगे। उसी प्रकार समस्त इन्द्रियों का कर्म ब्रह्मार्पण के योग से ब्रह्म में मधुर अर्थात् ब्रह्मरूप हो
जाता है। वह पूरे कर्मसमूह का विधिपूर्वक निर्वाह कर उसका गौरव बढ़ाता है। लेकिन मन में कर्तापन का भाव
नहीं रखता। मैंने सत्कर्म का पालन किया, मेरा आचरण अत्यन्त उत्तम था, मैंने जन्ममरण को समाप्त किया, यह
स्वाभाविक देहभाव उसमें उत्पन्न ही नहीं होता। वह देह के साथ विचरण अवश्य करता है, लेकिन देहधर्म को
धारण नहीं करता। उसे ज्ञान का अहंकार नहीं होता, इसलिए सहजभजन में वह अहंकार रहित होकर ही
विचरण करता रहता है। उससे जो कुछ भी उत्पन्न होता है वह सब मेरा मधुर खाद्य है, ऐसा भगवान कहते हैं।
इस प्रकार ब्रह्मार्पणत्व के कारण ऐसे भक्त के सारे स्वभाव अर्पण नहीं करने होते बल्कि सहज ही अर्पण हो जाते
हैं। पारस की कसौटी पर जो भी सोना चढ़ता है वह अत्यन्त शुद्ध सोना ही बनता है उसी प्रकार उसके शरीर से
जो भी कर्म होता है वह सच्चा परब्रह्म होता है। उसका खेल ही उसकी महापूजा है, उसका बड़बड़ाना ही
महास्तुति है, इस प्रकार उसके स्वाभाविक कर्म से स्वानंदपूर्ण श्रीनारायण सुखी होता है। जिस राह की ओर वह
देखता है उसी राह पर भगवान प्रसन्नतापूर्वक खड़े हो जाते हैं। फिर वह देखे या न देखे, उसे स्वाभाविक रूप से
भगवान ही दिखाई देता है। वह जिस मार्ग पर चलता है, वह मार्ग ही स्वयं श्रीरंग बन जाता है। अर्थात् वह
भगवान के पेट पर मस्ती से चलता है। उससे स्वाभाविक रूप से जो कर्म होता है, वह अहेतुक ब्रह्मार्पण ही
होता है। इसी का नाम है निर्दोष 'भजन' और यही है शुद्ध भागवत धर्म। स्वाभाविक रूप से.जो व्यवहार होता है
वह ब्रह्मार्पण ही होता है। इसी का नाम है शुद्ध 'आराधन'। हे राजा जनक ! पूर्ण 'भागवत धर्म' जिसे कहा जाता
है, समझ लो कि वह यही है। इस प्रकार के भगवद्भजन मार्ग पर किसी बात का भय नहीं है। हे नृपनाथ ! तुमने
'अभय' के सम्बन्ध में पूछा था। वह इस भजन से ही निश्चित रूप से प्राप्त होता है। राजा ! इसमें भय का
कारण क्या है, यह अगर पूछते हो तो वह भी बताता हूँ। हे श्रवणसौभाग्यनिधे ! सावधान होकर सुनो।
भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यादीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः ।
तन्माययाऽतो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ॥ ३७॥
आत्मा पूर्ण रूप से सर्वत्र एक ही है। फिर भी 'उससे मैं भिन्न हूँ' यह कहना ही भयजनक अज्ञान है।
उसमें भेद-भाव उत्पन्न होने के कारण वह अत्यन्त दुःखदायी होता है। यदि दृढ़ अज्ञान ही भय का मूल कारण है
और ज्ञान ही उस अज्ञान का निवर्त्तक है तो फिर वहाँ भगवद्भजन कहाँ से आये ? पण्डितों को ऐसा ज्ञानाभिमान
होता है। इसलिए हे राजा ! तुम्हें जो कहता हूँ वह सुनो। हमारा दृढ़ विश्वास है कि ज्ञान का मुख्य कारण भक्ति
है। 'माया' ही अज्ञान का मूल कारण है। ब्रह्मादिक भी उसे नहीं सँभाल पाते। वह त्रिगुणात्मक है तथा प्राणियों
के पीछे लगी हुई है और वह अत्यन्त दुस्तर है यह जान लो। स्वस्वरूप को आवृत करना यही उस माया का
प्रमुख लक्षण है। द्वैत का उभरना ही 'मूल माया' है। ब्रह्म अद्वैत से परिपूर्ण है। हे राजा ! उस अद्वैतरूप में 'मैं'
का जो भाव उत्पन्न होता है वही वास्तव में माया का जन्मस्थान है यह जान लो। उस माया के पेट में भय, शोक