श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयं अध्याय ३१
एक थी और उनकी और इनकी शान्ति भी एक जैसी ही थी, वास्तव में उनमें भेद कुछ भी नहीं था। उनकी ही
तरह ये भी सगे भाई थे, उनकी ही तरह बोध इनका भी था, चाल-चलन, ढंग, व्यवहार उनके ही जैसा था,
अन्तर कुछ भी नहीं। वे चार और ये नौ लेकिन सबका ब्रह्मज्ञान एक जैसा, उनकी और इनकी शान्ति एक जैसी।
ये बातें जनक ने जान लीं। उनकी यह परिपूर्ण स्थिति देखकर राजा को बड़ा संतोष प्राप्त हुआ और उन्होंने
अत्यन्त विनम्र होकर मृदु-मंजुल वाणी से उनकी विनती की।
विदेह उवाच
मन्ये भगवतः साक्षात् पार्षदान्वो मधुद्विषः।
विष्णोर्भूतानि लोकानां पावनाय चरन्ति हि॥ २८॥
सार्वभौम चक्रवर्ती होते हुएं भी विदेह ऐसा राजा जनक उन ऋषभपुत्रों से अत्यन्त प्रेम से विनती करने
लगा। उनसे भेंट होते ही राजा जनक को असीम आनन्द हुआ और उस सुख संतोष के आवेग में उसने उनसे
प्रेमपूर्वक विनती की। उसने कहा—आप का सामर्थ्य देखा जाय तो आप ईश्वरस्वरूप हैं, देहभाव से देखा जाय
तो भगवान के भक्त हैं, मानों आप श्रीहरी के पार्षद हैं। देवता स्वयं अपना ही भक्त है ऐसा जो ध्वनितार्थ
उपनिषद में है, उसका प्रत्यक्ष अनुभव आप में हो रहा है। "शिव होकर ही शिव की पूजा करनी चाहिए"—
("शिवो भूत्वा शिवं यजेत") यह उपनिषद रहस्य आप में ही शोभा दे रहा है। अन्य लोग केवल मुँह से इन
बातों का उच्चार करें। लेकिन उस बात का कोई अर्थ नहीं दिखाई देता। श्रीविष्णु संसार में जो भी कुछ उत्पन्न
करते हैं, वह सब पवित्र करने के लिए, केवल दीन-दुखियों का उद्धार करने के लिए। इसीलिए आप कृपापूर्वक
पृथ्वी पर संचार करते रहते हैं। आप संसार के कल्याण के लिए ही विचरण करते रहते हैं, किन्तु जब भाग्योदय
होता है तभी आप से भेंट होती है। आज मुझे आपकी सेवा का लाभ मिला इसका अर्थ मैं सचमुच ही बड़ा
भाग्यवांन हूँ। धन्य है मेरा भाग्य और धन्य है मेरा वैभव। आज आपके चरणों का अपूर्व लाभ होने से मैं सचमुच
ही धन्य हो गया हूँ।
दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः।
तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्॥ २९॥
सभी प्रकार के देहों में नरदेह अत्यन्त दुर्लभ है। उसकी प्राप्ति अत्यन्त दुर्लभ है। जब पाप और पुण्य
समान रहता है तभी यह कर्मभूमि अर्थात् यह नरदेह प्राप्त होता है। पुण्य और पाप की मात्रा यदि कम अथवा
अधिक हो तो उसे स्वर्ग या नरक प्राप्त होता है। कर्म समान होने पर नरदेह प्राप्त होता है। किन्तु सभी की बुद्धि
एक जैसी नहीं होती, उस समता में भी गाढी विषमता कैसे हो जाती है वह बताता हूँ। पाप का एक बहुत बड़ा
हिस्सा एक पलड़े में रखें और दूसरे पलड़े में पुण्य डालें और दोनों का भार यदि समान भी हो तो भी उस जन्म
में उस व्यक्ति में पापबुद्धि ही होगी। जिस प्रकार बालू और सुवर्ण तौल में यदि समान भी हो तो उस स्वर्ण को
खरीदने के लिए लोग धन खर्च करते हैं और बालू कोई मुफ्त में भी नहीं लेता। उसी प्रकार किसी का पुण्य बहुत
बड़ा होता है और उसकी बराबरी में दूसरे पलड़े में छोटे-छोटे पाप डाले जाते हैं और उनका भार समान हो जाता
है। ऐसा कर्म लेकर जो जन्म लेते हैं उनका प्रेम पुण्य के प्रति अधिक रहता है। पुण्य ओर पाप जब पूरी तरह
नष्ट हो जाते हैं तभी नित्यमुक्ति प्राप्त होती है। मनुष्य देह की प्राप्ति भी महान संकट है। वहाँ कनक-कांता रूपी
विषय का अभिमान उत्पन्न होता है। जिस प्रकार प्यासा अपनी प्यास बुझाने के लिए अमृत देकर मद्यरस पीए