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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 869 में से

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पृष्ठ 55

द्वितीय अध्याय
३९

है। चरणों को चलने के लिए जो गति देता है, वही पृथ्वी की धारणा शक्ति है ऐसी युक्ति धारण कर चलने से,
चलने का वह कर्म ब्रह्मस्थिति को पहुँच जाता है। अभी तक ज्ञानेन्द्रियों में से श्रोतेन्द्रियों के सम्बन्ध में बतलाया,
अब कर्मेन्द्रियों में से वागिन्द्रिय के सम्बन्ध में सुनिये। बोल और बुलवाने वाले की भेंट बोलने में होती है। उसे
देखकर बोल लज्जा करता है। उसे दूर कर ही बोलना प्रकट होता है इसलिए ब्रह्मार्पण के साथ निजभजन बढ़ता
रहता है। निःशब्द में शब्द का विलय होता है निःशब्द बात ही शब्दों से कही जाती है। अर्पणकर्ता के साथ
वास्तविक अर्पण विधि इसे ही समझो। बोल बुलाने वाला बोल के भीतर ही है यह मान लेने पर वह बोल
कृष्णार्पण ही हो जाते हैं। इस प्रकार शब्द रूप से ही भजन होकर ब्रह्मार्पण के साथ परमार्थ प्रकट होता है। अब
अभिमान का अर्पण बताते हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है, मन से कर्म से और वचन से जो भगवद्भजन में दृढ़
होता है वही उस भजन को अभिमान के साथ दृढ़तर थाम कर रहता है। समुद्र के भीतर रहने वाली लहर कहती
है कि वास्तव में देखा जाए तो जगत को शान्त करने वाला और पोसने वाला तथा चातक की तृष्णा को हरण
करने वाला जो मेघ है उसकी उत्पत्ति मुझ से ही है। मेरे ही कारण फसल पकती है, मेरे ही कारण नदियाँ जल
से भरकर बहती हैं और फिर समुद्र में मिल कर मुझसे ही मिल जाती हैं। इस न्याय के अनुसार भगवद्भक्त मूल
का पूर्णत्व पाकर उस पूर्णत्व के अभिमान से भजने लगता है। उस भजन का लक्षण ध्यान देकर सुनो। वह
कहता है कि त्रिभुवन का कर्ता मैं हूँ, कर्म करके अकर्ता तथा सभी प्रकार के भोग भोगकर नित्य अभोक्ता रहने
वाला भी मैं हूँ, सभी लोकों में मेरी ही सत्ता है, सभी में सब का नियंता भी मैं ही हूँ, सब को सभी प्रकार से
प्रकाशित करने वाला भी मैं ही हूँ, उसी प्रकार सबका रास्ता भी मैं ही हूँ। सकल प्राणियों में मैं ही एकमेव हूँ,
व्याप्य और व्यापक मैं ही हूँ, उत्पन्न होने वाला और उत्पन्न करने वाला मैं ही हूँ। एकता भंग किये बिना जगद्रूप
होनेवाला मैं ही हूँ। देवों का आदिदेव मैं हूँ, देवों में जो देवत्व है वह मेरा ही तत्व है। विनाशवान पदार्थों में
अव्यय और अज मैं हूँ। अक्षरों में जो अक्षरधर्म दिखाई देता है वह मेरे ही कारण है। ईश्वर में निहित जो भी
सत्ता है, वह सब मेरे ही सामर्थ्य के कारण है। ईश्वर में जो भी ईश्वरत्व है वह मेरे ही कारण है। जलरूप में
रसरूप मैं हूँ, प्रकृतिपुरुषों का जनक मैं हूँ, सृष्टि रचना की संकल्पना मेरी है किन्तु मैं निर्विकल्प हूँ। सभी
कारणों का अनादि कारण मैं हूँ, समाधि की मूल समाधि मैं हूँ, आत्मशुद्धि को मेरे ही कारण शुद्धि प्राप्त हुई।
अभिमान का कृष्णार्पण इसी प्रकार होता है। मैं अजन्मा होते हुए, बिना जन्म लिये जन्म लेता हूँ। मैं अकर्मा होते
हुए कर्म किये बिना कर्म करता हूँ। पुरुषोत्तम को 'उत्तम' की महिमा मेरे ही कारण प्राप्त हुई है। 'सत्' शब्द से
मेरा ही बोध होता है। 'चित्' शब्द से तो स्पष्ट रूप से 'मैं' ही हूँ। सत्, चित् और 'आनन्द' ये तीन भिन्न धर्म न
होकर निर्व्यंग जो 'आनन्द' है, वह मैं हूँ। मेरे ही कारण सूर्य में प्रकाश है, मुझमें ही चिदाकाश का आकाश है।
जगन्निवास मेरे ही कारण जगत में आनन्द से विचरण करता है। मैं अज हूँ। मेरे अजत्व के कारण ही माया को
अजत्व प्राप्त हुआ है। निःशेष निर्बीज पदार्थों का बीज मैं हूँ। मेरे ही स्वरूप से आत्मस्वरूप प्रकट होकर नाचता
रहता है। अधिष्ठान का वास मुझमें ही है। जगदीश्वर का पूर्ण ईश्वर मैं हूँ। परमपुरुष का पुरुष मैं हूँ और परेश
का परेश भी स्वयं मैं हूँ। असत् पदार्थ मेरे कारण सत्तावान होते हैं। अचित् अर्थात् जड़ वस्तुओं को मेरे कारण
चेतनता प्राप्त होती है। निजानंद को भी मेरे ही कारण आनन्दत्व प्राप्त होता है। सभी सिद्धियों की मूल सिद्धि मैं
हूँ, बुद्धि की सर्वांग सुन्दर बुद्धि मैं ही हूँ। मोक्ष की उपाधि भी मेरे कारण ही सिद्ध होती है। सच्चा धर्म मैं हूँ।
मुझमें निहित ब्रह्म से कर्म का विस्मरण होता है। ब्रह्म समाधि की परमावधि जो परब्रह्म है, वह मैं हूँ।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर ये भी वास्तव में मेरा ही अंश धारण करते हैं। दशावतारों का अवतारी मैं ही हूँ। मेरी