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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 54, कुल 869 में से

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पृष्ठ 54

३८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
करती है वह दृष्टि में दर्शनरूप हो जाती है। ऐसे अभिन्न भाव से दर्शनार्पण कर भक्तगण भजन करते हैं। एकत्व
में तीनों भाग हैं और तीनों में एक ही रूप है। इस प्रकार सुन्दर देखना ही पूर्ण समर्पण है। आँखें नित्य विविध
प्रकार के अनेक पदार्थ देखती हैं लेकिन भक्तों को उन सब में परमात्मा का ही रूप दिखाई देता है और इस
प्रकार वे दृष्टि के अर्पण का वैभव भोगते हैं। इस प्रकार भक्त दृष्टि का दर्शन ब्रह्मार्पण करते रहते हैं। अब हे
राजा! अब तुम्हें बताता हूँ कि श्रवण का ब्रह्मा में किस प्रकार अर्पण होता है। जो शब्दों का मुँह से उच्चार
कराता है वही कानों में सुनने वाला बनकर बैठा हुआ है और अर्थ जानने वाला भी वही है। अर्थात् यहाँ श्रवण
भी ब्रह्मार्पण हो जाता है। मुँह से शब्द निकल रहा है तभी शब्द का उच्चार कराने वाला उसके पीछे-पीछे प्रकट
होता है। इससे वह भजन प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होता है और श्रवण सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है। शब्दोच्चार
होते ही अर्थ की वृद्धि होने लगती है इतने में जो शब्द का उच्चार कराने वाला होता है वही शब्दार्थ का माधुर्य
ग्रहण करता है और इस प्रकार श्रवणार्पण से ही हरिभजन में रुचि उत्पन्न होती है। कान पर शब्द पड़ते ही
शब्दार्थ के कारण भजन बढ़ता है और इस प्रकार शब्दों के प्रवर्तक से जुड़ जाता है अर्थात् अर्पित हो जाता है।
जो शब्दों को मुँह से निकलवाता है, उससे एकात्मता निश्चित करने से भजन श्रवण के हाथ में आता है और
सहज ही ब्रह्मार्पण हो जाता है। सद्गुरु का वचन कान पर पड़ते ही मन का मनपन मन में ही विलीन हो जाता
है। वही श्रवण ब्रह्मार्पण होकर भगवद्भजन में सार्थकता आती है। इस प्रकार श्रवण से ही श्रवण करने पर उसे
ब्रह्मार्पणता प्राप्त होकर सहज ही हेतुरहित भगवद्भजन हो जाता है। भजन से सन्तुष्ट होने वाला जगन्निवास गन्ध
का गन्ध बन कर रहता है और परेश घ्राण के द्वारा ब्रह्मार्पण से सुवास ग्रहण करता है। जो पुष्प को पुष्पत्व देता
है और फिर अनेक प्रकार की सुगन्धता का ब्रह्मार्पण भोग करता है। नासिका में अवकाश स्वयं ही ग्राहक्ता बन
जाने के कारण वह भोग स्वयं ही कृष्णार्पण होता है। अब 'रस' के अर्पण के सम्बन्ध में बताता हूँ। जिह्वा
रसग्रहण करने जाती है तो भगवान स्वयं ही रसास्वाद बन जाते हैं, जिससे रसना में रसोपभोग की वृत्ति ब्रह्मार्पण
हो जाती है। जिह्वा जो भी स्वाद ग्रहण करती है, वह हरिरूप होकर पूर्ण रूप से मधुर हो जाती है। इस प्रकार
जिह्वा अपना रसानुभव ब्रह्मार्पण कर देती है। रस, रसना और रसास्वाद का निजस्वरूप में अभेद ही है। ऐसी
भावना से रस का सेवन करने से स्वानन्द कन्द इन्द्रियद्वार के बाहर आता है। अर्थात् ऐसे रससेवन से परमानन्द
का साक्षात्कार होता है। कडुवा, मधुर आदि जो अनेक रस हैं उनका रसना धीरे-धीरे सेवन करती है लेकन वह
सारा 'ब्रह्मरस' ही होने के कारण उसके स्वाद में मधुर परमानन्द ही प्रकट होता है। इस प्रकार रसना भी रसभोग
द्वारा कृष्णार्पण में ही रत होती है। अब हे राजा! 'स्पर्श' इस विषय की व्यवस्था ब्रह्मार्पण में किस प्रकार होती
है, सुनो! अपने शरीर से स्पर्श करने जाओ तो देह में विदेही आत्मा ही प्रकट होता है। इसलिए जिसे भी स्पर्श
करने जाओ, वह स्पर्शभोग ब्रह्मार्पण होने लगता है। स्पर्शास्पर्श से अर्थात् त्वचा से किसी को स्पर्श करने का
विचार करें तो वहाँ स्पर्श करने के लिए कुछ नहीं रहता। उस ऐक्यरूप के कारण कृष्णार्पणरूपी भजन ही प्रकट
होता है। इसलिए जो भी पदार्थ लेने जाओ, वह पदार्थ सर्वसत्ताधीश परमात्मा ही बनकर रह जाता है इस प्रकार
उस भजन से निजभक्ति का स्वार्थ अर्थात् परमार्थ ही पल्ले पड़ता है। अब हाथ के अर्पण के बारे में बता रहे हैं।
हाथ भगवान को जब कुछ देने जाते हैं, तब वह देते समय भजन किस प्रकार हो जाता है, देखें। तो देनेवाला,
लेने वाला और दान ये तीनों बातें भगवान स्वयं हो जाता है। अब 'पैर' का अर्पण सुनिये। भक्त हर तरफ पैर से
चल कर आता है वह मार्ग भगवान स्वयं हो जाता है इसलिए ब्रह्मार्पण के कारण पग-पग पर निजभजन होता