श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय अध्याय ३५
चाहिए यही सम्पूर्ण भागवतधर्म है और इसी का नाम 'मुख्य भजन' है। अब ग्यारहों इन्द्रियों को किस प्रकार
भगवद्भक्ति की ओर लगाया जाए उसके विषय में संक्षेप में बताता हूँ। 'मन' से हरि का ध्यान करना चाहिए,
'कानों' से उसकी कीर्ति का श्रवण करना चाहिए, 'जिह्वा' से नामस्मरण करना चाहिए और दिन रात उसके
कीर्तन में मग्न रहना चाहिए। 'हाथों' से हरि का पूजन करना चाहिए, पैरों से मन्दिर में जाना चाहिए, नाक से
तुलसी निर्माल्य की गन्ध लेनी चाहिए। जो मस्तक पर नित्य निर्माल्य धारण करता है और पेट में चरणतीर्थ
तथा हरिप्रसाद एकत्र करता है उसे देखकर संसार भय दूर भागता है। बढ़ते हुए सद्भाव तथा बढ़ते प्रेम के
कारण जिसके भाग्य में श्रीकृष्ण का अखण्ड भजन रहता है उसे संसार का बन्धन नहीं रहता। सभी भयों में
संसार भय अत्यन्त कठोर है। वह बेचारा भी हरिभक्ति के सामने किंकर हो जाता है। फिर वह सामने कैसे
खड़ा हो पाएगा ? रामकृष्ण का स्मरण करने से जहाँ जन्म-मरण उठकर भागने लगते हैं वहाँ भव भय का
साहस कौन धीर कर सकता है ? जहाँ हरिचरण भजन से प्रेम है, वहीं संसारभय की निवृत्ति है। इस प्रकार
हमारे विवेक के अनुसार भगवद्भक्ति ही परम निर्भय है। तुम निश्चयपूर्वक जान लो कि यह हमारा दृढ़
निश्चय है और वेद, शास्त्र, पुराण इसके साक्षी हैं। सारांश यही कि सभी प्राणियों के लिए भगवद्भजन ही
सबसे अधिक निर्भय स्थान है। वेद, शास्त्र, पुराण भले ही एक ओर रहें लेकिन प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण ने अपने मुख
से यही कहा है कि मैं सर्वथा भक्तों के अधीन हूँ। इससे भगवान के कथन में भक्ति ही प्रधान है। इतना ही
नहीं, बल्कि साक्षात श्रीकृष्ण ने अपने चारों हाथ उठाकर निज आत्म प्राप्ति का उपाय बताते समय
'भक्त्याहमेकन्या ग्राह्यः' अर्थात् केवल भक्ति से ही मैं वश में आने वाला हूँ, यह बात बतायी है।
ये वै भगवता प्रोक्ता उपाया ह्यात्मलब्धये।
अंजः पुंसामविदुषां विद्धि भागवतान् हि तान् ॥ ३४॥
जिनके पास वेद शास्त्र का ज्ञान नहीं है, ऐसे अज्ञानी लोगों को ईश्वर प्राप्ति सुगम हो और वे ब्रह्मस्वरूप
प्राप्त कर सकें इसलिए भगवान ने ही यह हरिभक्ति प्रकट की है। वेदशास्त्र का अध्ययन किये बिना किस
जड़-मूढ़ ने भवसागर पार किया ऐसा यदि पूछें तो उन्मत्त गजेन्द्र का उद्धार हुआ है। परीक्षित का गर्भावस्था में
संरक्षण हुआ है। अम्बरीष का गर्भ निवारण भक्ति के ही कारण हुआ। 'अहं भक्तपराधीनः' अर्थात् मैं भक्त के
वश में हूँ यह बात स्वयं नारायण ने कही है। इस भगवद्भक्ति से वनचर, वानर जाने कितने तर गये। भालुओं
का उद्धार करने के लिए भगवान ने जंगल में जाकर भक्ति से जांबवती से विवाह किया फिर यह भी याद करो
कि अविवेकी ग्वाले, गोधन और गोपाल जो कृष्ण के सखा थे वे भी प्रबल अनन्य प्रीति के ही कारण तर गये।
शास्त्र विरुद्ध अविवेक के कारण, जार भावना से ही क्यों न हो लेकिन श्रीकृष्ण से अत्यन्त प्रेम रखने के कारण
कितनी गोपियों का उद्धार हुआ उनकी तो कोई गिनती ही नहीं है। अनेक प्रकार के शास्त्र पढ़े बिना सुलभ
उपाय से ब्रह्मप्राप्ति हो सके और दुर्बल भी पार लग सकें इसलिए भगवान ने अपनी भक्ति प्रकट की। राजा !
वही यह भागवत है, जिसमें मुख्य रूप से भक्ति ही प्रधान है। शुद्ध भावना से भगवद्भजन करने से अज्ञानी
जनों का उद्धार हो जाता है। यह भागवत नहीं बल्कि दीन अज्ञानी लोगों के लिए खुला हुआ पौसरा है।
भजनभाव से संसार सागर पार करने के लिए भगवान ने यह बहुत बड़ी नौका ही बना कर रख दी है। भजन
भाव से जो इस भागवत रूपी महानौका में बैठ कर निकल पड़े उन्हें भजन स्वभाव के कारण संसार भय के
हिंचकोले नहीं लगते। स्त्री, शूद्र आदि सभी को एक ही बार में भजन भाव से उस तट तक ले जाया जा सकता