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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 869 में से

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पृष्ठ 45

द्वितीय अध्याय २९

नौ पुरुषों के नाम यथागौरव बताता हूँ। उनका नाम सुनते ही काल कम्पित होकर पीछे से ही भाग जाता है,
जिनके नाम का स्मरण करने से संसार माथा नहीं उठा पाता। हे परीक्षित! जिनका नाम लेने से भक्तजनों को
निश्चित रूप से मुक्ति ही मिलती है, उनके नाम की कीर्ति के सम्बन्ध में तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
कविर्हरिरन्तरिक्षः प्रबुद्धः पिप्पलायनः ।
आविर्होत्रोऽथ द्रुमिलश्चमसः करभाजनः ॥ २१ ॥
कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध पिप्पलायन, आविर्होत्र, सुलक्षणी द्रुमिल निर्दोष चमस तथा करभाजन इस
प्रकार उन नौ के नौ नाम थे। इन नामों का स्मरण करने से सभी पापों का विनाश होता है ऐसी उनकी महिमा है।
उनकी परमहंस स्थिति मैं तुम्हें बताता हूँ। जिनके कारण सारी पृथ्वी पावन हो जाय ऐसी वे पुण्य पूज्य नौ
मूर्तियाँ थीं।
एते वै भगवद्रूपं विश्वं सदसदात्मकम्।
आत्मनोऽव्यतिरेकेण पश्यन्तो व्यचरन्महीम् ॥ २२ ॥
वे नौ यद्यपि शरीर से अलग दिखाई देते थे लेकिन भगवद्रूप से वे एक ही थे। चाहे सृष्ट हो या दुष्ट हो
वे सबको अपनी ही तरह एक ही दृष्टि से देखते थे। क्योंकि उनमें असाधुत्व जैसी कोई चीज शेष नहीं रह गयी
थी, सब कुछ चिन्मय हो जाने के कारण 'संत' कहने लायक भेद उनमें रह ही नहीं गया था। सारा संसार ही
जहाँ भगवान से भरा हुआ है वहाँ हम उनसे अलग कैसे रह सकते हैं। इसलिये वे सब भूतमात्र तथा पंचमहाभूतों
को भगवत्स्वरूप में ही देखते थे। देखना और देखने का पदार्थ भी स्वयं ही बन जाना, होना न होना आवागमन
इन सारे लक्षणों को निगल कर वे संसार में विचरण करते थे।
अव्याहतेष्टगतयः सुरसिद्धसाध्यगन्धर्वयक्षनरकिन्नरनागलोकान्।
मुक्ताश्चरन्ति मुनिचारणभूतनाथविद्याधरद्विजगवां भुवनानि कामम् ॥ २३ ॥
वैकुण्ठ, कैलाश, उसी प्रकार देवता तथा सिद्ध (साध्य, गंधर्व, यक्ष, नर, किन्नर, नाग, मुनि, चारण,
भूतनाथ, विद्याधर, द्विज, गौएँ) आदि के स्थान, सारांश सप्तस्वर्ग तथा सप्त पातालादि अर्थात् श्लोकों में वर्णित
चौदह लोकों में वे अबाध गति से विचरण करते थे। उनके मन में विषयासक्ति न होने के कारण उनकी गति
कहीं बाधित नहीं होती थी। स्वेच्छानुसार कहीं भी जाने का सामर्थ्य उनमें होने के कारण वे निष्काम भाव से
कहीं भी विचरण करते रहते थे।
तं एकदा निमेः सत्रमुपजग्मुर्यदृच्छया।
वितायमानमृषिभिरजनाभेर्महात्मनः ॥ २४ ॥
जहाँ मन का प्रवेश भी निषिद्ध है, वहाँ वे पग से चल कर जाते। इस प्रकार वे इच्छागमनी पुरुष स्वेच्छा से
विचरण करते-करते एक बार कर्मभूमि पर आये ओर पृथ्वी पर के 'अजनाभ' खण्ड पर (भारतवर्ष) पहुँचे। वहाँ
राजा जनक का यज्ञ चल रहा था और असंख्य बड़े-बड़े ऋषि वहाँ एकत्र थे। यज्ञ वैदिक विधि से शास्त्रोक्त ढंग
से चल रहा था। कुण्ड, मण्डप, वेदिका, दिशासाधन, अनुष्ठान की पीठिका अर्थात् यज्ञ की पूर्व तैयारी कर सभी
कर्म पवित्र रीति से चल रहे थे। स्त्रुक, स्त्रुवा आदि यज्ञपात्र, त्रिसंधान अर्थात् तीन जगह जोड़ी हुई दर्भ की डोरी
तथा दर्भ के परिस्तरण फैलाकर अखण्ड घृत की धार कुण्ड में देते हुए ऋषि लोग होम कर रहे थे। होम समाप्त