श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
कैसा और अपवित्र कैसा ? तीर्थ कैसा और क्षेत्र कैसा ? वेद कैसा और शास्त्र कैसा ? ब्रह्म तो स्वतंत्र और अद्वय
ही है। वहाँ उत्पत्ति कैसी और विनाश कैसा ? बैकुण्ठ कैसा और कैलास कैसा ? ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर भी
कैसे ? एक अविनाशी ब्रह्म ही शेष रहता है। वहाँ किसका बोध और कैसी बुद्धि ? वहाँ तो वास्तव में देवत्व भी
नष्ट हो जाता है। मोक्षसिद्धि भी लज्जा से विनष्ट हो जाती है। वही क्षीरसागर का शेषशायी भी कैसा ? वहाँ तो
मेरा भगवान स्वरूप भी नष्ट हो जाता है। ॐकार का मस्तक भी डूब जाता है। इतना सायुज्यस्वरूप उन्हें प्राप्त
होता है। इसलिये देह बचा भी तो क्या और आया भी तो क्या इसका उन्हें स्फुरण भी नहीं होता। उसका
स्पष्टीकरण इस प्रकार है। अविद्या यह कारण है और देह उसका कार्य है। वह अविद्या ही जब नष्ट हो जाती है
तो कारण के बिना कार्य रहे यह सम्भव नहीं है ऐसा आप कहेंगे। वृक्ष यदि जड़ के साथ गिर पड़े तो भी
उसकी आर्द्रता तत्काल समाप्त नहीं होती। पत्ते, फूल, फल आदि आर्द्र रहते ही हैं। उसे सूखने में काफी समय
लगता है। उसी प्रकार अविद्या का नाश भले ही हो जाय लेकिन भोगरूप दैव के रूप में जो शेष रहता है उसके
कारण ज्ञानी पुरुष कर्म करता है। वह अपने देह में ही विदेह के रूप में रहता है। अब शायद आप यह कहें कि
देह को बड़े प्रेम से बड़ा करते हैं, उसका बड़े लाड़-प्यार से पोषण करते हैं और निरन्तर सुरक्षा करने पर भी
उसका पतन होता है यह स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। जिसका देह उसके स्वाधीन न हो उसका तत्काल पतन होना
चाहिये। फिर भी वह बचता क्यों है ? ऐसी भी कल्पना मन में आ सकती है। जिसका वह देह है वही जब उसे
नहीं पूछता तो फिर वह देहकर्म किस लिये करेगा ? यदि आपकी ऐसी शंका हो तो उसका भी उत्तर दूँगा। ध्यान
देकर श्रवण करें। देह की उत्पत्ति स्थिति और लय यह पुरुष के वश में नहीं रहती। दैव ही उसे चलाता है
इसलिये दैव योग से ही देह का कर्म होता रहता है। उठना या बैठना देह को दैवयोग के कारण ही प्राप्त होता
है। लेना-देना भी दैवयोग से होता है और खाना-पीना भी दैवयोग से होता है। देह को स्वदेश या परदेस दैव ही
ले जाता है। देह को स्वर्ग या नरक के भोग दैव के कारण ही भोगने पड़ते हैं। यश, लाभ, हानि अथवा मृत्यु
यह सब देह को दैव के कारण ही प्राप्त होते हैं किन्तु मृत्यु यह सब देह को दैव के कारण ही प्राप्त होते हैं
किन्तु जो ज्ञानसम्पन्न रहता है वह जिस प्रकार घट में दिखाई पड़ने वाला चन्द्रमा घट से अलग रहता है उसी
प्रकार वह देह से अलग रहता है। जिस प्रकार पुरुष के पास छाया रहती है उसी प्रकार ज्ञाता के सान्निध्य के
लिये देह रहता है। वह देह अपने कर्म भोगने के लिये दैव के अधीन रहता है। छाया मुझसे ही उत्पन्न होती है
और मेरे ही सान्निध्य में बढ़ती है फिर भी वह मेरी ही है इसका कभी किसी को गर्व नहीं होता। उसी प्रकार
ज्ञाता के पास देह रहता है फिर भी वह अभिमानपूर्वक 'यह मेरा' है नहीं कह सकता। छाया सदा निकट ही
रहती है लेकिन वह कहाँ रहती है और कहाँ नहीं रहती यह वह जिसकी है वह भी उससे नहीं पूछता। उसी
प्रकार ज्ञाता का देह के सम्बन्ध में आचरण रहता है। छाया विष्ठा पर भी पड़ती है और पालकी में भी चढ़ती है
लेकिन इसके कारण उस पुरुष को किसी भी प्रकार का सुख या दुःख नहीं होता। उसी प्रकार ज्ञाता को भी
देहभोग का सुख-दुःख नहीं होता। लेकिन उसे इस प्रकार अपने देह का विस्मरण कैसे होता है ? उसका कारण
भी दृष्टांत देकर बताता हूँ। जो पैसा देकर दारू पीता है वह उस दारू के नशे में नाचने, गाने लगता है। वास्तव
में देहधारी होते हुए भी वह अपने देह को भूल जाता है। शरीर पर वस्त्र है या नहीं इसका भी उसे भान नहीं
रहता और यह तो ब्रह्मरस का पान कर परमानन्द से तृप्त हुआ रहता है। अतः उस नशे की धुंध में उसे देह का
भी स्मरण नहीं होता। सारांश, देह का पालन अथवा पोषण, जन्म अथवा मृत्यु यह सब दैवयोग से ही होता
रहता है। हंस ने अपने भाषण में इसी बात का प्रतिपादन किया।
तेरहवाँ अध्याय ३८९
देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः ।
तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥ ३७॥
देह का जो भी आचरण है वह दैवयोग से ही होता है इसे ध्यान में रखो। अज्ञान में देहाभिमान रहता है जो
ज्ञाताओं में कभी नहीं होता। जिस प्रकार पूर्वसंचित कर्म रहता है, उसी प्रकार यहाँ देह उत्पन्न होता है। वह सभी
इन्द्रियों और प्राणों के साथ अगर दैवयोग से ही आचरण करता है तो आप कहेंगे कि दैवयोग से यदि वह देह में
है तो इससे देह का अहंकार अवश्य बढ़ना चाहिये। जिस प्रकार साथ-साथ चलने वाले राही परस्पर संकट
भोगते रहते हैं, लवण के मिश्रण से जल भी खारा हो जाता है, उसी प्रकार ज्ञाता भी देह की संगत से देहाभिमानी
हो जायेगा। जिस प्रकार लोहे की संगत से अग्नि को भी हथौड़े के घाव सहन करने पड़ते हैं उसी प्रकार देह की
संगति से ज्ञाता भी सुख-दुःख भोगते हैं। इस प्रकार की कल्पना आप मन में कर सकते हैं किन्तु यह बात
ज्ञाताओं पर लागू नहीं होती क्योंकि वे सारा अहंभाव त्याग कर चिदानंद में ही समाधिस्त रहते हैं। 'अधिरूढ
समाधियोग' इस आशय का स्पष्ट पद है। इसका अर्थ है कि उसने आत्मज्ञान से अत्यन्त निर्दोष समाधि प्राप्त कर
ली है। वह समाधि कैसी रहती है? उसमें रहने वाला पुरुष क्या काष्ट की तरह तटस्थ रहता है या निरा पागल
हो जाता है या ज्ञानसम्पन्न रहता है? उस समाधि के सम्पूर्ण लक्षण बताता हूँ, सुनो। उसके योग से ज्ञानसम्पन्न
व्यक्ति को देह में रहते हुए भी देह के बन्धन में नहीं फँसना पड़ता। 'केवल तटस्थ होकर रहने का ही नाम
समाधि है' यह बात यदि ज्ञाता ही कहने लगें तो समझ लो उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी क्योंकि वास्तव में वह
समाधि नहीं है। ऐसी स्थिति में वृत्ति मूर्च्छाना की अवस्था में रहती है। सदा अभिमानरहित रहना इसी का नाम
अखण्ड समाधि है। लेकिन काष्ट की तरह होकर रहने का नाम समाधि कदापि नहीं है। तटस्थता को ही जो
समाधि मानते हैं उन्हें वास्तव में सच्चे स्वरूप का ज्ञान नहीं है और निश्चय का भी ज्ञान नहीं है। उनकी बातों में
केवल अनुमान रहता है। किसी भयंकर आघात से बेसुध होकर मनुष्य में लकड़ी की सी तटस्थता आ जाती है।
तो क्या उसे समाधि कहा जाय? पुरस्कार की आशा से बहुरुपिया अपना स्वांग रचते समय कभी अपनी सांस
रोक कर तटस्थता लाने का प्रयत्न करता है। लेकिन वह कोई समाधि नहीं है क्योंकि जब तक अंतःकरण में
वासना शेष है तब तक समाधि कैसे लगेगी? वह बहुरुपिया होश में आते ही कहता है, "आप उदारश्रेष्ठ हैं
अतः मुझे योग्य पुरस्कार दें।" सारे संकल्पों का जो चरम बिन्दु है उसी का नाम निर्विकल्प समाधि है। सभी
शास्त्रों ने इसे प्रतिपादित किया है। बकरी के पास साँप आता है तो वह भी सभी वृत्तियों से शून्य होकर तटस्थ हो
जाती है। लेकिन वह समाधि नहीं है। सहसा कोई दिव्य स्वरूप देखने पर आश्चर्य के कारण तटस्थता प्राप्त होती
है। ऐसे प्रसंग में सचमुच वृत्ति रहती ही है ऐसा समझना चाहिये। उसी प्रकार पहली ही बार आँखों को
आत्मस्वरूप दिखायी देने पर इतना अधिक आश्चर्य होता है कि सँभाले नहीं सँभलता। लेकिन उस आश्चर्य को
पेट में दबाने पर जो स्थिति उत्पन्न होती है, उसी का नाम है, 'समाधि'! कल्पना जहाँ पूरी तरह नष्ट हो जाती है
वहाँ विस्मय का स्फुरण कैसे होगा? वहाँ अतिसूक्ष्म कल्पना भी नष्ट हो जाती है, इसलिये आश्चर्य भी नष्ट हो
जाता है। जिसे सचमुच ब्रह्म की ही प्राप्ति हो जाती है, उसमें देह का ही स्फुरण नहीं होता और उस समय वह
तटस्थ खड़ा है या चल रहा है यह भी दूसरों को ही देखना पड़ता है। इस प्रकार जहाँ देह ही मिथ्या होता है वहाँ
उसके लक्षण कौन देखेगा? मृगजल के स्नान से ज्ञाता को जितना संतोष प्राप्त होगा उतना ही यह भी सम्भव है।
मिथ्या देह को तटस्थता प्राप्त हो जाय उसी को समाधि की अवस्था समझा जाय इस लक्षण को सच मानकर
बड़े-बड़े ज्ञानी भी फँस गये हैं। स्वप्न में ज्ञानी बने मनुष्य को तटस्थ स्थिति प्राप्त हुई और वह स्वप्न देखने वाले
३९० श्रीमद् एकनाथी भागवत
उस व्यक्ति को वह सच भी मालूम हुई तो भी जागृति में आने पर वह उसी अवस्था में नहीं आता अथवा
स्वप्नावस्था में रहने वाले व्यक्तियों को समाधि में बड़ा सम्मान प्राप्त हो जाय लेकिन वह सम्मान उसे जागृत
अवस्था में नहीं प्राप्त होगा। वास्तव में वह सो गया है यही समझना चाहिये। उसी प्रकार तटस्थता को समाधि
कहना ही अविद्या है। वह अविद्या स्वप्न और मूर्च्छा का स्वरूप है। वह आत्मस्वरूप ज्ञान में जागृत नहीं हुआ है
यही समझना चाहिये। जागृत होकर जब वह स्वप्न की ओर देखता है तो उसे झूठा ही मानता है। क्या उसमें
उसका देह भी सत्य था ? अमर वह सत्य है तो फिर उसमें तटस्थता आ सकती है ऐसा प्रश्न उसके मन में आता
है। जो सचमुच जागृत होने के बाद उस स्वप्न के देह को अपनी कल्पना से तटस्थता देने का प्रयास करता है
उसे तब लज्जा होने लगती है। उसे इसमें इससे अधिक महत्त्व नहीं मालूम होता। वह जागृत होने पर जिस स्वप्न
का वर्णन करता है वह असत्य रहता है। वह उसे स्पर्श भी नहीं करता। उसी प्रकार जिसे सचमुच परब्रह्म की ही
प्राप्ति होती है वह भी देह की स्थिति में लिप्त नहीं होता। तो फिर उसका देह किसके बल से क्रियाएँ करता है ?
वह शेष प्रारब्ध की गति से क्रियाशील रहता है। अग्निपात्र का अग्नि भले ही बुझ जाय लेकिन जमीन में उसकी
उष्णता कायम रहती है। कपूर भले ही जल जाय लेकिन उस स्थान पर उसका सुवास कायम रहता है। पालने
को झुलाने वाला आदमी भले ही थक जाय लेकिन पालना अपनी पूर्व गति के कारण चलता रहता है। उसी
प्रकार अविद्या का नाश होने पर भी प्रारब्ध तो शेष रहता ही है। उसी शेष प्रारब्ध से मुक्तों का देह चलता रहता
है। शरीर के ही कारण छाया हिलती है किन्तु शरीर छाया से भिन्न ही रहता है। इस प्रकार मुक्तों का देह मिथ्या
होता है और वह प्रारब्ध के सहारे व्यवहार रहता है। पुरुष के साथ जो छाया रहती है वह किसी कारण से नहीं
बल्कि सहज ही रहती है। उसी प्रकार ज्ञाता के साथ देह भी मिथ्या रहता है। जिस प्रकार जमीन पर पड़ा हुआ
पत्ता हवा के योग से हिलता है, उसी प्रकार देह भी पूर्व कर्म के अनुसार व्यवहार करता है। लेकिन ज्ञाता देहकर्म
के स्पर्श से मलिन नहीं होता। भले ही वह प्रारब्ध के अधीन रह कर पूरे संसार के साथ बातें करता रहे अथवा
मौन साध कर आनन्दपूर्वक गिरि कंदराओं में पड़ा रहे। भले ही वह सारे कर्म करे अथवा भ्रम के कारण पागल
हो जाये लेकिन वह प्रारब्ध के कारण प्राप्त स्थिति के अनुसार आचरण करता रहता है। वह पालकी में रहे
अथवा हाथी के गंडस्थल पर विराजमान हो या विष्टामूत्र में पड़ा रहे वह उसे स्थिति प्रारब्ध के कारण ही मानता
है। जिसमें बाध्य और बाधकता समाप्त हो जाती है, अहंकार की अविद्या समाप्त हो जाती है, उसकी उस स्थिति
को ही 'स्वभावसिद्ध समाधि' के नाम से जाना जाता है। सभी सिद्धान्तों का यही सारांश है। जिसे इस प्रकार की
प्राकृतिक समाधि अवस्था प्राप्त होती है वही सारे भोग भोग कर अभोक्ता बना रहता है और सारे कर्म करके भी
अकर्ता बना रहता है। वह क्रिया और कारण के संयोग से विषयोपभोग में लिप्त दिखायी देता है लेकिन इससे
उसकी समाधि अवस्था भंग नहीं होती। भोगों का भोग करते हुए भी वह अलिप्त ही रहता है। उसकी स्त्री उसे
मेरा पति कहती है, पुत्र उसे मेरा पिता कहता है शिष्य उसे 'मेरा सच्चा गुरु' कहता है। किन्तु वह इन सारे
सम्बन्धों से दूर रहते हुए भी उन सब में विचरण करता रहता है। अथवा जिस प्रकार लकड़ी से ही अग्नि उत्पन्न
होती है, लकड़ी में ही रहती है लेकिन यदि कोई कहे कि लकड़ियाँ उसे अपने अधीन रखती हैं तो वह उनके
नियंत्रण में नहीं रहतीं अथवा जो फूँकने से ही प्रकाश देने लगता है, जो फूँकने से ही उत्पन्न होता है वही दीपक
फूँक से बचने पर सुरक्षित स्थान पर दीपक के रूप में टिक पायेगा। उसी प्रकार कर्म से उत्पत्ति होती है, कर्म से
ही परब्रह्मप्राप्ति होती है लेकिन महान योगी उस कर्म में भी निष्कर्म स्थिति में व्यवहार करते रहते हैं। वह लोगों
में भले ही गृहस्थ दिखायी दे अथवा जंगल में पागलों की तरह नाचता फिरे या एकांत में शान्त पड़ा रहे लेकिन
तेरहवाँ अध्याय ३९१
उसकी स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। सिंहासन पर बैठने से उसे जो राजत्व प्राप्त होता है वह बगीचे में
खेलते समय भी कायम रहता है और शिकार खेलते समय शिकार का पीछा करते हुए भी बना रहता है। राजा
जंगल में भी जाकर रहे तो भी उसके राजभोग वहाँ पहुँच जाते हैं। वहाँ राजा की सत्ता समाप्त हो जाती है यह
कोई मूर्ख भी स्वीकार नहीं करेगा। उसी प्रकार योगी स्वस्वरूप पर पहुँच कर प्रारब्ध की अवस्था के अनुसार
अनेक प्रकार के कर्म करते हुए दिखायी देते हैं लेकिन इससे उनकी आत्मस्वरूप स्थिति नहीं बिगड़ती। समाधि
लगना या समाधि टूटने का अनुभव केवल अधूरे ज्ञानी को ही होता है। परिपूर्ण ज्ञानी के ये लक्षण नहीं होते।
क्योंकि जो परिपूर्ण होते हैं उनमें आत्मस्वरूप के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रहता। समाधि और समाधि
विसर्जन का सुख सामने आने में भी शरमाता है। अर्जुन को समाधि लगायी और तत्काल उसे घोर युद्ध में झोंक
दिया। दयानिधि श्रीकृष्ण ने उसे कभी तटस्थ (क्रियाशून्य) रखा ही नहीं। इसलिये परिपूर्णत्त्व से आत्मस्वरूप में
रममाण होते होते, समाधि लगाना और उसका विसर्जन करना यह परिश्रम तटस्थता को भी सर्वथा निगल कर
सच्ची समाधि लग पाती है। इस प्रकार जब तक प्रारब्ध चाहता है तब तक मुक्त का देह इस प्रकार आचरण
करता रहता है। लेकिन उसे अहंता की ममता पहले जैसी पीड़ा नहीं देती। जिस प्रकार स्वप्न में देह को प्राप्त
अवस्थाओं को पुरुष जागृत होने पर अपने माथे पर नहीं लेता उसी प्रकार समाधि में रहने वाला व्यक्ति देह के
कर्म अपने माथे पर नहीं लेता। यही श्रेष्ठ ब्रह्मस्वरूप स्थिति है। अनेक प्रकार के स्पष्टीकरण देकर मैंने तुम्हें
अपने गुह्यज्ञान सम्पत्ति का निरूपण सुनाया। सनकादिकों ने पूछा था, 'तुम कौन?' उन्हें बताने के लिये तथा
उनका विश्वास दृढ़ करने की दृष्टि से मैंने अपने आत्मस्वरूप का निरूपण किया।
मयैतदुक्तं वो विप्रा गुह्यं यत् सांख्ययोगयोः।
जानीत माऽऽगतं यज्ञं युष्मद्धर्मविवक्षया ॥ ३८ ॥
इस प्रकार अत्यन्त गुह्य, श्रेष्ठों में श्रेष्ठ उपनिषद का भण्डार तथा योगियों के योगमार्ग का रहस्य मैंने तुम्हें
बताया। जिस ज्ञान के लिये मुमुक्षु लोग अत्यन्त कष्ट सह कर सहस्रों साधन करते हैं और जिसके लिये योगी
गिरि कन्दराओं में रहकर आसन मुद्रा आदि करते हैं, जिसके आगे वेदशास्त्रों की सारी युक्तियाँ असमर्थ सिद्ध हुई
वह आत्मज्ञान मैंने यथार्थ रूप में तुम्हें बताया। इतना ज्ञान देने वाला ज्ञानवक्ता मैं कौन हूँ? यह बिल्कुल मालूम
नहीं होगा। तो समस्त यज्ञों का यज्ञभोक्ता जो विष्णु है वह मैं हूँ इसे ध्यान में रखिये। मेरे यहाँ आने का कारण
यही है कि आपने ब्रह्मदेव से जो प्रश्न किया था उस ब्रह्मज्ञान का उपदेश देने के लिये मैं यहाँ स्वयं आया हूँ।
जिस उपदेश में वर्णाश्रमधर्म की पद्धति छोड़े बगैर मेरा दर्शन होता है, वह बात भी ध्वनित की गयी है। ब्राह्मण
धर्म छोड़ कर, फिर सन्यासग्रहण करना चाहिये ये दोनों धर्म देह के ही हैं। किन्तु उपदेश के अनुसार मुख्य रूप
से देह ही मिथ्या रहता है। उपदेश को ही प्रमाण मानकर सनकादिकों ने अभी तक ब्राह्मण धर्म नहीं छोड़ा फिर
भी उन्हें मेरा गुह्य ज्ञान प्राप्त हुआ और सचमुच उसी उपदेश से नारद भी ब्राह्मण के ही रूप में रहते हैं और
आत्मानंद में निमग्न होकर नाचते गाते ब्रह्मानन्द में डोलते रहते हैं। अपना वही चैतन्यधनस्वरूप वे स्वयं अपनी
महिमा प्रकट करने के लिये वर्णन कर रहे हैं।
अहं योगस्य सांख्यस्य सत्यस्यर्तस्य तेजसः।
परायणं द्विजश्रेष्ठाः श्रियः कीर्तेर्दमस्य च॥ ३९॥
सांख्य नाम का श्रेष्ठ ज्ञान, अष्टांगादि साधनों से सिद्ध होने वाला योग अथवा सत्य का सत्यत्त्व वही मेरा
३९२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सच्चा स्वरूप है। देखो! जिस सत्य में संत सद्धर्म से आचरण करते हैं अथवा इच्छारहित जो वाणी होती है वह
भी मुझसे भिन्न नहीं हो सकती। तेज की वह प्रगल्भता मेरे ही कारण प्रकाशित हुई है। अथवा लक्ष्मी को जो
ऐश्वर्य प्राप्त हुआ है वह सचमुच मेरे ही कारण से है। साधु लोग कीर्ति को जो सम्मान देते हैं वह मेरे कीर्तन के
कारण ही प्राप्त होती है। मेरे सिवा उस कीर्ति को कोई स्वीकार नहीं करेगा। निग्रहता मेरे ही प्रभाव से सब से
निग्रह कराती है। मेरे सामर्थ्य से वे अदम्य का भी नमन करते हैं। ध्येय और ध्यान; अथवा साध्य और साधन;
इन सब के लिये आश्रय का स्थान मैं ही हूँ। मेरे सिवा उन्हें कार्य की प्रेरणा कैसे मिलेगी ? आप अत्यन्त श्रेष्ठ
ब्राह्मण हैं, आप मेरे लिये भी पूज्य हैं इसलिये मेरा शुद्ध आत्मज्ञान आपको स्पष्ट रूप से बताया।
मां भजन्ति गुणाः सर्वे निर्गुणं निरपेक्षकम्।
सुहृदं प्रियमात्मानं साम्यासङ्गादयोऽगुणाः ॥ ४० ॥
वास्तव में मैं इच्छारहित तथा निर्गुण हूँ। मेरे गुणों की कल्पना से मेरी भक्ति कर वे मुझे सुहृद, आत्मा, प्रिय
आदि लक्षण लगाते हैं। समता और निःसंगता आदि गुणों की अवस्थाएँ भी मुझे लगाते हैं। जरा देखो! क्या कभी
अन्धकार अपनी पराक्रमी सेना लेकर सूर्य का मुकाबला करने के लिये खड़ा हुआ है ? फिर भी वह जिस प्रकार
सूर्य को अन्धकार का विनाश कह कर महिमा मण्डित करता है या क्या कभी किसी ने घर में आकाश को भरने
का प्रयास किया है ? फिर भी घर के ही कारण आकाश को घटाकाश यह नाम प्राप्त हुआ है। चन्द्रमा घर को
स्पर्श नहीं करता सदा आकाश में ही रहता है फिर भी घर चन्द्रमा को घटचन्द्र बनाता है और मूर्ख उसी को सच
मान लेते हैं। फिर भी, मैं निर्गुण होते हुए वे मेरे गुणों की कल्पना से भजन कर मुझे सुहृद, आत्मा, असंग आदि
विशेषणों से अलंकृत करते हैं। मैं गुणों को स्पर्श भी नहीं करता फिर भी वे मुझे लीलाधारी कहते हैं। इस प्रकार
गुण ही गुणों के पास रहते हैं, मुझ पर केवल आरोप लगता है। अतः मैं न लेने वाला हूँ, न देनेवाला हूँ। मैं न
कर्ता हूँ न करवाने वाला। मेरा यह स्वभावधर्म है। अन्य अवस्था गुणों की है। इस प्रकार ज्ञान और विज्ञान का
जो पहले से चला आ रहा विलक्षण स्वरूप है उसका उपसंहार अब श्रीकृष्ण स्वयं कर रहे हैं।
इति मे छिन्नसन्देहा मुनयः सनकादयः।
सभाजयित्वा परया भक्त्यागृणत संस्तवैः ॥ ४१ ॥
आत्मज्ञानी, अत्यन्त कुशल, मुमुक्षुओं में अत्यन्त श्रेष्ठ सनकादिक सन्देहयुक्त हो गये थे। मैंने उन्हें इस
प्रकार निःसन्देह किया वे सदा सावधान, शुद्ध, मेरे भजन के प्रति प्रेमभाव रखने वाले, निरन्तर मत्स्वरूप में
रहकर मनन करने वाले और उपदेश सुनने से कभी न ऊबने वाले थे। मेरा यह उपदेश सुनते ही वे तत्काल मेरे
गले लग गये और तत्काल मत्स्वरूप हो गये। ऐसे वे ब्रह्मपुत्र संसार में अत्यन्त धन्य हैं। मेरे उपदेश के कारण
उन्होंने दृश्य, द्रष्टा और दर्शन इस त्रिपुटी का शून्य कर डाला और वे पूर्णरूप से ब्रह्मस्वरूप हो गये। उन्हें
अत्यन्त समाधान प्राप्त हुआ और उन्होंने गद्य-पद्य में मेरा स्तवन कर मेरी पूजा प्रारम्भ कर दी।
तैरहं पूजितः सम्यक् संस्तुतः परमर्षिभिः ।
प्रत्येयाय स्वकं धाम पश्यतः परमेष्ठिनः ॥ ४२ ॥
यद्यपि उनकी पूज्यता और पूजकता ये वृत्तियाँ नष्ट हो गयी थीं फिर भी उन्होंने गुरु की पूजा की। द्वैत का
भ्रम त्याग कर उन्होंने परम भक्तिभाव से मेरी पूजा का प्रारम्भ किया। शिष्य भले ही ब्रह्मस्वरूप हो जाय लेकिन
फिर भी उसे गुरु तो पूज्य है ही। सद्गुरु सचमुच ही परिपूर्ण ब्रह्म है यह बात सनकादिकों ने भी मान ली।
जिनके शब्दों रो सब ब्रह्मस्वरूप होकर रहता है उन पूज्य सद्गुरु के चरणों का वर्णन मैं किन शब्दों में करूँ?
परब्रह्म जिसे प्राप्त होता है वही सद्गुरु की पूज्यता जानता है ? इतरों की समझ में वह बात नहीं आती। शब्दों से
बताने पर वह केवल अनुमान मात्र होता है। अस्तु ! वे सब सनकादिक मेरी यथासांग पूजा कर बार-बार मेरा
स्तवन करने लगे और नम्रतापूर्वक मेरे चरणों पर गिर गये। मेरे भजन में वे सब एकदिल से तल्लीन हो गये मेरी
भक्ति से वे अत्यन्त भक्तियुक्त हो गये तो मुझ निरन्तर पूर्णकाम को भी उनकी पूजा से सन्तोष प्राप्त हुआ। फिर
उन्होंने प्रदक्षिणा की और मेरे चरणों को नमस्कार किया। मेरे भाषण के गहन अर्थ से उन ब्राह्मणों को अत्यन्त
सन्तोष प्राप्त हुआ। ब्रह्मदेव यह सब देख रहे थे और सनकादिक वहीं खड़े थे तभी उनके सामने मैंने निजधाम
के लिये प्रस्थान किया। उद्धव ! इस प्रकार सनकादिक मेरे शिष्य बन गये हैं इसे ध्यान में रखो। वही अलौकिक
इतिहास मैंने तुम्हें संक्षेप में बताया। योगियों में अत्यन्त श्रेष्ठ, भक्तों में अत्यन्त श्रेष्ठ ज्ञाताओं में अत्यन्त अधिकारी
पुरुष सनकादिक मेरे सर्वोत्तम शिष्य हैं। 'हंसगीत निरूपण' नाम से प्रसिद्ध जो पुरातन ब्रह्मज्ञान था वह श्रीकृष्ण
ने प्रसन्न होकर उद्धव को सुनाया। भागवत धर्म का आचरण करते हुए यह पुरातन ब्रह्मकथा एकनाथ को
एकादशस्कंध का अवलोकन करते समय साज हाथ लगी। हंस के मुख से निकले वे ज्ञानरत्न जो सनकादिकों को
अलंकारों के रूप में प्राप्त हुए उनसे श्रीकृष्ण ने उद्धव का श्रृंगार किया और उनमें से जो बचे उन्हें श्रीगुरु जनार्दन
ने मुझे सौंपा। लेकिन यह बात सत्य नहीं है क्योंकि सनकादिक व उद्धव को हुए अनेक दिन व्यतीत हो गये।
इसलिये यह व्यर्थ की बकवास है ऐसा शायद आप कहेंगे लेकिन भगवान ने शंखासुर का कृतयुग में संहार किया
था किन्तु जो भाग्यवान है उसे आज भी वहाँ दाहिने शंख प्राप्त होते हैं। रामचन्द्रजी ने बहुत पहले अयोध्या में
बहुत बड़ा यज्ञ किया था लेकिन उस स्थान पर आज भी यज्ञद्रव्यों का बचा हुआ भाग मिलता है। उसी प्रकार
यहाँ भागवत में जनार्दन गुरु की कृपा से सनकादिकों के ज्ञानरत्न से बचे हुए ज्ञान की प्राप्ति मुझे एकादशस्कंध
के अर्थ के रूप में प्राप्त हुई। पीछे हो या आगे लेकिन सर्वत्र परब्रह्म ही भरा हुआ है। यही एकादश स्कंध का
विचार है। इसी कारण से सनकादिक और उद्धव के ज्ञानरत्न का अवशेष हमें भी प्राप्त हुआ। जब तक आज्ञा
प्राप्त न हो तब तक समर्थ जन भी गया में श्राद्ध कर्म नहीं कर सकते हैं लेकिन उसी पद पर यदि कोई मक्खी
बैठी हो तो उसका निवारण कोई नहीं कर सकता। उसी प्रकार अनेक प्रकार के शास्त्रों का विचार कर थक जाने
पर बड़े-बड़े साधकों को भी जिस ज्ञानशेष की प्राप्ति नहीं होती वह हमें इस एकादशस्कंध से हुई। हंस, कृष्ण
और जनार्दन ये नाम भले ही भिन्न हों लेकिन स्वरूप एक है। उसी ने यह बोधरूपी अंजन डाल कर यह प्राचीन
निधि दिखा दी। वहाँ मैं एक एकनाथ देखने वाला और वह एक मुझे दिखलाने वाला यह बोध और यह
बोधकता भी नहीं रहती। क्योंकि देखने वाला और दिखलाने वाला एक ही है। दर्पण सामने लाने पर उसमें चेहरा
दिखाई देता है और दूर हटाने पर अदृश्य हो जाता है। लेकिन वह चेहरा न कहीं आता है न जाता है। वह
स्वभावतः जहाँ है वहीं रहता है। देखने वाला यह नहीं कहता कि दर्पण के साथ चेहरा भी चला गया क्योंकि वह
जानता है कि चेहरा जहाँ था वहीं है। उसी प्रकार अज्ञान से जो गया वह ज्ञान होने पर वापस आये ऐसा परब्रह्म
में नहीं होता। परब्रह्म स्वाभाविक रूप से वैसा ही है। उसी प्रकार देखने वाला और दिखानेवाला ये दोनों चले
जाते हैं और वहाँ मेरा जो मूलतत्त्व था वही जनार्दन ने मुझे दिखाया। जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश से सूर्य के ही
कारण सूर्य दिखायी देता है, उसी प्रकार मेरे आत्मप्रकाश से मैं ही स्वयं को देखता हूँ। ऐसे स्थान पर नया ज्ञान
और नया पुराना ज्ञान कैसा? दीर्घकाल से रखे हुए सुवर्ण को सड़ा हुआ कौन कहेगा? कल का ही सूर्य आज
३९४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उदित हुआ उसे बासी कौन कहेगा ? आज का अग्नि यदि शुद्ध है तो क्या कल का अशुद्ध रहा ? उसी प्रकार
सनकादिकों का ज्ञान मराठी भाषा में लाने के लिये यदि कोई दोष देता है तो वह स्वयं दोषी होगा। सुवर्ण का
कुत्ता बनाया जाय तो वह कीमत में कम नहीं होगा उसी प्रकार सनकादिकों का ज्ञान लोक भाषा में लाने से वह
हीन नहीं होगा। जैसे गुड़ का करैला बनाने से वह कडुवा नहीं होता उसी प्रकार हंसगीत मराठी में लाने से
उसका अर्थ बदल नहीं जाता। मुकुट के सुवर्ण का जो मूल्य रहता है वही मूल्य सुवर्ण के श्वान का भी होता है।
ग्राहक दोनों का समान मूल्य देता है। उसी प्रकार जो आत्मानुभवी होंगे वही इस ग्रन्थ का सम्मान करेंगे और जो
आत्मानुभवी नहीं होंगे वे इसकी निन्दा करेंगे। हमारे लिये दोनों ही ब्रह्मस्वरूप हैं। आत्मानुभव का यही सच्चा
अनुभव जनार्दन ने हमें दिलाया है। एका जनार्दन की शरण जाते ही जिस प्रकार नमक समुद्र में मिलाने पर स्वयं
समुद्र रूप हो जाता है, उसी प्रकार एका और जनार्दन एक हो गये यह कौन कहेगा ? आँख का देखने का अपना
धर्म होता है जो स्वयं उसकी आँखों को मालूम रहता है। आँखों का समर्थ दर्शन, आँख ही स्वयं जानती है।
आँखों से दर्पण दिखायी देता है तो आँख को ही आँख दिखायी देती है। उसी प्रकार यह ज्ञान है। जिसे दृष्टि हो
वही दृश्य देखे। अपना अकेलापन छोड़कर एकनाथ जनार्दन की शरण में आया यहीं हंसगीत का निरूपण समाप्त
हुआ।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादश स्कंधे टीकायां
श्रीकृष्ण उद्धव संवादे हंसगीत निरूपण नाम त्रयोदशोध्यायः ॥ १३ ॥
श्रीकृष्णार्पणमस्तु
चौदहवाँ अध्याय
हे स्वामी ! सद्गुरु ! मेरा तुम्हें प्रणाम ! तुम स्वयं ही क्षीरसागर हो। तुम्हारे ज्ञानरूप चन्द्रमा का उदय होने से
प्रत्येक जीव प्रसन्न हो उठता है। जिस चन्द्रमा के सितारों ने हृदयाकाश को प्रकाशित कर घनघोर अज्ञानरूपी
अन्धकार के ताप दूर किये, जिस चन्द्रमा के चन्द्रकिरण तृषाकांत चकोरों के लिये स्वानंदामृत का स्राव कर उन्हें
सहज ही तृप्त करते हैं, अविद्यारूपी अँधेरे में अन्धकाररूपी बन्धनों से जीवों के जो देहरूपी कमल कुम्हलाये
रहते हैं वे जिसके किरणरूपी ज्ञान से आनन्द से मुदित होते हैं, जिस चन्द्रमा का दर्शन होने से जीव के
अंतःकरण में आनन्द होता है और जो अहंकार रूपी चन्द्रकान्त मणियों का तत्काल विलय कर देता है। पूर्णिमा
के दिन पुत्र (शिष्य) के पूर्णत्त्व से पूर्ण वृद्धि हुई यह देखकर क्षीरसागर में ज्वार आता है फिर भी उसके
गुरुगौरव की मर्यादा का उल्लंघन नहीं होता। अद्वयानुभव के कारण अंतःकरण में आत्मानन्द बढ़ता ही रहता है।
सद्गुरुरूप क्षीरसागर अत्यन्त गहरा है। उसकी ओर आदरपूर्वक देखने से उस पर हिलोरें मारने वाली वेदांतरूपी
लहरों में शब्दरूपी ज्ञानरत्न दृष्टिगोचर होते हैं। उसमें विश्वासरूपी मंदराचल पर्वत तथा वैराग्यरूपी वासुकी के
रूप में मथनी को बाँधने वाली डोर, इनकी सहायता से निजधैर्यरूपी देव-दानव समसमान भाव से क्षीरसागर का
मंथन करने के लिये तत्पर रहते हैं। उस मंथन की पहली ही खेप में लय, विक्षेप आदि कालकूट उत्पन्न हुए और
विवेकरूपी महादेव ने आत्मदृष्टि से उन्हें अपने ही गले में निगल लिया। फिर अभ्यास की पुनरावृत्ति से सारे
कर्मों को विश्राम मिला उस समय श्रीकृष्ण जिसके वश हुआ, वह आत्मशान्ति रूपी लक्ष्मी प्रकट हुई। फिर वहाँ
ब्रह्मरस और भ्रमरस इन दोनों से भरा हुआ अमृत कलश जो देव-दानवों को समान रूप से प्रिय है, वह धीरे-धीरे
उस मंथन से बाहर निकला। उसी का बँटवारा करने के लिये श्रीहरि ने मोहिनी रूप लिया और अहंकाररूपी राहु
का शिरच्छेद कर देवताओं को तृप्त किया। वह वृत्तिरूप मोहिनी तत्काल रूप बदल कर नारायण स्वरूप हो
गयी। पहले की देहबुद्धि उसमें नहीं रही। क्षीरसागर का वह नारायण आज भी स्वयं समाधिरूप शेषशयन कर
सुखपूर्वक अत्यन्त संतुष्ट होकर अभी तक लेटा हुआ है। इस प्रकार सद्गुरु ज्ञानरूपी समुद्र है। नारायण आदि
अनेक अवतार सचमुच जिसके कारण उत्पन्न होते हैं, ऐसे उस सद्गुरु का अंत वेदों की भी समझ में नहीं आता।
जिसके सुन्दर ज्ञानरूपी रत्न शंकर और विष्णु के गले में तथा मुकुट पर शोभा बढ़ाते हैं और जिसका वेदपाठों ने
तथा महान कवियों ने वर्णन किया है ऐसे अत्यन्त गम्भीर सुखसागर ! जनार्दन ! अनंत, रूप धारण करने वाले तथा
जिसका अन्त मालूम नहीं हो पाता ऐसे देवता। तुम्हारे परे की वस्तु को कौन जानता है ? विचार की दृष्टि से भी
वह नहीं दिखायी देता, वेद भी उसके स्वरूप का वर्णन नहीं कर सकते तो मेरी मराठी उसका वर्णन करने में
किस प्रकार समर्थ होगी ? देखो ! सार्वभौम राजा के मस्तक पर कोई नहीं बैठ सकता। लेकिन मक्खी को वहाँ
बैठने में कोई कठिनाई नहीं होती। अथवा रानी के स्तन कौन देख सकता है ? लेकिन उसका बालक बड़े प्रेम से
स्तनपान करता है। उसी प्रकार मेरी यह मराठी भाषा भी जनार्दन कृपा के सामर्थ्य से आत्मज्ञान के गले लग कर
ब्रह्मा की भी बातें कर रही है। अस्तु आकाश घट के अन्दर और बाहर व्याप्त रहता है उसी प्रकार शब्दातीत
परब्रह्म शब्दों में ही रहता है। इसलिये प्रस्तुत प्रसंग में व्यर्थ के शब्द घुसाने के लिये स्थान ही नहीं बचा है।
बालक बोलना नहीं जानता इसलिये उसका पिता स्वयं बातें कर उससे बातें कराता रहता है। इस बात को भी
३९६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
उसी प्रकार समझना चाहिये क्योंकि मेरी वाणी को स्वर देने वाला जनार्दन है। उस जनार्दन की कृपादृष्टि से
भागवत देशी भाषा में सुना रहा हूँ। सहस्त्रों ग्रन्थों का अध्ययन करने के उपरान्त भी उनमें भागवत का ज्ञान
दृष्टिगोचर नहीं होता। वही यह श्रीमद्भागवत है। उसमें का 'हंसगीत' नाम का जो ज्ञान है उसे जनार्दन की कृपा
से देशी भाषा में सुनाया। एकनिष्ठा से मेरी भक्ति करने से ज्ञानरूप खड्ग की प्राप्ति होती है और उसी शस्त्र से
संसार की आसक्ति को छेद कर मेरे भक्तों को सायुज्य मुक्ति प्राप्त होती है। मेरे भजन से ही मोक्ष प्राप्त होता है
यह बात उद्धव ने भगवान से सुन रखी थी। उसने मन में विचार किया कि भगवान भजन को ही मोक्ष का साधन
बताते हैं लेकिन ज्ञानी लोग मोक्ष प्राप्ति के लिये भिन्न-भिन्न साधन बताते हैं। तो इन दोनों प्रकारों में मोक्ष प्राप्ति
का श्रेष्ठ साधन क्या है ? वही शंकायुक्त प्रश्न उद्धव ने स्वयं ही श्रीकृष्ण से पूछा।
उद्धव उवाच
वदन्ति कृष्ण श्रेयांसि बहूनि ब्रह्मवादिनः ।
तेषां विकल्पप्राधान्यमुताहो एकमुख्यता ॥ १ ॥
उद्धव ने कहा, हे श्रीकृष्ण ! मोक्षमार्ग के कितने साधन हैं ? वेद वाले तो अनेक साधन बताते हैं। क्या वे
साधन समान योग्यता के हैं कि उसमें एक श्रेष्ठ और एक गौण है ? आपने तो मुक्ति के लिये भक्ति का ही कारण
बताया था।
भवतोदाहृतः स्वामिन् भक्तियोगोऽनपेक्षितः ।
निरस्य सर्वतः सङ्गं येन त्वय्याविशेन्मनः ॥ २॥
भक्त अन्य साधनों की आशा ही नहीं करते। सारे संगों का त्याग करते हैं क्योंकि जिसके योग से तत्काल
आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है ऐसी भक्ति ही मोक्षमार्ग में प्रमुख है। मेरे स्वरूप पर ध्यान रखकर फल की आशा
छोड़ मेरा भजन करना यही मोक्ष का मुख्य साधन है यह बात भगवान ने स्वयं ही कही थी। भगवान ने तो भक्ति
को ही मुख्य साधन बताया था अतः अन्य साधनों से आत्मस्वरूप की प्राप्ति होती है या नहीं यह ईश्वर स्वयं ही
बतायें। इसी प्रश्न का विचार कर भगवान श्रीकृष्ण विवरण के साथ कहने लगे। उन्होंने कहा-ज्ञाता का स्वभाव
त्रिगुणात्मक होने के कारण वह अपनी रुचि के अनुसार साधन स्वीकार करता है। जिस गुण में उसकी रुचि होती
है उसी साधन को वह ठीक मानता है। ज्ञान का अभिमान करने वाले इस प्रकार अनेक साधनों की बातें करते
रहते हैं। उद्धव ! यही परम्परा अनेक दिनों से चली आने के कारण अब मलिन हो गयी है। उसके फल क्षुद्र होते
हैं फिर भी उसी ज्ञान को वे सच्चा मानते हैं। उसका स्पष्ट रूप से श्रवण करो। चौदहवें अध्याय का प्रतिपादन
करते समय श्रीकृष्ण विस्तारपूर्वक इस विषय का निरूपण करेंगे कि ध्यानयोगस्थिति तथा समाधि से युक्त जो
भक्ति है वही सभी साधनों में प्रमुख है। अन्य साधनों में फल की इच्छा रहती है इसलिये वे तुच्छ हैं। इसे
श्रीकृष्ण सात श्लोकों में, अपनी वाणी में सुना रहे हैं।
श्रीभगवानुवाच
कालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंज्ञिता ।
मयाऽऽदौ ब्रह्मणे प्रोक्ता धर्मो यस्यां मदात्मकः ॥ ३ ॥
मेरी वेदवाणी स्पष्ट है। ज्ञानरूपी प्रकाश से वह अत्यन्त उज्ज्वल हो गयी है। प्रलयकाल में जब सत्यलोक
चौदहवाँ अध्याय ३९७
जल कर भस्म हो गया तभी वह नष्ट हो गयी। उस प्रलय में जब ब्रह्मदेव का नाश हो गया तब सच्ची वेदवाणी
सुनाने वाला कोई शेष न रहा। वह पूरी की पूरी डूब गयी। कल्प के प्रारम्भ में वही वेदवाणी मैंने ब्रह्मदेव के
सामने प्रकट की। उसमें मैंने मेरी भक्ति का वर्णन यथार्थ रीति से किया है। वाणी का अनुसंधान जो मेरे स्वरूप में
ही सन्तोष प्राप्त करता है ऐसा वह आत्मज्ञान मैंने ब्रह्मदेव को सुनाया।
तेन प्रोक्ता च पुत्राय मनवे पूर्वजाय सा।
ततो भृग्वादयोऽगृह्णन् सप्त ब्रह्ममहर्षयः ॥ ४॥
उस समस्त वेद का विचार कर ब्रह्मदेव ने पहले मनु को उपदेश दिया, फिर उस मनु से ही सात ऋषियों ने
सम्पूर्ण वेद प्राप्त किया। ब्रह्मदेव ने दक्षादि प्रजापतियों को भी उसी रीति से उपदेश किया। फिर उनसे और
कितने लोगों को वह ज्ञान सम्पत्ति प्राप्त हुई उनकी संख्या बताना सम्भव नहीं है। सप्तऋषियों के नाम पूछोगे तो
वे हैं—भृगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह और ऋतु ये सच्चे ऋषि हैं।
तेभ्यः पितृभ्यस्तत्पुत्रा देवदानवगुह्यकाः।
मनुष्याः सिद्धगन्धर्वाः सविद्याधरचारणाः ॥ ५॥
किंदेवाः किन्नरा नागा रक्षःकिम्पुरुषादयः।
बह्व्यस्तेषां प्रकृतयो रजःसत्त्वतमोभुवः ॥ ६॥
उन अत्यन्त महान ऋषीश्वरों ने पुत्र, पौत्र, नर, किन्नर, देव, दानव, सिद्ध, विद्याधर, चारण, गुह्यक, गन्धर्व,
राक्षस, किंदेव और किंपुरुष आदि अनेकों को उपदेश किया। इतना ही नहीं, अपितु नाग-सर्पादि-तामस योनियों
में भी वह उपदेश परम्परा से प्राप्त हुआ। मुँह के आकार से जो मनुष्य की तरह दिखायी देते हैं किन्तु बाकी
शरीर पशु जैसा होता है ऐसे जो बड़े-बड़े भालू होते हैं उन्हें किंनर कहते हैं और मुँह पुरुष जैसा लेकिन शेष
शरीर चौपायों का ऐसे जो राम के सेवक वे हैं वानर, उन्हें किंपुरुष कहते हैं। पसीना, दुर्गन्ध तथा मलरहित
जिनके बड़े-बड़े भव्य शरीर दिखाई देते हैं और जो मनुष्य तथा देवताओं की तरह दिखायी देते हैं, उन्हें 'किदेव'
कहते हैं। ऐसे नाना प्रकार के व्यक्ति रज, तम अथवा सत्त्वप्रकृति के अनुसार उपदेश प्राप्त होने के कारण
अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार ज्ञान देते रहते हैं।
याभिर्भूतानि भिद्यन्ते भूतानां मतयस्तथा।
यथाप्रकृति सर्वेषां चित्रा वाचः स्रवन्ति हि ॥ ७॥
जिस गुण की प्रकृति होती है, उसी गुण का स्वभाव होता है। जैसा गुण होता है, वैसी ही वासना होती है।
समस्त प्राणिमात्र में जो कम या अधिक भेदभाव उत्पन्न हुआ है वह उस वासना के ही कारण हुआ है। देवत्व,
मानवता अथवा कीटक योनि ये सब वासना के ही प्रकार हैं। वह वासना ही अपनी रुचि के अनुसार प्राणियों में
अनेक प्रकार के भेद उत्पन्न करती है। जिनकी जैसी प्रकृति होती है, उसके अनुसार वे वेद का वैसा ही अर्थ ग्रहण
करते हैं। शिष्यों को वे उसी परम्परा से उपदेश देते हैं। वेद का विचित्र अर्थ लगाना और उसे ही सच मानकर
चलना, गलत साथ करना, गलत साधन रखना तथा विचित्र उपदेश करना यह सब प्रकृति के गुणों का मतभेद है।
एवं प्रकृतिवैचित्र्याद् भिद्यन्ते मतयोर्नृणाम्।
पारम्पर्येण केषांच्चि पाखण्डमतयोऽपरे ॥ ८॥
३९८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
इस प्रकार हमारी प्रकृति अनेक प्रकार के मतों से पुष्ट हुई है यह ध्यान में रखो। वह मतवाद पूर्णतयः ठीक
है यह बात जब मन में धँस जाती है तो वही चित्त में घर कर जाती है। स्वप्न मिथ्या रहता है फिर भी सोये हुए
मनुष्य को वही सच मालूम होता है, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न मतों की बातों को वे सच ही मान लेते हैं। यह
वेदवेत्ताओं की बात हुई। किन्तु जिनका वेदों पर अधिकार नहीं है उन्हें उपदेश परम्परा से चले आ रहे भिन्न-भिन्न
मत ही सच मालूम होते हैं। किसी की विचारशैली वेदों के विरुद्ध रहती है। वे अपने मत के अनुसार पाखण्ड
मत की ही स्थापना करते हैं और वही शिष्यों के मन में भर देते हैं।
मन्मायामोहितधियः पुरुषाः पुरुषर्षभ।
श्रेयो वदन्त्यनेकान्तं यथाकर्म यथारुचि॥ ९॥
उद्धव! विभिन्न प्रकार की वासनाएँ गुणों के अनुसार बनी रहती हैं। इससे पुरुषों की प्रकृति भी भिन्न-भिन्न
हो जाती है। लेकिन इन सबको उत्पन्न करने के पीछे मेरी माया ही है यह निश्चित रूप से जान लो। मेरी ही
माया से श्रेष्ठ लोग भी मोहित हुए हैं, लोगों का विवेक नष्ट हुआ है और उन्हें मोक्षमार्ग का विस्मरण होकर वे
विषय लंपटता की ओर उन्मुख हुए हैं। हे पुरुषश्रेष्ठ उद्धव! सुनो। इस प्रकार लोगों की निष्ठा भ्रष्ट हो जाने के
कारण मोक्ष का द्वार चूक जाता है और वे गलत साधकों के प्रयासों की बात करते रहते हैं। वे अनेक प्रकार के
साधनों की चतुराई जो अपने-अपने मतवाद का प्रतिपादन करती हैं उनका उल्लेख भी श्रीकृष्ण डेढ़ श्लोकों में
करते हैं।
धर्ममेके यशश्चान्ये कामं सत्यं दमं शमम्।
अन्ये वदन्ति स्वार्थं वा ऐश्वर्यं त्यागभोजनम्।
केचिद्यज्ञतपोदानं व्रतानि नियमान् यमान्॥ १०॥
अब इस सम्बन्ध में मीमांसकों का मत है कि काम्यकर्म को निषिद्ध मान कर उसे हटा कर शेष कर्म मुख्य
साधन हैं जिनसे मोक्ष प्राप्त होता है। काव्य, नाटक तथा अलंकार शास्त्र के रचयिता कवित्त्व को ही प्रमुख साधन
मानते हैं। विभिन्न प्रकार की कविताएँ, पद्य और उनकी रचना पद्धति से प्राप्त कीर्ति से ही मोक्ष प्राप्त होता है
ऐसा उनका मानना है। महान कवियों का मत है कि हमारी काव्यकीर्ति के कारण ही हमें सहज ही मोक्ष प्राप्त
होगा। श्रेष्ठ कवियों में इस प्रकार का पागलपन होता है। वात्स्यायन आदि कामशास्त्रियों का अभिप्राय इसके
विपरीत दिखायी देता है। काम के सुखोपभोग से मोक्ष प्राप्त होगा ऐसा उनका मानना है, इसलिये वे सदा
कामसेवन करने के लिये कहते हैं। सांख्य योग के मतावलम्बियों का कहना है कि सत्य, शम, दम आदि जो
सम्पत्ति है, वही मोक्ष का साधन है। उनका यही निश्चय है। नीतिशास्त्रियों के अनुसार सार्वभौम राज्य प्राप्त हो
जाय तो वही मोक्ष है। उसमें साम, दान आदि साधन हैं। किसी का मत है कि चुटिया और यज्ञोपवीत का त्याग
करने मात्र से ही मोक्ष का मार्ग प्राप्त हो जाता है। वे उसी मार्ग को अत्यन्त उत्तम समझते हैं। जो देहात्मवादी हैं
उनका योगमार्ग यही है कि इच्छा के अनुसार मिलने वाले भोगों को भोगना चाहिये। कैसा स्वर्ग और कैसा नर्क !
मरने के बाद कौन जन्म लेता है? किसी के लिये अश्वमेध, राजसूय यज्ञ यही मोक्षमार्ग होता है। मूर्ति की
यथाविधि उपासना करना, उसकी विधिपूर्वक पूजा करना इसी को कुछ लोग मोक्षमार्ग का साधन समझते हैं।
कुछ लोगों का मत है अनेक प्रकार के कष्ट सह कर शरीर का शोषण कर तप करना, यही मोक्ष का सबसे सरल
मार्ग है। कुछ लोग कहते हैं कि दान करना यही मोक्ष प्राप्त करने का श्रेष्ठ साधन है। याज्ञिकों के अनुसार व्रतों
चौदहवाँ अध्याय ३९९
का पालन करके रहना यही मोक्ष का साधन है। कुछ लोगों की विचार शैली के अनुसार व्रत, नियम आदि का
अवश्य पालन करना चाहिये। इस प्रकार अपने-अपने मतों के अनुसार प्रयास कर लोग अनेक प्रकार के साधनों
का महत्त्व प्रतिपादित करते रहते हैं। लेकिन इन सभी प्रकार के साधनों का विचार करने पर ज्ञात होता है कि ये
सब नाशवान हैं। यही बात कृपामूर्ति श्रीकृष्ण उद्धव को बता रहे हैं।
आद्यन्तवन्त एवैषां लोकाः कर्मविनिर्मिताः।
दुःखोदर्कास्तमोनिष्ठाः क्षुद्रानन्दाः शुचार्पिताः ॥ ११॥
फल की आशा और देह का अभिमान त्याग कर जो अपने साधन मुझे अर्पण नहीं करते, उनके साधनों का
फल दुःखस्वरूप होता है यह स्मरण रखो। वे बार-बार जन्म-मरण देते हैं। उन साधनों को जो साध्य करते हैं वे
सब नाशवान और क्षणिक होते हैं। उस लोक का जो सुख होता है वह शक्कर में मिले हुए विष की तरह होता
है। उसमें मिठास रहती है किन्तु उसमें मृत्यु अटल रहती है। उसके अनुसार उस लोक का आनन्द भी क्षुद्र और
शोक का कारण होता है। जो अपने ही कर्म से मलिन हो गये उन्हें सुख किस बात का होगा ? उसमें निरन्तर
बढ़ता जाने वालो दुःख ही रहता है और अद्यतम नरक की प्राप्ति ही उसका अन्तिम परिणाम होता है। जो मन
भोगों के प्रति आसक्त होता है उसे सदा विषयों की ही चिन्ता लगी रहती है। उन विषयों की आसक्ति के कारण
ही तमोगुण की वृद्धि होकर वह अधःपतन की ओर जाता है। लेकिन इन्हीं साधनों से जो प्रेमपूर्वक मेरी भक्ति
करेगा, उस भक्ति का स्वरूप श्रीकृष्ण स्वयं बता रहे हैं।
मय्यर्पितात्मनः सभ्य निरपेक्षस्य सर्वतः।
मयाऽऽत्मना सुखं यत्तत् कुतःस्याद् विषयात्मनाम् ॥ १२ ॥
भक्ति से प्राप्त होने वाले आत्मसुख का महत्त्व बताने के लिये ही भगवान ने उद्धव को सम्बोधित करते हुए
कहा, "उद्धव ! भक्तिसुख का पात्र होने वाले भाग्यवान सचमुच तुम ही हो। इसे भक्तिसुख का भाग्य प्राप्त हुआ है
इसलिये इसे 'सभ्य' कहना उचित है ऐसा भगवान के मन में आया और 'हे सभ्या!' जैसा सम्मानसूचक सम्बोधन
देकर भगवान भक्ति सुख का वर्णन करने लगे। मेरे स्वरूप को प्राप्त करने के लिये इहलोक की भोगासक्ति से वैसे
ही दूर करना होगा जिस प्रकार रजस्वला स्त्री पति को स्पर्श नहीं करती और उससे दूर रहती है। मेरा ही अनुसंधान
साध्य कर लेने से उसकी वासना परलोक का स्पर्श ही नहीं करती। वह ब्रह्मलोक का भी धिःकार करती है फिर
औरों की क्या बात है ? ऐसी निरपेक्षता से मेरा भजन करते-करते जब अंतःकरण में प्रेम उत्पन्न होने लगता है तो मैं
उनमें अपने आप ही आत्मस्वरूप में प्रकट हो जाता हूँ। वास्तव में यहाँ 'मैं प्रकट होता हूँ' यह कहना भी व्यर्थ है
क्योंकि मैं सदा हृदय में ही वास करता रहता हूँ। जब चित्तवृत्ति निर्विकल्प हो जाती है तभी मैं दिखायी देता हूँ।
बादल दूर हटते ही उसके पीछे छिपा हुआ सूर्य भी दिखायी देने लगता है उसी प्रकार विषयावस्था दूर होते ही मैं भी
प्रकट हो जाता हूँ। उसी प्रकार भक्तों के भावार्थ तथा भक्ति सामर्थ्य से जब मैं प्रकट होता हूँ तो भक्त के मन में
विषय की बात ही नहीं आती। विषयावस्था छोड़कर जब चित्त मत्स्वरूप की ओर लग जाता है तो भक्तों को अपने
आप ही मत्स्वरूप प्राप्त होता है। लौह का स्पर्श पारस से भले ही एक ओर से ही हो लेकिन पूरा लौह सुवर्ण बन
जाता है। उसी प्रकार जब मेरे भक्त मेरे ही ध्यान में लीन हो जाते हैं तो उनका सर्वांग ही ज्ञानमय हो जाता है। उस
समय भक्तों को जो सहज सुख प्राप्त होता है उसे नापने का क्या मापदण्ड हो सकता है ? जिस आत्मसुख की प्राप्ति
के लिये शंकर ने श्मशान में रहना स्वीकार कर लिया वह सुख ब्रह्मदेव को कैसे प्राप्त होगा ? इसीलिये उसे मैंने
४०० श्रीमद् एकनाथी भागवत
बताया। भक्त जब मेरे सुख का उपभोग करते हैं तो देहादि जन्म-दुःख भूल जाते हैं। वे भूख-प्यास भी भूल जाते हैं।
आत्मसुख से वे ओतप्रोत हो जाते हैं। ऐसे आत्मसुख का माधुर्य भला विषय लंपट लोगों को कैसे मिल पाएगा?
लाखों रुपया खर्च करने पर भी उन्हें उस सुख की एक कौड़ी प्राप्त नहीं होगी। धन, धान्य, पुत्र, सगे-सम्बन्धी
आदि सर्वस्व देने पर भी उस सुख का कण भी उन्हें प्राप्त नहीं होता। इतना ही नहीं बल्कि जब सत्यलोक में रहने
वाले लोगों को भी वह सुख नहीं प्राप्त होता तो औरों की क्या कथा? फिर ब्रह्मदेव को भी वह सुख कैसे
मिलेगा? मुझ आत्मा को सुख की प्राप्ति होने से सारे इन्द्रिय सुखस्वरूप हो जाते हैं। उस सुखस्थिति का एक
सहस्रांश भी स्वर्गादि लोक के लोग नहीं प्राप्त कर सकते। अपने निष्काम, निर्लोभ तथा गर्वहीन भजन करने वाले
निर्मत्सरी तथा निरभिमानी भक्तों को मैं अपना पूर्ण सुख देता हूँ इसे ध्यान में रखो। सचमुच देश और काल की सीमा
से परे मेरे अगाध आत्मसुख पर मेरे भक्तों का वास रहता है।
अकिंचनस्य दान्तस्य शान्तस्य समचेतसः।
चौदहवाँ अध्याय ४०१
के साथ समुद्र से घिरी हुई सारी पृथ्वी का साम्राज्य स्वयं ही सामने आ जाय तो मेरे भक्त उस पर थूकते हैं। नरक
में पड़े हुए चने सुअर को भले ही अच्छे लगें लेकिन बुद्धिमानों को उसे देखकर घिन लगती है। उसी प्रकार मेरे
भक्तों ने सार्वभौम राज्य का भी त्याग किया रहता है। रसातल आदि सभी पातालों में अमृतादिक सभी भोग प्राप्त
होने पर भी मेरे भक्त उन पर लात मारते हैं। मुँह में रखे हुए अमृतफल को फेंक कर कोई बुद्धिमान पुरुष घास
का गोला नहीं खायेगा। उसी प्रकार मेरा सौख्यलाभ छोड़कर मेरे भक्त रसातलादिक सुख भोगों की ओर नहीं
जाते। जहाँ देवतागण, महान पुरुष तथा नाग भी वन्दन करते हैं वह श्रेष्ठ अमरावती प्राप्त होने के बाद मेरे भक्त
उसका उसी प्रकार त्याग करते हैं जिस प्रकार लोग कस्तूरी मिलने पर मिट्टी फेंक देते हैं अथवा मेरी भक्ति से
सुखसम्पन्न होने वाले मेरे भक्तगण इन्द्रादिक देवताओं को वंद्य ब्रह्मलोक को भी तुच्छ मानते हैं। मट्ठा और दूध
आँखों को सफेद ही दिखायी देता है लेकिन ज्ञाता दूध ही होठों से लगाते हैं और मट्ठा रख देते हैं। उसी प्रकार
जो मूर्ख हैं वही सत्यलोक और भक्ति के सुख को एक समान कहेंगे। लेकिन मेरे जो भक्त भक्ति से शुद्ध रहते हैं
वे सत्यलोक का धिःकार ही करते हैं अथवा इन्द्र पद, ब्रह्मलोक, पाताललोक के ऐष आराम, अमृतपान ये सब
एक साथ प्राप्त कराने के लिये सारी सिद्धियाँ तैयार हो जाएँ या जिन महासिद्धियों को प्राप्त करने में योगी सारी
विधियाँ करके थक जाते हैं वे भी यदि सामने खड़ी हो जाएँ तो भी सद्बुद्धिवाले भक्त उनका स्पर्श नहीं करते।
उद्धव! मेरे भक्त उन अणिमादिक सिद्धियों पर लात मार कर मेरे भक्तिमार्ग पर लग गये हैं। इन सिद्धियों की कथा
का क्या वर्णन करें? किन्तु सलोकता, निकटता अथवा मेरा स्वरूप देने वाली सायुज्यता भी यदि उन्हें दी जाय तो
भी मेरे भक्त सलोकातादि मुक्ति कभी ग्रहण नहीं करते। जिसके आगे काल की सत्ता भी नहीं चलती, जिसमें
जन्म-मरण के फेरे नहीं होते, वह सायुज्यता मुक्ति भी मेरे भक्त स्वीकार नहीं करते। पहले अलगाव स्वीकारे और
फिर सायुज्यमुक्ति से एक हो जायें यही बात असंगत है। इसलिये मेरे भक्त सायुज्य मुक्ति कभी स्वीकार नहीं
करते। भक्ति के सुख से ही उनकी वृत्ति प्रसन्न रहती है इसलिये उन्हें मेरी भक्ति ही अच्छी लगती है। चारों
मुक्तियाँ चरणों पर गिर पड़े, फिर भी मेरे भक्त उन्हें स्वीकार नहीं करते। लोकों में नहीं समाते। मेरे सिवा चारों
मुक्तियों से जो सुख प्राप्त होता है उसे मेरे भक्त कभी ग्रहण नहीं करते क्योंकि वे मेरी अभेद भक्ति से सराबोर
रहते हैं। मेरे सिवा जो भी कोई सुख रहता है उसे वे तुच्छ समझ कर छोड़ देते हैं। मेरे भक्तों को मेरे भजन में ही
अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है। अब शायद तुम यह सोचोगे कि भक्त निरे पागल हैं, उन्हें तुम्हारे भजनों में ही
आनन्द प्राप्त होता है। परन्तु तुम्हें उनके प्रति चाह या गहरी प्रीति नहीं होगी। किलनी को भैंस अच्छी लगती है
लेकिन भैंस किलनी को नहीं चाहती, उसी प्रकार भक्तों को तुमसे प्रेम हो लेकिन तुम्हें उनसे प्रेम न हो। भव्य,
भजन और भजनेवाला यह त्रिकुट ही मूलतः अविद्या से उत्पन्न है अर्थात् मिथ्या है अतः ऐसे अविद्यायुक्त
भजनमार्ग में तुम्हें रुचि न हो। जिस प्रकार स्वप्न मिले निमंत्रण पर कोई जागृत होने पर भोजन करने नहीं जाता
उसी प्रकार अविद्यायुक्त मिथ्या भजन से तुम प्रेम करो यह संभव नहीं है। इस शंका का सारांश जानकर भगवान
कहते हैं कि यदि भजन में भक्त की भक्ति शुद्ध हो तो वहाँ मुझे भी अत्यन्त प्रेम रहता है। मुझसे जो जैसा
व्यवहार करता है, उससे मैं भी वैसा ही व्यवहार करता हूँ। भक्त को मेरे प्रति अनन्य भक्ति रहती है इसलिये मैं
भी उस पर अनन्य भक्ति रखता हूँ।
न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शंकरः।
न च संकर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान् ॥ १५॥
मेरे भक्तों का मुझ पर कितना प्रेम है यह मैं श्रीकृष्ण ही जानता हूँ। उस प्रीति की उपमा देने के लिये
४०२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
त्रिभुवन में कोई वस्तु नहीं है। मेरी भक्ति से जो मुझसे अनन्य हो जाता है, तभी उसका अज्ञान समाप्त हो
जाता है। ऐसे भक्तों की मुझसे जो प्रीति होती है वह कितनी है यह कैसे बताऊँ ? ब्रह्मदेव तो मेरा पुत्र ही है।
उसके सारे लाड़-प्यार मैं करता हूँ। लेकिन भक्तों की वैसी प्रबल प्रेमलहर वहाँ नहीं उठती। मैंने ब्रह्मदेव को
कर्मयोग दिया और भक्तों को निष्कर्मता दी। इसीलिये ब्रह्मदेव की प्रार्थना पर भी मैं वहाँ नहीं गया और
ग्वालों के घर का भात खाया। ब्रह्मदेव को नीचा दिखा कर मैं तो बछड़ा और ग्वाल बना। सारांश, मेरे भक्तों
जैसी प्रीति मुझे ब्रह्मदेव के प्रति भी नहीं है। ब्रह्मदेव की बात तो है ही, बलराम तो मेरा बड़ा भाई है लेकिन
भक्तों जैसी प्रीति सचमुच उससे भी नहीं है। कौरवों से जा मिले बलराम को नीचा दिखा कर मेरे भक्त
पाण्डवों का मैंने संरक्षण किया। जब भीष्म ने प्रतिज्ञा की तो समरभूमि में मैंने ही पीछे हट कर भक्तशिरोमणि
धनुर्धारी अर्जुन को तुम्हारे सामने बचाया। लक्ष्मी मेरी पटरानी है लेकिन उसे मैंने अपने चरणों के पास सेवा
करने बिठाया और भक्तों में अग्रगण्य गोपियों और ग्वालिनों को कन्धे पर बिठाया। जो लक्ष्मी का पूर्णरूप से
तिरस्कार करते हैं वही मेरे लिये प्रीति से पूज्य हैं। जो मुझसे लक्ष्मी की माँग करते हैं उन्हें न लक्ष्मी ही
मिलती है न लक्ष्मीपति ही। सचमुच लक्ष्मी की उपेक्षा करने वाले भक्त ही मुझे अच्छे लगते हैं। शंकर मेरा
प्रिय है। लेकिन उससे भी अधिक प्रीति मुझे ऐसे भक्तों से होती है। जिस महादेव के गुण से मुझे भी अपने
शरीर पर साँवला रंग धारण करना पड़ा और जिस महादेव के कहने से मुझे दूसरी बार मोहिनी का रूप धारण
करना पड़ा उस मोहिनी के दर्शन में ही मैंने शंकर को तत्काल मोहित किया और रुक्मांगद को आधे क्षण में
ही उस मोहिनी से बचाया। इस प्रकार मेरे भक्तों की अपेक्षा शंकर भी मुझे अधिक प्रिय नहीं है। त्रिभुवन में
भक्तों के सिवा मुझे कुछ भी प्रिय नहीं है। वेदशास्त्रों में मेरी अत्यन्त पवित्र चतुर्भुज मूर्ति का वर्णन है।
लेकिन वही मैं अपने हृदय पर मेरे भक्त के पैरों के चिह्न (भृगुपदचिह्न) धारण करता हूँ। मुझे अपने देह से
भी प्रीति नहीं है, इसीलिये मैं बड़े आनन्द से ग्वाला बना और जंगल पर्वतों में गायें चराता रहा। इतना ही
नहीं बल्कि भक्तों की घोड़ियों को भी नहलाया। मैं स्वेच्छा से परिपूर्ण हूँ फिर भी प्रेमिल भक्तों के लिये सदा
सकाम रहता हूँ। प्रेमिल भक्तों की परम भक्ति देखते ही मैं आत्माराम वहाँ कूद पड़ता हूँ। प्रेमिल भक्त को
देखते ही मैं उसे अपने साथ ले आता हूँ और अगर ऐसा न हो सके तो मैं उसे परमोत्त्व सुख अर्पण करता हूँ
और अगर वह भक्त मेरे पास न आये तो मैं उसका चाकर बनकर रहता हूँ। बड़प्पन की मानमर्यादा छोड़ मैं
अपने भक्तों की जूठन तक उठाता हूँ। भक्त कार्य के लिये उसके संकट में मैं अपने प्राण तक न्योछावर कर
देता हूँ। हे उद्धव! तुम्हारे जैसे भक्त के लिये मैं अपने देह की भी उपेक्षा करता हूँ। वे भक्त मुझे दिन-रात
अच्छे लगते हैं। वे जीवभाव से मेरे लाडले हैं। प्रेम से मेरा भजन करने के कारण वे भक्त मुझे पूज्य बन गये
हैं। उन भक्तों के लक्षण श्रीकृष्ण स्वयं बताते हैं।
निरपेक्षं मुनिं शान्तं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यङ्घ्रिरेणुभिः ॥ १६ ॥
एकनिष्ठा से मेरा भजन करने से मन मेरे ही स्वरूप पर जम जाता है और समस्त वासनायें नष्ट होकर
वृत्ति शून्य हो जाती हैं। बिना किसी प्रकार का परिश्रम किये, किसी से याचना किये बिना, अपने आप मिला
हुआ धन हाथ से लेने में निरपेक्षता नष्ट होती है। फिर धन देखकर जो झुका उसे लालच ने झुका ही दिया।
इसलिये ऐसे धन की भी उपेक्षा कर जो वहाँ से चला गया वही मुझे पूर्णरूप से वन्दनीय है। रास्ते में पैसा
चौदहवाँ अध्याय ४०३
पड़ा हुआ और उसे अपना कहने वाला कोई न हो उसे भी यदि कोई अपने हाथ से उठाता है तो उससे
निरिच्छता नष्ट होती है। इच्छाशून्य स्थिति का नाम ही निरपेक्षता है। अब उस समय जो मननशीलता प्राप्त
होती है, उसे यथार्थ रूप से बताता हूँ। वेदशास्त्रार्थ ने मेरे जिस स्वरूप को प्रामाणिक माना है वह मेरा
अत्यन्त शुद्ध स्वरूप है, यह जान लो। उस स्वरूप के प्रति धारणा रखना इसी को मनन कहते हैं। उस स्वरूप
का विचार करते-करते मन ही स्वस्वरूपाकार हो जाता है। अर्थात् बिना धारणा के ही मनन होता है और
बिना किये ही स्मरण होता है। इसी का नाम है सच्ची मननशील स्थिति। इसे पूर्णरूप से सच मान लो। अब
इसके आगे शान्ति का स्वरूप बताता हूँ। सुनो। काम, क्रोध और लोभ का समूल उन्मूलन हुए बिना ही देह में
जो स्थिरता उत्पन्न होती है, वह यहाँ शान्ति नहीं हो सकती। मन में मत्स्य पर लक्ष स्थिर कर बगुला ध्यानस्थ
होकर बैठता है लेकिन उसके अंतःकरण में लोभ होने के कारण उसे शान्ति कौन कहेगा ? देह को देह का
भी भान न रहना, काम, क्रोध और लोभ का विलय हो जाना, ऐसी शान्ति किसी भाग्यवान को ही प्राप्त होती
है। इसी का नाम है, मुख्य शान्ति। हे उद्धव! मैं भी ऐसी ही शान्ति को मानता हूँ। अब इसके बाद तुम्हें
समता का रूप बताता हूँ, सुनो। समस्त प्राणि विविध प्रकार के हैं और उनके नाम भी अलग-अलग हैं। यह
सारा संसार ही विचित्र आकारों के कारण विषम बना हुआ है। लेकिन उन सब में परब्रह्म समान रूप से भरा
हुआ है। उठा-पटक में श्रम न कर, बिना तोड़-फोड़ किये, मेरे भक्तों को भक्ति के योग से ही सर्वत्र समानता
दिखायी देती है। मेरी भक्ति से समानता प्राप्त होते ही प्राणियों में भेद बुद्धि ही नष्ट हो जाती है। वह सहज
ही भेदभाव रहित हो जाता है। उसे सहज ही निर्वैरता प्राप्त होती है। जब तक द्वैत का भान रहता है, तभी
तक विरोध के लिये कोई कारण होता है। जब सर्वत्र एक ही व्याप्त है तो फिर बैरी कौन होगा? क्या कभी
आकाश आकाश से झगड़ा कर सकता है? या चन्द्र चन्द्र से ही लड़े? या वायु वायु को ही रोकेगा? या जीभ
ही जीभ के दो टुकड़े करेगी? भेद नष्ट होने का ही अर्थ है बैररहित होना। निरपेक्षता और मेरा मनन, शान्ति
और समदृष्टि तथा बैर रहित होना ये पाँच लक्षण मुख्य हैं। इन पाँच लक्षणों में से एक निरपेक्षता भी हाथ
लग जाय तो सायुज्यता मुक्ति पैर छूती है और ब्रह्मस्वरूप मन में स्थिर हो जाता है। निरपेक्ष मनुष्य का मन
स्थिर रहता है। जो निरपेक्ष है वह बैररहित है इसे समझ लो। जो निरपेक्ष है वही परिपूर्ण शान्त रहता है।
इसलिये मैं भी निरपेक्ष की ही सेवा करता हूँ। गिरि-कन्दराओं में गये बिना, विकट साधन सहन किये बिना
यदि ये पाँच साधन हाथ में आ जाएँ तो उनसे ही विश्व का उद्धार होगा। ऐसे भक्तों का दर्शन होने से लोग
तर जायेंगे इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। उनका केवल नामस्मरण करने से ही जड़ जीवों का उद्धार होगा। ये
पाँच लक्षण प्राप्त होने पर मेरे भक्तों को मुझसे भी अधिक पवित्रता प्राप्त होती है। मैं भी उनकी चरणधूलि
का वन्दन करता हूँ। समुद्र का पानी जब मेघ बनता है तभी उसमें माधुर्य आता है और वह सारे संसार को
शीतल करता है और अकाल का संकट दूर करता है। वही जल यदि समुद्र में रह जाय तो उसका कोई
उपयोग नहीं होता। उसी प्रकार मेरे भक्तों को मुझसे भी अधिक पवित्रता प्राप्त होती है। यदि केले का पेड़
खाने लगे तो उसमें कोई स्वाद नहीं होता लेकिन उसके केले अत्यन्त सुस्वादु होते हैं। उसी प्रकार मुझसे भी
अधिक मेरे भक्तों में पवित्रता बढ़ जाती है। मुझमें जो पवित्रता आयी है वह मेरे भक्तों के कारण ही है।
इसीलिये मैं अपने भक्तों के पीछे-पीछे उनके चरणों की धूल का वन्दन करने के लिये दौड़ता रहता हूँ। मेरे
चरणों का तीर्थ साक्षात शंकर भी अपने मस्तक पर धारण करते हैं। सारांश मेरे भक्तों का जो सुख है वह सुख
की दृष्टि से अलौकिक है। वह सुख और कोई नहीं जानता और उसका वर्णन करने में वाणी भी असमर्थ है।
४०४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
निष्किंचना मय्यनुरक्तचेतसः शान्ता महान्तोऽखिलजीववत्सलाः।
कामैरनालब्धधियो जुषन्ति यत् तन्निरपेक्ष्यं न विदुः सुखं मम ॥ १७॥
जिनके पास मेरे सिवा फूटी कौड़ी भी नहीं है, वे मेरे सिवा इस संसार में किसी और को देखते ही नहीं
हैं। इस प्रकार मेरा भजन करने से जाति, कुल और देह का अभिमान सहज ही नष्ट हो जाता है। इसी का नाम है
'अकिंचन' और मेरे स्वरूप में मन तल्लीन रहता है इसलिये वहाँ आत्मशांति भी पूर्ण रूप से वास करती है।
ऐसी आत्मशांति में जब भक्ति परिणत हो जाती है समस्त प्राणीमात्र में उसे मेरे सिवा दूसरा स्वरूप दिखायी ही
नहीं देता। जिधर-जिधर भी जीव देखता है वहाँ वह स्वयं को मद्रूप हुआ देखता है। उस पूर्व परिचित आनन्द से
वह स्वाभाविक रूप से प्रेम करने लगता है। इस मद्रूपस्थिति से जीव मात्र पर अनन्य प्रीति होती है। इस प्रकार
मेरी ही भावना से मेरी भक्ति करने का नाम है 'महंत स्थिति'। इस प्रकार सर्वत्र मेरी भावना रखने वाला जब मेरा
भक्त हो जाता है तो उसमें होने वाले सभी कामादिक दोषों का लोप हो जाता है। सूर्य जब पूर्व दिशा में आता है
तो सभी नक्षत्र समुदाय लुप्त हो जाता है उसी प्रकार भक्ति के उदयकाल में कामादिकों की होली जलती है। काम
की निवृत्ति होने पर सहज ही निर्विषय स्थिति प्राप्त होती है और तब मेरे सुख का सुखलाभ होकर वे उस सुख
में निमग्न रहते हैं। देश, काल अथवा वेदों को भी जिस सुख की थाह नहीं लगती, उस सुख के सुखदायी वैभव
का मेरे भक्त सदा उपभोग करते हैं। जिस सुख का लाभ होने से चित्त की वृत्तियाँ शान्त हो जाती हैं, उस सुख से
सारे अवयव आनन्दमय हो जाते हैं। मेरे भक्तों को सुख की इतनी अधिक प्राप्ति होती है। मोक्ष सुख में भी इस
सुख का माधुर्य नहीं है। सचमुच हरिभक्त धन्य हैं। ऐसे सुख के लिये साधक लोग जी जान से प्रयत्नशील रहते
हैं। तपादि साधनों के चक्कर में शरीर को यातना देते हैं। विषयों पर अंकुश लगाते हैं। कोई योगयाग करते हैं,
कोई शास्त्रों का अभ्यास करते हैं, कोई सब कुछ त्याग कर देते हैं, कोई घर और पत्नी का संग छोड़ देते हैं, कोई
फलों का आहार करते हैं तो कोई निराहार रहते हैं, कोई नग्न स्थिति में रहते हैं, कोई ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते
हैं, कोई गिरिकन्दराओं में रहते हैं, कोई पर्वत की चोटी पर जाकर बैठते हैं, कोई पर्वत की गुफा में बैठते हैं।
कुछ लोग जटाएँ बढ़ाते हैं तो कोई जटाओं में गाँठ बाँधकर उनका जूड़ा बनाते हैं। कोई अपने नाखून बढ़ाते हैं,
कोई हठयोग का साधन करते हैं तो कोई उन्मत्त पिशाच की तरह स्वैराचार करते हैं। कुछ लाल रंग के कपड़े
पहन कर खुले सिर रहते हैं तो कोई शरीर पर चिथड़े पहनते हैं। कोई तीर्थयात्रा कर शरीर को कृश बनाते हैं तो
कोई मौन धारण कर गूँगे बने रहते हैं। कुछ लोग शरीर में भभूत लगाते हैं तो कोई लगातार बक्बक् करते रहते
हैं। किसी को पानी का ही पागलपन रहता है। कुछ दर्भ तथा मृत्तिका में ही लीन रहते हैं। ऐसी अनेक पद्धतियाँ
हैं जिनमें साधक कितने जर्जर होते हैं इसकी कोई गिनती ही नहीं है। लेकिन सचमुच मेरे भजन का लाभ इनमें
से किसीं को भी नहीं होता। उस सुख के दर्शन उन्हें स्वप्न में भी नहीं होते इतने वे उस सुख से वंचित हो जाते
हैं। चन्द्रमा के किरणों से निकलने वाला अमृत जिस प्रकार कौओं को दुर्लभ रहता है, उसी प्रकार मेरा सच्चा
आत्मसुख अभक्तों को सचमुच प्राप्त नहीं होता। गोथन में लगी किलनी को रक्त ही अच्छा लगता है। बेचारा
नजदीक के ही दुग्ध का सेवन नहीं कर सकता। उसी प्रकार मेरी भक्ति छोड़कर अनेक प्रकार के साधनों से जो
व्यर्थ ही कष्ट भोगते हैं, उन्हें हे उद्धव! मेरे आत्मसुख की प्राप्ति नहीं होती। जिन्होंने मेरे भजन की प्रीति से
भक्ति की पौध को सींचा उन्हें ही सचमुच मेरे आत्मसुख की प्राप्ति हुई। मेरे उस आत्मसुख में बासीपन की बात
ही नहीं है। कल्पांत में भी कोई उससे नहीं ऊबेगा और वहाँ इन्द्रियों की कोई बाधा भी नहीं है। देखो! विषयों
का सुख इन्द्रियों के अधीन होता है। किन्तु पवित्र भक्तिसुख किसी के अधीन नहीं होता और जो भाग्यवान है
चौदहवाँ अध्याय ४०५
उन्हीं को वह प्राप्त होता है। देखो ! जिस सुख का उपभोग लेते समय देही भी विदेही हो जाता है, वह सुख मेरे
भक्तों में प्रकट होते ही वह कभी कम नहीं होता। इस प्रकार के ये उत्तम भक्त जब सुखी हो जाते हैं तो इसमें
आश्चर्य कैसा ? लेकिन जो केवल विषयी थे, उन्हें भी मेरे भजन से सुख की प्राप्ति हुई। सौभाग्य से सत्संग प्राप्त
हुआ हो और मन में आस्तिक बुद्धि उत्पन्न होकर मेरे प्रति अनन्यभाव उत्पन्न हुआ तो मेरी थोड़ी-सी भक्ति से भी
विषयों की निवृत्ति होती है।
बाध्यमानोऽपि मद्द्क्तो विषयैरजितेन्द्रियः।
प्रायः प्रगल्भया भक्त्या विषयैर्नाभिभूयते ॥ १८ ॥
मेरे प्रति एकनिष्ठ प्रेम रखने वाले तथा प्रेमयुक्त भजन करने वालों को विषयों की बाधा सतायेगी, यह
विचित्र बात क्या सम्भव है ? प्रेम से मेरी भक्ति करने पर विषय वासनायें जल जाती हैं। वहाँ विषयों के प्रति
रुचि जगेगी इसे कौन स्वीकार करेगा ? दर्पण को चूर्ण से साफ करने पर वह निर्मल हो जाता है। उसी प्रकार
भक्ति के योग से विषय धुल जाते हैं। अतः ऐसे स्थान पर विषय की आसक्ति बढ़ेगी यह बात ही बचकानी और
क्षुद्र है। जो पूर्णतयः विषयासक्त रहता है तथा प्रपंचयुक्त होकर संसार में मग्न रहता है वह भी अगर प्रसंगवश
भक्त हो गया तो विरक्त होता है। उसके बारे में भी सुनो। मन को भक्ति अच्छी लगे और विषयों की इच्छा भी
नष्ट नहीं हुई है ऐसे संकट में फँस जाने पर मेरी भक्ति का ही आश्रय करना चाहिये। विषयासक्ति को गौण
समझना चाहिये। उसे विषयासक्ति से भी विरक्ति हो सकती है। उसका उपाय बताता हूँ, सुनो। नमक से पानी
मिल जाने पर वह उसे तत्काल घोल कर अदृष्य कर देता हैं उसी प्रकार भक्ति जब बहुत अधिक बढ़ जाती है तो
वह विषयों का जाल तोड़ देती है। इस प्रकार भजन के अभ्यास से विषयों से बिछोह हो जाता है तथा आत्मसुख
का लाभ होकर आत्मानंद से मुलाकात होती है। मुझे विषय से निवृत्ति चाहिये लेकिन उसके लिये मैंने भक्ति नहीं
की, तो किस प्रकार मुझे विषयों से विरक्ति मिलेगी ? इसका उत्तर श्रीकृष्ण दे रहे हैं। दीपक से आग भड़के तो
वह घर को तथा शहर को भी जला देगी। वैसा ही प्रकार है यह।
यथाग्निः सुसमृद्धार्चिः करोत्येधांसि भस्मसात् ।
तथा मद्विषया भक्तिरुद्धवैनांसि कृत्स्नशः ॥ १९ ॥
दीप जलाने के लिये आग जलाई तो एक चिनगारी जंगल के फूस में लग गयी जिससे आग जलाने वाले
के न चाहने पर भी एक के बाद एक झोपड़े, घर, गाँव, शहर, मन्दिर तथा पर्वत शिखर सभी जलकर भस्म हो
जाते हैं। उसी प्रकार मेरी जरा सी भी भक्ति अगर श्रद्धापूर्वक मन में प्रवेश करे तो संचित तथा नित्य होने वाले
पापों की राशियाँ पूरी तरह भस्म हो जाती हैं। पूर्व पापों का मल चित्त को अत्यन्त कस कर चिपका रहता है
जिससे चित्त अत्यन्त चंचल होकर सदा विषयों के लिये व्याकुल रहता है। उसे यदि मेरी भक्ति का थोड़ा-सा
अंश भी मिल गया तो उतने से ही पूर्व पातकों का संग्रह नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार दीपक के स्पर्श से कपूर
तत्काल पूरी तरह नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार वह भस्म हो जाता है। चित्त इस प्रकार निर्मल हो जाने पर वहाँ
सदा ब्रह्म प्रकट हो जाता है। फिर वह चित्त विषयासक्त नहीं होता। इच्छा न करने पर भी वह अपने आप विरक्त
हो जाता है। भक्ति के अंशमात्र की इतनी बड़ी महिमा है। हे भक्तोत्तम उद्धव ! मेरी सम्पूर्ण भक्ति की महिमा कौन
जान पायेगा ? वेदशास्त्रों के लिये भी वह अतर्क्य है। मेरी भक्ति अलक्ष्य होने के कारण वह दिखायी नहीं देती।
अतर्क्य होने के कारण शास्त्रमीमांसा द्वारा भी उसके सम्बन्ध में तर्क नहीं हो सकता। अगाध होने के कारण
४०६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
अथक साधनों के बाद भी उसका आकलन नहीं होता। मेरी भक्ति की थाह स्वयं मुझे भी नहीं लग पाती।
इसीलिये मैं भक्तों का आज्ञाधारक बन कर रहता हूँ। उनके शब्दों का जरा भी उल्लंघन नहीं करता। भक्तों की
महिमा अगाध है इसलिये मैं भी उनकी सेवा करता हूँ। भक्त ने मारी हुई लात मैंने अपने हृदय पर धारण की।
भक्तों के चरणों की धूलि मैं माथे पर लगाता हूँ। भक्त कहलाना बहुत अच्छा लगता है लेकिन भजन का स्वरूप
अत्यन्त विकट है। भक्ति का रहस्य अत्यन्त गूढ़ है। श्रुति शास्त्रों के भी वह ठीक से समझ में नहीं आता। कंजूस
व्यक्ति कितनी ही दूर क्यों न जाये लेकिन घर में रखी हुई निधि को वह अपने मन में सुरक्षित रखता है। उसी
प्रकार वह सदा सर्वदा मेरी प्रीति अपने अंतःकरण में सुरक्षित रखता है या बहुत दिन के बाद जब किसी स्त्री को
गर्भ रह जाता है तो वह सुन्दरी जिस प्रकार आनन्दपूर्वक उसका पालन पोषण करती है उसी प्रकार जब हृदय में
मेरे प्रति प्रेम जगता है अथवा बाँझ स्त्री जब गर्भवती होती है उसी प्रकार उसके मन में मेरे प्रेम का उत्सव मनाने
की इच्छा होती है और अंतःकरण से प्रेमविह्वल होकर पहले से भी अधिक उत्कर्ष से उल्हास बढ़ता जाता है।
अथवा भाग्यवान जामाता घर आने पर जिस प्रकार सास उसका स्वागत करने में किसी बात की कमी नहीं रहने
देती, अथवा बीज जितनी अधिक पैदावार देता है उतना ही किसान का उल्हास बढ़ता है, अथवा गुणवान, सुन्दर
और श्रीमान पति के घर से जाने पर उसकी पत्नी उसके लिये छटपटाती है, उसी प्रकार मेरे लिये उसके मन में
बेचैनी बढ़ने लगती है। उद्धव ! इसी का नाम है मेरे प्रति सच्ची भक्ति। जिस भक्ति के भुलावे में मैं लक्ष्मीकांत
भक्तों के हाथ में हूँ। मेरे लिये चाह बढ़ने से प्रीति उत्पन्न होती है। उद्धव को सीने से लगाकर भगवान उससे
बताने लगे कि जिसके पास मैं सदा रहता हूँ वह मेरी भक्ति ऐसी रहती है। संसार सागर को पार करने के लिये
भक्ति यही एक प्रमुख साधन है। मोक्ष भी उसके चरणों पर लोटता है फिर अन्य साधनों की क्या बिसात है?
देखो! पूरे त्रिलोक में मैं अविजीत हूँ। लेकिन भक्तों के सामर्थ्य ने मुझे जीत कर भक्ति के बल पर मुझे अपना
सेवक बना लिया है। इसीलिये सभी विजयों में श्रेष्ठ एक मेरी भक्ति ही है। उसकी भी कथा सुनो। तुम्हें
विस्तारपूर्वक बताता हूँ।
न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव ।
न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ २० ॥
नित्य क्या है और अनित्य क्या है इसका ज्ञान देने वाला सांख्यशास्त्र अथवा नित्य-नैमित्तिक कर्म अपना
सर्व अष्टांगिक योग भी मेरी प्राप्ति कराने में समर्थ नहीं है अथवा जिसे 'स्वाध्याय' कहते हैं वह वेदाध्ययन
अथवा वायु, जल तथा पके हुए पत्ते खाकर किया जाने वाला तप अथवा संन्यास ग्रहण आदि त्याग ये सब मेरी
भक्ति के बिना दुर्बल हैं। जिस प्रकार बिना नाक का सौन्दर्य अथवा मस्तक बिना सारे अवयव अथवा पति बिना
सुहागन ये सब जिस प्रकार व्यर्थ हैं उसी प्रकार मेरी भक्ति के बिना सभी साधन दुर्बल हैं। उन सब में मुझ तक
पहुँचने का सामर्थ्य नहीं है। लेकिन मेरी भक्ति वैसी नहीं है। वह मेरे प्रेम की अधिकाधिक वृद्धि कर तत्काल
मेरी प्राप्ति कराती है। अन्य किसी के अधीन नहीं होती। जिस समय मेरी भक्ति उत्पन्न होती है तभी मेरी प्राप्ति
होती है। यह बात श्रीकृष्ण उद्धव को बार-बार, प्रसन्नतापूर्वक बताने लगे। हे उद्धव! जिस प्रकार रत्न के साथ
उसका तेज होता है, अरुण के साथ जैसे सूर्य होता है उसी प्रकार भक्ति के पास मैं लक्ष्मीपति खड़ा रहता हूँ। वह
भक्ति जिसके मन में लग गयी उसी समय मैं उसके हाथ लग जाता हूँ। अन्य कितने ही साधन कोई क्यों न प्राप्त
कर ले लेकिन भक्ति के बिना मैं नहीं प्राप्त हो सकता।
चौदहवाँ अध्याय ४०७
भक्त्याहमेकयाग्राह्यः श्रद्धयाऽऽत्मा प्रियः सताम्।
भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात् ॥ २१ ॥
अन्य साधन तथा युक्तियाँ दूर कर मेरी श्रद्धायुक्त भक्ति करने से मेरा लाभ होता है। मन में किसी भी प्रकार
का विकल्प लाये बिना, किसी भी प्रकार की शंका न कर समस्त प्राणिमात्र के प्रति भगवत्स्वरूप की भावना
रखना यही भक्ति का मुख्य लक्षण है। इसी का नाम है भजनभाव। सभी प्रकार की सम्पत्ति के प्रति उदासीन
होकर जब मेरे भजन में आनन्द आने लगे, जितनी मोक्ष की इच्छा नहीं की उससे अधिक मेरे भजन पर विश्वास
किया तो फिर तरने या न तरने का प्रश्न ही कहाँ उठता है। मेरे भजन ने विधि निषेध के सभी वादों को निरस्त
कर दिया। इतने विश्वास से जिनकी भावना भक्ति के अलावा अन्य उपाय स्वीकार नहीं करती उसके ही जीवन
से हमारा जीवन चलता है। वह हमारा आत्मा ही है। ज्ञानियों का आत्मा मैं, भक्तों का प्रिय परमात्मा मैं, शास्त्रों में
जिस पुरुषोत्तम का वर्णन करते हैं वह मैं दौड़ कर उनकी अगवानी करने जाता हूँ। मुझे अनन्य भक्ति पसन्द है
इसलिये मैं उनके ही अधीन रहता हूँ। उनके ही कारण पूरे त्रैलोक्य में मेरी ख्याति है। उनके ही कारण मुझे
महत्त्व प्राप्त हुआ है। उनके ही कारण मुझे अलंकार धारण करने को मिलते हैं तथा पहनने के लिये परिधान
मिलते हैं। उनके ही बल पर मैं सर्वत्र विचरण करता रहता हूँ। मेरी गाँठ में कुछ भी नहीं है। भक्तों ने अपना
सर्वस्व खर्च कर, विविध प्रकार के उपचारों से मुझे महत्त्व प्रदान किया है। मैं नेत्रहीन था उन्होंने मुझे आँखें दीं,
मुझे कान नहीं थे जो उन्होंने मुझे दिये, मैं मुखविहीन था तो उन्होंने मुझे मुख दिया, उनकी ही वाणी से मैं बोलने
लगा। उनके ही कारण मेरा आना-जाना होता है। उनके ही कारण मैं हाथों में तथा पैरों में अलंकार धारण करता
हूँ। उनके ही कारण मुझे निश्चित स्थान प्राप्त हुआ है। उनके ही कारण मुझे सामर्थ्य प्राप्त हुआ है। मेरा नाम
और रूप उन्होंने ही बनाया, मुझे उनके गुणों से ही पवित्रता प्राप्त हुई है। वैकुण्ठ में मेरा स्थान मेरे भक्तों ने ही
अटल बना दिया है। इस प्रकार मेरे भक्तों को मैं भक्ति के ही कारण वशीभूत हुआ हूँ इसलिये रात-दिन मैं उनके
साथ खड़ा रहता हूँ। जन्मरहित होते हुए मैं उनके लिये जन्म लेता हूँ, कर्मशून्य होते हुए मैं उनके ही लिये कर्म
करता हूँ। उनके ही कहने से मैं महान पापियों का नाममात्र से उद्धार करता हूँ। वाल्मीकि इस संसार में महान
पापी था लेकिन नारदजी के कहने से मैंने उसे नामजप की पवित्रता के कारण पूजनीय बना दिया। मुझ पर भक्ति
का इतना अधिकार है। भक्ति के अलावा मैं किसी के भी हाथ नहीं आता। भक्तों के उपकार से मैं बिलकुल झुक
गया हूँ क्योंकि उसके उपकार को चुकाया नहीं जा सकता। इसलिये मैं पूरी तरह उनके अधीन रहता हूँ। उनके
उपकार का बदला चुकाने के लिये मेरी गाँठ में कुछ नहीं रहता। अब जो कुछ थोड़ा-बहुत मैंने उन्हें दिया है वह
भी तुम्हें धीरे से बता देता हूँ। भक्त मेरे ही कारण सनाथ हुए हैं। मेरे ही कारण वे कृतकृत्य हुए हैं। मेरे ही
आनन्द से वे सर्वदा तृप्त हुए हैं और आत्मज्ञान से अभिभूत हो गये हैं। मेरे ही बल पर वे सारी दुनिया पर भारी
हैं। वे प्रहार किये बिना ही सृष्टि को छेद देते हैं। मेरे सामर्थ्य के कारण ही कलिकाल उनके सामने नहीं आ
सकता। मेरे ही कारण वे त्रैलोक्य में किसी की चिन्ता नहीं करते। मेरे ही कारण वे देह में विदेह की भाँति रहते
हैं। मेरे ही बल पर उन्होंने प्रलयकाल को निगल लिया है। मेरे ही बल से उन्होंने जन्म-मरण को नष्ट कर दिया
है। मेरा भजन कर वे सनातन ब्रह्मस्वरूप हो गये। लेकिन यह सब भी उन्हें मैंने नहीं दिया। वे अपने भजन
सामर्थ्य से ही वह सब मुझसे ले गये। उनके आगे मेरी कुछ भी नहीं चलती। मेरा सर्वस्व मेरे भक्त मुझसे लूट
कर ले गये हैं। उन भक्तों ने भजनसामर्थ्य से मुझ अजेय को भी जीत लिया है और मुझे अपने वश में कर लिया
है। मेरा जो आत्मपद भले ही मेरे भक्तों के हाथ में आ गया हो लेकिन उसे मेरे ही अधिकार में रख कर वे