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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

३६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
थोड़ा भी विकल्प उत्पन्न नहीं होता। उस सद्गुरु से ही शैवी अथवा वैष्णवी दीक्षा प्राप्त होती है अथवा वह गुरु
आत्मज्ञान से चैतन्यघन अथवा निर्गुण का उपदेश करता है। अब दीक्षा का लक्षण सुनो। जो चारों प्रकार के
पुरुषार्थ और चारों मुक्ति प्रदान करती है और अविद्या की स्थिति को पूर्णतया विलुप्त करती है उसी का नाम
वात्सव में दीक्षा है। इस प्रकार हे उद्धव! दीक्षा रूप जन्म की कथा वास्तव में दीक्षा है। इस प्रकार हे उद्धव !
दीक्षा रूप जन्म की कथा तुम्हें यथातथ्य बतलायी। अब ध्याननिष्ठ नाम से जो सात्त्विकता होती है उसके सम्बन्ध
में सुनो। वास्तव में जिसका शरीर सत्त्वोपाधिक और जिसका स्वरूप ज्ञानमय होता है वही श्रीविष्णु इन सात्विकों
का ध्येय है। उसका ध्यान करें। अथवा जो गौ के दुग्ध की तरह शुभ्र अथवा कर्पूर की तरह गौर वर्ण है उस
पंचमुखी श्रीशंकर का भवसागर के उस पार जाने के लिये ध्यान करना चाहिये। उस मूर्ति का ध्यान करने से
ध्येय, ध्यान और ध्याता यह सारा नष्ट हो जाता है और अंतःकरण में ज्ञानस्वरूप स्थापित हो जाता है। सात्विकता
का ध्यान यही है। जैसी दीक्षा वैसा ही ध्यान यही आगम शास्त्र का सिद्धान्त है और ज्ञानस्वरूप तक पहुँचना
यही उस ध्यान की परिणति है। जो ज्ञान का भण्डार है वही सद्गुरु का स्वरूप है। निरन्तर उसी का अनुसंधान
कर ध्यान करना चाहिये। पंचभूतात्मक देह का साँचा बना कर उसमें ब्रह्मरूपी रस उड़ेलने से सुन्दर गुरुस्वरूप
तैयार होता है। इसलिये दिन-रात उसी का ध्यान करना चाहिये। हे उद्धव! यही सात्त्विकों का ध्यान है यह
स्मरण रखो। अब मंत्रों का ग्रहण किस प्रकार होता है इसका भी निरूपण सुनो। जो सभी मंत्रों की माँ है, जो
ब्राह्मण को तत्काल द्विजता प्रदान करती है उस गायत्री के मंत्र को ग्रहण करने से ब्राह्मणों को ब्राह्मण होने का
अधिकार प्राप्त होता है। जो सभी मंत्रों का राजा है, जो ब्राह्मणों के हिस्से में आयी है, जिसके भय से मुझ
श्रीकृष्ण को भी ब्राह्मणों की पूजा करनी पड़ती है, वह गायत्री ब्राह्मणों को सहज ही प्राप्त हुई है। लोभ के कारण
उसकी उपेक्षा कर ब्राह्मण दरिद्र हो गये हैं। जो ब्राह्मण गायत्री पर निष्ठा रखता है उसके चरणों का मैं वंदन
करता हूँ। मंत्रों में गायत्री मंत्र श्रेष्ठ हैं ऐसा वेदों का प्रामाणिक मत है। गायत्री मंत्र का प्रवेश हुए बिना अन्य मंत्रों
का वेद में प्रवेश सम्भव ही नहीं था। मुख्यतयः सारे मंत्र गायत्री के पास एकजुट होकर निवास कर रहे हैं। यदि
गायत्री मंत्र का सम्बन्ध न हो तो ब्राह्मणों के मुख में वेद प्रवेश कर ही नहीं सकते। फिर दूसरे मंत्रों की बात क्या
करें ? सारांश वेदों के लिये गायत्री वंदनीय है। गायत्री मंत्र का एकमात्र गोपनीय तथ्य ज्ञानस्वरूप परब्रह्म ही है।
वह मंत्र ब्राह्मणों को ही सुलभ है। लेकिन वे भी उसका मर्म भूल गये। इस प्रकार गायत्री मंत्र पूर्ण रूप से
ब्रह्मस्वरूप है और सभी सिद्धियों को उत्पन्न करने वाला है। शैव अथवा वैष्णव मंत्रों को ग्रहण करने पर भी
गायत्री मंत्र से ही तत्काल सत्त्वशुद्धि होती है। सत्त्व की शुद्धि हो जाने के बाद सहस्रों शैव मंत्र अथवा वैष्णव
मंत्रों की प्राप्ति होती है और उस सत्त्वशुद्धि से ही साधकों को तत्काल आत्मदृष्टि प्राप्त होती है। हे उद्धव !
मंत्रग्रहण करने का यह सही ढंग है। अब संस्कार के बारे में सुनो। मन के संकल्प और विकल्प तोड़ने का प्रयत्न
जो उत्कट इच्छा और लगन से करता है उसमें वैसे तो संकप उत्पन्न ही नहीं होता और अगर हुआ भी तो उसे
वह वहीं कुचल देता है। वह सदा विचार दृष्टि से ही देखता रहता है इसलिये वह मन से भी स्वतंत्र रहता है।
परमात्मा निष्ठा के कारण वह मन को नियंत्रण में रखता है, उसे इधर-उधर भटकने नहीं देता। मन को
कुशलतापूर्वक स्मरण में ही फँसाये रखता है। वैराग्य के बल पर वह मन का दमन करता है और उसी के भय से
हरि का चिन्तन करता है। जिस प्रकार दासी स्वामी की किसी भी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करती, उसी प्रकार
वह अपने मन को ईश्वरनाम स्मरण के अधीन कर देता है। इन्द्रिय अनेक प्रकार के पदार्थों को देखते रहते हैं
लेकिन मन किसी अन्य विषय को नहीं देखता। वह जागृत अवस्था में तथा स्वप्न में भी स्वाभाविक रूप से हरि

तेरहवाँ अध्याय ३६५
का स्मरण करता रहता है। मन जब इस प्रकार सुसंस्कारित हो जाता है तो वह प्रत्येक क्षण हरि का ही चिन्तन
करता है। श्वासोश्वास चलते समय भी 'परब्रह्म मैं ही हूँ' का ध्यान लगा रहता है। सहज ही भगवान के
नामस्मरण का आदर करने को आत्मसंस्कार कहते हैं। आत्मशुद्धि का जो प्रमुख कारण है उसे दस लक्षणों के
साथ बतलाया। साधक भी उसका सेवन करें इसलिये मैंने भी उसका अधिक स्पष्टीकरण किया। अब जिसके
कारण तमोगुण जोर से बढ़ता है उसके भी दस लक्षण हैं। उसका पूरी तरह त्याग करना चाहिये। उसका शास्त्र
आभिचारिक है। वह मार्ग वेदों द्वारा निषिद्ध माना गया है। उसमें दारू, मद्य, ताड़ी आदि का अनिवार्य रूप से
सेवन किया जाता है। जो इहलोक और परलोक में भ्रष्ट हुए रहते हैं, पाखंडी तथा बहुरूपिया होते हैं और मुण्डन
किये रहते हैं उनसे इनकी संगति रहती है और जहाँ वेदविधियों का विरोध होता है, द्वेष, जुआ अथवा परस्त्री
जैसे दुर्व्यसन हों वहीं इनकी बैठक होती है और उनका समय मध्यरात्रि का रहता है। उस समय उस कर्म का
विधि चलता है। उस कर्म का प्रारम्भ जारण, मारण, मोहन, स्तंभन, उच्चाटन अथवा वशीकरण रहता है। ये सब
तामस कर्म हैं। जन्म का अर्थ है दीक्षाग्रहण। इसलिये प्रेतभूत पिशाच विद्या से प्रेतभूतों की आराधना करने से
तामसों को भी प्रेत का ही जन्म प्राप्त होता है। जिसमें तामस गुण प्रमुख रूप से रहता है वह पुरुष क्रोधयुक्त
होकर निरन्तर शत्रु की ही टोह में रहता है और उसका विनाश करने के लिये प्रवृत्त रहता है। उसके मंत्र तामसी
होते हैं और देवता गूँगी, मैली (गन्दी), उच्छिष्ट चांडालिन अथवा प्रेतों की देवता कंकाली होती है और उनकी
मंत्रयोजना भी वैसी ही रहती है। पत्थर और मिट्टी से बना घर मेरा है, यह जमीन मेरी है यही लगन रहती है।
नींद में, स्वप्न में भी दीवारें उठाता रहता है, इतनी घर के प्रति आसक्ति रहती है। मकान बनाने की क्षमता भले
ही न हो लेकिन पत्थर मिट्टी आदि का संग्रह करता रहता है। किसी चिड़िया को भी वहाँ नहीं आने देता। जिस
देह के लिये घर बनाया जाता है उस देह को भी वह असह्य कष्ट देता रहता है। तामस संस्कारों के योग से घर
की आसक्ति के कारण वह लगभग पागल हुआ रहता है। घर के लिये वह मरने तक प्रयास करता रहता है। यही
उसका तामस संस्कार है और उसका संसार है सिर्फ मिट्टी। जिसके कारण तमोगुण बढ़ता है उनके ये दस लक्षण
हैं। अब राजस का स्वरूप सुनो। उसका स्वरूप इससे अलग रहता है। सत्त्वगुण को स्वीकार करना चाहिये और
तमोगुण का त्याग करना चाहिये। अब आगे से काटने वाले और पीछे से लात मारने वाले रजोगुण के बारे में
सुनो। जरा सुनो, चतुर और छिनाल औरत अपने पति को प्रसन्न रखती है और फिर उसे धोखा देकर व्यभिचार के
लिये बाहर जाती है। उसी प्रकार यह रजोगुण है। जिस प्रकार कोई अड़ियल टट्टू देखने में बहुत सुन्दर रहता है
लेकिन बीच रास्ते में अड़ जाता है और पैर आगे नहीं बढ़ाता बल्कि पीछे हटने लगता है, उसी प्रकार रजोगुण
की स्थिति है। वहाँ कल्पांत में भी त्याग की सम्भावना नहीं है। ऐसा मनुष्य केवल दांभिक भावना से ही धर्म
करता है और मन में काम के प्रति आसक्ति रहती है। साथ में चलने वाला चोर सर्वस्व लूटने के लिये चाकर
बनकर साथ-साथ दौड़ता रहता है। वही स्थिति रजोगुण की है। वह भी इच्छा का संसार बढ़ाता रहता है।
इसलिये मनुष्य काम की आसक्ति से धर्म करता है, किये हुए कर्म का निश्चयपूर्वक उपभोग करता है और इस
प्रकार स्वयं ही जन्म-मरण के भँवर में फँस जाता है। कल्पांत में भी उससे छूट नहीं पाता। सात्त्विक लोग मेरी
भक्ति से तर जाते हैं, तामस लोग मेरी विरोध भक्ति से तर जाते हैं। किन्तु राजस लोगों की जन्म-मरण की यात्रा
रजोगुण के कारण कभी समाप्त नहीं हो पाती। रजोगुण की बाढ़ जिसके कारण प्रबल होती है वे दस लक्षण तुम्हें
बताता हूँ। काम्य कल्पना पूरी तरह छोड़ देने के लिये यह निरूपण भी सुनो। राजस लोगों का शास्त्र केवल
प्रवृत्ति पर आधृत है। वह केवल वासनामय होता है। जिससे इहलोक में और परलोक में सुख मिले ऐसी ही

३६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
चीजों के प्रति राजस व्यक्ति के मन में अत्यन्त आदरभाव रहता है। आप का अर्थ है केवल पानी। लेकिन यदि
उसमें इलायची और खस की सुगन्ध हो उसमें कपूर पड़ा हो और वह शीतल हो तो वह राजस व्यक्ति को
अत्यन्त प्रिय होगा। वह किसकी संगत करता है यह भी सुनो। राजा सरीखे लोग, सभापति, व्यवहार चतुर, लोगों
का मनोरंजन करने वाले तथा ऐसी ही प्रवृत्ति के लोग उसे अच्छे लगते हैं। राजदरवार में अथवा सभा में, चौपाल
में अथवा जहाँ बड़े व्यापारी लेन-देन करते हैं ऐसी दुकान में अथवा जहाँ मण्डप और वंदनवार लगे हों ऐसे
स्थान पर वह बड़े सम्मानपूर्वक जाकर बैठता है। जब घर में समय नहीं बीतता तो शहर के किसी अड्डे पर
जाकर बैठता है। अन्यथा शतरंज खेलने के लिये बड़े चाव से बैठ जाता है। अब रजोगुण का समय सुनो।
सूर्योदय होने के बाद का समय या शाम का समय राजसी है। यह समय उसे बहुत प्रिय है। राजस लोगों के
प्रत्येक कार्य में लालच भरा रहता है। धनधान्य प्राप्त करने के लिये वे धर्म करते हैं। पशु पुत्र हों यह उनकी सदा
की वासना होतीहै। इच्छारहित बात उनके स्वप्न में भी नहीं आती। राजसों की इच्छा प्रचण्ड रहती है। काम की
आसक्ति के कारण वे दीक्षा लेते हैं, उनका जन्म उसी के लिये होता है। उन्हें निरन्तर स्त्रियों की ही इच्छा लगी
रहती है। मंत्र लेते समय भी मन में कोई न कोई अभिलाषा अवश्य रहती है। जिससे मेरा सम्मान होगा, मेरी
प्रतिष्ठा बढ़ेगी और जिससे गुण अलौकिक प्रतीत होगा ऐसा मंत्र वह अत्यन्त आदरपूर्वक ग्रहण करता है। उसका
संस्कार तो अत्यन्त राजसी होता है। उसमें शारीरिक भोग के ही विलास होते हैं। बहुमूल्य सुगन्ध, साफ-सुथरे
वस्त्र उसे हमेशा अच्छे लगते हैं। उद्देश्य यही होता है कि मेरा लौकिक बढ़े और मुझे मंच पर आदर का स्थान
मिले बड़े-बड़े लोग मुझे प्रणाम करें और भरी सभा में मेरा सम्मान करें। हे उद्धव ! रजोगुण के जो दस लक्षण हैं
उनका यही स्वरूप है। इसीलिये राजस लोग जन्म-मरण के जंजाल से पूरी तरह कभी नहीं छूट पाते। सात्त्विक
पुरुष विवेक पर निष्ठा रखकर त्याग करता है, तामस व्यक्तिं कनक-कांता के लोभ में त्याग नहीं कर पाता। इन
तीन गुणों का लक्षण मैंने अनेक प्रकार से तुम्हें बताया। अब इन तीनों का साधारण स्वरूप भी तुम्हें बताता हूँ।
तत्तत्सात्त्विकमेवैषां यद् यद् वृद्धाः प्रचक्षते।
निन्दन्ति तामसंतत्तद् राजसं तदुपेक्षितम् ॥ ५॥
जिनकी बुद्धि विचारों से परिपक्व हुई है ऐसे बुजुर्ग जो आचरण करते हैं जिसकी लोग आदरपूर्वक स्तुति
करते हैं वे सचमुच सात्त्विक कार्य हैं ऐसा मेरा निश्चित मत है। विचारकों के उपदेशानुसार लोग जिन बातों की
निन्दा करते हैं, वह सब तमोगुण की पीड़ा है, ऐसा मेरा विचार है। जिसकी कोई स्तुति नहीं करता, निन्दा भी
नहीं करता, मन से उपेक्षा करते हैं वे कार्य सचमुच राजस हैं इसे ध्यान में रखो। उसकी बाधा अत्यन्त कठिन है।
जिस प्रकार विष मिलाया हुआ अन्न खाने में मधुर लगता है किन्तु उसमें मृत्यु छिपी होती है उसी प्रकार यह
राजस गुण है। उसका बन्धन बड़ा विचित्र होता है। राजस को उपदेश करते-करते वेद भी हार गये। उसे उपदेश
करने में ब्रह्मदेव भी थक गये। स्वयं मैं भी उसे उपदेश नहीं कर पाता। इसी लिये विचारकों ने रजोगुण की
उपेक्षा कर उसे फेंक दिया है। इसीलिये साधक को सात्त्विक का ही सेवन करना चाहिये। उस सात्त्विक सेवन
का सम्पूर्ण गुण मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
सात्त्विकान्येव सेवेत पुमान् सत्त्वविवृद्धये।
ततो धर्मस्ततो ज्ञानं यावत्स्मृतिरपोहनम् ॥ ६॥
सात्त्विक पदार्थों का सेवन करने से सचमुच सत्त्वगुण की वृद्धि होती है और पुरुषों में सत्त्वगुण की वृद्धि

तेरहवाँ अध्याय ३६७

होते ही उनकी प्रवृत्ति अपने आप ही धर्म की ओर होती है। धर्मप्रवृत्ति से मेरा भजन होता है और मेरी भक्ति का
उल्हास बढ़ते ही मैं भक्तों पर जब प्रसन्न हो उठता हूँ उस समय ज्ञान भी अपने आप ही प्रकट होता है।
'तत्वमसि' आदि जो वाक्य हैं उनका यही अर्थ है कि गुरु के द्वार से आकर ज्ञान की प्राप्ति होती है। तो फिर तुम
कहोगे कि फिर सत्त्वशुद्धि से किस हेतु से धर्मभक्ति करनी चाहिये ? तो उसका विचार भी सुनो। सत्त्वशुद्धि के
बिना यदि श्रवण किया जाय तो वह बाजार के कोलाहल की तरह होता है। उससे कभी भी आत्मस्वरूप की
पहचान नहीं हो सकेगी। अन्धा बालक जिसके गर्भ से जन्म लेता है उसका स्तनपान करता रहता है लेकिन माँ
कैसी होती है उसे दिखायी ही नहीं देती। वैसी ही स्थिति उस उपदेश की रहती है। प्रत्येक इन्द्रिय को सजीवता
प्रदान कर भगवान सभी का पालन-पोषण करता रहता है लेकिन विषय में अन्धे लोग उसे नहीं देख पाते। उनकी
चित्त की शुद्धि न होने के कारण उन्हें कुछ भी नहीं दिखायी देता। बकरी के गले में चमड़ा लटकता रहता है उसे
झूठ ही 'स्तन' कहते हैं, उसी प्रकार सत्त्व की शुद्धि हुए बिना उपदेश भी व्यर्थ है। बहते जल पर अक्षर लिखने
से वे पानी की सतह पर अंकित नहीं हो पाते, उसी प्रकार आत्मज्ञान भी सत्त्वशुद्धि के बिना स्पष्ट रूप से प्रकट
नहीं हो पाता। पूर्णरूप से सत्त्वशुद्ध हुए बिना जिस प्रकार धर्मबुद्धि प्रकट नहीं होती, उसी प्रकार ग्रहण में जिस
प्रकार चन्द्रमा नहीं दिखाई देता उसी प्रकार आत्मज्ञान भी सिद्ध नहीं होता। हरिकथा श्रवण करने से जिसका कंठ
सूख जाता है, शरीर पर रोमांच उभर आते हैं, पसीना छूटने लगता है, रुलाई आने लगती है, लेकिन एक भी पैसा
खर्च करना होता है तो प्राण निकलने लगते हैं ऐसा जिसका आचरण होता है उसमें भी ब्रह्मज्ञान प्रकट नहीं होगा।
जब तक हृदय से लोभ नहीं छूटता तब तक सच्चा ज्ञान कैसे प्राप्त हो ? जब सत्त्वशुद्धि और धर्म ये दोनों स्पष्ट
दिखायी देने लगेंगे तभी वह आत्मज्ञान की प्रबल 'प्रेरणा से सही मार्ग पर लगेगा। उस मार्ग पर चलते रहने पर भी
यदि मेरी भक्ति साथ में हो तभी वह चोरों से बच पायेगा और झट मेरे पास आएगा। उस भक्ति की संगत न हो
तो आगे का राजमार्ग भी अपरिचित होने लगता है। तब काम-क्रोध विनाश करने के लिए प्रवृत्त हो उठते हैं और
विकल्परूपी भँवर डुबा देते हैं। अरे ! भाग्य के बिना मेरी भक्ति प्राणियों का संग नहीं करतीं। मेरी भक्ति की
संगत से मार्ग चलने पर किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। मेरी भक्ति के साथ बड़े-बड़े वीर तथा प्रसिद्ध नौ
रणबाँकुरे होते हैं। वे युद्ध के लिये सदा तैयार होकर शत्रु का सामना करने के लिये तैयार रहते हैं। आत्मज्ञान के
योग से वे महान योद्धा बने हुए हैं। इसलिये मेरी भक्ति के बिना हजारों प्रकार से श्रवण, मनन करने पर भी मेरी
प्राप्ति नहीं होती। भजन से ही मेरी पूर्ण प्राप्ति होती है। अहो ! सभी प्राणिमात्र के प्रति भगवान की ही भावना
रखना यही मेरी श्रेष्ठ भक्ति है। वह स्वयं ही जब सहचरी हो जाती है तो काम, क्रोध, मोह, पीड़ा नहीं दे सकते।
बड़े जतन से उलटी गागर समुद्र में डुबोने से उसमें एक बूँद जल भी नहीं घुस पाता। वही बात महावाक्य की
है। इसलिये अत्यन्त आदर और धर्मशील बुद्धि से मेरा भजन करने से मैं प्रसन्न होता हूँ और मेरे प्रसाद से ही ज्ञान
प्रकाशित होता है। हे उद्धव ! ऐसा न कर यदि केवल अर्थ और स्वार्थ पर लोभदृष्टि रख कर मेरी सूखी भक्ति की
जाय तो उससे मैं लक्ष्मीपति प्रसन्न नहीं होता। जो धन, मन, शरीर, वाणी घिस कर मेरा भजन करता है उसे ही
जिस प्रकार चन्द्र किरणों से चकोर प्रसन्न होता है उसी प्रकार मैं प्रसन्न होता हूँ। वत्स के लिये गाय जिस प्रकार
स्नेहयुक्त होकर गोरस देती है, उसी प्रकार अत्यन्त सन्तोष से मैं भी प्रसन्न होता हूँ। मेरे उस प्रसाद से ही मेरा
ज्ञान भक्तों में प्रकट होता है। स्त्री यदि सद्गुणी, सुन्दर और पतिव्रता और लाडली हो तो पति उसे बिना माँगे सब
कुछ दे देता है, उसी प्रकार मैं अपने भक्तों पर प्रसन्न होता हूँ। मेरे ही प्रसाद से जो ज्ञान प्रकट होता है उसे ही
'श्रुति' और 'स्मृति' कहते हैं यह जान लो और सहज ही जिस प्रकार अविद्या का नाश होता है उसे 'अपोहन'

३६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कहते हैं। गुणों से देह उत्पन्न होता है और देह से ज्ञान उत्पन्न होता है, लेकिन उसी ज्ञान से गुणों का नाश होता
है। तुम कहोगे, लेकिन क्या देह का नाश नहीं होता? लेकिन तुम्हारी यह बात गलत है। क्या पक्षी स्वयं अपने
पंख तोड़ता है या नारियल नारियल को फोड़ता है? क्या व्याघ्र स्वयं ही अपने मांस को चखता है। यह जो कभी
न घटने वाली बात होगी तभी देह के ज्ञान से गुणों का और देह का विनाश होगा। यदि तुम्हारे मन में इस तरह
का विकल्प आ रहा हो तो उसका भी निराकरण करता हूँ।
वेणुसंघर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद् वनम्।
एवं गुणव्यत्ययजो देहः शाम्यति तत्क्रियः ॥७॥
संयोग से बाँस के जंगल में तेज हवा में बाँस एक दूसरे के घर्षण के कारण चिनगारी उत्पन्न होती है और
पूरा जंगल जल जाता है। जिस टुकड़े से अग्नि उत्पन्न होती है वह टुकड़ा भी जलकर स्वाहा हो जाता है। जंगल
में एक सीक भी शेष नहीं रह पाती और वह स्वयं भी राख होकर बुझ जाता है। उसी प्रकार वैराग्य के
अभ्यासरूपी वायु से त्रिगुणों का घर्षण होते ही वहाँ ज्ञानरूपी अग्नि उत्पन्न होता है जिससे अविद्यारूप जंगल
जल जाता है। वह हरिगुरु की कृपा से खौलता है, वृत्ति के रूप से प्रज्वलित होता है और दोनों देहों से लगे
गुणों को जलाने में प्रवृत्त होता है। तब आशा और तृष्णा के झुण्ड जल जाते हैं, काम-लोभरूपी सियार जल जाते
हैं, क्रोधरूप व्याघ्र की होली हो जाती है और मदरूपी हाथी भी जलने लगता है। स्नेह के कँटीले पौधे जल जाते
हैं, असत्यरूप बैर के काँटे जल जाते हैं, मोहरूप अजगर तो तत्काल ही जल जाता है और अंततः भयानक काल
भी जल जाता है। इतने में अहंकार रूप सुअर उठता है, कितना भी दौड़ाने पर भी वह नहीं मिलता। लेकिन वह
विकराल सुअर भी जल जाता है। ज्वालाग्नि चारों ओर फैल जाता है, बचने के लिये अणुमात्र स्थान भी नहीं
रहता। इस प्रकार अहंकाररूपी जंगली सुअर भागते-भागते जल जाता है और पूर्ण रूप से मर जाता है। अग्नि की
करनी बड़ी विचित्र है। वह स्वयं अपना भी दहन कर लेता है। इतना ही नहीं बल्कि वह दाहकशक्ति को भी
जलाकर अपने स्वस्वरूप में जाकर स्थिर हो जाता है। यह निरूपण सुनकर उद्धव को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने
कहा, लोगों पर यह कैसी संकट की घड़ी आयी है? ऐसा होते हुए, उसे छोड़ लोग विषय पर ही लुब्ध होते हैं
और मरते रहते हैं। सात्त्विक सेवन से सत्त्व की वृद्धि होती है और अलभ्य सिद्धि का लाभ होता है। लेकिन उस
सिद्धि को छोड़कर लोग विषय में ही रममाण होते हैं। इन लोगों में कितना अनर्थ मचा हुआ है। मन में इस
प्रकार की शंका उत्पन्न होने के कारण वह बड़ी जिज्ञासा से श्रीकृष्ण से पूछने लगा।
उद्धव उवाच
विदन्ति मर्त्याः प्रायेण विषयान् पदमापदाम।
तदापि भुञ्जते कृष्ण तत्कथं श्वखराजवत् ॥८॥
उद्धव ने कहा, "हे मुकुन्द! सर्वज्ञ गोविन्द! सुनो। विषय का संकट सर्वत्र बाधा उत्पन्न करता है यह सदा
सबको ज्ञात हो चुका है। जो विषयाधीन होता है वह सर्वत्र, सदा दीन-हीन ही बना रहता है। यह सब देखने
जानने पर भी उन्हें विषयों के प्रति कितनी आसक्ति है। लोग श्वान, गधा तथा बकरे की तरह विषय भोग करने
के लिये निर्लज्ज हो जाते हैं। अपने हित का कार्य न करके विषय की चाहत में ही क्यों नाचते रहते हैं? कुतिया
क्रोध से बिफरती रहती है फिर भी कुत्ता उसके पीछे-पीछे लगा रहता है और दुम हिलाकर उसे सूँघता रहता है।
वह लोगों की लज्जा भी नहीं करता। अन्धा, रोगग्रस्त, शरीर से पीप गलता हुआ, गले में चिन्तारूपी मटके का

तेरहवाँ अध्याय ३६९

किनारा फँसा हुआ, फिर भी वह कुतिया के पीछे कामासक्ति से लगा रहता है। कुतिया गुस्से में उस पर
चिल्लाती रहती है फिर भी कुत्ते को वह भला ही लगता है। उसके सारे प्राण कुतिया के पूँछ में लगे रहते हैं
इसलिये वह उसका पीछा करता रहता है। शरीर से शरीर सटते ही कुतिया उस पर चिल्लाती है और उसके पीछे
दौड़ती है फिर भी वह उसकी पूँछ नहीं छोड़ता। उसकी कामेच्छा बढ़ती रहती है। इतनी यातनाओं के बाद यदि
भोग मिला भी तो उस भोग में वह लड़खड़ा कर गिर पड़ता है। चारों ओर से लोग उसे दुत्कारने लगते हैं और
उसकी उपेक्षा करते हैं। निन्दा के पत्थर शरीर पर निरन्तर बरसते रहते हैं। मूर्ख लोग भी उस पर थूकते हैं। पुरुष
की भी वैसी ही अवस्था होती है फिर भी उसे काम ही अच्छा लगता है। श्वान का जुग जल्दी ही छूटता है
किन्तु मनुष्य का जुग कल्पांत में भी नहीं छूटता। स्त्री के लोभ में अत्यन्त लंपट होने के कारण वह अनेक प्रकार
के संकट सहता रहता है। अब गधे का भी हाल सुनो। गधी को दूर से देखते ही गधा चिल्लाता हुआ उसकी ओर
दौड़ता है। उसे जरा भी लज्जा नहीं होती। गधी आगे-आगे भागती रहती है और गधा लालच के कारण उसके
पीछे-पीछे दौड़ता रहता है। वह उसके मुँह पर दुलत्ती चलाती है लेकिन यह आगे ही बढ़ता जाता है। वह छाती
पर दुलत्ती चलाती है लेकिन वह उससे प्रेम ही करता है। इस प्रकार स्त्रियों के प्रति गधे जैसा आचरण करते
रहते हैं। अथवा पुरुषों की गति बकरे जैसी ही होती है। उसे मारने के लिये कसाई के पास लाया जाता है, फिर
भी उसका ध्यान बकरियों में ही लगा रहता है। अपनी ही जात बिरादरीवालों को मरता देखता रहता है लेकिन
उस दुःख से उसे पश्चात्ताप नहीं होता। मृत्यु के बिलकुल पास पहुँचने पर भी वे लोभ के कारण विषयसुखों की
ही इच्छा करते रहते हैं। मृत्यु की अन्तिम सीढ़ी बुढ़ापा सिर पर आ टपकता है फिर भी वह विषय की ही ओर
भागता रहता है। मृत्यु का स्मरण भी नहीं करता। कसाई बकरा काटने के लिये ले आता है, वह अपने साथियों
को कटते देखता रहता है लेकिन उसकी परवाह न कर खुशी-खुशी बकरियों के साथ रममाण होने के लिये
छटपटाता रहता है। बकरा, कुत्ता और गधा ये विषयी अवश्य हैं लेकिन वे केवल ऋतुकाल में ही विषयभोग के
लिये तैयार रहते हैं। लेकिन पुरुष हमेशा कामातुर रहता है। कुतिया गर्भवती रहती है उस समय कुत्ता भी संभोग
के लिये तैयार नहीं रहता। लेकिन पुरुष गर्भवती स्त्री के साथ भी संभोग करता है। गधा गधी के साथ लिपटता
जरूर है लेकिन वह उसे मोतियों के अलंकार नहीं पहनाता लेकिन मनुष्य को स्त्री की चाह इतनी अधिक होती
है कि वह उसके हर लाड़ पूरे करता है। उसकी वेणी के लिये फूलों के गजरे लाता है, उसके कुंकुम तिलक पर
रत्न की आभा सजाता है और नाक में मोतियों की नथ पहनाता है। यह मनुष्य जन्म की चाह है। प्रसूति का
समय निकट आता है और पेट फूला रहता है फिर भी कामांध और विवेकहीन दुष्ट ऐसी स्त्रियों के साथ रममाण
होते रहते हैं। अस्थि, मांस, विष्टा, मूत्र इत्यादिसे भरी होने पर भी लोग जानबूझ कर इतनी गन्दगी के प्रति क्यों
कामासक्त होते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर श्रीकृष्ण तीन श्लोकों में दे रहे हैं। वे कहते हैं, उद्धव! ध्यान देकर
कामासक्ति के सम्बन्ध में विचार सुनो।
श्री भगवानुवाच
अहमित्यन्यथाबुद्धिः प्रमत्तस्य यथा हृदि।
उत्सर्पति रजो घोरं ततो वैकारिकं मनः ॥९॥
जो मोह मद से उन्मत्त विवेकहीन पुरुष होते हैं उनमें देहात्मवाद के कारण रजोगुण उत्पन्न होकर उससे
अभिमान उफनता है। जिस प्रकार मनुष्य मद्य प्राशन कर उन्मत्त हो जाने पर अपना हित भूल जाता है और फिर

३७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अनेक प्रकार के अनर्थ उत्पन्न कर आत्मघात करने के लिये भी प्रवृत्त हो जाता है उसी प्रकार रजोगुण के कारण
लंपट होने वाला पुरुष शुद्ध, बुद्ध तथा नित्यमुक्त होने में ही सच्चा कल्याण है यह भूलकर कामासक्त हो जाता
है। अभिमान रजोगुण में रंग जाने पर दुःखरूपी भीषण रजोगुण अपार बढ़ जाता है और उससे मन विकार के
वशीभूत हो जाता है।
रजोयुक्तस्य मनसः संकल्पः सविकल्पकः।
ततः कामो गुणध्यानाद् दुःसहः स्याद्धि दुर्मतेः॥१०॥
मन जब रजोगुण से भर जाता है, उस समय प्रचण्ड-संकल्प-विकल्प उत्पन्न होते हैं और एकान्त में
आसन डालकर ध्यानस्थ बैठने पर भी स्त्रियों का ही चिन्तन होता रहता है। रजोगुण से ही कामासक्ति उत्पन्न
होती है। दुष्ट वासना उत्पन्न होकर मन भी दुष्ट हो जाता है। इससे चित्त में काम के सिवा कोई दूसरी स्फूर्ति
उत्पन्न ही नहीं होती। जन में, वन में, एकान्त में, जागृति में, सुषुप्ती में, स्वप्न में, ध्यान में, मन में अथवा चिन्तन
में स्त्रियों के अतिरिक्त और किसी का स्मरण नहीं होता। सारा ध्यान स्त्री की कामेच्छा की ओर लगा रहता है।
उसके हावभाव, उसके मनोहर विलास, उसका सुन्दर लावण्य, और उसका सुरस रस इसमें ही मन लिप्त रहता
है। रतिसुख, तथा स्त्री की क्रीड़ा का महत्त्व बढ़ाकर उससे काम जिस प्रकार बढ़ जाता है उस पर किसी का बस
नहीं चलता। धन, धान्य, पुत्र आदि का सुख मिले, इहलोक तथा परलोक का सुख प्राप्त हो, ऐसी रजोगुण की
उत्कट इच्छा रहती है।
करोति कामवशः कर्माण्यविजितेन्द्रियः।
दुःखोदर्काणि सम्पश्यन् रजोवेगविमोहितः॥११॥
जब रजोगुण का आवेश उत्पन्न होता है, उस समय कामरूप-ग्रह अद्भुत ढंग से बिफरता है और जो पुरुष
काम से ग्रस्त होता है वह सदा काम का ही दास बन जाता है। जिसके मन में विचार नहीं है वह काम का जर
खरीद गुलाम बनकर रहता है। काम उसे जैसे नचाता है उसी के अनुसार वह नाचता रहता है। काम का दास हो
जाने पर उसका दुःख प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है, सकाम कर्म करना ही उसे अनिवार्य हो जाता है और वह
अत्यन्त अहंकारी हो जाता है। रजोगुण के कारण वह मोह में लिप्त रहता है इसलिये वह इन्द्रियों पर विजय न
प्राप्त करने वाला तथा अयोग्य बना रहता है। वह जन्म-मरण के अधीन रह कर तदनुसार सारे कर्म करता है।
रजोगुण की पीड़ा अत्यन्त भयंकर है। उसने सारे लोगों को विषयांध कर दिया है। उद्धव! रज पर लुब्ध होने
वाले लोग अत्यन्त मूर्ख होते हैं, यह प्रसिद्ध ही है। रजोगुण से बद्ध होने पर महामोह का प्रवेश होता है तब भ्रम
की आँधी चलती है और तमोगुण चारों ओर फैलता है। उद्धव! प्राणियों की बुद्धि सचमुच ऐसी होती है इसे
ध्यान में रखो। इसीलिये वे काम का सेवन करते हैं। विषयों से उन्हें विरक्ति नहीं होती। अब शायद तुम सोचोगे
कि तब तो तरने का कोई उपाय ही नहीं रहा और प्राणियों को सद्गति भी मिलने से रही। यह विषयासक्ति
अनिवार्य है। जीव का तो अविद्या और विषय से सम्बन्ध रहता है। उनकी पीड़ा बहुत बड़ी होती है। अविद्या का
सम्बन्ध अनादिसिद्ध है। इसके कारण अनेक प्रकार की कल्पनाएँ उठती हैं। अंतःकरण भी अनादि है और उसकी
पूर्णता भी क्रमानुसार होती रहती है। इससे विषयबुद्धि भी दृढ़ हो जाती है और त्याग·बिलकुल नहीं होता।
अंतःकरण सत्त्व से उत्पन्न होता है यह सत्य है किन्तु यह कार्य माया का है इसे ध्यान में रखो। सुखभोग की
आदत से जहाँ रजोगुण उफन उठेगा तो उसे कौन रोक पायेगा? जो विचारी पुरुष होते हैं वे भी विषय के अधीन

तेरहवाँ अध्याय ३७१
हुए रहते हैं। इसलिये इस लोक में विषय का त्याग नहीं हो पाता। उद्धव ! तुम्हारी शंका यही थी न ? तो उसका
भी उपाय सुनो। जो विचारशील लोग हैं उनके मन में विषय वासना उत्पन्न ही नहीं होती। लेकिन इस पर भी
यदि कभी ऐसा हुआ तो उन्हें अभ्यास करना चाहिये।
रजस्तमोभ्यां यदपि विद्वान् विक्षिप्तधीः पुनः।
अतन्द्रितो मनो युञ्जन् दोषदृष्टिर्न सज्जते ॥ १२ ॥
रज और तम ये गुण यदि बुद्धि पर अपना प्रभाव जमाने में सफल हो जाएँ तो ज्ञाता को आलस छोड़ कर
अपने मन को नियंत्रण में रखना चाहिये। स्त्री का शरीर हड्डियों और मांस का बना विष्ठामूत्र का भण्डार है और
उसके सम्बन्ध में विचार करने पर भी घृणा हो आती है। उसका भोग तो नरक की यातना के समान है। इस
प्रकार स्त्री भोग के दोष बता देने से मन विषयों से तत्काल दूर कर नियमों के नियंत्रण में रखना चाहिये। ऐसा
करने से भी मन नियमों के बन्धन में नहीं बँध पाता। अभ्यास करने वालों को इसमें बड़ी कठिनाई होती है।
अर्थात् साधारण लोग तो इसमें असमर्थ ही होते हैं। तो भाई ! ध्यान से सुनो। तो जिससे मन नियंत्रित हो सके
ऐसा मनोनिग्रह का लक्षण और साधन बताता हूँ।
अप्रमत्तोऽनुयुञ्जीत मनो मय्यर्पयञ्छनैः।
अनिर्विण्णोयथाकालं जितश्वासो जितासनः ॥ १३ ॥
आलस और निद्रा का त्याग कर जो सावधान चित्त से ब्रह्मसाधना करता है, वही सचमुच मेरे चित्स्वरूप
के अभ्यास में लग जाता है। इसमें पहला काम है आसन स्थिर करने का अभ्यास। मूलबंध व्यवस्थित
नियमानुसार करने में आसन स्थिर होता है। आसनजय साध्य होते ही वह सहज ही योगमार्ग पर लग जाता है
और अधिक अभ्यास करने पर प्राण और अपान की स्थिति भी सामान्य होने लगती है। विषय मन के अधीन
रहते हैं, मन वायु के वश में रहता है इसलिये अभ्यास से वायु को ही वश में कर लेने से मन अपने आप स्थिर
हो जाता है। इस प्रकार जो धीरे-धीरे अभ्यास कर समय को सार्थक करता है वह विरक्त भले ही न हो लेकिन
महान सामर्थ्यवान बनकर परमार्थ के प्रति अत्यन्त व्याकुल रहता है। हरिचिंतन में मन को एकाग्र करने से प्राण
और अपान ये दोनों वायु एकरूप हो जाते हैं। यही वायु की परिपूर्ण विजय है। उसे साधने से योगसाधन सहज
ही साध्य हो जाता है। तब प्राणापान की समझोड़ी छः चक्र के परदे फाड़ देती है। तब चित्त विषयों को छोड़
देता है और विषय भी चित्त को छोड़ देते हैं। इस प्रकार इस अभ्यास के मार्ग से वासनायुक्त इच्छा का सम्बन्ध
ही टूट जाता है। इसी मार्ग से मैंने सनकादिकों को आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त किया।
एतावान् योग आदिष्टो मच्छिष्यैः सनकादिभिः।
सर्वतोमन आकृष्यमय्यद्धाऽऽवेश्यते यथा ॥ १४ ॥
देखो। इसी उपदेश से मेरे शिष्य सनकादिक आदि ने अपने अभ्यास के सामर्थ्य से अलौकिक आत्मज्ञान
का सुख प्राप्त किया। ऐसा वह कौन-सा उपदेश है ? वह चित्त और विषय के सम्बन्ध को तोड़ने के बारे में है।
यही बात उन्हें बताकर मैंने उन्हें आत्मज्ञान के अभ्यास की ओर लगाया। मन जहाँ भी कहीं जाये वहाँ परब्रह्म ही
भरा हुआ है यही भावना धारण करने की आदत लग जाने के कारण सनकादिक ब्रह्मस्वरूप हो गये। चित्त का
विषयों से वियोग कराना यही योग सनकादिकों ने साध्य किया। उन्हें इसका उपदेश करने के लिये मैं श्रीकृष्ण

३७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही उपदेशक बना। उद्धव ने यह श्रवण करते ही मन में विचार करना शुरू किया कि मैं तो श्रीकृष्ण को छोड़कर
कभी रहा नहीं, फिर इन्होंने सनकादिकों को उपदेश कब किया ? सनकादिक तो बहुत पहले ही ब्रह्मस्वरूप हो
चुके हैं और कृष्ण तो इस काल के देवकी का बेटा है। उसको यह गुरुत्त्व कैसे प्राप्त हुआ ?
उद्धव उवाच
यदा त्वं सनकादिभ्यो येन रूपेण केशव ।
योगमादिष्टवानेतद्रूपमिच्छामि वेदितुम् ॥ १५ ॥
यही बात मन में लाकर उद्धव ने पूछा, "हे श्रीकृष्ण ! तुमने सनकादिक को कब उपदेश किया ? क्या इस
समय मैं तुम्हारे पास नहीं था ? भगवान ! तुमने इसी रूप में उन्हें उपदेश किया था या किसी अन्य रूप में ? यह
बात जानने की मेरी इच्छा है। वह कौन सा काल था ? समय क्या था और उन्होंने प्रश्न किस प्रकार किया था ?
आप मुझे पूरी तरह सुनाइये।" उद्धव का यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण भावविह्वल हो गये और अपनी हंसा की
कथा स्वयं ही सुनाने लगे।
श्रीभगवानुवाच
पुत्रा हिरण्यगर्भस्य मानसाः सनकादयः ।
पप्रच्छुः पितरं सूक्ष्मां योगस्यैकान्तिकीं गतिम् ॥ १६ ॥
महाप्रसिद्ध सनत्कुमार ब्रह्मदेव के मानसपुत्र हैं। उन्होंने सत्यलोक में एक अत्यन्त गहन प्रश्न पूछा था। वह
प्रश्न यह था कि योग की गति अत्यन्त सूक्ष्म है और आत्मस्वरूप की स्थिति समझना अत्यन्त कठिन है। वह
किस प्रकार समझ में आयेगी ? ऐसा विकट प्रश्न उन्होंने अपने पिता से पूछा।
सनकादय ऊचुः
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रभो ।
कथमन्योन्यसंत्यागो मुमुक्षोरतितितीर्षोः ॥ १७ ॥
सनकादिक ने पूछा, चित्त स्वभाव धर्म के अनुसार सदा विषयों में आसक्त रहता है इसलिये वह हमेशा
विषयों में ही उलझा रहता है। उसी प्रकार विषय भी चित्त में प्रवेश कर वासना के रूप में उससे चिपके रहते हैं।
इसलिये वे वहाँ से निकल नहीं सकते। फल और काल इन दोनों के न रहने पर भी आम मधुर ही होते हैं। उसी
प्रकार विषय जब एक बार चित्त में प्रवेश कर जाते हैं तो वहाँ से कभी नहीं निकल पाते। विवाहिता स्त्री अपने
मैके जाती है लेकिन वह मन से दूर नहीं जाती, उसी प्रकार विषय भी चित्त से चिपक कर बैठा रहता है।
इसलिये चित्त और विषय का परस्पर बिछोह मुमुक्षुओं के लिये कैसे संभव है ? इसका कोई उपाय हो तो स्वामी
सविस्तार बतायें।
श्रीभगवानुवाच
एवं पृष्टो महादेवः स्वयम्भूभूर्तभावनः ।
ध्यायमानः प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधीः ॥ १८ ॥
जिसे अग्रपूजा का सम्मान प्राप्त है, समस्त देवताओं में जिसकी महिमा श्रेष्ठ है उस ब्रह्मदेव को श्रेष्ठ
कहने का कारण उसकी महानता ही है। जो स्वयं चराचर सृष्टि का निर्माण करता है, जो वेदों का

तेरहवाँ अध्याय ३७३
निवासस्थान है, उस ब्रह्मदेव को उसके श्रेष्ठपुत्र ने यह अत्यन्त गहन प्रश्न पूछा। लेकिन उस प्रश्न का
यथोचित उत्तर किस प्रकार दिया जाय यह ब्रह्मदेव की समझ में नहीं आया। कर्म के योग से उसकी बुद्धि
मन्द हो गयी थी। ज्ञानोपदेश किस प्रकार किया जाय यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था। प्रश्न तो अत्यन्त
गहन था। ब्रह्मदेव मानों पागल से हो गये। तब वे मेरा चिन्तन करने लगे। सत्यलोक में सबके सामने
सनकादिक ने जो प्रश्न किया वह मेरी समझ में नहीं आया यह भी वे नहीं कह पा रहे थे और न उसका
उचित उत्तर ही दे पा रहे थे। इस प्रकार ब्रह्मदेव के सामने बहुत बड़ा संकट उत्पन्न हो गया। उन्होंने मुझ
ज्ञानश्रेष्ठ का चिन्तन किया।
स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारतितीर्षया।
तस्याहं हंसरूपेण सकाशमगमं तदा॥१९॥
पुत्रों का अज्ञान दूर करने के लिये और उनके प्रश्न का उत्तर जानने के लिये ब्रह्मदेव मेरा स्मरण करने
लगे, तो मेरा हृदय भी व्यथित हो उठा। ब्रह्मदेव मेरा ही बेटा है। उसकी दृष्टि पर कर्म की जड़ता से अज्ञान
का परदा आ गया था उसे तत्काल दूर करने के लिये मैं हंस बना। वर्ण अथवा व्यक्ति को जो स्पर्श भी नहीं
करता वह मैं श्वेत वर्ण हूँ तथा स्वयं प्रकाश हूँ। ब्रह्मदेव के पुत्रों को उपदेश करने के लिये ही मैं स्वयं
राजहंस बना। ब्रह्मदेव सृष्टि निर्माण कार्य में जुटा हुआ था इसलिये कर्म से उसकी बुद्धि जड़ हो गयी और
वह आत्मज्ञान की सिद्धि भूल गया। मैं कर्म का अधिकारी हूँ यह जब कोई कहता है तभी वह देहधारी हो
जाता है। परमार्थ के नगर में वह कभी बाह्य स्वरूप से प्रवेश नहीं करेगा। 'न कर्मणा न प्रजया'-ब्रह्मप्राप्ति
कभी कर्म से नहीं होती और न ही पुत्र के द्वारा होती है, यह वेदोक्ति है। इस प्रकार श्रुति कर्म का निषेध कर
उसका त्याग कराती है। उसी कर्म से ब्रह्मप्राप्ति होगी वह कहने वाले लोग ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी हैं। मैंने
ब्रह्मदेव को उपदेश किया ही था लेकिन वह कर्म से जड़ हो गया। कर्म से वह केवल कर्मठ हो गया है, उसे
मुक्ति कैसे प्राप्त हो ? त्रिभुवन में अदृष्ट का सबसे बड़ा ज्ञाता होते हुए भी ब्रह्मदेव जब कर्म की जड़ता से
विषयी बना तो दूसरों की क्या बात की जाय ? इसमें बड़े-बड़े ज्ञानी भी फँस गये। पुत्रों के प्रश्न का उत्तर देने
में ब्रह्मदेव का ज्ञान भी उज्ज्वल होगा इसलिये मैंने भी सत्यलोक में प्रवेश किया। प्रश्न करने वाले सनकादिक
और वक्ता ब्रह्मदेव लेकिन जब दोनों ही संकट में फँसे तो मैं वहाँ अवतीर्ण हुआ। दूध को खराब न होने देते
हुए हंस जिस प्रकार दूध और पानी अलग-अलग कर देता है उसी प्रकार सार और असार को चुनने वाला मैं
ज्ञान से चतुर राजहंस हूँ। संचित पुण्य के सिवा अथवा दैवी विमान से स्वयं प्रवास किये बिना किसी का
सत्यलोक में प्रवेश सम्भव नहीं है। लेकिन मैं पाप-पुण्य से परे हूँ। मेरे लिये पाप-पुण्य की आवश्यकता नहीं
है। फिर भी मैं पंखों से या पैरों से चलकर कहीं भी, कभी भी जा सकता हूँ। उस सत्यलोक में मैं हंसरूप में
आया। मुझे देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ।
दृष्टा मां त उपव्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम्।
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा पप्रच्छुःको भवानिति ॥२०॥
केवल ब्रह्मस्वरूप मेरी श्रेष्ठ मूर्ति है, मुझे हंसरूप में आते देख देवतागण मेरे स्वागत में खड़े हो गये और
मुझे साष्टांग दण्डवत किया। ब्रह्मलोक में वेद जहाँ मूर्तिमंत होते हैं वहाँ पुण्य भी मूर्तिमंत रहता है, सत्यलोक में
सत्य मूर्तिमंत रहता है और तप आदि भी वहाँ मूर्तिमंत रहते हैं। उन सबकी उपस्थिति में 'तुम कौन ?' ऐसा प्रश्न

३७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यदि ब्रह्मदेव मुझसे पूछते तो इसमें उनकी अज्ञानता प्रकट होती इसलिये वह मौन ही रहा और ब्रह्मदेव को आगे
कर उन सनकादिकों ने मुझसे पूछा, 'आप कौन हैं? कहाँ से आये हैं?'
इत्यहं मुनिभिः पृष्टस्तत्वजिज्ञासुभिस्तदा ।
यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे ॥ २१ ॥
उन्होंने ब्रह्मदेव से जो प्रश्न किया था उसका अर्थ मेरी समझ में आ सके इसलिये उन्होंने पूछा, "आप कौन
हैं?" वे अत्यन्त चतुर और जिज्ञासु थे। तिस पर स्थूलदेह, लिंगदेह और कारणदेह इसके अतिरिक्त जो भी वस्तु
है वह चैतन्यस्वरूप है यह बतलाने के लिये मैंने उस प्रश्न का खण्डन तीन श्लोकों में किया। उनके प्रश्नों का
खण्डन कर मैंने नित्यानित्य विवेक का ज्ञान उन्हें प्रदान किया। उसी निरूपण को तुम सुनो। उद्धव! मैं तुम्हें
सनकादिकों के ही समान मानता हूँ। इसलिये उन्हें जो ज्ञान दिया वह तुम्हें भी दूँगा सुनो। वह ज्ञान अत्यन्त श्रेष्ठ
होते हुए अत्यन्त प्राचीन है। इसलिये ध्यानपूर्वक सुनो। यह सुनकर उद्धव ने मन के कर्णों का विस्तार कर दिया।
स्थूलदेह और सूक्ष्मदेह को पीछे छोड़ उद्धव सर्वांग से कर्णरूप हो गया। इसलिये श्रीकृष्ण ने स्वयं ही उसे गुप्त
ज्ञान दिया। जैसे मन्दिर में रत्नों की खान मिले, उसमें पारस मिले और उस पारस से अमृत की धारा फूट पड़े,
उसी प्रकार उद्धव का भाग्योदय हुआ। श्रीमद्भागवत की कथा सुनाने के लिये श्रीकृष्ण जैसा वक्ता मिला और
हंसगीत की कथा श्रीकृष्ण बड़े चाव से सुनाने लगा। अहो! सनकादिकों का हिस्सा श्रीकृष्ण स्वयं ही उद्धव के
हाथ में दे रहे थे, ऐसे भाग्य का किन शब्दों में वर्णन किया जाय? वक्ता स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप हो, वह भी ब्रह्मकथा
का ही उपदेश करेगा। तब सहज ही परब्रह्म गुरु बन गये। उद्धव कैसा भाग्यवान था? इसलिये आत्मभाग्य से
भाग्यवान तथा संसार में प्रसिद्ध एक उद्धव ही है। जिसके लिये स्वयं ज्ञानसमर्थ जगन्नाथ प्रसन्न हुआ।
हंस उवाच
वस्तुतो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्न ईदृशः।
कथं घटेत वो विप्रा वक्तुर्वा मे क आश्रयः ॥ २२॥
परमात्मा सर्वत्र एक ही है। उसमें 'मैं' और 'तुम' का सन्देह नहीं है। 'तुम कौन' यह जो प्रश्न है वह
केवल शब्दों का अपव्यय है। आपने जो प्रश्न किया उसका उत्तर देने के लिये वक्ता के पास शब्द ही नहीं है।
वास्तव में 'मैं' और 'तुम' है ही नहीं इसलिये आपका प्रश्न मिथ्या है। नाम, रूप, वर्ण, व्यक्ति यह सब कुछ भी
नहीं है। 'अपना' और 'पराया' जैसी कोई जाति नहीं है। इसलिये हे विप्र ! आपके भाषण में सत्यत्त्व हो ही नहीं
सकता। चारों पुरुषार्थ पूर्ण करने वालों में ब्राह्मण विख्यात है। लेकिन विप्र हो! आपके लिये ज्ञान का प्रश्न ही
उपस्थित नहीं होता। अगर अनेकत्व हो तभी ऐसा प्रश्न सम्भव होगा। आत्मा के लिये ऐसा प्रश्न नहीं किया जा
सकता। आत्मा के लिये ऐसा प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता। देह के लिये वह लागू ही नहीं होता।
पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः।
को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भोह्यनर्थकः ॥ २३ ॥
क्योंकि ब्रह्मदेव से लेकर मशक तक देह के रूप में जो कुछ भी है वह पंचभूतात्मक है। इसलिये 'तुम
कौन' कहने में कोई अलग बात नहीं दिखायी देती। कड़ा, कुंडल, मुकुट, माला, अँगुठियाँ, कमरपट्टा अथवा
अन्य अलंकार देखने पर उसमें सुवर्ण के अतिरिक्त अन्य कुछ दिखायी नहीं देता। अथवा गाजर, मटका, सुराही,

खिलौने, हौज या टंकी में मृत्तिका से भिन्न कुछ भी नहीं होता। उसी प्रकार सभी देहों में देहरूप में पंचमहाभूत
एक समान ही होते हैं। इसलिये 'तुम कौन' यह अलग से पूछने का कोई अर्थ नहीं है। ब्रह्म ब्रह्मरूप में
एकसमान है और प्राणी प्राणित्व से समान है। इसलिये यहाँ प्रश्नोत्तरी की भाषा करना और 'तुम कौन?' यह
पूछना अनर्थ ही है। अथवा कोई स्वयं अपने से ही 'तुम कौन' पूछता है तो वह अत्यन्त भ्रम में उलझा हुआ है।
वह आत्मज्ञान ही भूल गया। तुम्हारे प्रश्न के अर्थ का विचार करने पर इतना 'अनर्थ' दिखायी देता है। उसमें
परमार्थ का नाम ही नहीं है इसलिये 'तुम कौन' यह आपका प्रश्न व्यर्थ है। देह को 'तुम कौन' यह प्रश्न आत्मा
जब स्वयं ही करता है तब उसके आत्मत्व पर अवश्य ही पागलपन सवार हुआ है और वह भ्रम में पड़ा हुआ है
यह सिद्ध होगा। रस्सी सर्प नहीं होती। यह आभास केवल भ्रम के कारण होता है। उस सर्प से यदि 'तुम कौन'
यह प्रश्न पूछा जाय तो रस्सी ही कहेगी कि यह झूठ है। उद्धव ! उस समय मैंने उनके प्रश्न का खण्डन इस
प्रकार किया। उस भाषण से उनके बीच भेदभाव भी स्पष्ट करके बताया। प्रश्न का खण्डन करने के बहाने ही,
कैसे इन्द्रिय और कैसे प्राणी ? जीव और शिव में भेद नहीं है यह भी सुझाया। इससे भी जो गहन, परम कारण से
अभिन्न, ऐसे आत्मज्ञान के बारे में भी बताया। उद्धव ! ध्यान देकर सुनो।
मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः ।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा ॥ २४ ॥
देखो। मेरे सिवा संसार में तिलमात्र की भी खाली जगह नहीं है। अतः व्याप्य और व्यापक ये दोनों सहज
ही अभिन्न हैं। जो मन में संकल्प रूप में आता है, उसे शब्द पण्डित भिन्न कहते हैं किन्तु मेरे स्वरूप का जो
भँवर है वही मन है यह अभिन्नत्व की पहचान उनकी समझ में नहीं आती। मन को कितनी ही सावधानी से
देखने का प्रयत्न करो लेकिन वह दिखायी नहीं देता, परब्रह्म भी उसी प्रकार अदृश्य है। इसलिये दोनों समान रूप
से चैतन्य स्वरूप हैं। सीप का रंग रुपहला लगता है लेकिन वह सच नहीं रहता। उसी प्रकार मेरे स्वरूप में मन
केवल कल्पनामय अर्थात् मिथ्या लगता है। अब शब्द की महानता का विचार करें तो वह स्वरूप से ज्ञानमय ही
है। ज्ञान के अर्थ के बिना भाषण केशमात्र भी हो ही नहीं सकता। वक्ता, वाच्य और वचन ये तीनों मैं ही हूँ इसे
ध्यान में रखो। शब्द का उच्चार करने वाला संसार में मेरे सिवा और कौन है ? मैं वेदों का वेद हूँ। मैं ही सचमुच
ओंकार स्वरूप हूँ। मुख्य वाणी की वाणी मैं हूँ। शब्द का स्थान मेरे सिवा और कहीं नहीं है। दृष्टि में जो दृश्यत्व
है वही प्रमुख ज्ञान है। आत्मदृष्टि से चैतन्यस्वरूप पूर्णब्रह्म भी वही है। आँख मैं ही, देखने वाला भी मैं ही हूँ;
दृश्य मैं ही हूँ और द्रष्टा भी मैं ही हूँ। मेरे सिवा समस्त त्रिभुवन में देखने की शक्ति कहीं नहीं है। आँखों का
वास्तविक चक्षु मैं हूँ, सर्वांग दर्शन योग्य सोज्वल मैं ही हूँ, मेरे सिवा दर्शन की कला किसी को सम्भव नहीं है।
मैं ही शब्दों की शब्दाविता हूँ, कर्णों से सुनने वाला मैं ही हूँ इस ऐक्यभावना से देखा जाय तो जो शब्द की
निःशब्दता है, वही परब्रह्म है। कान, भाषण और श्रोता मैं हूँ, शब्दों का अर्थ जानने वाला मैं हूँ और कान हैं वह
सुनने वाला भी मेरे सिवा कोई नहीं है। नाक मैं हूँ, सुगन्ध मैं हूँ, सुवास जानने वाला मैं ही हूँ। सुवास का रहने
का स्थान मेरे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। रसज्ञता की दृष्टि से जिह्वा उत्तम है लेकिन वह केवल चमड़ी है।
उस बेचारी को काट डालने से वह स्वाद या अस्वाद नहीं जानती। रस मैं हूँ, रसना मैं हूँ और रस सेवन करने
वाला भी मैं हूँ। मेरे सिवा रस का स्वाद जानने वाला रसिक कोई नहीं है। इन्द्रियों की जो अन्य प्रवृत्तियाँ हैं वे
भी सचमुच मद्रूप ही हैं यह ध्यान में रखो। सभी की अंतरात्मा में आत्मस्वरूप में रहने वाला मैं ही हूँ और

३७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
क्रियाशक्ति भी मैं ही हूँ। जो भ्रम में पड़े रहते हैं वे इस पंचमहाभूतात्मक देह को मुझसे अलग मानते हैं। मेरे जैसे
सर्वव्यापी को छोड़कर वह अलग कहाँ रह सकता है ? जिस प्रकार पानी में पानी की लहरें पानी के ही स्वरूप
में मजे में क्रीड़ा करती रहती हैं, उसी प्रकार मेरे स्वरूप में अनेक देह मत्स्वरूप में ही पूर्णरूप से रहते हैं या
कभी घृत जम कर उसकी पुतली बन जाय तो वह घृत से अलग नहीं हो जाती। उसी प्रकार मुझमें ये जीव हैं।
जल में जल के ही अनेक आकार भासित होते हैं उसी प्रकार मुझमें ही यह चराचर उत्पन्न होकर सचमुच मेरे
स्वरूप में अभिन्न ही है। सूत में एक तंतु दूसरे से सूत से ही जुड़ा रहता है किन्तु उन्हें अलग-अलग तन्तु ही
कहते हैं, उसी प्रकार मुझमें पूरे जगत का आभास होता है। यदि तंतु ही देखने लगें तो वस्त्र दिखायी नहीं देता
उसी प्रकार आत्मा को देखने लगें तो संसार अदृश्य हो जाता है। इस प्रकार ऐक्यतत्त्वदृष्टि से देखने पर सर्वत्र
परब्रह्म दिखायी देता है। ऐसे ऐक्यभाव से मैं ही एक सर्वात्मा और सर्वात्मक हूँ यह विचार निश्चयपूर्वक बुद्धि
से जान लेना चाहिये। सर्वत्र मैं ही हूँ यह दृढ़ निश्चय कर लेने पर फिर अन्य साधनों का कोई काम नहीं है। वह
अपने स्थान पर नित्य मुक्त होता है। सर्वत्र व्याप्त आत्मा चैतन्यस्वरूप है यह आत्मज्ञान सुलभ है। उद्धव ! मैंने
यही बताकर उनके भेद का खण्डन किया। सनकादिकों का जो प्रश्न ब्रह्मदेव को भी संकट में डालने वाला था
उसका इस प्रकार विवरण देकर मैंने ज्ञान प्रदान किया।
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः।
जीवस्य देह उभयंगुणाश्चेतो मदात्मनः ॥ २५ ॥
आपने ब्रह्मदेव से जो यह पूछा कि "चित्त में विषय प्रवेश करें और चित्त विषय में प्रवेश करें तो फिर
उन्हें अलग नहीं किया जा सकता और विषयत्याग किये बिना तो ब्रह्मज्ञान कभी नहीं होता।" तो वह त्याग भी
कैसे किया जाता है इसका लक्षण पूरी तरह बताता हूँ, सुनो। जरा देखो ! चित्त और विषय यह कोई जीव का
आत्मस्वरूप नहीं है। ये दोनों उपाधि के कारण प्रवाहरूप में देह से लगे हुए हैं। कर्तृत्व रूप से और भोक्तृत्व
रूप से अंतःकरण विषयी हो जाता है। इससे दोनों देहों का कारण जो अहंकार है वह उबल उठता है। वह
विषयों को वश में कर चित्त को जब लुभाता है तो उससे जीव और मन का तादात्म्य अत्यन्त दृढ़ हो जाता है।
अगर चित्त ही जीव का स्वरूप होता तो वह विषय पर लुब्ध नहीं हुआ होता। ये दोनों उपाधियाँ केवल अभिमान
के कारण बढ़ती हैं। जिस प्रकार पुरुष अपने वास्तविक देह को भूलकर स्वप्न के देह पर ही अधिक आसक्त
रहता है, उसी प्रकार यहाँ जीव की भी स्थिति हुई है। नित्य, शुद्ध, मुक्त और ज्ञानरूप यह जीव का स्वरूप है।
अभिमान ने उसे यह मिथ्या बन्धन लगा दिया है। इसलिये अभिमान छोड़ देना चाहिये सभी सारे बन्धन टूटते हैं।
अभिमान छूटने के लिये मेरा भजन करना चाहिये। लेकिन वैराग्य के बिना मेरी भक्ति भी व्यर्थ है। जब वैराग्य के
साथ मेरी भक्ति उत्पन्न होती है तभी जीव को मेरे स्वरूप की प्राप्ति होती है। हृदय में विषय का जरा भी अस्तित्व
न हो और सभी प्राणियों में भगवान के प्रति आदरभाव हो, यही वैराग्ययुक्त भक्ति है। वह प्राप्त होने पर ही मेरे
स्वरूप में जीव का प्रवेश होगा। सच पूछो तो जीव मत्स्वरूप ही है। लेकिन देहाभिमान उसका पोषण करता
रहता है। इसलिये सदासर्वदा प्राणी मात्र में मेरी भावना होने से अपने आप ही मत्स्वरूप प्राप्त होता है। जीव को
मत्स्वरूप प्राप्त होते ही विषय और चित्त इन दोनों का सहज ही त्याग हो जाता है क्योंकि वे दोनों ही मिथ्या हैं।
बिना त्याग किये ही यह त्याग सम्भव होता है। हे पुत्र ! तुमने चित्त और विषय के त्याग के बारे में पूछा यह
बहुत उत्तम हुआ। मैंने तुम्हें उसके बारे में बतलाया। यह ज्ञानमार्ग अत्यन्त शुद्ध है। अब आप कहेंगे कि जब इन

तेरहवाँ अध्याय ३७७
दोनों का ही भास मिथ्या है, फिर भी जीव को इनका इतना बन्धन है तो उसका कारण भी कुछ वैसा ही होगा।
आकाशपुष्पों की माला किसने धारण की है ? मृगजल में जहाज को डूबते किसने देखा है ? उसी प्रकार सच को
झूठ की कभी बाधा नहीं हो सकती ऐसी तुम कल्पना कर सकते हो। तो सावधान होकर सुनो। मैं वह निरूपण
करता हूँ जिससे जीव का झूठा बन्धन दृढ़ हो गया है।
गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया।
गुणाश्चचित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत्॥ २६॥
इस अनादि संसार में विषयों का नित्य सेवन करने से, वे चित्त में स्वामी बन कर बैठ जाते हैं। चित्त को
विषयों से अत्यन्त प्रेम होता ही है। इससे विषयासक्ति बढ़ती है और वे एक बार विषय में घुसते ही वापस नहीं
लौटते। एक बार बुद्धि को विषयों का ध्यान लग जाय और चित्त में विषयों का चिन्तन शुरु हो जाय तो फिर मन
विषयों के ही लिये छटपटाने लगता है। इससे विषयाभिमान पैदा होता है। विषयों में अभिमान उफनने पर दोनों
देहों को दृढ़ बन्धन प्राप्त होता है। जीव के लिये वही अत्यन्त कठिन, महाभयंकर और दुर्धर हो जाता है। तब
वह अपने देह के विकारों को अपना ही मानने लगता है। अन्धा मैं हूँ, विकलांग मैं हूँ, कोढ़ी मैं हूँ, सुन्दर मैं और
ज्ञाता भी मैं ही। देह को ही मैं मान कर बड़े भोलेपन से आत्मस्वरूप भूल जाता है। जीव का जो यह
मिथ्याबन्धन है वही सच है इस बात का उसे अभिमान होता है। शतरंज का खेल ही झूठ का है इसलिये उसमें
जय और पराजय दोनों ही निष्फल हैं। लेकिन खेलने वाले में उस खेल का अभिमान बहुत बढ़ता है। उसी प्रकार
जीव को भी देह का बल होता है। उस खेल के हाथी घोड़ा क्या मूलतः जीवित रहते हैं ? और उन्हें मारने पर
क्या खिलाड़ी परस्पर झगड़ा करते हैं ? उसी प्रकार जीवों को भी जन्म-जन्म के फेरे हैं। जीव का यह बन्धन नष्ट
करने के लिये देहाभिमान का बिल्कुल त्याग करना चाहिये। अभिमान का त्याग करने पर सहज ही मद्रूपता प्राप्त
होती है। जीव मेरा स्वरूप साध्य कर ले तो विषय और चित्त इनका सहज ही त्याग सम्भव हो जाता है क्योंकि
मेरे स्वरूप में अहंता और विषय को स्थान ही नहीं है। जिस प्रकार शतरंज की बाजी समाप्त होने पर राजा,
प्रधान आदि सब लकड़ी के खिलौने बन जाते हैं उसी प्रकार अहंकार नष्ट होते ही प्रपंच भी अपने मिथ्यत्व के
कारण उड़ जाता है। स्वप्न में देखी स्त्रियाँ, बच्चे, इष्टमित्र, धन और अपना देह इन सब का अभिमान नींद खुलने
पर अपने स्वप्नदेह की तरह मिथ्या मालूम होता है। उसी प्रकार मेरा स्वरूप प्राप्त होने पर देह किसलिये ? अहंता
कैसी ? विषय और चित्त की तो बात ही छोड़िये, तीन गुणों का भी कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। जो जागृति,
स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में अवस्थारूप होकर रहता है, वह जीव अवस्थाहीन होकर परमात्मा में
कैसे मिल जाता है ? यदि मन में ऐसी कोई कल्पना आ रही है, तो वह व्यर्थ है क्योंकि जीव को कोई अवस्था
ही नहीं होती। वह उन तीनों गुणों का स्वभाव धर्म होता है और उनसे उत्पन्न होने वाली वृत्ति बुद्धि की होती है।
जाग्रत् स्वप्नः सुषुप्तं च गुणतो बुद्धिवृत्तयः।
तासां विलक्षणो जीवः साक्षित्वेन विनिश्चितः ॥ २७॥
तीन गुणों की तीन वृत्तियाँ होती हैं। जागृति सत्त्वगुण की होती है, रजोगुण से स्वप्नावस्था प्राप्त होती है
और सुषुप्ति तम की होती है। देखो ! ये तीनों अवस्थाएँ बुद्धि में जड़ी रहती हैं। उनका जीव से कोई सम्बन्ध नहीं
होता। जीव साक्षी रूप में स्वतंत्र रहता है। यदि जीव के साथ अवस्था जुड़ जाय तब वह उस अवस्था में डूब
जायगा। तब वह तीनों अवस्थाओं का साक्षी भी नहीं रह पाएगा। इसलिये उन अवस्थाओं की स्थिति सुनो।

३७८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
जागृति में स्वप्न नहीं होता इसलिये स्वप्न जागृति को नहीं जानता इसे स्मरण रखो। सुषुप्ति जागृति और स्वप्न
इन दोनों को नहीं जानती इसलिये उन दोनों को सुषुप्ति का ज्ञान नहीं होता। यदि जीव को अवस्थाओं का
अभिमानी कहें तो जीव के साथ यह भी नहीं घटता। विश्व, तैजस और प्राज्ञ ये तीनों तीन अवस्थाओं के
अभिमानी हैं। जो जिस अवस्था का अभिमानी होता है वह उस अवस्था के साथ तद्रूप हो जाता है। लेकिन
'जीव' तीनों अवस्थाओं का साक्षी होकर साक्षित्व के कारण स्वतंत्र रहता है अतः वह अवस्थाभिमानी नहीं है।
यहाँ 'जीव' वह है जो देह से स्वतंत्र, गुणों से निराला तीनों अवस्थाओं से अलग, केवल द्रष्टा, साक्षी और
सचमुच जो जानता है। जीव को यदि अवस्थाभिमानी न कहें तो फिर तीनों अवस्थाएँ कौन भोगता है ? मैं सोया,
मैंने जिया, मैंने स्वप्नावस्था देखी यह प्रत्यक्ष अनुभव स्वयं जीव ही करता है। यदि इसे जीव का स्वभाव ही कहें
तो उसका अभिप्राय बताता हूँ।
अहंकारकृतं बन्धमात्मनोऽर्थविपर्ययम्।
विद्वान् निर्विद्य संसारचिन्तां तुर्ये स्थितस्त्यजेद् ॥ २८ ॥
जो आराम से झूले पर बैठा रहता है वह स्वयं हिले बिना भी उस झूले के हिलने से आनन्द से झूलता
रहता है और अपनी इच्छा से झूले के साथ हिलता रहता है। वह जब जोर-जोर से झूलता रहता है उस समय
वास्तव में झूला ही हिलता रहता है और बैठने वाला अपने स्थान पर स्थिर रहता है। जीव की वैसी ही स्थिति
है। जिस प्रकार वह स्वप्न का घर, स्त्रियाँ आदि को अपना ही मानता है उसी प्रकार अहंममता के अभिमान के
कारण वह तीनों अवस्थाएँ मैं ही भोग रहा हूँ यह मानता है। लोहे का काम करते समय, अग्नि के साथ तादात्म्य
होने के कारण लोहे पर किये हुए प्रहार अग्नि पर किये गये मालूम होते हैं। अग्नि की संगतिसे ही लोहे का काम
पूर्ण होता है या पूर्ण नहीं होता लेकिन अग्नि न बनता है न बिगड़ता है। इसी प्रकार जीव भी यहीं रहता है। जिस
प्रकार अग्नि के बिना लोहे का सामान नहीं बनता उसी प्रकार आत्मा के संयोग के बिना बुद्धि जड़ है। आत्मा के
बिना वह कभी भी कोई भी क्रिया नहीं कर सकती। लोहे की सलाख बनाकर भी अग्नि उसका निर्माण कर्त्ता
नहीं होती। उसी प्रकार कर्म करवा कर भी जीव अकर्त्ता ही होता है। फिर भी वृत्ति के साथ तादात्म्य होने के
कारण वह 'कर्त्ता मैं हूँ' यही मानता है। जीव ने अपने प्रकाश से वृत्ति को प्रकाशित किया है और यह वृत्ति ही
जीव को अपने स्वभाव के अनुसार विविध अवस्थाएँ देती रहती हैं। सूर्य के कारण ही जल प्रकाशित होता है,
उस जल ने ही सूर्य का प्रतिबिम्ब निर्मित किया है और उस पानी के कलकल निनाद की तरह अथवा चंचलता
के अनुसार या स्थिरता के अनुसार सूर्य का प्रतिबिम्ब पानी के कम्पन्न के अनुसार थरथर काँपता है अथवा स्थिर
रहता है। सूर्य का निवास ऊपर आकाश में है, पानी उसे नीचे ले आता है। उसी प्रकार वृत्ति भी अपने
नामलौकिक के अनुसार मुक्तों को भी बन्धन में डालती है। आत्मा से वृत्ति प्रकाशित होती है लेकिन उसी वृत्ति
के कारण आत्मा में जीवभाव आता है, उस जीवभाव के कारण जीव में देह की ममता उत्पन्न होती है और इसी
कारण वह प्राप्त सुख-दुःख का उपभोग करता है। सारांश, वृत्ति की संगत से ही विषयों की आसक्ति बढ़ती है
और वास्तव में इसी कारण से जीव को संसार बन्धन प्राप्त होता है। इस प्रकार गुण और चित्त की विषयासक्ति से
जीव को भले ही बन्धन प्राप्त हो जाय, फिर भी वैराग्य भाव से तथा गुरु की कृपा से विषयवृत्ति को नियंत्रित
करना चाहिये। अब गुरुकृपा की बात सुनो। मैं जो निरन्तर तीनों अवस्थाओं में ज्ञानस्वरूप तथा गुणों से अलिप्त
हूँ, उसे गुरुकृपा आत्मज्ञान के योग से अभ्यास की ओर प्रवृत्त करती है। अभ्यास की बात तो विचित्र ही है। वह

तेरहवाँ अध्याय ३७९
आत्मज्ञान से, उपदेश के रूप में विषयवृत्ति के आगे-पीछे अपना ज्ञानस्वरूप दृष्टि को दिखलाता रहता है। मैं तो
सदा ज्ञानस्वरूप ही हूँ। मैं सब में सर्वत्र हूँ। इसलिये गुरु, शिष्य को मुझ में आत्महित ही दिखलाता है। अरे!
साड़ी को सूत से अलग करने का प्रयत्न करने पर वह कृति ही नष्ट हो जाती है क्योंकि उसमें भीतर-बाहर सूत
ही रहता है। उसी प्रकार साधकों में विषयों का जो भान रहता है वह भी मेरे स्वरूप से भिन्न नहीं है क्योंकि सारे
ज्ञान का स्वरूप मैं ही हूँ। उसमें नाम, रूप, वर्ण आदि का भेद नहीं है अथवा कर्म, कर्त्ता अथवा कर्म सम्बन्धी
विवाद भी नहीं है। ॐकार के साथ सारे वेद जिसमें डूबे, ऐसा शुद्ध केवल एक मैं ही हूँ। जहाँ से भ्रम के साथ
भ्रान्ति का पलायन हो गया, क्रिया के साथ प्रवृत्ति टूट कर गिर पड़ी, निवृत्ति तो लज्जा से ही अदृश्य हो गयी और
वृत्ति स्वस्वरूप में एकरूप होकर रह गयी। सूर्य उदय होने पर वह अन्धकार को पूर्णरूप से निगल लेता है, जुगनूँ
को तो मार ही डालता है और नक्षत्रों को तत्काल नष्ट कर देता है। उसी प्रकार मेरे स्वरूप की प्रवृत्ति और
निवृत्ति लज्जा से नष्ट हो जाती हैं और आत्मानन्द से नित्य तृप्ति रहती है। मेरे इस स्वरूप का आनन्द जब
साधकों को प्राप्त हो जाता है, तो चित्त भी विषयों का त्याग करता है और विषय भी चित्त को छोड़ देता है। जो
फल डाल पर पकते हैं वे पकने के समय डाल से अलग हो जाते हैं। डाल भी उस फल को नहीं रखती। दही
मथ कर निकाले हुए मक्खन को यदि पुनः मट्ठे में डाल दिया जाय तो वह मट्ठे से अलग ही रहता है। उसी
प्रकार चित्त भी विषयों से अलग रहता है। मेरा स्वरूप प्राप्त हो जाने पर यदि दैव जबर्दस्ती उसे विषयोपभोग देने
लगे तो भी उसके चित्त में विषयवासना उत्पन्न नहीं होती क्योंकि वह स्वाभाविक रूप से अलग ही रहता है। इस
प्रकार मेरा योग साधने पर अपने आप ही चित्त और विषय का उत्तम रीति से वियोग होता है। इसका सरल
उपाय बताता हूँ। जरा देखो। इसमें भी शायद आपको शंका होगी कि सर्वत्र एक ही स्वरूप व्याप्त है और वह
शुद्ध है। वहाँ बाध्य कैसा और बाधक कैसा ? अर्थात् उस समय साधक किस चीज की साधना करते हैं ? लेकिन
ऐसे समय भी अहंता ही बाधक होती है। उसका भी लक्षण बताता हूँ, ध्यान से सुनो।
यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तिदः ।
मयि तुर्ये स्थितो जह्यात् त्यागस्तद्गुणचेतसाम् ॥ २९ ॥
जहाँ क्षणभर की भी बस्ती होती है उस स्थान का भी मनुष्य को अभिमान चढ़ता है। अभिमान का उसे
इतना व्यसन रहता है। उसका यह कौतुक प्रत्यक्ष ही देखने लायक है। जरा सा भी अहंकार उत्पन्न हो जाय तो
बुद्धि पवित्र मनुष्य को भी मायाग्रस्त कर देती है। देह की संगति से वह अहंकार प्रबल होते ही तत्काल कुछ न
कुछ विपरीत परिणाम कर देता है। अहंकार जब उफनता है तो वह आनन्द को ढँक देता है। इससे परमात्मस्फूर्ति
का स्फुरण नष्ट होता है, जीव की विषयासक्ति बढ़ती है और वे स्त्री के विषय के अधीन हो जाते हैं। उनके
चित्त में सदा विषयों की ही चिन्ता रहती है। ऐसा मनुष्य भूल जाता है कि मैं स्वयं ही परिपूर्ण हूँ और धन के
लिये असहाय हो उठता है। अपने मर्यादित देहाकार का ही उसे अभिमान हो जाता है। इससे कर्माकर्म के आघात
होकर अनेक प्रकार की नरक यातनाएँ होती हैं और जन्म-मरण के भँवर में पड़ कर वह महान दुःख से व्याकुल
हो जाता है। उन दुःख यातनाओं को भोगते समय जिसके मन को कष्ट होता है और उससे गृहस्थी की वेदना
नहीं सही जाती उसे देहाभिमान छोड़ देना चाहिये। लेकिन संकट यही है कि यह देहाभिमान नहीं छूटता।
इसीलिये साधकों को साधनों का संकट सहना अनिवार्य हो जाता है। लेकिन वह जो भी साधन करता है उसमें
साधनाभिमान उत्पन्न हो जाता है। जिस प्रकार लुटेरे सब कुछ लूट लेते हैं, उसी प्रकार साधनों में अहंकार विघ्न

३८० श्रीमद् एकनाथी भागवत
रूप हो जाता है। अब साधकों के साधन सुनो। वह इस प्रकार है कि वेदोक्त स्वधर्माचरण करना, पूर्ण वैराग्य
रखना और अत्यन्त प्रेम से मेरा भजन करना। देहाभिमान को तत्काल दूर करने के लिये मेरा अखण्ड नामस्मरण
करते रहना चाहिये। गायन, नृत्य आदि से युक्त होकर हरि का कीर्तन करना चाहिये और समस्त प्राणिमात्र के
प्रति समान मत्स्वरूप भावना रखें। समस्त भूत मत्स्वरूप हैं इस भावना से सदासर्वदा देखने से ज्ञानस्वरूप और
सर्वव्यापी मुझ में चित्त प्रवेश करता है। मैं निरन्तर तीनों अवस्थाओं में रहता हूँ। तीनों अवस्थाओं को मैं प्रकाशित
करता हूँ। लेकिन तीनों अवस्थाओं से भिन्न जो मैं हूँ वह सचमुच ज्ञानस्वरूप हूँ। तीन गुणों से परे, चौथा हुए
बिना भी चौथा मैं सचमुच ज्ञानस्वरूप हूँ। ऐसे मुझमें जो अपना चित्त रखता है वह ऐसा करते ही मत्स्वरूप हो
जाता है। सांसारिक चिन्ताएँ दूर होकर विषयावस्था समाप्त हो जाती है। उस समय चित्त, चिन्ता और चिन्तन,
विषयवासना व अभिमान इन सबका विनाश होकर स्वानंदघन मैं स्वयं ही प्रकट होता हूँ। द्वैत की भावना टूटे
बिना जो स्वयं को ज्ञानी समझता है और वृथा ज्ञान का अभिमान करता है वह भी अज्ञानी ही है।
यावन्नार्थेधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः ।
जागर्त्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥ ३०॥
अनेक वर्ण, अनेक व्यक्ति, विविध गोत्र, विभिन्न जातियाँ, अधम व उत्तम विधि के प्रकार इन सबसे चित्त
में दृढ़तर भेद उत्पन्न हो जाते हैं। मैं काला, गोरा, साँवला, उत्तम ज्ञान से श्रेष्ठ मैं, उत्तम पवित्र कृति मेरी, मेरा
कुल श्रेष्ठ और मैं उत्तम कुलवान इस प्रकार का भेद मन में उत्पन्न होने पर अद्वैत बताने वाली श्रुति देखकर या
शास्त्रार्थ की युक्ति सुनकर भी जिन साधकों के मन से भेद की निवृत्ति नहीं होगी उसका ज्ञानाभिमान व्यर्थ है।
उसका कर्माचरण व्यर्थ है। जागृत अवस्था में होने पर भी उसे सोया हुआ समझना चाहिये। उसमें जागृत अवस्था
है ही नहीं। तब देहाभिमान दृढ़ होता है उस समय उसने मानो धतूरे का सेवन किया रहता है और वह अत्यन्त
भ्रमजाल में फँस कर मानो अविद्यारूपी प्रदीर्घ सपना देखता रहता है। नींद में कहे गये शब्दों का जैसे कोई अर्थ
नहीं निकलता उसी प्रकार केवल पठन करने से परमार्थ प्राप्त नहीं होता। इतना ही नहीं बल्कि श्रुति शास्त्रों का
वास्तविक अर्थ भी उनकी समझ में नहीं आता। नित्य वेदाध्ययन करते हैं, अरण, ब्राह्मण, सूत्र, निरुक्त का पाठ
करते हैं लेकिन यदि कामक्रोध की निवृत्ति नहीं होती तो उस पठन से परमार्थ की प्राप्ति कभी नहीं होगी। मन में
देहाभिमान रखकर और भेद दृष्टि रखकर सहस्र वेदशास्त्र का पठन करने से भी परमार्थ की प्राप्ति कभी नहीं
होगी। जो स्वप्न में ही जागता है और स्वप्न में ही वेदशास्त्र पढ़ता है उसे जाग्रत कहने पर भी वह सोया हुआ
है। उसी प्रकार शास्त्रज्ञों का व्यवहार रहता है। देहाभिमान के साथ सभी भेद भावनाओं का जब तक विलय नहीं
होता तब तक आत्मज्ञान प्राप्त नहीं होगा। क्योंकि भेद ही सबसे बड़ा बन्धन है। सनकादिकों की ही शंका ध्यान
में रखकर, सबकी समझ में ठीक से आ सके ऐसी भाषा में वेदों का अर्थ भगवान अच्छी तरह समझाने लगे।
स्वयं ही सारा भेद प्रकट कर तुम्हारा वेद जोर-जोर से गर्जना कर रहा है। भेद का प्रतिपादन तो वेद ने ही किया
है और वेद का कथन तो असत्य नहीं होता। वेद का वचन सत्य ही है और उसे मान्य करना चाहिये यह तुम्हारा
ही कथन है तो उस वेद को असत्य कैसे कहा जाय? वेदज्ञा सबमें श्रेष्ठ है। वेद ने ही क्रिया और कर्म का
प्रतिपादन किया है। सारे वर्णाश्रम अपना स्वधर्म वेद के ही बल पर चलाते हैं। वेद को जो झूठा कहेगा वही
वास्तव में वेद बाह्य है यह तुमने ही कहा है। उस वेद को झूठा कैसे मानूँ? यदि ऐसी शंका हो तो उसके सम्बन्ध
में मैं ही तुम्हें वेद वचनों के भिन्न-भिन्न भागों का विचार सुनाता हूँ। अविद्यात्म भेद जिसमें प्रबल हुआ रहता है

तेरहवाँ अध्याय ३८१
उसी के लिये मैंने वेद का यह नियम लगाया है। किन्तु जो भक्त मेरे स्वरूप में एक हो जाता है उसके आगे
वेदवचन लाचार हो जाते हैं। वेद तीन गुणों से व्याप्त हैं और अभेद भजन के कारण भक्त निर्गुण बन जाता है
अतः उसे मेरी आज्ञा के कारण वेद का बन्धन नहीं रह जाता। राजा का प्रिय चाकर हो तो पहरेदार उसे नहीं
रोकता अथवा किसी दासी को राजा की गोद में बैठने का अधिकार प्राप्त हो तो बड़े-बड़े प्रधान भी उसे सम्मान
देते हैं। माँ भी अपनी कन्या को सिखाती है कि दूसरों के सामने पति से भी लज्जा करनी चाहिये लेकिन एकान्त
में लज्जा छोड़ देनी चाहिये। भेदों की भेदभावना जब तक प्रबल रहती है तब तक वेदों के वचन का उल्लंघन
नहीं हो सकता। लेकिन मेरे अभेद भावना धारण करने वाले जो भक्त हैं उनके लिये कोई भी नियम बाधक नहीं
होता। जिस प्रकार सूर्योदय के आगे चन्द्रमा का तेज फीका रहता है उसी प्रकार आशा अविद्या रूप में बाधक
होती है। उसे नष्ट कर देने पर वेदों की बाधा नहीं होती।
असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां तत्कृता भिदा।
गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा॥३१॥
जो गुरुकृपा से ज्ञानसम्पन्न होता है, उसे देह की भावना बाधक नहीं होती। उसके लिये प्रपंच का दर्शन
मिथ्या होता है और कर्म करने पर भी उसे कर्त्ता नहीं होना पड़ता। वर्ण और आश्रम अज्ञान की ही उपज हैं
इसलिये उसमें का क्रियाकर्म भी अज्ञानात्मक ही रहता है इसलिये उस वर्णाश्रम का वेदोक्त धर्म अज्ञानी के ही
मन में अविद्या का भ्रम उत्पन्न करता है। किन्तु ज्ञानसम्पन्न भक्तों में वह अविद्या बिलकुल नहीं होती। फिर उनमें
वेद विधान को स्थान कहाँ? आम के वृक्ष पर जब तक फल लगे रहते हैं तभी तक उनकी रखवाली की जरूरत
पड़ती है लेकिन एक बार फल हाथ में आ जाए तो रखवाली निष्फल सिद्ध होती है। उसी प्रकार जब तक अज्ञान
का बन्धन है तभी तक वेदों का विधान है। वह अज्ञान ही जब नष्ट हो जाता है तब वेदविधान वह स्थान छोड़
देते हैं। अज्ञान नष्ट होकर जब देह आचरण करता है तो देह का देहत्व से कोई हेतु नहीं होता। लेकिन आप
कहेंगे कि ऐसा कुछ होगा ही नहीं। तो उसके सम्बन्ध में भी बताता हूँ। सुनो। स्वप्न में देहादिक प्रपंच का भान
स्वप्न में ही सच होता है। कुछ संस्कारों से स्वप्न आने पर भी नींद खुलने पर वह सब व्यर्थ लगने लगता है।
किसी व्यक्ति को यदि स्वप्न में राजपाट मिल जाय या वह बाघ के मुँह में पड़ जाय अथवा उसे धन का लाभ हो
कर अमूल्य रत्न मिल जाए तो वहाँ का सुख, दुःख अथवा हर्ष नींद खुलने पर नहीं होता। उसी प्रकार ज्ञानी को
भी आत्मज्ञान के कारण अज्ञानात्मक कुछ भी बाधक नहीं होता। देह में रहकर भी विदेह स्थिति धारण करने के
जो ज्ञानदायक उपाय हैं, उस भेद का नाश करने के लिये भगवान स्वयं बता रहे हैं।
यो जागरे बहिरनुक्षणधर्मिणोऽर्थान् भुङ्क्ते समस्तकरणैर्हृदि तत्सदृक्षान्।
स्वप्ने सुषुप्त उपसंहरते स एकः स्मृत्यन्वयात्त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः॥ ३२॥
तीनों अवस्थाओं में देह में आत्मा एक ही रहता है। वही देह में विदेही होकर सबका साक्षी है। मैं बच्चा
था, फिर युवा हुआ और अब वृद्ध हो गया हूँ। इस प्रकार उम्र की साक्ष्य हम स्वयं देखते रहते हैं। जागृत अवस्था
में वह अनेक प्रकार के सुखोपभोग अनेक प्रकार से भोगता है और उन्हीं का स्वप्न में अपने हृदय में अच्छे ढंग
से विस्तार करता है। जागृति में भोग का जो संस्कार घटता है उसी का स्वप्न में विस्तार होता है। स्वप्न में
मनोमय विश्व उत्पन्न कर अपने हृदय में उसी का विस्तार बढ़ाता है। हाथी, घोड़ा, गधा, पुरुष, पर्वत, नगर,
बड़ी-बड़ी नदियाँ, समुद्र आदि वासनाओं को स्वप्न में देखता है। वही सुषुप्ति में, न जागृति न स्वप्न ही ऐसी

स्थिति में, अंतःकरण को भी लीन कर अहंकार विहीन होकर रहता है। विश्वाभिमानी पुरुष देह को ही 'मैं' और
विषय को 'मेरा' समझने की प्रवृत्ति का रहता है। उस वृत्ति से वह जागृति में निरन्तर देखता रहता है। जो तैजस
अभिमानी होता है वह अज्ञानवृत्ति का होता है इसलिये वह स्वप्नस्थिति देखता रहता है। ज्ञान का अभिमानी मूढ़
प्रवृत्ति का होता है इसलिये वह सुषुप्ति अवस्था देखता है। अब आप कहेंगे कि एक ही आत्मा इन तीन
अवस्थाओं में हो यह सम्भव नहीं है और तीनों अवस्थाओं को देखने वाले तीनों अभिमानी भिन्न होंगे यह कहें तो
अन्त में एक ही आत्मा शेष रहता है। ऐसा क्यों होता है? तो सुनो। पहला जो मैं जागने वाला हूँ उसने
स्वप्नावस्था देखी और वही मैं सुख से सोया भी था। इससे स्पष्ट है कि ये तीनों अवस्थायें मैं स्वयं जानता हूँ।
जिसने जो अवस्था देखी ही नहीं है वह उस अवस्था को कैसे बता सकता है? यही कारण है कि तीन
अवस्थाओं में आत्मा एक ही है। जागृति में इन्द्रियों में देखने का सामर्थ्य होता है, स्वप्न में तो देखने वाला मन
होता है और सुषुप्ति में पूरी तरह मूढ़ अज्ञान ही होता है। वह आत्मा को कैसे देखेगा? हे ब्राह्मण! इस शंका का
उत्तर भी शान्त चित्त से सुनें। मन और इन्द्रिय जड़ ही हैं। उनमें देखने का सामर्थ्य कहाँ से आयेगा? जो मन को
चलाता है, जो इन्द्रियों का प्रकाशक है, जो सुषुप्ति का द्योतक है, वह साक्षी रूप में रहने वाला आत्मा ही है।
अब अगर यह कहें कि सुषुप्ति में आत्मा होता ही नहीं है तो यह कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि, मैं आनन्दपूर्वक
सोया था यह अनुभव किसे होता है? तो प्राकृतिक कार्यों से अलग, देहादि अवस्थाओं को प्रकाशित करने वाला
तथा गुण और इन्द्रियों का नियंता वही वास्तव में आत्मा है। इन्द्रियाँ आत्मा नहीं होती यह नियम है क्योंकि
उनका कर्म केवल एकदेशी होता है और आत्मा तो सर्वकर्ता, सर्वोत्तम होते हुए सदा निष्कर्म है। मन आत्मा नहीं
है, इसका मर्म सुनो। संकल्प और विकल्प यह मन का कर्म है और आत्मा निर्विकल्प, निरुपम होते हुए संसार
का विश्रामस्थल है। जो सुषुप्ति भोग का साक्षी, त्रिभुवन में देखना ही जिसका स्वरूप है, ऐसा जो अद्वितीय
आत्मा है वह मैं ही हूँ इसे निश्चयपूर्वक ध्यान में रखो। इस युक्ति से जो एक परमात्मा को साध्य कर लेता है
वही साधकों के काम आता है और उसी के सामर्थ्य से योग भी साध्य होता है।
एवं विमृश्य गुणतो मनसस्त्र्यवस्था मन्मायया मयि कृता इति निश्चितार्थाः।
संछिद्य हार्दमनुमानसदुक्तितीक्ष्णज्ञानासिना भजत माखिलसंशयाधिम्॥ ३३॥
जो-जो युक्तियाँ मैंने तुम्हें बतायी हैं और जो श्रुति शास्त्रसम्मत भी हैं उन पर विचार कर परमार्थ के मार्ग
के संकटों को सुलझाना चाहिये। संसार के बन्धनों का कारण गुणावस्था है जिनसे मन व्याप्त है। जिसे मेरा ही
आच्छादन है ऐसी जो माया है वही मूल कारण है। जिस प्रकार आँख का पानी जम कर उसी का परदा बन जाता
है और जो आँख को ढँक देता है, उसी प्रकार मेरी माया मेरे ही कारण प्रबल हुई है और उसने मुझे ही ढंक दिया
है अथवा जिस प्रकार पूर्णिमा को अत्यन्त निर्मल पूर्णचन्द्र का उदय होते हुए उस पर पृथ्वी की छाया पड़ती है
और चन्द्रमा पर काला दाग दिखायी देने लगता है। पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच का अन्तर काफी है अर्थात्
चन्द्रमा का दाग झूठा है लेकिन लोग उसे सच मानते हैं। उसी प्रकार माया मेरे पास है, उसने मुझे स्पर्श भी नहीं
किया है फिर भी लोग मिथ्याभास के कारण ही उसके भुलावे में आ जाते हैं। इसीलिये मिथ्या गुणों की अवस्था
अपने माथे पर ढोते हैं। इसी कारण विषयभोग की अवस्था वासनामुक्त होकर बढ़ती है। इस प्रकार उभय देह
बन्धन जीव से व्यर्थ ही चिपके हुए हैं। इसलिये उसे तोड़ने के लिये मेरी युक्ति पर विचार करना चाहिये। मुक्ति
का केवल अनुमान ही करते रहने से अनुमानिक ज्ञान होता है। उससे अविद्या का बन्धन नहीं टूटता। इसलिये

तेरहवाँ अध्याय ३८३
साधु संतों की सेवा करनी चाहिये। साधुओं में भी परिपूर्ण साधुत्त्व केवल सद्गुरु के ही पास है इसलिये उनके
चरणों की सेवा करनी चाहिये। उस सेवा से संसार बन्धन टूटता है क्योंकि सद्गुरु ही सच्चे साधु और सज्जन
पुरुष रहते हैं। उस साधु के सरस वचन श्रुति का ही उपदेश करते हैं जिससे ज्ञानरूपी खड्ग की प्राप्ति होती है
और उसे बुद्धि के हाथ में दिया जा सकता है। उसी शस्त्र को फिर वैराग्य और नैराश्यरूपी सील पर घिस कर
उसे प्रखर बनाना चाहिये और उसे धैर्य की मुठिया लगाकर अंतःकरण में सावधानी से रखना चाहिए। उस शस्त्र
से स्वयं को एकजुट करना चाहिये और फिर लक्ष्य साधकर देहाभिमान को छाँट देना चाहिये जो सभी संशयों का
गड़ढा है, जिससे देहदुःख उत्पन्न होता है, जिसके कारण सदा विषयों का व्यसन लगता है, जो काम और क्रोध
का पोषण करता है, जो तीनों गुण बढ़ाता है, जो शुद्ध आत्मा में जीवत्त्व लाता है, जिसके कारण जीव को जन्म-
मरण भोगना पड़ता है, जो सभी अनर्थों का दाता है, ममता जिसकी लाडली बेटी है, ऐसा यह अभिमान है।
मायारूपी माँ ही ममता को बढ़ाती है और उसी के सामर्थ्य पर यह इतना अहंकारी हो जाता है। इसलिये वीर को
समरभूमि में तेज धार वाला शस्त्र लेकर, धैर्यपूर्वक खड़े होकर इतने जोर से प्रहार करना चाहिये कि एक ही घाव
में माया, ममता और अभिमान इन तीनों के एक साथ टुकड़े हो जाएँ। भोज्य, भोग और भोक्ता, कर्म, कार्य और
कर्त्ता, ध्येय, ध्यान और ध्याता इस त्रिगुट को ही काट डालना चाहिये। 'मैं हूँ', 'मैं कौन' अथवा 'मैं ही ब्रह्म हूँ'
इस आत्मीयता का अहंभाव भी काट डालने से साधकों को मेरे पद के पास स्थान प्राप्त होगा। इस प्रकार वे स्वयं
ही ब्रह्मस्वरूप हो जाते हैं। अब आप कहेंगे कि यह तो केवल शब्दज्ञान का व्यवहार है। जोर शोर से बातें करने
से अहंकार कैसे नष्ट होगा? यदि शब्दों से ही अभिमान नष्ट होता तो बड़े-बड़े विद्वान अभिमान में क्यों चूर हो
जाते? अभिमान अगर सामने दिखायी देता तो दौड़ कर उसे काट डालते। लेकिन वह तो अतर्क्य है। अतः शब्दों
से तो अभिमान नष्ट नहीं होगा। उसी प्रकार आत्मानुभव का जो साक्षात्कार होता है वह कोई शब्दों का खेल नहीं
है। तो ऐसी शंका का समाधान सुनो। जो सदा सावधान रहकर अनन्य भाव से मेरा भजन करता है अथवा मेरी
ही भावना से जो सद्गुरु के पवित्र चरणों की सेवा करता है, मुझमें और सद्गुरु के कल्पांत में भी कोई भेद नहीं
है इस अभेदभाव से जो मेरा भजन करते हैं उन्हें सहज ही ज्ञान प्राप्त होता है। स्वाभाविक रूप से मेरे भजन में
मग्न रहने के कारण उन्हें ज्ञानरूप खड्ग की प्राप्ति होती है। जिस शस्त्र की धार से काल का हृदय भी काँप
उठता है वह शस्त्र ही अपने आप उसके हाथ लग जाता है। उस शस्त्र के भय से ही माया, ममता और अभिमान
जीव को छोड़ कर पूरी तरह भाग जाते हैं। अहंममता तथा अविद्या पर पूरी तरह प्रहार करने के लिये तैयार हो
जाइये तो वे स्वयं ही भय के कारण भाग जाते हैं और अहंममता तथा अविद्या का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता
है। उत्तम भक्तिभाव से मेरा जो भजन करना चाहिये उसे करने से इतना ज्ञान प्राप्त होता है। अब मन में ऐसी
शंका आएगी कि यह भजन कहाँ किया जाय? तुम्हारा स्वरूप अतर्क्य, अत्यन्त सूक्ष्म और निर्गुण है। अतः
तुम्हारा भजन करने के लिये कौन-सा स्थान उपयुक्त है यही समझ में नहीं आता। अगर मन में ऐसी कल्पना
आती है तो उसका उत्तर ध्यानपूर्वक सुनो। सहस्रों पर्वतों को पार किये बिना, गुफाओं में गये बिना, कहीं दूर
जाने का परिश्रम किये बिना, जहाँ मेरी सदा सर्वदा भेंट होती है, जहाँ मैं पुरुषोत्तम रहता हूँ, वह भजन स्थान
निरूपम है। मुझे प्राप्त करने के लिये वह भक्तों का अत्यन्त सुलभ विश्राम स्थल है। सर्वसुखों का विश्रामस्थल
जो आत्माराम है वह अपने हृदय में सदा समभाव से रहता है। वहीं उसका प्रेम से भजन करना चाहिये। ब्रह्मदेव
से लेकर मक्खी तक सबके हृदय में एक मैं ही हूँ यह जो जानता है वही भाग्यवान है। मेरी प्राप्ति के लिये यही
भजन उत्तम है। जो मेरे हृदयस्थ तेज से मन-बुद्धि से आचरण करते हैं, जिस मेरे स्फुरण स्फूर्ति से ज्ञान पैरों पर