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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 869 में से

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पृष्ठ 381

तेरहवाँ अध्याय ३६५
का स्मरण करता रहता है। मन जब इस प्रकार सुसंस्कारित हो जाता है तो वह प्रत्येक क्षण हरि का ही चिन्तन
करता है। श्वासोश्वास चलते समय भी 'परब्रह्म मैं ही हूँ' का ध्यान लगा रहता है। सहज ही भगवान के
नामस्मरण का आदर करने को आत्मसंस्कार कहते हैं। आत्मशुद्धि का जो प्रमुख कारण है उसे दस लक्षणों के
साथ बतलाया। साधक भी उसका सेवन करें इसलिये मैंने भी उसका अधिक स्पष्टीकरण किया। अब जिसके
कारण तमोगुण जोर से बढ़ता है उसके भी दस लक्षण हैं। उसका पूरी तरह त्याग करना चाहिये। उसका शास्त्र
आभिचारिक है। वह मार्ग वेदों द्वारा निषिद्ध माना गया है। उसमें दारू, मद्य, ताड़ी आदि का अनिवार्य रूप से
सेवन किया जाता है। जो इहलोक और परलोक में भ्रष्ट हुए रहते हैं, पाखंडी तथा बहुरूपिया होते हैं और मुण्डन
किये रहते हैं उनसे इनकी संगति रहती है और जहाँ वेदविधियों का विरोध होता है, द्वेष, जुआ अथवा परस्त्री
जैसे दुर्व्यसन हों वहीं इनकी बैठक होती है और उनका समय मध्यरात्रि का रहता है। उस समय उस कर्म का
विधि चलता है। उस कर्म का प्रारम्भ जारण, मारण, मोहन, स्तंभन, उच्चाटन अथवा वशीकरण रहता है। ये सब
तामस कर्म हैं। जन्म का अर्थ है दीक्षाग्रहण। इसलिये प्रेतभूत पिशाच विद्या से प्रेतभूतों की आराधना करने से
तामसों को भी प्रेत का ही जन्म प्राप्त होता है। जिसमें तामस गुण प्रमुख रूप से रहता है वह पुरुष क्रोधयुक्त
होकर निरन्तर शत्रु की ही टोह में रहता है और उसका विनाश करने के लिये प्रवृत्त रहता है। उसके मंत्र तामसी
होते हैं और देवता गूँगी, मैली (गन्दी), उच्छिष्ट चांडालिन अथवा प्रेतों की देवता कंकाली होती है और उनकी
मंत्रयोजना भी वैसी ही रहती है। पत्थर और मिट्टी से बना घर मेरा है, यह जमीन मेरी है यही लगन रहती है।
नींद में, स्वप्न में भी दीवारें उठाता रहता है, इतनी घर के प्रति आसक्ति रहती है। मकान बनाने की क्षमता भले
ही न हो लेकिन पत्थर मिट्टी आदि का संग्रह करता रहता है। किसी चिड़िया को भी वहाँ नहीं आने देता। जिस
देह के लिये घर बनाया जाता है उस देह को भी वह असह्य कष्ट देता रहता है। तामस संस्कारों के योग से घर
की आसक्ति के कारण वह लगभग पागल हुआ रहता है। घर के लिये वह मरने तक प्रयास करता रहता है। यही
उसका तामस संस्कार है और उसका संसार है सिर्फ मिट्टी। जिसके कारण तमोगुण बढ़ता है उनके ये दस लक्षण
हैं। अब राजस का स्वरूप सुनो। उसका स्वरूप इससे अलग रहता है। सत्त्वगुण को स्वीकार करना चाहिये और
तमोगुण का त्याग करना चाहिये। अब आगे से काटने वाले और पीछे से लात मारने वाले रजोगुण के बारे में
सुनो। जरा सुनो, चतुर और छिनाल औरत अपने पति को प्रसन्न रखती है और फिर उसे धोखा देकर व्यभिचार के
लिये बाहर जाती है। उसी प्रकार यह रजोगुण है। जिस प्रकार कोई अड़ियल टट्टू देखने में बहुत सुन्दर रहता है
लेकिन बीच रास्ते में अड़ जाता है और पैर आगे नहीं बढ़ाता बल्कि पीछे हटने लगता है, उसी प्रकार रजोगुण
की स्थिति है। वहाँ कल्पांत में भी त्याग की सम्भावना नहीं है। ऐसा मनुष्य केवल दांभिक भावना से ही धर्म
करता है और मन में काम के प्रति आसक्ति रहती है। साथ में चलने वाला चोर सर्वस्व लूटने के लिये चाकर
बनकर साथ-साथ दौड़ता रहता है। वही स्थिति रजोगुण की है। वह भी इच्छा का संसार बढ़ाता रहता है।
इसलिये मनुष्य काम की आसक्ति से धर्म करता है, किये हुए कर्म का निश्चयपूर्वक उपभोग करता है और इस
प्रकार स्वयं ही जन्म-मरण के भँवर में फँस जाता है। कल्पांत में भी उससे छूट नहीं पाता। सात्त्विक लोग मेरी
भक्ति से तर जाते हैं, तामस लोग मेरी विरोध भक्ति से तर जाते हैं। किन्तु राजस लोगों की जन्म-मरण की यात्रा
रजोगुण के कारण कभी समाप्त नहीं हो पाती। रजोगुण की बाढ़ जिसके कारण प्रबल होती है वे दस लक्षण तुम्हें
बताता हूँ। काम्य कल्पना पूरी तरह छोड़ देने के लिये यह निरूपण भी सुनो। राजस लोगों का शास्त्र केवल
प्रवृत्ति पर आधृत है। वह केवल वासनामय होता है। जिससे इहलोक में और परलोक में सुख मिले ऐसी ही