श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 380, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें३६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
थोड़ा भी विकल्प उत्पन्न नहीं होता। उस सद्गुरु से ही शैवी अथवा वैष्णवी दीक्षा प्राप्त होती है अथवा वह गुरु
आत्मज्ञान से चैतन्यघन अथवा निर्गुण का उपदेश करता है। अब दीक्षा का लक्षण सुनो। जो चारों प्रकार के
पुरुषार्थ और चारों मुक्ति प्रदान करती है और अविद्या की स्थिति को पूर्णतया विलुप्त करती है उसी का नाम
वात्सव में दीक्षा है। इस प्रकार हे उद्धव! दीक्षा रूप जन्म की कथा वास्तव में दीक्षा है। इस प्रकार हे उद्धव !
दीक्षा रूप जन्म की कथा तुम्हें यथातथ्य बतलायी। अब ध्याननिष्ठ नाम से जो सात्त्विकता होती है उसके सम्बन्ध
में सुनो। वास्तव में जिसका शरीर सत्त्वोपाधिक और जिसका स्वरूप ज्ञानमय होता है वही श्रीविष्णु इन सात्विकों
का ध्येय है। उसका ध्यान करें। अथवा जो गौ के दुग्ध की तरह शुभ्र अथवा कर्पूर की तरह गौर वर्ण है उस
पंचमुखी श्रीशंकर का भवसागर के उस पार जाने के लिये ध्यान करना चाहिये। उस मूर्ति का ध्यान करने से
ध्येय, ध्यान और ध्याता यह सारा नष्ट हो जाता है और अंतःकरण में ज्ञानस्वरूप स्थापित हो जाता है। सात्विकता
का ध्यान यही है। जैसी दीक्षा वैसा ही ध्यान यही आगम शास्त्र का सिद्धान्त है और ज्ञानस्वरूप तक पहुँचना
यही उस ध्यान की परिणति है। जो ज्ञान का भण्डार है वही सद्गुरु का स्वरूप है। निरन्तर उसी का अनुसंधान
कर ध्यान करना चाहिये। पंचभूतात्मक देह का साँचा बना कर उसमें ब्रह्मरूपी रस उड़ेलने से सुन्दर गुरुस्वरूप
तैयार होता है। इसलिये दिन-रात उसी का ध्यान करना चाहिये। हे उद्धव! यही सात्त्विकों का ध्यान है यह
स्मरण रखो। अब मंत्रों का ग्रहण किस प्रकार होता है इसका भी निरूपण सुनो। जो सभी मंत्रों की माँ है, जो
ब्राह्मण को तत्काल द्विजता प्रदान करती है उस गायत्री के मंत्र को ग्रहण करने से ब्राह्मणों को ब्राह्मण होने का
अधिकार प्राप्त होता है। जो सभी मंत्रों का राजा है, जो ब्राह्मणों के हिस्से में आयी है, जिसके भय से मुझ
श्रीकृष्ण को भी ब्राह्मणों की पूजा करनी पड़ती है, वह गायत्री ब्राह्मणों को सहज ही प्राप्त हुई है। लोभ के कारण
उसकी उपेक्षा कर ब्राह्मण दरिद्र हो गये हैं। जो ब्राह्मण गायत्री पर निष्ठा रखता है उसके चरणों का मैं वंदन
करता हूँ। मंत्रों में गायत्री मंत्र श्रेष्ठ हैं ऐसा वेदों का प्रामाणिक मत है। गायत्री मंत्र का प्रवेश हुए बिना अन्य मंत्रों
का वेद में प्रवेश सम्भव ही नहीं था। मुख्यतयः सारे मंत्र गायत्री के पास एकजुट होकर निवास कर रहे हैं। यदि
गायत्री मंत्र का सम्बन्ध न हो तो ब्राह्मणों के मुख में वेद प्रवेश कर ही नहीं सकते। फिर दूसरे मंत्रों की बात क्या
करें ? सारांश वेदों के लिये गायत्री वंदनीय है। गायत्री मंत्र का एकमात्र गोपनीय तथ्य ज्ञानस्वरूप परब्रह्म ही है।
वह मंत्र ब्राह्मणों को ही सुलभ है। लेकिन वे भी उसका मर्म भूल गये। इस प्रकार गायत्री मंत्र पूर्ण रूप से
ब्रह्मस्वरूप है और सभी सिद्धियों को उत्पन्न करने वाला है। शैव अथवा वैष्णव मंत्रों को ग्रहण करने पर भी
गायत्री मंत्र से ही तत्काल सत्त्वशुद्धि होती है। सत्त्व की शुद्धि हो जाने के बाद सहस्रों शैव मंत्र अथवा वैष्णव
मंत्रों की प्राप्ति होती है और उस सत्त्वशुद्धि से ही साधकों को तत्काल आत्मदृष्टि प्राप्त होती है। हे उद्धव !
मंत्रग्रहण करने का यह सही ढंग है। अब संस्कार के बारे में सुनो। मन के संकल्प और विकल्प तोड़ने का प्रयत्न
जो उत्कट इच्छा और लगन से करता है उसमें वैसे तो संकप उत्पन्न ही नहीं होता और अगर हुआ भी तो उसे
वह वहीं कुचल देता है। वह सदा विचार दृष्टि से ही देखता रहता है इसलिये वह मन से भी स्वतंत्र रहता है।
परमात्मा निष्ठा के कारण वह मन को नियंत्रण में रखता है, उसे इधर-उधर भटकने नहीं देता। मन को
कुशलतापूर्वक स्मरण में ही फँसाये रखता है। वैराग्य के बल पर वह मन का दमन करता है और उसी के भय से
हरि का चिन्तन करता है। जिस प्रकार दासी स्वामी की किसी भी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करती, उसी प्रकार
वह अपने मन को ईश्वरनाम स्मरण के अधीन कर देता है। इन्द्रिय अनेक प्रकार के पदार्थों को देखते रहते हैं
लेकिन मन किसी अन्य विषय को नहीं देखता। वह जागृत अवस्था में तथा स्वप्न में भी स्वाभाविक रूप से हरि