श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 387, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय ३७१
हुए रहते हैं। इसलिये इस लोक में विषय का त्याग नहीं हो पाता। उद्धव ! तुम्हारी शंका यही थी न ? तो उसका
भी उपाय सुनो। जो विचारशील लोग हैं उनके मन में विषय वासना उत्पन्न ही नहीं होती। लेकिन इस पर भी
यदि कभी ऐसा हुआ तो उन्हें अभ्यास करना चाहिये।
रजस्तमोभ्यां यदपि विद्वान् विक्षिप्तधीः पुनः।
अतन्द्रितो मनो युञ्जन् दोषदृष्टिर्न सज्जते ॥ १२ ॥
रज और तम ये गुण यदि बुद्धि पर अपना प्रभाव जमाने में सफल हो जाएँ तो ज्ञाता को आलस छोड़ कर
अपने मन को नियंत्रण में रखना चाहिये। स्त्री का शरीर हड्डियों और मांस का बना विष्ठामूत्र का भण्डार है और
उसके सम्बन्ध में विचार करने पर भी घृणा हो आती है। उसका भोग तो नरक की यातना के समान है। इस
प्रकार स्त्री भोग के दोष बता देने से मन विषयों से तत्काल दूर कर नियमों के नियंत्रण में रखना चाहिये। ऐसा
करने से भी मन नियमों के बन्धन में नहीं बँध पाता। अभ्यास करने वालों को इसमें बड़ी कठिनाई होती है।
अर्थात् साधारण लोग तो इसमें असमर्थ ही होते हैं। तो भाई ! ध्यान से सुनो। तो जिससे मन नियंत्रित हो सके
ऐसा मनोनिग्रह का लक्षण और साधन बताता हूँ।
अप्रमत्तोऽनुयुञ्जीत मनो मय्यर्पयञ्छनैः।
अनिर्विण्णोयथाकालं जितश्वासो जितासनः ॥ १३ ॥
आलस और निद्रा का त्याग कर जो सावधान चित्त से ब्रह्मसाधना करता है, वही सचमुच मेरे चित्स्वरूप
के अभ्यास में लग जाता है। इसमें पहला काम है आसन स्थिर करने का अभ्यास। मूलबंध व्यवस्थित
नियमानुसार करने में आसन स्थिर होता है। आसनजय साध्य होते ही वह सहज ही योगमार्ग पर लग जाता है
और अधिक अभ्यास करने पर प्राण और अपान की स्थिति भी सामान्य होने लगती है। विषय मन के अधीन
रहते हैं, मन वायु के वश में रहता है इसलिये अभ्यास से वायु को ही वश में कर लेने से मन अपने आप स्थिर
हो जाता है। इस प्रकार जो धीरे-धीरे अभ्यास कर समय को सार्थक करता है वह विरक्त भले ही न हो लेकिन
महान सामर्थ्यवान बनकर परमार्थ के प्रति अत्यन्त व्याकुल रहता है। हरिचिंतन में मन को एकाग्र करने से प्राण
और अपान ये दोनों वायु एकरूप हो जाते हैं। यही वायु की परिपूर्ण विजय है। उसे साधने से योगसाधन सहज
ही साध्य हो जाता है। तब प्राणापान की समझोड़ी छः चक्र के परदे फाड़ देती है। तब चित्त विषयों को छोड़
देता है और विषय भी चित्त को छोड़ देते हैं। इस प्रकार इस अभ्यास के मार्ग से वासनायुक्त इच्छा का सम्बन्ध
ही टूट जाता है। इसी मार्ग से मैंने सनकादिकों को आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त किया।
एतावान् योग आदिष्टो मच्छिष्यैः सनकादिभिः।
सर्वतोमन आकृष्यमय्यद्धाऽऽवेश्यते यथा ॥ १४ ॥
देखो। इसी उपदेश से मेरे शिष्य सनकादिक आदि ने अपने अभ्यास के सामर्थ्य से अलौकिक आत्मज्ञान
का सुख प्राप्त किया। ऐसा वह कौन-सा उपदेश है ? वह चित्त और विषय के सम्बन्ध को तोड़ने के बारे में है।
यही बात उन्हें बताकर मैंने उन्हें आत्मज्ञान के अभ्यास की ओर लगाया। मन जहाँ भी कहीं जाये वहाँ परब्रह्म ही
भरा हुआ है यही भावना धारण करने की आदत लग जाने के कारण सनकादिक ब्रह्मस्वरूप हो गये। चित्त का
विषयों से वियोग कराना यही योग सनकादिकों ने साध्य किया। उन्हें इसका उपदेश करने के लिये मैं श्रीकृष्ण