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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 869 में से

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पृष्ठ 388

३७२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
ही उपदेशक बना। उद्धव ने यह श्रवण करते ही मन में विचार करना शुरू किया कि मैं तो श्रीकृष्ण को छोड़कर
कभी रहा नहीं, फिर इन्होंने सनकादिकों को उपदेश कब किया ? सनकादिक तो बहुत पहले ही ब्रह्मस्वरूप हो
चुके हैं और कृष्ण तो इस काल के देवकी का बेटा है। उसको यह गुरुत्त्व कैसे प्राप्त हुआ ?
उद्धव उवाच
यदा त्वं सनकादिभ्यो येन रूपेण केशव ।
योगमादिष्टवानेतद्रूपमिच्छामि वेदितुम् ॥ १५ ॥
यही बात मन में लाकर उद्धव ने पूछा, "हे श्रीकृष्ण ! तुमने सनकादिक को कब उपदेश किया ? क्या इस
समय मैं तुम्हारे पास नहीं था ? भगवान ! तुमने इसी रूप में उन्हें उपदेश किया था या किसी अन्य रूप में ? यह
बात जानने की मेरी इच्छा है। वह कौन सा काल था ? समय क्या था और उन्होंने प्रश्न किस प्रकार किया था ?
आप मुझे पूरी तरह सुनाइये।" उद्धव का यह प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण भावविह्वल हो गये और अपनी हंसा की
कथा स्वयं ही सुनाने लगे।
श्रीभगवानुवाच
पुत्रा हिरण्यगर्भस्य मानसाः सनकादयः ।
पप्रच्छुः पितरं सूक्ष्मां योगस्यैकान्तिकीं गतिम् ॥ १६ ॥
महाप्रसिद्ध सनत्कुमार ब्रह्मदेव के मानसपुत्र हैं। उन्होंने सत्यलोक में एक अत्यन्त गहन प्रश्न पूछा था। वह
प्रश्न यह था कि योग की गति अत्यन्त सूक्ष्म है और आत्मस्वरूप की स्थिति समझना अत्यन्त कठिन है। वह
किस प्रकार समझ में आयेगी ? ऐसा विकट प्रश्न उन्होंने अपने पिता से पूछा।
सनकादय ऊचुः
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रभो ।
कथमन्योन्यसंत्यागो मुमुक्षोरतितितीर्षोः ॥ १७ ॥
सनकादिक ने पूछा, चित्त स्वभाव धर्म के अनुसार सदा विषयों में आसक्त रहता है इसलिये वह हमेशा
विषयों में ही उलझा रहता है। उसी प्रकार विषय भी चित्त में प्रवेश कर वासना के रूप में उससे चिपके रहते हैं।
इसलिये वे वहाँ से निकल नहीं सकते। फल और काल इन दोनों के न रहने पर भी आम मधुर ही होते हैं। उसी
प्रकार विषय जब एक बार चित्त में प्रवेश कर जाते हैं तो वहाँ से कभी नहीं निकल पाते। विवाहिता स्त्री अपने
मैके जाती है लेकिन वह मन से दूर नहीं जाती, उसी प्रकार विषय भी चित्त से चिपक कर बैठा रहता है।
इसलिये चित्त और विषय का परस्पर बिछोह मुमुक्षुओं के लिये कैसे संभव है ? इसका कोई उपाय हो तो स्वामी
सविस्तार बतायें।
श्रीभगवानुवाच
एवं पृष्टो महादेवः स्वयम्भूभूर्तभावनः ।
ध्यायमानः प्रश्नबीजं नाभ्यपद्यत कर्मधीः ॥ १८ ॥
जिसे अग्रपूजा का सम्मान प्राप्त है, समस्त देवताओं में जिसकी महिमा श्रेष्ठ है उस ब्रह्मदेव को श्रेष्ठ
कहने का कारण उसकी महानता ही है। जो स्वयं चराचर सृष्टि का निर्माण करता है, जो वेदों का