श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
यदि ब्रह्मदेव मुझसे पूछते तो इसमें उनकी अज्ञानता प्रकट होती इसलिये वह मौन ही रहा और ब्रह्मदेव को आगे
कर उन सनकादिकों ने मुझसे पूछा, 'आप कौन हैं? कहाँ से आये हैं?'
इत्यहं मुनिभिः पृष्टस्तत्वजिज्ञासुभिस्तदा ।
यदवोचमहं तेभ्यस्तदुद्धव निबोध मे ॥ २१ ॥
उन्होंने ब्रह्मदेव से जो प्रश्न किया था उसका अर्थ मेरी समझ में आ सके इसलिये उन्होंने पूछा, "आप कौन
हैं?" वे अत्यन्त चतुर और जिज्ञासु थे। तिस पर स्थूलदेह, लिंगदेह और कारणदेह इसके अतिरिक्त जो भी वस्तु
है वह चैतन्यस्वरूप है यह बतलाने के लिये मैंने उस प्रश्न का खण्डन तीन श्लोकों में किया। उनके प्रश्नों का
खण्डन कर मैंने नित्यानित्य विवेक का ज्ञान उन्हें प्रदान किया। उसी निरूपण को तुम सुनो। उद्धव! मैं तुम्हें
सनकादिकों के ही समान मानता हूँ। इसलिये उन्हें जो ज्ञान दिया वह तुम्हें भी दूँगा सुनो। वह ज्ञान अत्यन्त श्रेष्ठ
होते हुए अत्यन्त प्राचीन है। इसलिये ध्यानपूर्वक सुनो। यह सुनकर उद्धव ने मन के कर्णों का विस्तार कर दिया।
स्थूलदेह और सूक्ष्मदेह को पीछे छोड़ उद्धव सर्वांग से कर्णरूप हो गया। इसलिये श्रीकृष्ण ने स्वयं ही उसे गुप्त
ज्ञान दिया। जैसे मन्दिर में रत्नों की खान मिले, उसमें पारस मिले और उस पारस से अमृत की धारा फूट पड़े,
उसी प्रकार उद्धव का भाग्योदय हुआ। श्रीमद्भागवत की कथा सुनाने के लिये श्रीकृष्ण जैसा वक्ता मिला और
हंसगीत की कथा श्रीकृष्ण बड़े चाव से सुनाने लगा। अहो! सनकादिकों का हिस्सा श्रीकृष्ण स्वयं ही उद्धव के
हाथ में दे रहे थे, ऐसे भाग्य का किन शब्दों में वर्णन किया जाय? वक्ता स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप हो, वह भी ब्रह्मकथा
का ही उपदेश करेगा। तब सहज ही परब्रह्म गुरु बन गये। उद्धव कैसा भाग्यवान था? इसलिये आत्मभाग्य से
भाग्यवान तथा संसार में प्रसिद्ध एक उद्धव ही है। जिसके लिये स्वयं ज्ञानसमर्थ जगन्नाथ प्रसन्न हुआ।
हंस उवाच
वस्तुतो यद्यनानात्वमात्मनः प्रश्न ईदृशः।
कथं घटेत वो विप्रा वक्तुर्वा मे क आश्रयः ॥ २२॥
परमात्मा सर्वत्र एक ही है। उसमें 'मैं' और 'तुम' का सन्देह नहीं है। 'तुम कौन' यह जो प्रश्न है वह
केवल शब्दों का अपव्यय है। आपने जो प्रश्न किया उसका उत्तर देने के लिये वक्ता के पास शब्द ही नहीं है।
वास्तव में 'मैं' और 'तुम' है ही नहीं इसलिये आपका प्रश्न मिथ्या है। नाम, रूप, वर्ण, व्यक्ति यह सब कुछ भी
नहीं है। 'अपना' और 'पराया' जैसी कोई जाति नहीं है। इसलिये हे विप्र ! आपके भाषण में सत्यत्त्व हो ही नहीं
सकता। चारों पुरुषार्थ पूर्ण करने वालों में ब्राह्मण विख्यात है। लेकिन विप्र हो! आपके लिये ज्ञान का प्रश्न ही
उपस्थित नहीं होता। अगर अनेकत्व हो तभी ऐसा प्रश्न सम्भव होगा। आत्मा के लिये ऐसा प्रश्न नहीं किया जा
सकता। आत्मा के लिये ऐसा प्रश्न उपस्थित ही नहीं होता। देह के लिये वह लागू ही नहीं होता।
पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः।
को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भोह्यनर्थकः ॥ २३ ॥
क्योंकि ब्रह्मदेव से लेकर मशक तक देह के रूप में जो कुछ भी है वह पंचभूतात्मक है। इसलिये 'तुम
कौन' कहने में कोई अलग बात नहीं दिखायी देती। कड़ा, कुंडल, मुकुट, माला, अँगुठियाँ, कमरपट्टा अथवा
अन्य अलंकार देखने पर उसमें सुवर्ण के अतिरिक्त अन्य कुछ दिखायी नहीं देता। अथवा गाजर, मटका, सुराही,