श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 385, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय ३६९
किनारा फँसा हुआ, फिर भी वह कुतिया के पीछे कामासक्ति से लगा रहता है। कुतिया गुस्से में उस पर
चिल्लाती रहती है फिर भी कुत्ते को वह भला ही लगता है। उसके सारे प्राण कुतिया के पूँछ में लगे रहते हैं
इसलिये वह उसका पीछा करता रहता है। शरीर से शरीर सटते ही कुतिया उस पर चिल्लाती है और उसके पीछे
दौड़ती है फिर भी वह उसकी पूँछ नहीं छोड़ता। उसकी कामेच्छा बढ़ती रहती है। इतनी यातनाओं के बाद यदि
भोग मिला भी तो उस भोग में वह लड़खड़ा कर गिर पड़ता है। चारों ओर से लोग उसे दुत्कारने लगते हैं और
उसकी उपेक्षा करते हैं। निन्दा के पत्थर शरीर पर निरन्तर बरसते रहते हैं। मूर्ख लोग भी उस पर थूकते हैं। पुरुष
की भी वैसी ही अवस्था होती है फिर भी उसे काम ही अच्छा लगता है। श्वान का जुग जल्दी ही छूटता है
किन्तु मनुष्य का जुग कल्पांत में भी नहीं छूटता। स्त्री के लोभ में अत्यन्त लंपट होने के कारण वह अनेक प्रकार
के संकट सहता रहता है। अब गधे का भी हाल सुनो। गधी को दूर से देखते ही गधा चिल्लाता हुआ उसकी ओर
दौड़ता है। उसे जरा भी लज्जा नहीं होती। गधी आगे-आगे भागती रहती है और गधा लालच के कारण उसके
पीछे-पीछे दौड़ता रहता है। वह उसके मुँह पर दुलत्ती चलाती है लेकिन यह आगे ही बढ़ता जाता है। वह छाती
पर दुलत्ती चलाती है लेकिन वह उससे प्रेम ही करता है। इस प्रकार स्त्रियों के प्रति गधे जैसा आचरण करते
रहते हैं। अथवा पुरुषों की गति बकरे जैसी ही होती है। उसे मारने के लिये कसाई के पास लाया जाता है, फिर
भी उसका ध्यान बकरियों में ही लगा रहता है। अपनी ही जात बिरादरीवालों को मरता देखता रहता है लेकिन
उस दुःख से उसे पश्चात्ताप नहीं होता। मृत्यु के बिलकुल पास पहुँचने पर भी वे लोभ के कारण विषयसुखों की
ही इच्छा करते रहते हैं। मृत्यु की अन्तिम सीढ़ी बुढ़ापा सिर पर आ टपकता है फिर भी वह विषय की ही ओर
भागता रहता है। मृत्यु का स्मरण भी नहीं करता। कसाई बकरा काटने के लिये ले आता है, वह अपने साथियों
को कटते देखता रहता है लेकिन उसकी परवाह न कर खुशी-खुशी बकरियों के साथ रममाण होने के लिये
छटपटाता रहता है। बकरा, कुत्ता और गधा ये विषयी अवश्य हैं लेकिन वे केवल ऋतुकाल में ही विषयभोग के
लिये तैयार रहते हैं। लेकिन पुरुष हमेशा कामातुर रहता है। कुतिया गर्भवती रहती है उस समय कुत्ता भी संभोग
के लिये तैयार नहीं रहता। लेकिन पुरुष गर्भवती स्त्री के साथ भी संभोग करता है। गधा गधी के साथ लिपटता
जरूर है लेकिन वह उसे मोतियों के अलंकार नहीं पहनाता लेकिन मनुष्य को स्त्री की चाह इतनी अधिक होती
है कि वह उसके हर लाड़ पूरे करता है। उसकी वेणी के लिये फूलों के गजरे लाता है, उसके कुंकुम तिलक पर
रत्न की आभा सजाता है और नाक में मोतियों की नथ पहनाता है। यह मनुष्य जन्म की चाह है। प्रसूति का
समय निकट आता है और पेट फूला रहता है फिर भी कामांध और विवेकहीन दुष्ट ऐसी स्त्रियों के साथ रममाण
होते रहते हैं। अस्थि, मांस, विष्टा, मूत्र इत्यादिसे भरी होने पर भी लोग जानबूझ कर इतनी गन्दगी के प्रति क्यों
कामासक्त होते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर श्रीकृष्ण तीन श्लोकों में दे रहे हैं। वे कहते हैं, उद्धव! ध्यान देकर
कामासक्ति के सम्बन्ध में विचार सुनो।
श्री भगवानुवाच
अहमित्यन्यथाबुद्धिः प्रमत्तस्य यथा हृदि।
उत्सर्पति रजो घोरं ततो वैकारिकं मनः ॥९॥
जो मोह मद से उन्मत्त विवेकहीन पुरुष होते हैं उनमें देहात्मवाद के कारण रजोगुण उत्पन्न होकर उससे
अभिमान उफनता है। जिस प्रकार मनुष्य मद्य प्राशन कर उन्मत्त हो जाने पर अपना हित भूल जाता है और फिर