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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 869 में से

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पृष्ठ 383

तेरहवाँ अध्याय ३६७

होते ही उनकी प्रवृत्ति अपने आप ही धर्म की ओर होती है। धर्मप्रवृत्ति से मेरा भजन होता है और मेरी भक्ति का
उल्हास बढ़ते ही मैं भक्तों पर जब प्रसन्न हो उठता हूँ उस समय ज्ञान भी अपने आप ही प्रकट होता है।
'तत्वमसि' आदि जो वाक्य हैं उनका यही अर्थ है कि गुरु के द्वार से आकर ज्ञान की प्राप्ति होती है। तो फिर तुम
कहोगे कि फिर सत्त्वशुद्धि से किस हेतु से धर्मभक्ति करनी चाहिये ? तो उसका विचार भी सुनो। सत्त्वशुद्धि के
बिना यदि श्रवण किया जाय तो वह बाजार के कोलाहल की तरह होता है। उससे कभी भी आत्मस्वरूप की
पहचान नहीं हो सकेगी। अन्धा बालक जिसके गर्भ से जन्म लेता है उसका स्तनपान करता रहता है लेकिन माँ
कैसी होती है उसे दिखायी ही नहीं देती। वैसी ही स्थिति उस उपदेश की रहती है। प्रत्येक इन्द्रिय को सजीवता
प्रदान कर भगवान सभी का पालन-पोषण करता रहता है लेकिन विषय में अन्धे लोग उसे नहीं देख पाते। उनकी
चित्त की शुद्धि न होने के कारण उन्हें कुछ भी नहीं दिखायी देता। बकरी के गले में चमड़ा लटकता रहता है उसे
झूठ ही 'स्तन' कहते हैं, उसी प्रकार सत्त्व की शुद्धि हुए बिना उपदेश भी व्यर्थ है। बहते जल पर अक्षर लिखने
से वे पानी की सतह पर अंकित नहीं हो पाते, उसी प्रकार आत्मज्ञान भी सत्त्वशुद्धि के बिना स्पष्ट रूप से प्रकट
नहीं हो पाता। पूर्णरूप से सत्त्वशुद्ध हुए बिना जिस प्रकार धर्मबुद्धि प्रकट नहीं होती, उसी प्रकार ग्रहण में जिस
प्रकार चन्द्रमा नहीं दिखाई देता उसी प्रकार आत्मज्ञान भी सिद्ध नहीं होता। हरिकथा श्रवण करने से जिसका कंठ
सूख जाता है, शरीर पर रोमांच उभर आते हैं, पसीना छूटने लगता है, रुलाई आने लगती है, लेकिन एक भी पैसा
खर्च करना होता है तो प्राण निकलने लगते हैं ऐसा जिसका आचरण होता है उसमें भी ब्रह्मज्ञान प्रकट नहीं होगा।
जब तक हृदय से लोभ नहीं छूटता तब तक सच्चा ज्ञान कैसे प्राप्त हो ? जब सत्त्वशुद्धि और धर्म ये दोनों स्पष्ट
दिखायी देने लगेंगे तभी वह आत्मज्ञान की प्रबल 'प्रेरणा से सही मार्ग पर लगेगा। उस मार्ग पर चलते रहने पर भी
यदि मेरी भक्ति साथ में हो तभी वह चोरों से बच पायेगा और झट मेरे पास आएगा। उस भक्ति की संगत न हो
तो आगे का राजमार्ग भी अपरिचित होने लगता है। तब काम-क्रोध विनाश करने के लिए प्रवृत्त हो उठते हैं और
विकल्परूपी भँवर डुबा देते हैं। अरे ! भाग्य के बिना मेरी भक्ति प्राणियों का संग नहीं करतीं। मेरी भक्ति की
संगत से मार्ग चलने पर किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता। मेरी भक्ति के साथ बड़े-बड़े वीर तथा प्रसिद्ध नौ
रणबाँकुरे होते हैं। वे युद्ध के लिये सदा तैयार होकर शत्रु का सामना करने के लिये तैयार रहते हैं। आत्मज्ञान के
योग से वे महान योद्धा बने हुए हैं। इसलिये मेरी भक्ति के बिना हजारों प्रकार से श्रवण, मनन करने पर भी मेरी
प्राप्ति नहीं होती। भजन से ही मेरी पूर्ण प्राप्ति होती है। अहो ! सभी प्राणिमात्र के प्रति भगवान की ही भावना
रखना यही मेरी श्रेष्ठ भक्ति है। वह स्वयं ही जब सहचरी हो जाती है तो काम, क्रोध, मोह, पीड़ा नहीं दे सकते।
बड़े जतन से उलटी गागर समुद्र में डुबोने से उसमें एक बूँद जल भी नहीं घुस पाता। वही बात महावाक्य की
है। इसलिये अत्यन्त आदर और धर्मशील बुद्धि से मेरा भजन करने से मैं प्रसन्न होता हूँ और मेरे प्रसाद से ही ज्ञान
प्रकाशित होता है। हे उद्धव ! ऐसा न कर यदि केवल अर्थ और स्वार्थ पर लोभदृष्टि रख कर मेरी सूखी भक्ति की
जाय तो उससे मैं लक्ष्मीपति प्रसन्न नहीं होता। जो धन, मन, शरीर, वाणी घिस कर मेरा भजन करता है उसे ही
जिस प्रकार चन्द्र किरणों से चकोर प्रसन्न होता है उसी प्रकार मैं प्रसन्न होता हूँ। वत्स के लिये गाय जिस प्रकार
स्नेहयुक्त होकर गोरस देती है, उसी प्रकार अत्यन्त सन्तोष से मैं भी प्रसन्न होता हूँ। मेरे उस प्रसाद से ही मेरा
ज्ञान भक्तों में प्रकट होता है। स्त्री यदि सद्गुणी, सुन्दर और पतिव्रता और लाडली हो तो पति उसे बिना माँगे सब
कुछ दे देता है, उसी प्रकार मैं अपने भक्तों पर प्रसन्न होता हूँ। मेरे ही प्रसाद से जो ज्ञान प्रकट होता है उसे ही
'श्रुति' और 'स्मृति' कहते हैं यह जान लो और सहज ही जिस प्रकार अविद्या का नाश होता है उसे 'अपोहन'