श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अनेक प्रकार के अनर्थ उत्पन्न कर आत्मघात करने के लिये भी प्रवृत्त हो जाता है उसी प्रकार रजोगुण के कारण
लंपट होने वाला पुरुष शुद्ध, बुद्ध तथा नित्यमुक्त होने में ही सच्चा कल्याण है यह भूलकर कामासक्त हो जाता
है। अभिमान रजोगुण में रंग जाने पर दुःखरूपी भीषण रजोगुण अपार बढ़ जाता है और उससे मन विकार के
वशीभूत हो जाता है।
रजोयुक्तस्य मनसः संकल्पः सविकल्पकः।
ततः कामो गुणध्यानाद् दुःसहः स्याद्धि दुर्मतेः॥१०॥
मन जब रजोगुण से भर जाता है, उस समय प्रचण्ड-संकल्प-विकल्प उत्पन्न होते हैं और एकान्त में
आसन डालकर ध्यानस्थ बैठने पर भी स्त्रियों का ही चिन्तन होता रहता है। रजोगुण से ही कामासक्ति उत्पन्न
होती है। दुष्ट वासना उत्पन्न होकर मन भी दुष्ट हो जाता है। इससे चित्त में काम के सिवा कोई दूसरी स्फूर्ति
उत्पन्न ही नहीं होती। जन में, वन में, एकान्त में, जागृति में, सुषुप्ती में, स्वप्न में, ध्यान में, मन में अथवा चिन्तन
में स्त्रियों के अतिरिक्त और किसी का स्मरण नहीं होता। सारा ध्यान स्त्री की कामेच्छा की ओर लगा रहता है।
उसके हावभाव, उसके मनोहर विलास, उसका सुन्दर लावण्य, और उसका सुरस रस इसमें ही मन लिप्त रहता
है। रतिसुख, तथा स्त्री की क्रीड़ा का महत्त्व बढ़ाकर उससे काम जिस प्रकार बढ़ जाता है उस पर किसी का बस
नहीं चलता। धन, धान्य, पुत्र आदि का सुख मिले, इहलोक तथा परलोक का सुख प्राप्त हो, ऐसी रजोगुण की
उत्कट इच्छा रहती है।
करोति कामवशः कर्माण्यविजितेन्द्रियः।
दुःखोदर्काणि सम्पश्यन् रजोवेगविमोहितः॥११॥
जब रजोगुण का आवेश उत्पन्न होता है, उस समय कामरूप-ग्रह अद्भुत ढंग से बिफरता है और जो पुरुष
काम से ग्रस्त होता है वह सदा काम का ही दास बन जाता है। जिसके मन में विचार नहीं है वह काम का जर
खरीद गुलाम बनकर रहता है। काम उसे जैसे नचाता है उसी के अनुसार वह नाचता रहता है। काम का दास हो
जाने पर उसका दुःख प्रतिदिन बढ़ता ही जाता है, सकाम कर्म करना ही उसे अनिवार्य हो जाता है और वह
अत्यन्त अहंकारी हो जाता है। रजोगुण के कारण वह मोह में लिप्त रहता है इसलिये वह इन्द्रियों पर विजय न
प्राप्त करने वाला तथा अयोग्य बना रहता है। वह जन्म-मरण के अधीन रह कर तदनुसार सारे कर्म करता है।
रजोगुण की पीड़ा अत्यन्त भयंकर है। उसने सारे लोगों को विषयांध कर दिया है। उद्धव! रज पर लुब्ध होने
वाले लोग अत्यन्त मूर्ख होते हैं, यह प्रसिद्ध ही है। रजोगुण से बद्ध होने पर महामोह का प्रवेश होता है तब भ्रम
की आँधी चलती है और तमोगुण चारों ओर फैलता है। उद्धव! प्राणियों की बुद्धि सचमुच ऐसी होती है इसे
ध्यान में रखो। इसीलिये वे काम का सेवन करते हैं। विषयों से उन्हें विरक्ति नहीं होती। अब शायद तुम सोचोगे
कि तब तो तरने का कोई उपाय ही नहीं रहा और प्राणियों को सद्गति भी मिलने से रही। यह विषयासक्ति
अनिवार्य है। जीव का तो अविद्या और विषय से सम्बन्ध रहता है। उनकी पीड़ा बहुत बड़ी होती है। अविद्या का
सम्बन्ध अनादिसिद्ध है। इसके कारण अनेक प्रकार की कल्पनाएँ उठती हैं। अंतःकरण भी अनादि है और उसकी
पूर्णता भी क्रमानुसार होती रहती है। इससे विषयबुद्धि भी दृढ़ हो जाती है और त्याग·बिलकुल नहीं होता।
अंतःकरण सत्त्व से उत्पन्न होता है यह सत्य है किन्तु यह कार्य माया का है इसे ध्यान में रखो। सुखभोग की
आदत से जहाँ रजोगुण उफन उठेगा तो उसे कौन रोक पायेगा? जो विचारी पुरुष होते हैं वे भी विषय के अधीन