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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 389, कुल 869 में से

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पृष्ठ 389

तेरहवाँ अध्याय ३७३
निवासस्थान है, उस ब्रह्मदेव को उसके श्रेष्ठपुत्र ने यह अत्यन्त गहन प्रश्न पूछा। लेकिन उस प्रश्न का
यथोचित उत्तर किस प्रकार दिया जाय यह ब्रह्मदेव की समझ में नहीं आया। कर्म के योग से उसकी बुद्धि
मन्द हो गयी थी। ज्ञानोपदेश किस प्रकार किया जाय यह उसकी समझ में नहीं आ रहा था। प्रश्न तो अत्यन्त
गहन था। ब्रह्मदेव मानों पागल से हो गये। तब वे मेरा चिन्तन करने लगे। सत्यलोक में सबके सामने
सनकादिक ने जो प्रश्न किया वह मेरी समझ में नहीं आया यह भी वे नहीं कह पा रहे थे और न उसका
उचित उत्तर ही दे पा रहे थे। इस प्रकार ब्रह्मदेव के सामने बहुत बड़ा संकट उत्पन्न हो गया। उन्होंने मुझ
ज्ञानश्रेष्ठ का चिन्तन किया।
स मामचिन्तयद् देवः प्रश्नपारतितीर्षया।
तस्याहं हंसरूपेण सकाशमगमं तदा॥१९॥
पुत्रों का अज्ञान दूर करने के लिये और उनके प्रश्न का उत्तर जानने के लिये ब्रह्मदेव मेरा स्मरण करने
लगे, तो मेरा हृदय भी व्यथित हो उठा। ब्रह्मदेव मेरा ही बेटा है। उसकी दृष्टि पर कर्म की जड़ता से अज्ञान
का परदा आ गया था उसे तत्काल दूर करने के लिये मैं हंस बना। वर्ण अथवा व्यक्ति को जो स्पर्श भी नहीं
करता वह मैं श्वेत वर्ण हूँ तथा स्वयं प्रकाश हूँ। ब्रह्मदेव के पुत्रों को उपदेश करने के लिये ही मैं स्वयं
राजहंस बना। ब्रह्मदेव सृष्टि निर्माण कार्य में जुटा हुआ था इसलिये कर्म से उसकी बुद्धि जड़ हो गयी और
वह आत्मज्ञान की सिद्धि भूल गया। मैं कर्म का अधिकारी हूँ यह जब कोई कहता है तभी वह देहधारी हो
जाता है। परमार्थ के नगर में वह कभी बाह्य स्वरूप से प्रवेश नहीं करेगा। 'न कर्मणा न प्रजया'-ब्रह्मप्राप्ति
कभी कर्म से नहीं होती और न ही पुत्र के द्वारा होती है, यह वेदोक्ति है। इस प्रकार श्रुति कर्म का निषेध कर
उसका त्याग कराती है। उसी कर्म से ब्रह्मप्राप्ति होगी वह कहने वाले लोग ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी हैं। मैंने
ब्रह्मदेव को उपदेश किया ही था लेकिन वह कर्म से जड़ हो गया। कर्म से वह केवल कर्मठ हो गया है, उसे
मुक्ति कैसे प्राप्त हो ? त्रिभुवन में अदृष्ट का सबसे बड़ा ज्ञाता होते हुए भी ब्रह्मदेव जब कर्म की जड़ता से
विषयी बना तो दूसरों की क्या बात की जाय ? इसमें बड़े-बड़े ज्ञानी भी फँस गये। पुत्रों के प्रश्न का उत्तर देने
में ब्रह्मदेव का ज्ञान भी उज्ज्वल होगा इसलिये मैंने भी सत्यलोक में प्रवेश किया। प्रश्न करने वाले सनकादिक
और वक्ता ब्रह्मदेव लेकिन जब दोनों ही संकट में फँसे तो मैं वहाँ अवतीर्ण हुआ। दूध को खराब न होने देते
हुए हंस जिस प्रकार दूध और पानी अलग-अलग कर देता है उसी प्रकार सार और असार को चुनने वाला मैं
ज्ञान से चतुर राजहंस हूँ। संचित पुण्य के सिवा अथवा दैवी विमान से स्वयं प्रवास किये बिना किसी का
सत्यलोक में प्रवेश सम्भव नहीं है। लेकिन मैं पाप-पुण्य से परे हूँ। मेरे लिये पाप-पुण्य की आवश्यकता नहीं
है। फिर भी मैं पंखों से या पैरों से चलकर कहीं भी, कभी भी जा सकता हूँ। उस सत्यलोक में मैं हंसरूप में
आया। मुझे देखकर सभी को बड़ा आश्चर्य हुआ।
दृष्टा मां त उपव्रज्य कृत्वा पादाभिवन्दनम्।
ब्रह्माणमग्रतः कृत्वा पप्रच्छुःको भवानिति ॥२०॥
केवल ब्रह्मस्वरूप मेरी श्रेष्ठ मूर्ति है, मुझे हंसरूप में आते देख देवतागण मेरे स्वागत में खड़े हो गये और
मुझे साष्टांग दण्डवत किया। ब्रह्मलोक में वेद जहाँ मूर्तिमंत होते हैं वहाँ पुण्य भी मूर्तिमंत रहता है, सत्यलोक में
सत्य मूर्तिमंत रहता है और तप आदि भी वहाँ मूर्तिमंत रहते हैं। उन सबकी उपस्थिति में 'तुम कौन ?' ऐसा प्रश्न