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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 869 में से

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पृष्ठ 393

तेरहवाँ अध्याय ३७७
दोनों का ही भास मिथ्या है, फिर भी जीव को इनका इतना बन्धन है तो उसका कारण भी कुछ वैसा ही होगा।
आकाशपुष्पों की माला किसने धारण की है ? मृगजल में जहाज को डूबते किसने देखा है ? उसी प्रकार सच को
झूठ की कभी बाधा नहीं हो सकती ऐसी तुम कल्पना कर सकते हो। तो सावधान होकर सुनो। मैं वह निरूपण
करता हूँ जिससे जीव का झूठा बन्धन दृढ़ हो गया है।
गुणेषु चाविशच्चित्तमभीक्ष्णं गुणसेवया।
गुणाश्चचित्तप्रभवा मद्रूप उभयं त्यजेत्॥ २६॥
इस अनादि संसार में विषयों का नित्य सेवन करने से, वे चित्त में स्वामी बन कर बैठ जाते हैं। चित्त को
विषयों से अत्यन्त प्रेम होता ही है। इससे विषयासक्ति बढ़ती है और वे एक बार विषय में घुसते ही वापस नहीं
लौटते। एक बार बुद्धि को विषयों का ध्यान लग जाय और चित्त में विषयों का चिन्तन शुरु हो जाय तो फिर मन
विषयों के ही लिये छटपटाने लगता है। इससे विषयाभिमान पैदा होता है। विषयों में अभिमान उफनने पर दोनों
देहों को दृढ़ बन्धन प्राप्त होता है। जीव के लिये वही अत्यन्त कठिन, महाभयंकर और दुर्धर हो जाता है। तब
वह अपने देह के विकारों को अपना ही मानने लगता है। अन्धा मैं हूँ, विकलांग मैं हूँ, कोढ़ी मैं हूँ, सुन्दर मैं और
ज्ञाता भी मैं ही। देह को ही मैं मान कर बड़े भोलेपन से आत्मस्वरूप भूल जाता है। जीव का जो यह
मिथ्याबन्धन है वही सच है इस बात का उसे अभिमान होता है। शतरंज का खेल ही झूठ का है इसलिये उसमें
जय और पराजय दोनों ही निष्फल हैं। लेकिन खेलने वाले में उस खेल का अभिमान बहुत बढ़ता है। उसी प्रकार
जीव को भी देह का बल होता है। उस खेल के हाथी घोड़ा क्या मूलतः जीवित रहते हैं ? और उन्हें मारने पर
क्या खिलाड़ी परस्पर झगड़ा करते हैं ? उसी प्रकार जीवों को भी जन्म-जन्म के फेरे हैं। जीव का यह बन्धन नष्ट
करने के लिये देहाभिमान का बिल्कुल त्याग करना चाहिये। अभिमान का त्याग करने पर सहज ही मद्रूपता प्राप्त
होती है। जीव मेरा स्वरूप साध्य कर ले तो विषय और चित्त इनका सहज ही त्याग सम्भव हो जाता है क्योंकि
मेरे स्वरूप में अहंता और विषय को स्थान ही नहीं है। जिस प्रकार शतरंज की बाजी समाप्त होने पर राजा,
प्रधान आदि सब लकड़ी के खिलौने बन जाते हैं उसी प्रकार अहंकार नष्ट होते ही प्रपंच भी अपने मिथ्यत्व के
कारण उड़ जाता है। स्वप्न में देखी स्त्रियाँ, बच्चे, इष्टमित्र, धन और अपना देह इन सब का अभिमान नींद खुलने
पर अपने स्वप्नदेह की तरह मिथ्या मालूम होता है। उसी प्रकार मेरा स्वरूप प्राप्त होने पर देह किसलिये ? अहंता
कैसी ? विषय और चित्त की तो बात ही छोड़िये, तीन गुणों का भी कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। जो जागृति,
स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं में अवस्थारूप होकर रहता है, वह जीव अवस्थाहीन होकर परमात्मा में
कैसे मिल जाता है ? यदि मन में ऐसी कोई कल्पना आ रही है, तो वह व्यर्थ है क्योंकि जीव को कोई अवस्था
ही नहीं होती। वह उन तीनों गुणों का स्वभाव धर्म होता है और उनसे उत्पन्न होने वाली वृत्ति बुद्धि की होती है।
जाग्रत् स्वप्नः सुषुप्तं च गुणतो बुद्धिवृत्तयः।
तासां विलक्षणो जीवः साक्षित्वेन विनिश्चितः ॥ २७॥
तीन गुणों की तीन वृत्तियाँ होती हैं। जागृति सत्त्वगुण की होती है, रजोगुण से स्वप्नावस्था प्राप्त होती है
और सुषुप्ति तम की होती है। देखो ! ये तीनों अवस्थाएँ बुद्धि में जड़ी रहती हैं। उनका जीव से कोई सम्बन्ध नहीं
होता। जीव साक्षी रूप में स्वतंत्र रहता है। यदि जीव के साथ अवस्था जुड़ जाय तब वह उस अवस्था में डूब
जायगा। तब वह तीनों अवस्थाओं का साक्षी भी नहीं रह पाएगा। इसलिये उन अवस्थाओं की स्थिति सुनो।