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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 869 में से

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पृष्ठ 391

खिलौने, हौज या टंकी में मृत्तिका से भिन्न कुछ भी नहीं होता। उसी प्रकार सभी देहों में देहरूप में पंचमहाभूत
एक समान ही होते हैं। इसलिये 'तुम कौन' यह अलग से पूछने का कोई अर्थ नहीं है। ब्रह्म ब्रह्मरूप में
एकसमान है और प्राणी प्राणित्व से समान है। इसलिये यहाँ प्रश्नोत्तरी की भाषा करना और 'तुम कौन?' यह
पूछना अनर्थ ही है। अथवा कोई स्वयं अपने से ही 'तुम कौन' पूछता है तो वह अत्यन्त भ्रम में उलझा हुआ है।
वह आत्मज्ञान ही भूल गया। तुम्हारे प्रश्न के अर्थ का विचार करने पर इतना 'अनर्थ' दिखायी देता है। उसमें
परमार्थ का नाम ही नहीं है इसलिये 'तुम कौन' यह आपका प्रश्न व्यर्थ है। देह को 'तुम कौन' यह प्रश्न आत्मा
जब स्वयं ही करता है तब उसके आत्मत्व पर अवश्य ही पागलपन सवार हुआ है और वह भ्रम में पड़ा हुआ है
यह सिद्ध होगा। रस्सी सर्प नहीं होती। यह आभास केवल भ्रम के कारण होता है। उस सर्प से यदि 'तुम कौन'
यह प्रश्न पूछा जाय तो रस्सी ही कहेगी कि यह झूठ है। उद्धव ! उस समय मैंने उनके प्रश्न का खण्डन इस
प्रकार किया। उस भाषण से उनके बीच भेदभाव भी स्पष्ट करके बताया। प्रश्न का खण्डन करने के बहाने ही,
कैसे इन्द्रिय और कैसे प्राणी ? जीव और शिव में भेद नहीं है यह भी सुझाया। इससे भी जो गहन, परम कारण से
अभिन्न, ऐसे आत्मज्ञान के बारे में भी बताया। उद्धव ! ध्यान देकर सुनो।
मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः ।
अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा ॥ २४ ॥
देखो। मेरे सिवा संसार में तिलमात्र की भी खाली जगह नहीं है। अतः व्याप्य और व्यापक ये दोनों सहज
ही अभिन्न हैं। जो मन में संकल्प रूप में आता है, उसे शब्द पण्डित भिन्न कहते हैं किन्तु मेरे स्वरूप का जो
भँवर है वही मन है यह अभिन्नत्व की पहचान उनकी समझ में नहीं आती। मन को कितनी ही सावधानी से
देखने का प्रयत्न करो लेकिन वह दिखायी नहीं देता, परब्रह्म भी उसी प्रकार अदृश्य है। इसलिये दोनों समान रूप
से चैतन्य स्वरूप हैं। सीप का रंग रुपहला लगता है लेकिन वह सच नहीं रहता। उसी प्रकार मेरे स्वरूप में मन
केवल कल्पनामय अर्थात् मिथ्या लगता है। अब शब्द की महानता का विचार करें तो वह स्वरूप से ज्ञानमय ही
है। ज्ञान के अर्थ के बिना भाषण केशमात्र भी हो ही नहीं सकता। वक्ता, वाच्य और वचन ये तीनों मैं ही हूँ इसे
ध्यान में रखो। शब्द का उच्चार करने वाला संसार में मेरे सिवा और कौन है ? मैं वेदों का वेद हूँ। मैं ही सचमुच
ओंकार स्वरूप हूँ। मुख्य वाणी की वाणी मैं हूँ। शब्द का स्थान मेरे सिवा और कहीं नहीं है। दृष्टि में जो दृश्यत्व
है वही प्रमुख ज्ञान है। आत्मदृष्टि से चैतन्यस्वरूप पूर्णब्रह्म भी वही है। आँख मैं ही, देखने वाला भी मैं ही हूँ;
दृश्य मैं ही हूँ और द्रष्टा भी मैं ही हूँ। मेरे सिवा समस्त त्रिभुवन में देखने की शक्ति कहीं नहीं है। आँखों का
वास्तविक चक्षु मैं हूँ, सर्वांग दर्शन योग्य सोज्वल मैं ही हूँ, मेरे सिवा दर्शन की कला किसी को सम्भव नहीं है।
मैं ही शब्दों की शब्दाविता हूँ, कर्णों से सुनने वाला मैं ही हूँ इस ऐक्यभावना से देखा जाय तो जो शब्द की
निःशब्दता है, वही परब्रह्म है। कान, भाषण और श्रोता मैं हूँ, शब्दों का अर्थ जानने वाला मैं हूँ और कान हैं वह
सुनने वाला भी मेरे सिवा कोई नहीं है। नाक मैं हूँ, सुगन्ध मैं हूँ, सुवास जानने वाला मैं ही हूँ। सुवास का रहने
का स्थान मेरे अतिरिक्त अन्य कोई नहीं है। रसज्ञता की दृष्टि से जिह्वा उत्तम है लेकिन वह केवल चमड़ी है।
उस बेचारी को काट डालने से वह स्वाद या अस्वाद नहीं जानती। रस मैं हूँ, रसना मैं हूँ और रस सेवन करने
वाला भी मैं हूँ। मेरे सिवा रस का स्वाद जानने वाला रसिक कोई नहीं है। इन्द्रियों की जो अन्य प्रवृत्तियाँ हैं वे
भी सचमुच मद्रूप ही हैं यह ध्यान में रखो। सभी की अंतरात्मा में आत्मस्वरूप में रहने वाला मैं ही हूँ और