श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
चीजों के प्रति राजस व्यक्ति के मन में अत्यन्त आदरभाव रहता है। आप का अर्थ है केवल पानी। लेकिन यदि
उसमें इलायची और खस की सुगन्ध हो उसमें कपूर पड़ा हो और वह शीतल हो तो वह राजस व्यक्ति को
अत्यन्त प्रिय होगा। वह किसकी संगत करता है यह भी सुनो। राजा सरीखे लोग, सभापति, व्यवहार चतुर, लोगों
का मनोरंजन करने वाले तथा ऐसी ही प्रवृत्ति के लोग उसे अच्छे लगते हैं। राजदरवार में अथवा सभा में, चौपाल
में अथवा जहाँ बड़े व्यापारी लेन-देन करते हैं ऐसी दुकान में अथवा जहाँ मण्डप और वंदनवार लगे हों ऐसे
स्थान पर वह बड़े सम्मानपूर्वक जाकर बैठता है। जब घर में समय नहीं बीतता तो शहर के किसी अड्डे पर
जाकर बैठता है। अन्यथा शतरंज खेलने के लिये बड़े चाव से बैठ जाता है। अब रजोगुण का समय सुनो।
सूर्योदय होने के बाद का समय या शाम का समय राजसी है। यह समय उसे बहुत प्रिय है। राजस लोगों के
प्रत्येक कार्य में लालच भरा रहता है। धनधान्य प्राप्त करने के लिये वे धर्म करते हैं। पशु पुत्र हों यह उनकी सदा
की वासना होतीहै। इच्छारहित बात उनके स्वप्न में भी नहीं आती। राजसों की इच्छा प्रचण्ड रहती है। काम की
आसक्ति के कारण वे दीक्षा लेते हैं, उनका जन्म उसी के लिये होता है। उन्हें निरन्तर स्त्रियों की ही इच्छा लगी
रहती है। मंत्र लेते समय भी मन में कोई न कोई अभिलाषा अवश्य रहती है। जिससे मेरा सम्मान होगा, मेरी
प्रतिष्ठा बढ़ेगी और जिससे गुण अलौकिक प्रतीत होगा ऐसा मंत्र वह अत्यन्त आदरपूर्वक ग्रहण करता है। उसका
संस्कार तो अत्यन्त राजसी होता है। उसमें शारीरिक भोग के ही विलास होते हैं। बहुमूल्य सुगन्ध, साफ-सुथरे
वस्त्र उसे हमेशा अच्छे लगते हैं। उद्देश्य यही होता है कि मेरा लौकिक बढ़े और मुझे मंच पर आदर का स्थान
मिले बड़े-बड़े लोग मुझे प्रणाम करें और भरी सभा में मेरा सम्मान करें। हे उद्धव ! रजोगुण के जो दस लक्षण हैं
उनका यही स्वरूप है। इसीलिये राजस लोग जन्म-मरण के जंजाल से पूरी तरह कभी नहीं छूट पाते। सात्त्विक
पुरुष विवेक पर निष्ठा रखकर त्याग करता है, तामस व्यक्तिं कनक-कांता के लोभ में त्याग नहीं कर पाता। इन
तीन गुणों का लक्षण मैंने अनेक प्रकार से तुम्हें बताया। अब इन तीनों का साधारण स्वरूप भी तुम्हें बताता हूँ।
तत्तत्सात्त्विकमेवैषां यद् यद् वृद्धाः प्रचक्षते।
निन्दन्ति तामसंतत्तद् राजसं तदुपेक्षितम् ॥ ५॥
जिनकी बुद्धि विचारों से परिपक्व हुई है ऐसे बुजुर्ग जो आचरण करते हैं जिसकी लोग आदरपूर्वक स्तुति
करते हैं वे सचमुच सात्त्विक कार्य हैं ऐसा मेरा निश्चित मत है। विचारकों के उपदेशानुसार लोग जिन बातों की
निन्दा करते हैं, वह सब तमोगुण की पीड़ा है, ऐसा मेरा विचार है। जिसकी कोई स्तुति नहीं करता, निन्दा भी
नहीं करता, मन से उपेक्षा करते हैं वे कार्य सचमुच राजस हैं इसे ध्यान में रखो। उसकी बाधा अत्यन्त कठिन है।
जिस प्रकार विष मिलाया हुआ अन्न खाने में मधुर लगता है किन्तु उसमें मृत्यु छिपी होती है उसी प्रकार यह
राजस गुण है। उसका बन्धन बड़ा विचित्र होता है। राजस को उपदेश करते-करते वेद भी हार गये। उसे उपदेश
करने में ब्रह्मदेव भी थक गये। स्वयं मैं भी उसे उपदेश नहीं कर पाता। इसी लिये विचारकों ने रजोगुण की
उपेक्षा कर उसे फेंक दिया है। इसीलिये साधक को सात्त्विक का ही सेवन करना चाहिये। उस सात्त्विक सेवन
का सम्पूर्ण गुण मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो।
सात्त्विकान्येव सेवेत पुमान् सत्त्वविवृद्धये।
ततो धर्मस्ततो ज्ञानं यावत्स्मृतिरपोहनम् ॥ ६॥
सात्त्विक पदार्थों का सेवन करने से सचमुच सत्त्वगुण की वृद्धि होती है और पुरुषों में सत्त्वगुण की वृद्धि