श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 392, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ें३७६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
क्रियाशक्ति भी मैं ही हूँ। जो भ्रम में पड़े रहते हैं वे इस पंचमहाभूतात्मक देह को मुझसे अलग मानते हैं। मेरे जैसे
सर्वव्यापी को छोड़कर वह अलग कहाँ रह सकता है ? जिस प्रकार पानी में पानी की लहरें पानी के ही स्वरूप
में मजे में क्रीड़ा करती रहती हैं, उसी प्रकार मेरे स्वरूप में अनेक देह मत्स्वरूप में ही पूर्णरूप से रहते हैं या
कभी घृत जम कर उसकी पुतली बन जाय तो वह घृत से अलग नहीं हो जाती। उसी प्रकार मुझमें ये जीव हैं।
जल में जल के ही अनेक आकार भासित होते हैं उसी प्रकार मुझमें ही यह चराचर उत्पन्न होकर सचमुच मेरे
स्वरूप में अभिन्न ही है। सूत में एक तंतु दूसरे से सूत से ही जुड़ा रहता है किन्तु उन्हें अलग-अलग तन्तु ही
कहते हैं, उसी प्रकार मुझमें पूरे जगत का आभास होता है। यदि तंतु ही देखने लगें तो वस्त्र दिखायी नहीं देता
उसी प्रकार आत्मा को देखने लगें तो संसार अदृश्य हो जाता है। इस प्रकार ऐक्यतत्त्वदृष्टि से देखने पर सर्वत्र
परब्रह्म दिखायी देता है। ऐसे ऐक्यभाव से मैं ही एक सर्वात्मा और सर्वात्मक हूँ यह विचार निश्चयपूर्वक बुद्धि
से जान लेना चाहिये। सर्वत्र मैं ही हूँ यह दृढ़ निश्चय कर लेने पर फिर अन्य साधनों का कोई काम नहीं है। वह
अपने स्थान पर नित्य मुक्त होता है। सर्वत्र व्याप्त आत्मा चैतन्यस्वरूप है यह आत्मज्ञान सुलभ है। उद्धव ! मैंने
यही बताकर उनके भेद का खण्डन किया। सनकादिकों का जो प्रश्न ब्रह्मदेव को भी संकट में डालने वाला था
उसका इस प्रकार विवरण देकर मैंने ज्ञान प्रदान किया।
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः।
जीवस्य देह उभयंगुणाश्चेतो मदात्मनः ॥ २५ ॥
आपने ब्रह्मदेव से जो यह पूछा कि "चित्त में विषय प्रवेश करें और चित्त विषय में प्रवेश करें तो फिर
उन्हें अलग नहीं किया जा सकता और विषयत्याग किये बिना तो ब्रह्मज्ञान कभी नहीं होता।" तो वह त्याग भी
कैसे किया जाता है इसका लक्षण पूरी तरह बताता हूँ, सुनो। जरा देखो ! चित्त और विषय यह कोई जीव का
आत्मस्वरूप नहीं है। ये दोनों उपाधि के कारण प्रवाहरूप में देह से लगे हुए हैं। कर्तृत्व रूप से और भोक्तृत्व
रूप से अंतःकरण विषयी हो जाता है। इससे दोनों देहों का कारण जो अहंकार है वह उबल उठता है। वह
विषयों को वश में कर चित्त को जब लुभाता है तो उससे जीव और मन का तादात्म्य अत्यन्त दृढ़ हो जाता है।
अगर चित्त ही जीव का स्वरूप होता तो वह विषय पर लुब्ध नहीं हुआ होता। ये दोनों उपाधियाँ केवल अभिमान
के कारण बढ़ती हैं। जिस प्रकार पुरुष अपने वास्तविक देह को भूलकर स्वप्न के देह पर ही अधिक आसक्त
रहता है, उसी प्रकार यहाँ जीव की भी स्थिति हुई है। नित्य, शुद्ध, मुक्त और ज्ञानरूप यह जीव का स्वरूप है।
अभिमान ने उसे यह मिथ्या बन्धन लगा दिया है। इसलिये अभिमान छोड़ देना चाहिये सभी सारे बन्धन टूटते हैं।
अभिमान छूटने के लिये मेरा भजन करना चाहिये। लेकिन वैराग्य के बिना मेरी भक्ति भी व्यर्थ है। जब वैराग्य के
साथ मेरी भक्ति उत्पन्न होती है तभी जीव को मेरे स्वरूप की प्राप्ति होती है। हृदय में विषय का जरा भी अस्तित्व
न हो और सभी प्राणियों में भगवान के प्रति आदरभाव हो, यही वैराग्ययुक्त भक्ति है। वह प्राप्त होने पर ही मेरे
स्वरूप में जीव का प्रवेश होगा। सच पूछो तो जीव मत्स्वरूप ही है। लेकिन देहाभिमान उसका पोषण करता
रहता है। इसलिये सदासर्वदा प्राणी मात्र में मेरी भावना होने से अपने आप ही मत्स्वरूप प्राप्त होता है। जीव को
मत्स्वरूप प्राप्त होते ही विषय और चित्त इन दोनों का सहज ही त्याग हो जाता है क्योंकि वे दोनों ही मिथ्या हैं।
बिना त्याग किये ही यह त्याग सम्भव होता है। हे पुत्र ! तुमने चित्त और विषय के त्याग के बारे में पूछा यह
बहुत उत्तम हुआ। मैंने तुम्हें उसके बारे में बतलाया। यह ज्ञानमार्ग अत्यन्त शुद्ध है। अब आप कहेंगे कि जब इन