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सर्वकोश
श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 869 में से

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पृष्ठ 384

३६८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
कहते हैं। गुणों से देह उत्पन्न होता है और देह से ज्ञान उत्पन्न होता है, लेकिन उसी ज्ञान से गुणों का नाश होता
है। तुम कहोगे, लेकिन क्या देह का नाश नहीं होता? लेकिन तुम्हारी यह बात गलत है। क्या पक्षी स्वयं अपने
पंख तोड़ता है या नारियल नारियल को फोड़ता है? क्या व्याघ्र स्वयं ही अपने मांस को चखता है। यह जो कभी
न घटने वाली बात होगी तभी देह के ज्ञान से गुणों का और देह का विनाश होगा। यदि तुम्हारे मन में इस तरह
का विकल्प आ रहा हो तो उसका भी निराकरण करता हूँ।
वेणुसंघर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद् वनम्।
एवं गुणव्यत्ययजो देहः शाम्यति तत्क्रियः ॥७॥
संयोग से बाँस के जंगल में तेज हवा में बाँस एक दूसरे के घर्षण के कारण चिनगारी उत्पन्न होती है और
पूरा जंगल जल जाता है। जिस टुकड़े से अग्नि उत्पन्न होती है वह टुकड़ा भी जलकर स्वाहा हो जाता है। जंगल
में एक सीक भी शेष नहीं रह पाती और वह स्वयं भी राख होकर बुझ जाता है। उसी प्रकार वैराग्य के
अभ्यासरूपी वायु से त्रिगुणों का घर्षण होते ही वहाँ ज्ञानरूपी अग्नि उत्पन्न होता है जिससे अविद्यारूप जंगल
जल जाता है। वह हरिगुरु की कृपा से खौलता है, वृत्ति के रूप से प्रज्वलित होता है और दोनों देहों से लगे
गुणों को जलाने में प्रवृत्त होता है। तब आशा और तृष्णा के झुण्ड जल जाते हैं, काम-लोभरूपी सियार जल जाते
हैं, क्रोधरूप व्याघ्र की होली हो जाती है और मदरूपी हाथी भी जलने लगता है। स्नेह के कँटीले पौधे जल जाते
हैं, असत्यरूप बैर के काँटे जल जाते हैं, मोहरूप अजगर तो तत्काल ही जल जाता है और अंततः भयानक काल
भी जल जाता है। इतने में अहंकार रूप सुअर उठता है, कितना भी दौड़ाने पर भी वह नहीं मिलता। लेकिन वह
विकराल सुअर भी जल जाता है। ज्वालाग्नि चारों ओर फैल जाता है, बचने के लिये अणुमात्र स्थान भी नहीं
रहता। इस प्रकार अहंकाररूपी जंगली सुअर भागते-भागते जल जाता है और पूर्ण रूप से मर जाता है। अग्नि की
करनी बड़ी विचित्र है। वह स्वयं अपना भी दहन कर लेता है। इतना ही नहीं बल्कि वह दाहकशक्ति को भी
जलाकर अपने स्वस्वरूप में जाकर स्थिर हो जाता है। यह निरूपण सुनकर उद्धव को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने
कहा, लोगों पर यह कैसी संकट की घड़ी आयी है? ऐसा होते हुए, उसे छोड़ लोग विषय पर ही लुब्ध होते हैं
और मरते रहते हैं। सात्त्विक सेवन से सत्त्व की वृद्धि होती है और अलभ्य सिद्धि का लाभ होता है। लेकिन उस
सिद्धि को छोड़कर लोग विषय में ही रममाण होते हैं। इन लोगों में कितना अनर्थ मचा हुआ है। मन में इस
प्रकार की शंका उत्पन्न होने के कारण वह बड़ी जिज्ञासा से श्रीकृष्ण से पूछने लगा।
उद्धव उवाच
विदन्ति मर्त्याः प्रायेण विषयान् पदमापदाम।
तदापि भुञ्जते कृष्ण तत्कथं श्वखराजवत् ॥८॥
उद्धव ने कहा, "हे मुकुन्द! सर्वज्ञ गोविन्द! सुनो। विषय का संकट सर्वत्र बाधा उत्पन्न करता है यह सदा
सबको ज्ञात हो चुका है। जो विषयाधीन होता है वह सर्वत्र, सदा दीन-हीन ही बना रहता है। यह सब देखने
जानने पर भी उन्हें विषयों के प्रति कितनी आसक्ति है। लोग श्वान, गधा तथा बकरे की तरह विषय भोग करने
के लिये निर्लज्ज हो जाते हैं। अपने हित का कार्य न करके विषय की चाहत में ही क्यों नाचते रहते हैं? कुतिया
क्रोध से बिफरती रहती है फिर भी कुत्ता उसके पीछे-पीछे लगा रहता है और दुम हिलाकर उसे सूँघता रहता है।
वह लोगों की लज्जा भी नहीं करता। अन्धा, रोगग्रस्त, शरीर से पीप गलता हुआ, गले में चिन्तारूपी मटके का