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श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre

सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा

DevanagariHindipublished869 पृष्ठ

३४६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
में फैलता है, वही दीपक घर में रखने पर प्रकाश घर भर में फैलता है। उसी प्रकार जब तक शरीर में है तभी
तक यह जीव है अन्यथा यह साक्षात् सदाशिव ही है। अब इस सम्बन्ध में अधिक कुछ कहने की आवश्यकता
नहीं है। जीव का और शिव का अनुभव इस प्रकार का है। दर्पण का सूर्य मानों हाथ में दिखायी देता है, उसी
प्रकार शरीर में भी जीव की प्रसूति (जन्म) हुई है। उस जीव की स्थिति उत्कर्ष के कारण रहती है इसलिये उसे
'प्रसूति' कहते हैं। दर्पण बहुत छोटा रहता है लेकिन उसमें सूर्य का पूरा प्रतिबिम्ब दिखायी देता है। उसी प्रकार
विदेह को देह धारण करना पड़ता है। उसे 'विवरप्रवेशन' अर्थात् बिल में प्रवेश करना कहते हैं। कुण्ड में चन्द्र
की स्थिति आकाश के चन्द्र की अधोगति मालूम होती है। उसी प्रकार शरीर में जीव की प्रसूति होती है। अर्थात्
जो अव्यक्त है वह व्यक्त में प्रवेश करता है। जल में प्रतिबिम्बित होने पर भी सूर्य गीला नहीं होता। उसी प्रकार
देह में कार्य करते हुए भी आत्मा अलिप्त ही रहता है। जल का प्रतिबिम्ब जिस प्रकार जल के हिलने से हिलता
है उसी प्रकार जीव को जन्म और मरण प्राप्त होता है। कुण्ड में जिस प्रकार पूर्ण चन्द्र प्रतिबिम्ब के रूप में फँस
जाता है उसी प्रकार जीव को भी कर्म का बन्धन प्राप्त होता है। कुण्ड का पानी सूख जाने पर और प्रतिबिम्ब
अदृश्य हो जाने पर क्या चन्द्रबिम्ब अदृश्य हो जाता है ? चन्द्र का बिम्ब जैसा था, वैसा ही वह रहा। कुण्ड के
पानी में जो उत्पन्न हुआ और पानी सूख जाने पर अदृश्य हो गया वे दोनों मिथ्या थे। कुण्ड से बाहर निकालने
का प्रयत्न करने पर भी वे हाथ नहीं आते। उसी प्रकार देह में जीवत्व मिथ्या ही रहता है। उसे सच मान लेने पर
अत्यन्त दुःख सहना पड़ता है। दर्पण बड़ा हो या छोटा हो लेकिन उसमें सूर्य का पूर्ण प्रतिबिम्ब दिखायी पड़ता
है। उसी प्रकार अंतःकरण में रहने वाला मैं समस्त प्राणिमात्र में समान रूप से और सम्पूर्णता से व्याप्त रहता हूँ।
सूर्य कुण्ड में फँसा हुआ दिखाई देता है, उसी प्रकार मूर्ख लोग जीव के लिये कर्म का बन्धन मानते हैं। आकाश
के सूर्य को नहीं देखते और वह कुण्ड में फँसा हुआ है यही मानते हैं। उसी प्रकार जिन्हें निर्गुणों का अनुभव
नहीं है वे ही जीव को बद्ध समझते हैं। आग की ज्वालाओं को जाल में फँसाने का प्रयत्न करने में, जाल ही जल
जाता है। उसी प्रकार आत्मा को कर्म में बांधने के प्रयास में कर्म ही निःसत्त्व हो जाता है। आवाज उत्पन्न होने के
लिये आवश्यक है वायु और प्रत्याघात। लेकिन इन दोनों के विना ही जो आवाज सदा घूमती रहती है वह है
'अनाहतध्वनि'। उस अनाहत ध्वनि का मूल शब्द जिसे परा और अपरा वाणी में 'परा का नाद' कहते हैं और
योगी जिसे बहुत चाहते हैं उसका अनुवाद शब्दों में व्यक्त होने वाला नहीं है। जिस ध्वनि की आनन्ददायक
माधुरी शंकर ही जानते हैं अथवा उस सुन्दर मिठास को सनकादिक ने ही यथेच्छ चखा है। वायु का सत्त्व खोजने
पर तथा शब्दतत्त्व को उससे मिलाने पर उन दोनों के चैतन्य से जो सजीवता उत्पन्न होती है, उसी को मन का
स्वरूप प्राप्त होता है। जो चेतना का चैतन्य है वही वायु का शुद्ध सत्त्व है। शब्द का मूलतत्त्व वही है और उसी
के योग से जीव मनोरूप होता है। जीव का शरीर के साथ संयोग किस प्रकार होता है इसे श्रीकृष्ण स्वयं बताने
लगे तो आधारादि चक्र से घटने वाले सभी संस्कारों का क्रमानुसार वर्णन किया। 'मैं' इस पहले ही भ्रम से जीव
को जीवत्व का आभास होने लगता है और वह जिस भी तत्त्व में प्रवेश करता है, उस तत्त्व को वह 'स्वयं' ही
कहने लगता है। 'मैं देह' उसने कहते ही तत्काल उसकी पूर्णता होकर उसी समय उसे एकदेशीय तथा अंशभूत
देहात्मबुद्धि प्राप्त होती है। वह सूक्ष्म नाद और अतिसूक्ष्म प्राण मिलकर प्रथमतः आधारचक्र में प्रवेश कर प्रारम्भ
में ही अत्यन्त सूक्ष्म स्फुरण पाकर परा नामक वाचा उत्पन्न होती है। आधारचक्र में प्राण का निवास रहता है और
परा नाम की वाणी वहीं रहती है। इसीलिये मन में अत्यन्त सूक्ष्म एवं कोमल स्फुरण उत्पन्न होता है और
स्वाधिष्ठान चक्र में मन का पोषण होने लगता है। वहाँ पश्यंति वाचा बोलने का प्रयत्न करती रहती है किन्तु वह

बोल नहीं सकती। इस चक्र में प्राणवायु भी एकत्र रहता है किन्तु वह उसके आगे नहीं जा पाता। वहाँ प्राण और
अपान का झगड़ा होकर दोनों ही रूठ जाते हैं। वहीं बहुत बड़ा गृहकलह मच जाता है और दोनों में अलगाव
होने लगता है। इस प्रकार प्राण, अपान, व्यान, उदान तथा समान ये पाँच प्राण अलग-अलग रहने लगते हैं। जो
पहले रूठ गया था उसे 'अपान' कहते हैं। गुस्से में जो आगे बढ़ा आता है उसे 'प्राण' कहते हैं। दोनों में जो
समानरूप से नाभि में रहता है, उसे 'समान' कहते हैं। जो कंठ में रहता है, उसका नाम 'उदान' है। लेकिन व्यान
को रहने का स्थान ही नहीं है इसलिये वह पूरे शरीर में परिभ्रमण करता रहता है। इनसे भी सूक्ष्म पंचप्राण होते हैं
जो भिन्न-भिन्न स्थानों में रहते हैं। उन्होंने स्वयं ही अपने रहने के लिए अलग-अलग स्थान निश्चित कर लिया
है। नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा पाँचवाँ धनंजय यही वे पंचप्राण हैं। इनकी शरीर में जहाँ बस्ती रहती है वे
स्थान तुम्हें निश्चित रूप से बताता हूँ। छींकर नाग का घर है, जम्हाई कूर्म का घर है और डकार कृकल का घर
है। हिचकी देवदत्त का निवास है। लेकिन धनंजय को कहीं भी बसेरा नहीं मिलता इसीलिये जीव और देह का
संगम होने के स्थान पर (अर्थात् चिज्जडग्रंथि में) धनंजय रहता है। इससे जीव शरीर को छोड़ देता है तो भी
कुछ समय के लिये यह शरीर को बचाकर रखता है। स्वाधिष्ठान नामक चक्र से प्रारम्भ कर क्रमानुसार प्राण के
दस भाग होते हैं। उनका स्थान, मान और लक्षण ये सारी बातें मैंने तुम्हें बतायीं। मैंने तुम्हें पहले ही यह बात
बता दी है कि प्राण और अपान ये दोनों रूठे हुए हैं। इसके बाद उन दोनों का कभी मिलन नहीं हुआ क्योंकि वे
दोनों ही बहुत हठी तथा सनकी हैं। उन दोनों में जो मेल करा दे वही प्यारा दुलारा है, यह जान लो। उसे मैं स्वयं
ही अपना सर्वस्व अर्पण करता हूँ। इसी का नाम योगसाधना है। हे उद्धव! प्राण के लक्षण बताते-बताते सहसा
प्राण और अपान की साम्यास्थिति बताने का प्रसंग आया। इसलिये तुम भी उसे सुन लो। स्वाधिष्ठान चक्र से
मणिपुर चक्र में आते समय जीव और मन की एकता होती है। वहीं सूक्ष्मप्राण का निवास होने के कारण पश्यंती
परावाणी की एकता प्राप्त करती है। तब मन में खिलाड़ी प्रवृत्ति उत्पन्न होकर बाल्यदशा प्राप्त होती है, यह समझ
लो। इसके बाद प्राण आराम से आगे बढ़ता है और अनाहत स्थान तक पहुँच जाता है। तब पश्यंती वाणी की
कृपा से मध्यमा नाम की वाची उत्पन्न होती है। वह मौन का दामन छोड़े बिना अपने से ही गुनगुनाने लगती है।
यहाँ मन को मुग्धावस्था (सोलह वर्ष के लगभग की अवस्था) प्राप्त होकर वह अनेक प्रकार के उपभोगों और
सुखास्थिति की कामना करती है। लेकिन लज्जा के कारण कुछ कह नहीं पाती। फिर प्राण अत्यन्त तत्परता से
विशुद्धि स्थान पर पहुँचता है और उच्छृंखल उदान का रूप धारण करता है। तब मन को भी परिपूर्ण यौवन प्राप्त
होता है। उस विशुद्धि चक्र में भीतर से परावाणी भी आ मिलती है और पश्यंती और मध्यमा भी एक हो जाती
हैं। इस प्रकार वे सब बड़ी शान से विचरण करने लगती हैं। उनके इस झटके के पीछे-पीछे तत्काल मुँह से
वाणी प्रकट होती है। वह यौवन से उन्मत्त रहती है और मुँह से स्वर और वर्णों की व्यर्थ की बड़बड़ करती रहती
है। आज्ञाचक्र की स्थिति भौंहों में होती है और वह उनसे अलग है। वहाँ वाणी का प्रवेश नहीं होता। योगियों का
हंस लक्षण यही है। ये क्रमानुसार छह चक्र हैं। चार मातृका, अट्ठाईस वर्ण तथा सोलहों सम्पूर्ण स्वर प्राप्त हो
जाएँ तो यही योगियों का हंसलक्षण होता है। अब किस चक्र में कौन से वर्ण उत्पन्न होते हैं मातृका का क्या
स्थान है सारे स्वर कहाँ उत्पन्न होते हैं उनके भी लक्षण सुनो। आधारचक्र में चार पंखुड़ियों की आकृति होती है
और उन आकृतियों में चार मात्राएँ छूटी रहती हैं। व, श, ष तथा स इन अक्षरों को शास्त्रज्ञों ने मात्रा कहा है।
स्वाधिष्ठान छह पंखुड़ियों का चक्र है। वहाँ छह वर्ण स्थापित हैं। 'ब' कार से 'ल' कार तक (ब, भ, म, य, र,
ल) ये जो छह वर्ण हैं वे उन स्थानों पर निश्चित रूप से रहते हैं। मणिपुर चक्र में दस पंखुड़ियाँ हैं, जहाँ दस

३४८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वर्ण स्थापित हैं। 'उ' कार से 'फ' कार तक (ब, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ) ये दस वर्ण उस चक्र में रहते
हैं। अनाहतचक्र बारह पंखुड़ियों का है। वहाँ 'क' कार से 'ठ' कार तक (क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ,
ट, ठ) बारह वर्ण रखे हुए हैं। वे उस चक्र की शोभा बढ़ाते हैं। विशुद्ध चक्र सोलह पंखुड़ियों का होता है और
उसमें अ, इ, उ, ऋ, लृ मिलाकर कुल सोलह स्वर हैं। उन सभी स्वरों की जमघट कंठस्थान में होती है। वेदों में
उनका अगाध सामर्थ्य दिखाई देता है। लेकिन आज्ञाचक्र बहुत कठिन है। वहाँ काकीमुख नाम का जो द्वार है वह
खुलता ही नहीं है। वहाँ प्राणों की छटपटाहट नहीं चलती। वहाँ का मार्ग अत्यन्त विकट होने के कारण वह उन्हें
नहीं मिल पाता। वह आज्ञाचक्र दो पंखुड़ियों का होता है और वह शुद्ध रूप से हंस का मन्दिर है। वहाँ पहुँचने
के लिये महान योगसामर्थ्य की आवश्यकता होती है। इस स्थान तक पहुँचने के लिये योगी अनेक प्रकार के
हठयोग करते हैं लेकिन अनेक संकटों का सामना कर योगाभ्यास करते पर भी वे वहाँ तक नहीं पहुँच पाते। मेरा
यह स्थान प्राप्त करने के लिये एक अत्यन्त गूढ़ अनुष्ठान है। 'सोहं हंसा' की साधना जो कोई अत्यन्त सावधानी
से करेगा वही उस स्थान तक पहुँचेगा। प्राणायाम का निरोध और त्याग कर 'सोहं हंसा' का स्मरण कर जो
सावधानी से यह अनुष्ठान करेगा वही यह स्थान प्राप्त करेगा। वही वायु का निरोध करने में सक्षम होता है और
वही आज्ञाचक्र में प्रवेश करता है। इतना ही नहीं वह उससे भी आगे का मार्ग अचूक खोज निकालता है। वहाँ
ऋद्धि सिद्धि के समुदाय उसे अनेक सुखसमृद्धि के फल उपलब्ध कराते हैं लेकिन वह उन सब को पीछे छोड़
अपने पवित्र मार्ग पर अग्रसर होता है। जो ऋद्धिसिद्धियों के भुलावे में आ गया या जिसमें सिद्ध होने का
अभिमान जाग उठा वह उस आज्ञाचक्र से च्युत हुआ और उसके सारे परिश्रम व्यर्थ गये ऐसा समझना चाहिये।
लेकिन जिसमें पूर्ण वैराग्य रहता है वह सिद्धियों के भुलावे में नहीं आता। सुखोपभोग तथा मानसम्मान पर लात
मार कर वह मेरी प्राप्ति के लिये अपने मार्ग पर चलता रहता है। इसके उपरान्त औटपीठ (आज्ञाचक्र के बाद का
स्थान) तथा गोल्हाट (औटपीठ के आगे का स्थान) पार कर भ्रमर गुफा के संकट को पार कर सहस्रदल कमल
का प्रवाह सोख कर वे धैर्यवान पुरुष मत्स्वरूप होते हैं। आज्ञाचक्र की स्थिति बताते समय योगमार्ग का वर्णन
रुचिकर लगा इसमें पिछली कथा सुनाना भूल गया। इसके लिये श्रोतागण क्षमा करें। आप कहेंगे कि मछली जब
प्रवाह के साथ बहती है तो वह पीछे मुड़ कर नहीं देखती, उसी प्रकार तुम भी बिना पीछे मुड़े ग्रन्थनिरूपण में
आगे बढ़ते चलो। व्यर्थ की बकवास क्यों करते हो? बच्चा गलती करता है तो माँ उसे सिखलाती है, उसी प्रकार
आपका यह भाषण मेरे कल्याण का ही द्योतक है। चक्रों का निरूपण करते हुए मन योग की ओर मुड़ गया और
इसीलिये पिछला निरूपण भूलकर आगे बढ़ गया। यह सुनकर श्रोतागण हँस पड़े और बोले, तुम इस ग्रन्थ के
कर्त्ता नहीं हो यह हमें मालूम हो चुका है इसलिये उसका निराकरण करने के लिये व्यर्थ का प्रतिपाद मत करो।
करोड़ों ग्रन्थों का अध्ययन करने पर भी योगज्ञान का माधुर्य समझ में नहीं आता। उसे तुमने अपनी ही रुचि से
स्पष्ट करके बतलाया। श्रीमद्भागवत समझने में कठिन था उसे श्रीकृष्ण ने तुम्हारे ही मुख से स्पष्ट करके
सुनाया। वह सचमुच हमें बहुत अच्छा लगा। यह बारहवाँ अध्याय अत्यन्त गूढ़ है। यह बात देवाधिदेव ने ही
कही है। लेकिन तुमने तो उसका अर्थ भी स्पष्ट करके बतलाया। इस प्रकार संतों ने आदरभाव व्यक्त कर
अभयदान दिया। यह देखकर एकाजनार्दन को भी अत्यन्त हर्ष हुआ और उसने संतों को नमस्कार किया। वैखरी,
मात्रा, स्वर और वर्ण आदि पदों का व्याख्यान हुआ। उसका ही निरूपण श्रीकृष्ण दृष्टांत देकर उद्धव से कर रहे
हैं। जीव और शिव का जो सूक्ष्म मूल है, वही आदिपुरुष वाणी के रूप में स्थूल आकार धारण करता है। इसी
का सरल विवेचन करके बताता हूँ।

बारहवाँ अध्याय ३४९
यथानलः खेऽनिलबन्धुरूष्मा बलेन दारुण्यधिमथ्यमानः।
अणुः प्रजातो हविषा समिध्यते तथैव मे व्यक्तिरियं हि वाणी॥ १८॥
आकाश में ऊष्मा अदृश्य रूप में विद्यमान रहती है क्योंकि अग्नि सर्वत्र व्याप्त रहता है। वही मथनी से मंथन
करने पर अत्यन्त सूक्ष्म रूप में प्रकट होता है। वायु अग्नि का घनिष्ट मित्र है। इसीलिये अग्नि पर महीन रुई रखकर
फूँकने से वह चमकने लगता है और उसकी नाजुक और कोमल ज्वालाएँ चारों ओर फैलने लगती हैं। इस प्रकार
अग्नि मध्यम स्थिति में पहुँचने पर उसमें हवनसामग्री से होम करने पर उसकी ज्वाला भड़क उठती है और आकाश
तक पहुँचती है। उसी प्रकार सूक्ष्म नाद शिव के संसर्ग से, प्राण की संगति से तथा षट्चक्रादि संस्कारों के योग से
वाणी के रूप में प्रकट होता है। 'मरा' यह शब्द सुनने पर वह वाणी अमंगल मालूम होती है लेकिन उन्हीं अक्षरों
को उलटा करने पर 'राम' के नाम से पवित्र हुई वाचा संतोष प्रदान करती है। अच्छा या बुरा उच्चार करने से वर्ण
नष्ट नहीं हो जाते। वे कायम ही रहते हैं। इसीलिये वर्णों को 'अक्षर' (अविनाशी) कहते हैं। इस प्रकार वह वाणी
पवित्र होती रहती है। जिस प्रकार वाणी वर्णोच्चारों से स्पष्ट रूप से प्रकट होती है, उसी प्रकार अन्य इन्द्रियों की भी
प्रवृत्ति है। उन इन्द्रियों की स्थिति भी श्रीकृष्ण उद्धव से संक्षेप में बता रहे हैं।
एवं गदिः कर्म गतिर्विसर्गो घ्राणो रसो दृक् स्पर्शः श्रुतिश्च।
संकल्पविज्ञानमथाभिमानः सूत्रं रजःसत्त्वतमोविकारः॥ १९॥
जिस प्रकार वाणी प्रकट होने का यह ढंग है, उसी प्रकार कर्म इन्द्रियों की प्रवृत्ति प्रकट होने का प्रकार है।
चरणों की गति तथा हाथों की ग्रहणशक्ति (किसी वस्तु को पकड़ने का सामर्थ्य) स्पष्ट प्रतीत होती है। विसर्ग
गुण है वायु का और आत्यंतिक सुखोपभोग लिंग के गुण के रूप में प्रकट होता है। कर्मेन्द्रियों में पाँचवीं जो
वाणी है उसका विस्तारपूर्वक वर्णन पीछे आ चुका है। उसी प्रकार ज्ञानेन्द्रिय होते हैं। दृष्टि देखने में व्यक्त होती
है, उसी प्रकार जिह्वा रसों का चखना जानती है और कान को अपने विशिष्ट गुण के कारण सुनने का अधिकार
प्राप्त हुआ है। शीत, उष्ण, मुलायम, कठोर यह ज्ञान त्वचा नामक इन्द्रिय द्वारा व्यक्त होता है। सुगन्ध अथवा
दुर्गन्ध का ज्ञान होने के मामले में नाक ही चतुर इन्द्रिय है। मन का संकल्प अथवा विकल्प, उसी प्रकार निश्चय
यह बुद्धि का कर्म है। चिन्तन चित्त का कर्म है और 'मैं' अहंकार का कर्म है। रजतम सत्त्वों के विकार तो मूल
काया के विकार हैं। उन तीनों का विवरण मैं बिलकुल संक्षेप में सुनाऊँगा। आधिदैव, आधिभौत तथा जिसे
अध्यात्म कहते हैं, उसके कारण जो बड़ा प्रपंच दिखायी देता है वह ईश्वर का दृश्य स्वरूप है। ईश्वर स्वयं ही
संसार का प्रमुख कारण है। इस कारण से भिन्न कोई कारण नहीं होता। घी यदि जम कर उसकी पुतली बन जाय
तो वह घृत से भिन्न कभी नहीं दिखायी देती। अथवा यदि लकड़ी का घोड़ा बनाया जाय, उसकी रचना, उसकी
खड़े रहने की शान आदि बातों के कारण वह कितना ही सुन्दर क्यों न लगे लेकिन उसने लकड़ी का गुण नहीं
छोड़ा होता। उसके अवयव, टांगे, कन्धे आदि सब काष्ठ के ही होते हैं। उसी प्रकार तीन गुणों से उत्पन्न
पंचमहाभूत शिव का ही मूर्तिमंत स्वरूप हैं। सुवर्ण का अलंकार अंततः सुवर्ण के ही रूप में शोभा पाता है, उसी
प्रकार महाभूत तथा विषयेन्द्रिय भी अभिन्न रूप से शिवस्वरूप ही हैं। सुवर्ण का नाग तैयार करने पर उसका फन,
पूँछ और मुड़ी हुई गर्दन के कारण उसे 'नाग' कहते हैं लेकिन वह सचमुच का नाग नहीं होता, वह अच्छे किस्म
का सुवर्ण ही होता है। उसी प्रकार यह संसार भी मद्रूप ही है। प्रपंच ईश्वर से अलग नहीं है। इसी अर्थ से
श्रीकृष्ण उद्धव से जीव-शिव की अभिन्नता का वर्णन कर रहे हैं।

३५० श्रीमद् एकनाथी भागवत
अयं हि जीवस्त्रिवृदब्जयोनिरव्यक्त एको वयसा स आद्यः ।
विश्लिष्टशक्तिर्बहुधैव भाति बीजानि योनिं प्रतिपद्य यद्वत् ॥ २० ॥
शिव स्वयं जीवों का जीव है इसलिये उसका शिवत्व भिन्न है ऐसा कहा जाता है। जीव और शिव इन रूपों
से यह भिन्न लगता है इसीलिये जीवत्त्व भिन्न लगता है। समुद्र अपने शरीर पर अनेक वर्त्तुल भँवर बनाता है उसी
प्रकार श्रीहरि ने ब्रह्माण्ड कमल उत्पन्न कर उसे अपनी नाभि में धारण किया है। इसीलिये उसे 'त्रिवृदब्ज' (तीन
लोकों को धारण करने वाला) कहते हैं। उस नाभिकाल में ही अपनी लीला से त्रैलोक्य धारण करता है इसलिये
श्रीहरि को पद्मनाभ कहते हैं। सोने के सिंहासन पर सोने की मूर्ति स्थापित कर उसकी सोने के ही फूलों से पूजा
की जाय तो वे तीनों एकरूप ही भासित होते हैं। उसी प्रकार नाभिकाल में त्रैलोक्य धारण करने पर तीनों लोकों
में एकता का ही भास होता है। इसीलिये श्रुति के मुख से 'पद्मनाभ' यही शब्द बाहर आया। सुगन्ध और मृदुता
के कारण पीली चंपा की कली अकेली दिखाई देती है लेकिन वही अनेक पंखुड़ियों से प्रफुल्लित होती है, उसी
प्रकार मैं श्रीकृष्ण अनेक लोकों के रूपों से विकसित हुआ हूँ। जब तक यह कार्य कारण सम्बन्ध नहीं था तब
तक मैं अव्यक्त ही था। मैं सत्य का भी सत्य हूँ और मुझमें भेद जरा भी नहीं है क्योंकि शब्द और दृष्टांत इनमें
से कोई भी जहाँ प्रवेश नहीं कर सकते ऐसा मैं अपार, अनादि, अनंत, आद्य और अव्यक्त हूँ। इस प्रकार जो
अभेदस्वरूप है उसमें तीन प्रकार के भेद किस प्रकार होंगे ? जिस स्वरूप का विचार करते-करते वेद भी लज्जित
होकर वापस लौटे वही मेरा शुद्ध स्वरूप है। मैं सहायक समुदाय एकत्र न कर स्वयं के लीलाक्षोभ से ही क्षुब्ध
काल बन जाता हूँ। मैं अपने ही सामर्थ्य से प्रबल हुआ हूँ और मेरी ही शक्ति का प्रबल विस्तार सर्वत्र व्याप्त है।
अपनी उस शक्ति के विभाग भी मैंने ही ठीक तरह से बना रखे हैं। उन विभागों के बारे में मैं बताऊँगा, सुनो।
गुणों की शक्ति, देवताओं की शक्ति, मन की शक्ति, इन्द्रियों की शक्ति, महाभूतों की भूतशक्ति इन सब में
क्रियाशक्ति ही प्रमुख रहती है। जीव से जो अदृष्ट शक्ति उत्पन्न हुई वह त्रैलोक्य में अटल है। हरिहर भी जिसे
नियंत्रित नहीं कर सकते ऐसी यह अदृष्ट शक्ति असीम है। जिस अदृष्टशक्ति ने जीव को बद्ध कर अपना लिया है
उस पर नियंत्रण करना मेरे सामर्थ्य के बाहर है। जिस प्रकार स्वयं राजा भी राजाज्ञा का पालन करता है उसी
प्रकार मैं भी अदृष्ट शक्ति का उल्लंघन नहीं करता। जीभ काट कर भगवान को अर्पित की जाती है लेकिन नाक
नहीं काटी जाती। उसी प्रकार मैं कर्म की स्थिति नष्ट करता हूँ लेकिन अदृष्ट की गति को नहीं तोड़ता अथवा
विशेष रूप से यह जान लो कि मेरी ही शक्ति माया, उसे आलिंगन देकर बैठा हुआ मैं अकेला त्रैलोक्य में अनेक
व्यक्त रूपों में भासमान होता हूँ। जो जीवन्मुक्त हुआ वह मत्स्वरूप तक आकर पहुँचता है लेकिन वह भी अदृष्ट
से ही बँधा होने के कारण देहरूपी गृह में नाना प्रकार से विचरण करता रहता है। राजा जनक राज्यपद पर
सुशोभित था। शुक्राचार्य अपने प्रारब्ध के अनुसार नग्नावस्था में रहता था। नारद तो हर जगह कलह ही लगाता
फिरता था और प्रारब्धगति से विनोदी बन गया था। वसिष्ठ को पुरोहितत्व करना पड़ा। भीष्म को शरपंजर पर
सोना पड़ा। याज्ञवल्क्य को दो पत्नियाँ थीं किन्तु प्रारब्ध के चक्कर में फँसकर उसे उसके ही अनुसार आचरण
करना पड़ता था। हे उद्धव ! इस प्रकार प्रारब्ध की शक्ति त्रैलोक्य में अनिवार रूप से बढ़ गयी है। जिस प्रकार
मदारी के हाथ में बन्दर रहता है उसी प्रकार जीव अदृष्ट गति से बँधे रहते हैं। इस त्रैलोक्य में मैं अकेला हूँ
किन्तु उन जीवों की प्रारब्ध गति से अनेक व्यक्तिरूपों में भासमान होता हूँ। 'विश्वतश्चक्षु' यह श्रुतिवचन है इससे
इन सारे व्यक्तियों में मैं ही एक हूँ यह स्पष्ट होता है। मिट्टी के अनेक गोकुल बनाकर उन्हें अलग-अलग नाम
और आकार देकर भले ही पूजा करें लेकिन उन सब में मिट्टी ही रहती है। उसी प्रकार यह संसार मेरे ही रूप में

बारहवाँ अध्याय ३५१
अभिव्यक्त हुआ है। जिस प्रकार एक होने पर निद्रा के वश में होने पर हम अपने अनेक रूप देखते हैं, उसी
प्रकार मैं भी विश्वात्मा हूँ ऐसा समझ लो। वट का बीज बहुत छोटा होता है और उसे उपयुक्त जमीन और पानी
मिलने पर उसका अंकुर बढ़कर अत्यन्त मजबूत और असीम विस्तार वाला वृक्ष खड़ा दिखायी देता है। उस
समय उसका नाम, रूप, पुष्प इन सारे रूपों में वह मूल बीज ही वास्तविक लगने लगता है, उसी प्रकार विश्व के
आकार से केवल चिदात्मा का ही आभास होता है। मूल बीज में जो मिठास होती है वही बढ़ते-बढ़ते बड़े
आकार में आ गयी। गन्ने के हर कांड में जो मिठास होती है, वही गन्ने की मूल अधिकृत मिठास है। उसी प्रकार
मूल कारण चिदात्मा ही है। उससे जो भी तत्त्व निकलते हैं वे सब शुद्ध चैतन्य से भरे हुए हैं। सारा संसार
चित्स्वरूप ही है। ईश सर्वांग से पूरा का पूरा बीजरूप रहता है। बीजरूप में ही ईख सफल होता है। उसी प्रकार
चिन्मात्र ही संसार का मूल है और सारा संसार चित्स्वरूप है। बीज और ईख दोनों एकरूप रहते हैं, उसी प्रकार
प्रपंच चित्स्वरूप है। यही बात श्रीकृष्ण अत्यन्त आग्रह और कृपापूर्वक बता रहे हैं।
यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं पटो यथा तन्तुवितानसंस्थः।
य एष संसारतरुः पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ॥ २१ ॥
इसलिये संसार नाम से जो भी कुछ है वह सब मुझ में ही भरा हुआ है। मुझसे अलग अणुमात्र भी कुछ
नहीं है। इसी अर्थ का दृष्टांत भगवान् उद्धव को बताते हैं। जिस प्रकार रुई के महीन धागे कात कर उनसे वस्त्र
तैयार किया जाता है अर्थात् उसमें आड़े-तिरछे बुने हुए तन्तु ही होते हैं, उन्हें वस्त्र यह नाम भी व्यर्थ है, उसी
प्रकार संसार यह नाम भी व्यर्थ ही है। वास्तव में देखा जाय तो उसके रूप में मैं भगवान ही स्फुटद्रूप होता रहता
हूँ। सूत स्पष्ट दिखाई देता है फिर भी उसे 'साड़ी' कहा जाता है। इस प्रकार हमारे सामने साक्षात चैतन्य दिखायी
देते हुए भी पागल लोग उसे संसार कहते हैं। जिस प्रकार सूत के बिना वस्त्र नहीं होता उसी प्रकार मेरे बिना
प्रपंच दिखाई नहीं देता। ऐसा होते हुए हे उद्धव! जिन्हें मैं प्राप्त नहीं हुआ उनका जरा भाग्य तो देखो! वे मुझे ही
नकारते हैं। इस प्रकार मैं सर्वव्यापी विश्वात्मा हूँ और विश्व में भरा हुआ हूँ यह बात मैंने वृक्ष का दृष्टांत देकर
तुम्हें बतायी। मुझे देखने का जिसका निश्चय हो चुका है उसके लिये मैं सर्वेश्वर हूँ। जो मनुष्य मुझे प्राप्त नहीं
कर पाता उसे संसार का ही आभास होता है। भ्रम में पड़ा हुआ व्यक्ति मुझ सर्वात्मा, सर्वेश्वर को ही संसाररूपी
विशाल वृक्ष समझ लेता है। उसी संसार वृक्ष का विस्तार भगवान बताते हैं।
भ्रान्ति के कारण ही संसारवृक्ष उत्पन्न होकर कर्माकर्मरूपी जल से फला फूला है। वह जीर्ण, पुराना तथा
अत्यन्त विस्तीर्ण होकर फल और पुष्पों से लदा हुआ है। उसका बीज क्या है, मूल क्या है, रस क्या है? फल
क्या है? आदि प्रश्नों से योगी आदि सभी भ्रम में पड़े हुए हैं उनके बारे में विस्तार से बताऊँगा।
द्वे अस्य बीजे शतमूलस्त्रिनालः पञ्चस्कन्धः पञ्चरसप्रसूतिः ।
दशैकशाखो द्विसुपर्णनीडस्त्रिवल्कलो द्विफलोऽर्कं प्रविष्टः ॥ २२ ॥
भ्रमरूपी उर्वर भूमि में पाप पुण्य का बीज पड़ते ही यह वृक्ष उत्पन्न होता है और उसके सीरे पर कल्पना
का विस्तार होता है। जिस प्रकार पत्ते, फूल अथवा फल न दीखने पर भी डोरे में पिरोये बेल की तरह केवल तंतु
ही भरे रहते हैं और उन तंतुओं से ही बेल की बाढ़ होती है, उसी प्रकार कल्पना मात्र से संसार इतना शक्तिशाली
हुआ है। कर्माकर्म रूपी बाँध के जल से अविद्यारूपी क्यारी भरती है और अनंत वासनाओं के मूल जमीन में धँस
कर मजबूत हो जाते हैं जिससे इस वृक्ष का आधार ठोस हो जाता है और वह अपनी जगह से नहीं हिलता। सूक्ष्म

३५२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
वासनारूपी करोड़ों पतली जड़ें जमीन में प्रवेश कर जम जाती हैं। वे संकल्प विकल्पों के रूप में चारों ओर फैल
कर उनके नीचे जाल फैला रहता है। संचित क्रियमाणों की अनेक क्यारियाँ जल से पहले से ही भरी रहती हैं,
इसके बाद भी अन्य प्रवाह आकर उन क्यारियों को बार-बार भरते रहते हैं जिससे यह संसारवृक्ष अत्यन्त मजबूत
होकर नित नयी बाढ़ ढूँढ़ता रहता है। सगुण गुण की बाढ़ पर त्रिगुणात्मक अहंकार का त्रिदल फूट कर बाहर
निकलता है। त्रिगुणों के गुणों का क्या कहना। वे एक-दूसरे में गुँथे रहते हैं। वे एक-दूसरे के शरीर पर गिरकर
मिल जाते हैं और एक साथ मिलकर बढ़ते हैं। पंचभूतों की विशाल शाखाएँ तो प्रपंच के बाहर चली जाती हैं
और एक-दूसरे पर फैल जाती हैं तथा एक-दूसरे में मिलकर बढ़ने लगती हैं। इस वृक्ष की शाखाएँ मूल से ही
बढ़ी रहती हैं। उन शाखाओं के गाँव में दसों दिशाओं के रास्ते निकले हुए हैं। वे उस शाखा के हिलने से हौले-
हौले डोलते रहते हैं। उन प्रत्येक शाखाओं में सुखपूर्वक रहने के लिये देवतागण भी आते हैं। वे कर्म का आधार
लेकर अपनी-अपनी शाखा पर बैठते हैं। दस प्रकार की वायु का तूफान उठता है जिससे मालूम होता है कि वह
वृक्ष हिलडुल रहा है। उसमें दो पक्षियों का अत्यन्त गूढ़ एक घोंसला है। इसी घोंसले से आत्मज्ञान उत्पन्न होता
है। वही हृदय मन्दिर है। उसमें जीव और परमात्मा ये दोनों पूर्णतयः अतर्क्य स्थिति में निवास करते हैं।
देहाभिमानी जीव और निरभिमानी परमात्मा ने मिलकर इस हृदय मन्दिर के घोंसले का निर्माण किया है। जीव
संकल्प-विकल्प प्राप्त कराता है और परमात्मा निर्विकल्प स्थिति प्रदान करने वाला है। इन दोनों का वास हृदय
में ही होता है इसलिये वास्तव में यह उनका ही घर है। वात, पित्त तथा कफ ये संसाररूपी वृक्ष की भीतरी छाल
है। हे भक्तोत्तम उद्धव! इसी कारण से उन्हें वल्कल कहलाने का महत्त्व प्राप्त हो गया है। यह वृक्ष आकाश से
भी ऊँचा है और शून्य से भी नीचे काफी दूर तक फैला हुआ है। उसी प्रकार वह चारों ओर सभी दिशाओं की
सीमाएँ तोड़ कर फैला हुआ है। इस प्रकार विस्तार में फैला हुआ वह वृक्ष अपने मद की मस्ती में उखड़ कर
नीचे आ गया है और वह पंचरसात्मक विषयों की अत्यन्त मधुर धाराओं की वर्षा करने लगता है। श्रुति और
स्मृति यही उस वृक्ष के पत्ते हैं और उनमें स्वर्गरूपी पुष्प खिले हुए हैं जिसके लिये याज्ञिकरूपी भ्रमर अत्यन्त
वेग से मँडराते रहते हैं। सुख और दुःख ये उस वृक्ष के जुड़वाँ फल हैं जो सदा एक साथ मिले रहते हैं। उसके
सीरे से नीचे तक उसे सदा वही फल आते हैं। जितनी दूर तक सूर्यमण्डल दिखायी देते हैं उतनी ही दूरी तक इस
वृक्ष का विस्तार है और उन सबको कर्मप्राप्ति सुख-दुःख के फल देती रहती है। सूर्यमण्डल तक इस वृक्ष का
विस्तार है इसका अर्थ यह नहीं कि चन्द्रमण्डल आदि में संसार का भय नहीं है। हे उद्धव! मैं सूर्यमण्डल के
मध्य में हूँ। लेकिन मेरे सिवा जहाँ तक स्फूर्ति का स्फुरण होता है वहाँ तक संसार का भय अवश्य है इसे ध्यान
में रखो। सूर्य का जो मण्डल हे वह भी संसार में ही इसलिये जो उस वृक्ष का फल नहीं खाता वही रविमण्डल
को भेद कर चला जाता है। इस वृक्ष के यहाँ दो ही फल हैं और उन दो फलों के भोक्ता भी दो ही हैं। वे दोनों
इस संसार में रहते हैं। उनके बारे में बताता हूँ, सुनो!
अदन्ति चैकं फलमस्य गृध्रा ग्रामेचरा एकमरण्यवासाः।
हंसा य एकं बहुरूपमिज्यैर्मायामयं वेद स वेद वेदम्॥ २३॥
दुःखरूपी फल के जो भोक्ता होते हैं वे मन से अत्यन्त विषयासक्त होते हैं। गिद्ध की तरह वे विधि बाह्य
रीति से विषयों का सेवन करते हैं। वे ग्राम्य विषयों में अत्यन्त तत्पर होते हैं इसलिये उन्हें 'ग्रामचर' कहा जाता
है। गाँव के गिद्ध अर्थात् चील की तरह ये विषयों को लपकने में तत्पर रहते हैं। जिस प्रकार चील आकाश में

बारहवाँ अध्याय ३५३
ऊँची उड़ान भरती है और वहाँ से एकाएक अपने शिकार पर टूट पड़ती है उसी प्रकार उत्तम नरदेह प्राप्त होने पर
भी ये विषयों से नोच-खसोट करते रहते हैं। ये मन से विषयासक्त रहते हैं और अधोगति प्राप्त करने योग्य होते
हैं वे वास्तव में दुःख फल के ही भोक्ता होते हैं। उद्धव ! जो पुरुष गृहस्थाश्रम का त्याग कर वानप्रस्थाश्रमी हो
जाते हैं उन्हें ही सुखफल प्राप्त होता है। उस सुखफल के विभागी, यथाशास्त्र कर्म करने के कारण ही जो उस
राह पर चल पाते हैं, ऐसे ब्रह्मस्थान के अन्त तक और भी अनेक स्वर्ग हैं। ब्रह्मचर्याश्रम में वेदाध्ययन करना
चाहिये, गृहस्थाश्रम में अग्नि की तथा ब्राह्मणों की पूजा करनी चाहिये और वानप्रस्थ में वन में रहकर वहाँ के
फलभक्षण कर रहना चाहिये। इस क्रम से आचरण करने से क्रमानुसार मुक्तिस्थान अर्थात् ब्रह्मस्थान जिन्होंने
प्राप्त कर लिया है वे लोग सुख के फल के भोक्ता हैं यह जान लो। अन्य स्वर्गों में सुख की प्राप्ति होती है
लेकिन वहाँ से पुनः जन्म लेना होता है। ब्रह्मस्थान प्राप्त होने पर उन्हें मुक्ति ही प्राप्त होगी। मूलरूप में
'अरण्यवासी' यही पद है। उस पद से 'वानप्रस्थ' का ही बोध होता है। यहाँ 'संन्यासी' यह अर्थ नहीं लिया गया
है। संन्यासी को वनवासी नहीं कहा जा सकता। वेदों में संन्यासियों के रहने के स्थान का कोई उल्लेख नहीं है।
उन्होंने स्वदेह का हवन किया रहता है इसलिये उनके रहने का कोई निश्चित स्थान नहीं है। जो विरजा होम में
अविद्या आदि कर्म प्रवृत्तियों को ही जला देते हैं वे संसाररूपी वृक्ष के फल खायेंगे यह सम्भव नहीं लगता।
जागृत अवस्था के मेहमान को स्वप्न के घर में भोजन के लिये भेजना जिस प्रकार सम्भव नहीं है उसी प्रकार
मनोवासना शून्य संन्यासी संसारसुख के भोक्ता किस प्रकार होंगे ? जिन्होंने विरजाहोम में अपना कर्म जलाकर
'ब्रह्म मैं ही हूँ' यह सूत्र साध लिया उनके लिये जंगल में अथवा गाँव में नियमित निवासस्थान कौन देगा?
आकाश के निवास के लिये कौन-सा घर निश्चित किया जाय ? उसी प्रकार जो संकल्प त्याग संन्यासी हैं उन्हें
रहने के लिए कौन जगह देगा ? जो संकल्प त्याग करने वाले संन्यासी होते हैं उन्हें वनवासी कौन कहेगा?
इसलिये उन्हें संसारवृक्ष के फल का भोक्ता नहीं कहा जा सकता। मूल पद अरण्यवासी है लेकिन वह वानप्रस्थ
के हिस्से में आया है क्योंकि वानप्रस्थमाश्रमी सदा वन में रहता है इसलिये दूसरे फल (सुखफल) का भोक्ता
वही है। अब संन्यासी की सुखप्राप्ति के बारे में सुनो। वे भी दोनों फलों को मिथ्या ही समझते हैं। त्रिभुवन में
सर्वत्र एक मैं ही हूँ यह अनुभव उन्हें निश्चयपूर्वक हुआ रहता है। अनेक रूपों में फैला हुआ जो यह विस्तार है,
वह सचमुच मैं चिदात्मा ही हूँ, यह निश्चय गुरुमुख से जानकर वे मेरा सच्चा सुख प्राप्त कर चुके हैं। वे
मत्स्वरूप होकर मेरे हो गये, मेरे ही सुख से सुखरूप हो गये, सुख-दुःख फलों से वंचित हो गये और संसार में
आने से भी मुक्त हो गये। मायामय होने के कारण संसार मिथ्या भासरूप है यह जो जानता है वही वेदवेत्ता और
विद्वान है। उसे ही परमहंस कहते हैं। वह सारे विश्व को अपना घर समझ कर ही रहता है। ऐसा पद प्राप्त करने
के लिये अनन्यभाव से गुरुभक्ति करनी चाहिये। उसी से संसार की निवृत्ति होगी। यही बात श्रीकृष्ण बता रहे हैं।
पहले सत्संगति के बारे में बताया। उससे मेरे पद की प्राप्ति होती है। उसी अध्याय के अन्त में गुरुभक्ति के बारे
में बताते हैं।
एवं गुरुपासनयैकभक्त्या विद्याकुठारेण शितेन धीरः।
विवृश्च्य जीवाशयमप्रमत्तः सम्पद्य चात्मानमथ त्यजास्त्रम् ॥ २४॥
भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक साधन करने पर भी यदि सद्गुरु का भजन नहीं किया तो संसारवृक्ष का भेदन
नहीं हो सकता। जिस प्रकार वीरों की स्वयं की ही शक्ति शत्रु का नाश करती है, उसी प्रकार संसारवृक्ष का

३५४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
विनाश करने वाली केवल एक गुरुभक्ति ही है यह जान लो। पापों का नाश करने में जिस प्रकार गंगाजल समर्थ
है उसी प्रकार गुरुभक्ति ही संसारभय को भस्म करती है इसे निश्चयपूर्वक ध्यान में रखो। सत्यव्रत ग्रहण करने से
पाप अपने आप भाग जाते हैं, उसी प्रकार गुरु का भजन करने से संसार का अपने आप क्षय हो जाता है। मारुति
दिखायी देते ही भूत चारों दिशाओं में भागने लगते हैं, उसी प्रकार गुरुभजन शुरु होते ही संसार का भय अपने
आप भागने लगता है। मरते समय अमृतपान करने से मरण की ही मृत्यु हो जाती है, उसी प्रकार गुरुभजन करने
से जन्ममरण की ही मृत्यु हो जाती है। अंतकाल में अकस्मात् 'हरि' कहने से यमदूत भी भाग जाते हैं, उसी
प्रकार सद्गुरु का भजन करने से संसार भय भी भाग जाता है। गुरुभक्त अत्यन्त भाग्यवान होता है। सद्गुरु कौन
है? भक्ति कैसे की जाय ? यदि तुम्हारे मन में इस प्रकार का विचार आ रहा है तो उसके सम्बन्ध में यथार्थ रूप
से बता ही चुका हूँ। हे उद्धव ! तो जो वेद और ब्रह्मज्ञान में निष्णात होते हुए शिष्य को ज्ञान देने में समर्थ हो,
वही सद्गुरु है। जो स्वस्वरूप में ही समाधान करता है, वही सचमुच सद्गुरु है। सद्गुरु बनने के लिये इसके
सिवा कोई कारण नहीं है। उस सद्गुरु के भजन का ढंग मैं तुम्हें बताता हूँ। जो गुरुभजन करता है वह सभी
कर्मों और धर्मों से भी महान है। गुरु को पिता के समान मानना चाहिये, पिता एक ही जन्म के लिये होता है
किन्तु सद्गुरु सनातन माता-पिता है। वह समस्त संसार का पिता है। गुरु को माता के समान मानना चाहिये। गर्भ
में रहने के कारण माता का उससे प्रेम रहता है किन्तु गुरुराज गर्भवास का ही निवारण करता है और पुत्र से भी
अधिक प्रेम करता है। गर्भ से बाहर आने पर माता पुत्रस्नेह के कारण उससे प्रेम करती है लेकिन गुरुमाता बाह्य
सारी बातों को पेट में छिपा कर स्नेह से अधिक प्रेम करती है। गुरु को स्वामी की तरह मानना चाहिये, स्वामी
जन्म-मरण से छुटकारा नहीं दिला पाता, लेकिन सद्गुरु जन्म-मरण से छुटकारा दिलाता है इसलिये सद्गुरु ही
सबसे बड़ा स्वामी है। गुरु को यदि कुलदेवता कहें तो कुलदेवता की पूजा केवल कुलधर्म में होती है किन्तु गुरु
कुलदेवता का भी देवता है। अपने प्रत्येक कर्म में वह पूजनीय है। गुरु को यदि कल्पतरु मानें तो कल्पतरु
कल्पना करने पर ही दान देता है किन्तु सद्गुरु निर्विकल्पता का ही दान देता है। वह निर्लोभता किसी बड़े दान
की तरह होती है। चिन्तामणि जिस बात की चिन्ता करो वही वस्तु देता है लेकिन सद्गुरु चिन्ता का ही नाश
करता है और मन को मार कर शाश्वत का निजदान करता है। कामधेनु दूध देती है लेकिन केवल इच्छा के
अनुसार लेकिन सद्गुरु स्वानन्द का ही रस देता है और इच्छा का नाश करता है। समुद्र को गुरु जैसा कहें तो वह
है तो गम्भीर किन्तु स्वभाव से गुस्सैल। किन्तु गुरु सदा स्वानंद से ओत-प्रोत होने के कारण आत्मबोध से अत्यन्त
मधुर रहता है। गुरु के लिये ब्रह्मा की उपमा भी कम है क्योंकि गुरु के उपदेश से ही ब्रह्मा को सत्यत्त्व प्राप्त
होता है। अन्यथा ब्रह्म तो केवल शाब्दिक ही है। शब्दार्थ को शब्दों में ही नष्ट कर गुरु ज्ञानमय अर्थ का बोध
कराता है इसलिये त्रैलोक्य में उससे अधिक श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। इसलिये गुरु ही माता, गुरु ही पिता, गुरु ही
स्वामी तथा गुरु ही कुलदेवता है। गुरु के सिवा किसी अन्य देवता का स्मरण ही नहीं होता। अत्यन्त कठिन
संकट आने पर अथवा जब आसमान टूट पड़ा हो उस समय भी जो अन्य कहीं झाँक कर नहीं देखता, केवल गुरु
का ही नामस्मरण करता रहता है, शरीर, वाणी, मन और प्राण से जो गुरु के सिवा किसी को नहीं जानता और
उसी प्रकार जो अनन्यभाव से गुरु का भजन करता है, उसकी उस भक्ति को गुरुभक्ति कहते हैं। चिड़िया के बच्चे
जिसके पंख भी नहीं निकले होते वे सदा उसी का ध्यान करते हैं। उसी प्रकार वह जागृति में, स्वप्न में अथवा
सुषुप्तावस्था में भी गुरु के सिवा किसी का स्मरण नहीं करता। पहले तुमने भगवद्भजन की बात की और अब
गुरु सेवा की बात करते हो। तुम्हारे इस निरूपण में सुसंगति नहीं है। ''ऐसी बात न सोचो। जो वास्तव में सद्गुरु

बारहवाँ अध्याय ३५५
है वही मेरी मूर्ति है यह निश्चयपूर्वक ध्यान में रखो। इसके सम्बन्ध में सन्देह न करो। इसी का नाम है
अनन्यभक्ति। एकाग्र होकर गुरु का जो भजन किया जाता है वही मेरी पूजा है। गुरु और मैं इन दो में कल्पांत में
भी कभी बिलगाव नहीं होता। गुरु और भगवान दोनों एक ही हैं इस भावना से जो भजन करता है वही गुरु का
सेवक है। इसके अतिरिक्त कोई और होगा तो उसके बारे में सन्देह है। मुझसे एकत्व प्राप्त करने के लिये जिसने
अत्यन्त प्रेम से गुरुभक्ति को स्वीकार किया वह त्रैलोक्य में धन्य है। अब भजन के स्वरूप के बारे में सुनो। गुरु
की सेवा करने के लिये उसका देह मन से भी आगे रहता है और सारी सेवा मैं अकेला ही करूँ इस महत्त्वाकांक्षा
से वह तैयार रहता है। सेवा का क्रम जैसे-जैसे बढ़ता जाता है वैसे-वैसे यह अधिक उत्साह से सेवा के लिये
तैयार रहता है। पूरी देह वह सेवा के लिये अर्पित कर देता है। गुरुसेवा में ही उसे विश्राम मिलता है। सेवा की
चाह के कारण वह घड़ी भर के लिये भी विश्राम नहीं करता। जैसे-जैसे चाह बढ़ती जाती है वैसे-वैसे गुरुभजन
की माधुरी बढ़ने लगती है। नित्य गुरु की सेवा करते हुए प्रेम का नया दौर ही शुरू हो जाता है। सद्‌भक्ति की
इच्छा से उसने गुरु के चरणों में स्वयं को समर्पित किया रहता है। आलस्य उसके पास आना ही भूल जाता है,
विश्राम का स्थान ही नष्ट हो जाता है। गुरुसेवा के संभ्रम में भूलने के कारण वह अन्य विषयों का सेवन ही भूल
जाता है। प्यास जल को भूल जाती है, क्षुधा पकवान भूल जाती है और गुरु चरणों की सेवा में वह निद्रा भी भूल
जाता है। जम्हाई लेने की भी फुर्सत नहीं मिलती, वहाँ निद्रा को कहाँ स्थान मिलेगा? मुख में सद्गुरु का नाम,
हृदय में सद्गुरु का प्रेम और देह में सद्गुरु का कर्म यही रात-दिन अविश्रांत चलते रहना चाहिये। मन गुरुसेवा
में व्यस्त रहने के कारण उसे पत्नी बच्चे तथा धन का भी विस्मरण होता है। मन का भी विस्मरण होता है और
वह अपने अस्तित्व का भी स्फुरण भूल जाता है। उसके भजन का उत्साह आश्चर्यजनक होता है। भजन करते
समय देह का भी स्मरण नहीं रह जाता। इस प्रकार गुरुसेवा की महिमा विलक्षण है क्योंकि सारा आत्मभाव
गुरुचरणों में ही लगा रहता है। ऐसा होते हुए भी यदाकदा किसी समय गुरु से बिछोह भी हो जाय तो प्रेम का
बन्धन नहीं टूटता, उलटे भजन में भक्ति बढ़ जाती है। जहाँ गुरु का गाँव है वहीं सारा मनोधर्म बस जाता है। गुरु
के ध्यान को ही धर्म कर्म समझ कर वह सेवा का प्रयास नहीं छोड़ता। गुरु के मूर्ति की ही आदत हो जाने के
कारण वह उसी मूर्ति को हृदयाकाश में स्थापित करता है और फिर अनेक प्रकार के भजनरंग में उसके भजन प्रेम
का क्या वर्णन किया जाय? चित्स्वरूप यही उसकी पूर्णिमा और गुरु यही उसका पूर्णचन्द्र है और वह स्वयं
उसके नीचे तृषित चकोर बनकर बैठ जाता है। फिर वह स्वयं स्वानंद बोधरूपी चन्द्रकिरणों का निरन्तर सेवन
करता रहता है अथवा चिदाकाश में सद्गुरु को सूर्य बनाकर स्वयं सूर्यकांतमणि बन जाता है और उसके दिव्य
तेज से देदीप्यमान होकर वह अपने प्रभाव से मायारूपी वन की होली जलाता है अथवा सद्गुरु के कृपामृतरूपी
सागर में लहर बन जाता है और अंतर्बाह्य गुरु का ही स्वरूप है यह मानकर हृदय में वही भावना धारण करता
है। अपना वास्तविक स्वामी जो सद्गुरु है वह सचमुच निर्विकल्प कल्पतरु ही है यह मानता है और उसकी
छाया में बैठकर गुरुभक्ति का ही वर माँगता है अथवा सद्गुरु को कामधेनु बनाकर स्वयं उसके बछड़े की
कल्पना करता है और ज्ञानरूप जिह्वा से स्वानंद का दुग्ध सेवन करता है। हे गुरुदेव तुम्हारी सभी वृत्तियों की
सेवा मैं ही करूँ इस सद्‌भक्ति से मैं उसकी प्रार्थना करता हूँ और कहता हूँ, हे कृपानिधे! मुझे यही वर दीजिये।
तब गुरुनाथ ने प्रसन्न होकर मस्तक पर वरदहस्त रखकर वैसा वर देते ही उसका मन आनन्द से मचल उठता है
और वह कहता है, "मुझे वर मिल गया, मैं धन्य हो गया।'' ऐसा वर प्राप्त कर वह वही सेवा प्रेम और आदर
से करने लगता है। गुरुभजन के असंख्य प्रकार हैं। सद्गुरु का मन, बुद्धि, अंतःकरण आदि जो दशेन्द्रिय हैं उन

३५६ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सबकी क्रिया मैं स्वयं बन जाऊँ ऐसी वह मन ही मन इच्छा करता है। सद्गुरु के सारे भोग मैं ही बनूँगा। इस
प्रकार मैं ही गुरुभक्तिस्वरूप बनकर रहूँगा। सद्गुरु जहाँ खड़े रहेंगे वहाँ उनके पैरों के नीचे की जमीन मैं बनूँगा,
सद्गुरु जहाँ-जहाँ चलते जायेंगे उस मार्ग की मिट्टी मैं ही बनूँगा। उनके पैर धोने का पानी मैं ही बनूँगा और
चरण धोने वाला मैं ही रहूँगा और उनके चरणों के तीर्थ को सेवन करने वाला मैं ही बनूँगा। सद्गुरु के चरणों की
धूल मैं स्वयं बनूँगा। सद्गुरु जिस पर बैठते हैं, वह सिंहासन भी मैं ही बनूँगा। उस पर रखा जाने वाला आसन
भी मैं ही बनूँगा इसे ध्यान में रखो। सद्गुरु के शरीर में जो तेल लगाया जाता है, वह भी सर्वांग से मैं ही बनूँगा।
गुरु को टेकने के लिये आगे-पीछे रखे जाने वाले तकिये मैं बनूँगा। यहाँ तक कि सद्गुरु की सिद्ध पादुकाएं भी
मैं ही बनूँगा। दूसरों को उन्हें हाथ भी नहीं लगाने दूँगा। गुरु का श्वासोच्छ्वास भी मैं ही बनूँगा और उनके नाम
से मैं ही तीव्र गति से बाहर आऊँगा। गुरु जिस सुगन्ध का सेवन करेंगे वह सुगन्ध मैं बनूँगा। गुरु कृपादृष्टि से
जिधर देखेंगे वह दृश्य मैं ही बनूँगा। अथवा जो कीर्तन गुरु को पसन्द है उसका गायक मैं रहूँगा। सद्गुरु के मुख
में जो कथा होगी वह आदरपूर्वक मैं ही रहूँगा और उसका प्रत्येक अक्षर और उसका अर्थ भी मैं ही रहूँगा।
सद्गुरु जहाँ स्नान करेंगे वहाँ भी स्नान से उड़ने वाला पानी मैं बनूँगा। गुरु जो आचमन करेंगे वह भी मैं ही
बनूँगा। गुरु जो वस्त्र परिधान करेंगे वह उत्तम वस्त्र मैं ही रहूँगा। गुरु के पैर पोंछने के लिये जो धूतवस्त्र होता है,
वह मैं ही रहूँगा। गुरु के शरीर पर उबटन लगाया जाता है, वह उबटन मैं बनूँगा। गुरु के चरणों पर अर्पण किया
जाने वाला फूल मैं ही रहूँगा। सद्गुरु जिसमें भोजन करेंगे वह थाली और अन्न मैं ही रहूँगा। उसमें रस का
माधुर्य, पकवान, पंगत में साथ में बैठने वाला सब कुछ मैं ही रहूँगा। दही मथ कर जो मक्खन निकलता है उसे
वैराग्यरूपी अग्नि पर पका कर भोजन का प्रमुख व्यंजन घृत मैं ही बनूँगा। भोजन में स्वाद लाने वाला लवण मैं
बनूँगा और इसके बाद भी यदि कोई कमी रह जाएगी तो उसे वे गुरु पूरा करेंगे। जो पानी गुरु प्राशन करेंगे वह
पानी मैं बनूँगा और सद्गुरु तृप्ति की जो डकार देंगे वह भी मैं ही बनूँगा। गुरु को जो फल अर्पण किया जाता है
वह फल तत्काल मैं बनूँगा। गुरु को अर्पण करने के कारण सफल होने वाले फल की सफलता मैं बनूँगा। गुरु
की जूठन ग्रहण करने की मुझे आदत-सी पड़ गयी है। इसके लिये मैं बिल्ली बनकर उनकी थाली चाट कर
साफ करूँगा। गुरु जब सुगन्धित चूर्ण से हस्तशुद्धि करेंगे तो मैं सुगन्धी चन्दन बन जाऊँगा और मुख में सुगन्ध
लाने वाली गन्ध भी बन जाऊँगा। फलाशा तोड़ कर उसके टुकड़े तथा वासना की रेशाएँ तोड़ कर उसका बीड़ा
सद्गुरु के मुख में रखने से आने वाली ताम्बूल की रुचि मैं बनूँगा। 'अहंता' का अभिमान छोड़कर मैं 'सोहं' का
शुद्ध चूना बन जाऊँगा और शान्ति रूप पके पान में लग कर सद्गुरु के मुख में प्रवेश करूँगा। सभी सारों का
शुद्ध कत्था मैं बनूँगा। सद्गुरु के मुख में रंग के रूप में मैं ही शोभा बढ़ाऊँगा। सद्गुरु के मुख का पवित्र थूक मैं
लपकूँगा और पीकदानी का मुँह मैं ही बनूँगा। गुरु ने चबाया हुआ बीड़ा और थूकी हुई पीक के साथ पीकदान मैं
ही बनूँगा। मक्खियाँ भगाने की चँवर मैं ही बनूँगा। गुरु के मुख का बीड़ा लेने के लिये मैं अत्यन्त आस्था से
सेवक बनूँगा। अन्यथा गुरु की गोद में मैं प्यारा बच्चा बनकर लेटूँगा। मेरे गुणरूपी पुष्पों की माला मैं बड़े प्यार से
गुरु के गले में डालूँगा। गुरु कमल के फूल के साथ खेलने लगेंगे तो उनका करकमल मैं ही बनूँगा। गुरु की
नीरांजन से आरती करते समय उस नीरांजन की ज्योति मैं अपने ही तेज से प्रकाशित करूँगा और गुरु जिस
प्रकाश से चलेंगे उस दीपक की प्रभा मैं बनूँगा। मैं श्रीगुरु पर अपने प्राण न्योछावर कर दूँगा। उनके सारे कष्ट मैं
अपने ऊपर ले लूँगा। वह शाप लक्षण मुझे लगे। मैं छत्र भी हूँ और छत्रधारी भी। चँवर भी मैं हूँ और चँवरधारी
भी मैं ही हूँ। पंखा भी मैं हूँ और पंखा झलने वाला भी मैं ही हूँ। इस प्रकार गुरु का सारा परिवार मैं ही रहूँगा।

बारहवाँ अध्याय ३५७
गुरु जिस पर बैठेंगे वह घोड़ा मैं ही बनूँगा। गुरु का बोझ उठाने के लिये मैं घोड़े के रूप में वाहन बनूँगा। गुरु के
आगे-आगे मैं मार्गरक्षक योद्धा रहूँगा, गुरु के गुणों का वर्णन करने के लिये मैं उनका भाट बनूँगा और गुरु के घर
शान्तिपाठ करने वाला भिक्षुक बनूँगा। गुरु के सिर पर छत्र धारण करने वाला, उन पर चँवर झुलाने वाला, उन्हें
बीड़ा देने वाला, फूल देने वाला, झाड़ लगाने वाला, दूध देने वाला और द्वारपाल मैं ही बनूँगा। गुरु जिधर-जिधर
ध्यान देंगे वहाँ का अवधान मैं ही रहूँगा, भले ही प्राण चले जाएँ लेकिन गुरु को छोड़कर एक क्षण के लिये भी
मैं कहीं नहीं जाऊँगा। गुरु जो कथा कहेंगे उसे आग्रहपूर्वक सुनने वाला मैं श्रोता बनूँगा। गुरुकृपा से अध्यात्मज्ञान
सुनाने वाला वक्ता मैं बनूँगा। गुरु उदारतापूर्वक दान देने लगें तो मैं गरीब याचक बन जाऊँगा। गुरु अपने मन की
बात कहने लगें तो मैं ही एकान्तस्वरूप हो जाऊँगा। गुरु विश्राम करने बैठें तो मैं अवकाश बन जाऊँगा और गुरु
के हृदयस्थ अवकाशरहित जो चिदाकाश है वह मैं बनूँगा। गुरु जिस पर बैठेंगे वह सुखकारी आसन मैं ही बनूँगा
और डोली उठाने वाला कहार मैं ही बनूँगा। स्वामी का ख्याल रखते हुए, बड़े संयम से तेज कदम उठाकर तथा
गुरु की पालकी का डंडा कन्धे पर उठा कर स्वामी से बातें करते हुए मैं तेज कदमों से चलता जाऊँगा। वाहन में
बैठे हुए गुरु का ध्यान रखते हुए कहीं पैर परस्पर टकरा न जाय इसलिये पैर उठाकर चलूँगा। जमीन के गड्ढों
तथा ऊँचाइयों को बचाकर ठीक तरह से चलूँगा। संकल्प और विकल्प के झटकों से शरीर के दायें-बायें अंग को
बचाते हुए श्रीगुरु के मुख की ओर देखते हुए मैं चलूँगा। रास्ता बिना भूले, पालकी का डंडा न हिले इसका ध्यान
रखते हुए, दूसरों की आस किये बिना मैं उत्तम कहार बनूँगा। उस सुखद वाहन में बैठकर चलने से सुख बढ़ता
ही जाएगा। चढ़ना, गिरना, लड़खड़ाना, डरना, दौड़ना, अटकना आदि का ध्यान रखते हुए ध्यानपूर्वक पूरी
उम्मीद से चलूँगा। पालकी में बैठने में गुरुजी को कष्ट न हो इसलिये पालकी का डंडा कन्धे पर, मस्तक पर,
कोहनी पर, इस प्रकार रखकर पैर का ध्यान रखते हुए चुपचाप चलूँगा। सामने चढ़ाई आ जाय, मोड़ आये, साँस
फूलने से शरीर थक जाय लेकिन सीना तान कर, धैर्यपूर्वक चढ़ाई चढ़ता चलूँगा। काम का प्रवाह लाँघ कर,
क्रोध के आवेग से बच कर तथा गड्ढों से बच कर पालकी का अगला डंडा कन्धे पर लेकर मैं चलूँगा। ममता
की दलदल विचित्र होती है। उसमें मनुष्य पूरी तरह फँस जाता है लेकिन मैं पैर में जरा भी कीचड़ लगे बिना
उस दलदल को पार कर जाऊँगा। मोहरूपी नदी की खोह बहुत भयंकर है। पानी के तेज बहाव के कारण वह
बड़ी तेजी से नीचे की ओर खींचता है। लेकिन मैं स्वामी को पानी का एक भी बूँद लगे बिना एक किनारे से
दूसरे किनारे तक ले जाऊँगा। सामने दृष्टि रख कर तेजी से आगे चलते समय दोनों ओर का कहार मैं बन
जाऊँगा और रास्ता चलता जाऊँगा। इस प्रकार आगे और पीछे मैं स्वयं सुखासन के आनन्द में कहीं स्वामी की
नींद न टूटे इसका ध्यान रखते हुए उन्हें ले जाऊँगा। जूठे अन्न पर पलने वाला, आठों पहर जागता रहने वाला
तथा गुरु के द्वार पर 'गुरु' 'गेरु' कहने वाला मैं कुत्ता बन कर रहूँगा। कोई अपरिचित दिखाई देते ही मैं 'सोहं'
भावना से भूकने लगूँगा और भजनरूप कुण्ड में बैठने वाले गुरु के द्वार का कुत्ता बनूँगा। ऐसी अनेक कल्पनाएँ
कर गुरु की सेवा के सम्बन्ध में शिष्य विचार करता रहता है। दैवयोग से वह भले ही दूर चला जाए किन्तु
भक्तियोग से वह पास ही रहता है। गुरु सेवा के लिए जो इस प्रकार अपने आप को न्योछावर कर देता है वह
सद्विद्या शास्त्र में सहज ही पारंगत हो जाता है। वह गुरु के पास रहे अथवा दूर रहे लेकिन उसे गुरुभक्ति से प्रेम
ही रहता है। वह अपने प्राण गुरु की सेवा के लिये और भजन के लिये गुरु के द्वार पर ही रखे रहते हैं। गुरुभक्ति
के प्रति ऐसी तत्परता के कारण तथा स्वरुचि से अधिकाधिक एकाग्रता साधने के कारण वही गुरुकृपाकुठार रूप
सद्विद्यालक्षणशस्त्र उसके हाथ में आता है। उस शस्त्र को वैराग्य की सील पर घिसने और स्वस्वरूपाकार वृत्ति ने

३५८ श्रीमद् एकनाथी भागवत
सान लगाकर चमकाने से अत्यन्त तेज शस्त्र तैयार हो जाता है। अपने सामने शस्त्र तैयार कर उसे ऐक्यभाव की
मुट्ठी में इस प्रकार पकड़ना चाहिये कि शस्त्र और शस्त्रधर दोनों एकजुट हो जाएँ। तब वह संसार पर प्रहार
करने के लिये सिद्ध हो जाता है। ठीक से निशाना साध कर प्रबल प्रहार करने से के लिये तत्पर होते ही
संसारवृक्ष का नाश होता है और प्रहार करने पहले ही टूट जाता है। लिंग वासना निज कल्पना का नाश करती है
उसे धैर्यपूर्वक तथा सावधान होकर नष्ट करने से संसाररूपी वृक्ष का नाश होता है। आत्मसाक्षात्कार होने पर सभी
साधन अपने आप नष्ट हो जाते हैं। भोजन से परितृप्ति हो जाने के बाद शेष पकवान वैसे ही रह जाते हैं। जिस
प्रकार क्षुधा शान्त हो जाने के बाद कोई अमृत भी मुँह से नहीं लगाता, उसी प्रकार ब्रह्मपद की प्राप्ति के बाद इन
साधनों का प्रयास नहीं करना चाहिये। यही भाव मन में रख कर मैंने तुम्हें पहले भी बताया था कि साधनों का
प्रयास प्रवृत्ति निवृत्ति के साथ छोड़ देना चाहिये। परब्रह्म तक पहुँचने के बाद सारे वेदोक्त कर्म भी मिथ्या हो जाते
हैं और आश्रमादि वर्णधर्म भी मिथ्या हो जाते हैं। यह कर्मत्याग का मर्म है। स्वप्न में गड़बड़ी में चलते समय
लड़खड़ा कर जो कुएँ में गिर पड़ता है वह जागृत होने पर खुद को उसमें से निकालता है। उसी प्रकार साधन का
अट्टहास व्यर्थ है। खेत जब फसल से भर जाता है तो उसे कौन जीतेगा? जब गजान्तलक्ष्मी ही घर में आयी तो
दरवाजे दरवाजे भीख कौन माँगेगा? जब निधि ही हाथ लग जाये तो आँख में अंजन कौन डालेगा? उसी प्रकार
आत्मज्ञान प्राप्त हो जाने पर साधनों का बोझ कौन ढोयेगा? हे उद्धव! ज्ञानसामर्थ्य को स्वीकार करने के बाद
सचमुच अपनी वृत्ति का ही त्याग करना चाहिये। अग्नि से अन्न पक कर तैयार होता है, लेकिन जब तक उसकी
भाप निकल नहीं जाती तो उसकी जो गरमी शेष रह जाती है, उससे खानेवाले का मुँह जलता है और खाना
बनाने वाले को भी उसका स्वाद समझ में नहीं आता। पेड़ से आम गिरता है, फिर भी उसमें खटास रहती है।
उसी आम को पाल में डाल दिया जाय तो पक जाने पर उसकी सुगन्ध से ही उसकी मिठास का पता चल जाता
है। लेकिन आम को पाल में रखने में भी खूबी है और वह यह कि एक आम का दूसरे से सम्पर्क नहीं होना
चाहिये क्योंकि ऐसा होने से दोनों में दाग लग जाता है और उनके संसर्ग से अन्य आम भी खराब हो जाते हैं।
समरभूमि में विजयध्वज फहराने से भी, जब तक शरीर के कवच नहीं उतारे जाते तब तक सच्चा विश्राम नहीं
मिल पाता। गर्भवती स्त्री प्रसूत होती है और पुत्र की प्राप्ति से आनन्दित होती है लेकिन जब उसका बारहवें दिन
नामकरण होता है तभी उसे पुत्र होने का सच्चा सुख प्राप्त होता है। कोई पुरुष मर जाता है तो उसके शरीर का
दहन होता है लेकिन सुतक तो रहता ही है। वह जब समाप्त हो जाता है तभी देह की शुद्धि होती है। उसी प्रकार
अज्ञान जाकर जो ज्ञानाभिमान बच रहता है उसका भी त्याग करने पर स्वानंद से आत्म समाधान होता है। खैर का
शूल सचमुच मारता है तो चन्दन का क्या कुछ अलग करता है? उसी प्रकार ज्ञान अथवा अज्ञान दोनों ही प्रकार
का अभिमान बाधक ही होता है। लोहे की बेड़ी तोड़ कर शौक से सोने की बेड़ी पहनने से पीड़ा कम नहीं
होती। 'ब्रह्मादिक' 'ब्रह्म मैं ही हूँ' यह अभिमान कोई शुद्ध ब्रह्म नहीं है। अहंता के कारण वह भी कठिन है।
उसका लक्षण भी सुनो। पानी से नमक तैयार होता है और वह पानी में ही मिल जाता है। लेकिन मोती पानी से
ही तैयार होता है किन्तु वह कठिन रहता है इसलिये वह पानी में घुल नहीं जाता। मोती होने से उसका मोल भले
ही बढ़ जाय लेकिन वह स्त्री के होठों के पास सोने की तार में फँस जाता है। मुक्त होते हुए भी वह नाक के
पास आ गया, यह कठिन प्रसंग अभिमान के कारण उपस्थित हुआ। उसी प्रकार अज्ञान का अभिमान तत्काल
नष्ट हो जाता है लेकिन ज्ञानाभिमान बहुत कठिन है। मिट्टी की गागर कच्ची रहती है वह तत्काल गलने लगती है
और मिट्टी में मिल जाती है। लेकिन वही भट्टी में सेंका हुआ खपरैल कठोर होने के कारण कितने ही दिन क्यों न

बारहवाँ अध्याय ३५९
बीत जाएँ लेकिन मिट्टी में नहीं मिलता। उसी प्रकार प्रपंच अज्ञान के ही कारण बलवान हुआ है। इसलिये ज्ञान
और अज्ञान इन दोनों का अभिमान छोड़ कर, जिस प्रकार काँटे से काँटा निकाला जाता है उसी प्रकार दोनों को
दूर फेंक देना चाहिये क्योंकि यदि इन्हें बीच रास्ते पर फेंक दिया जाय तो ये कभी हमें ही बाधक हो सकते हैं।
अहंकार के रूप में जितना भी कुछ है वह उतना ही बाधक है। इसलिये अहंकार अच्छा हो या बुरा हो ज्ञानीजन
दोनों ही प्रकार के अभिमान को पूर्णरूप से छोड़ देते हैं। हे उद्धव ! तुम्हें मेरे पद की प्राप्ति मेरी भक्ति करने से ही
हुई है। अब अनेक प्रकार के साधनों की झंझट तथा शास्त्रों की चर्चा क्यों करते हो? सद्‌भक्ति से मेरा भजन
करने से तुम ब्रह्मस्वरूप हो गये हो। इसलिये अब शास्त्र श्रवण के साथ सद्धिद्याधिक साधनों का परित्याग कर
दो। 'तस्मादुद्धव उत्सृज्य' इस श्लोक के त्याग का बीज यही है यह अपने अंतःकरण की गुप्त बात मैंने तुम्हें
स्पष्ट करके बतलायी। शिष्य के लिये गुरु का भजन यही सब साधनों में श्रेष्ठ साधन है। सचमुच उससे ही
ब्रह्मसमाधान प्राप्त होता है। जो गुरुचरण का भक्तिभाव से भजन करता है वह सच्चिदानंद मन्दिर में वास करता
है। मेरा यह भाषण पूरी तरह सच है। उसके सम्बन्ध में कोई विकल्प मन में नहीं रखना चाहिये। यह कह कर
श्रीकृष्ण ने अपनी चारों बाहें पसारीं और उन हाथों से उद्धव को बड़े आनन्द से अपने पेट से लगा लिया।
भगवान ने सद्‌भक्त को आलिंगन देने के कारण हृदय से हृदय मिल गया। तब अर्थात् ही कहना और सुनना ये
दोनों क्रियाएँ बन्द हो गयीं और शब्दों ने ही शब्दों को खा लिया। चारों वाणियाँ बन्द हो गयीं, जीव अपना
जीवत्व भी भूल गया और सद्‌भक्तों को केवल आनन्दघन के रूप में जो एकनाथरूपी जनार्दन है वह भी सन्तुष्ट
हो गया। उसी सद्‌भक्ति का भावार्थ बारहवें अध्याय में स्पष्ट किया। उसका सारांश यही कि भक्तों को उनकी
भक्ति से श्रीकृष्णनाथ सदा प्राप्त होते हैं। आत्मप्राप्ति होने का कारण केवल मुख्य भावार्थ ही है। भावार्थ के सिवा
अन्य साधन व्यर्थ की परिक्रमा है।, जप, तप, यज्ञ अथवा दान भावार्थ के ही लिये किये जाते हैं। वह भावार्थ
जिसने साध लिया उसका जन्म धन्य है। नरदेह की प्राप्ति धन्य है। साधुओं का संग धन्य है और जो भावार्थी
भगवद्भक्ति में रंग गये वे अत्यन्त धन्य हैं। जो भगवन्मार्ग में रंग जाते हैं उनका चित्त विषयसुख को भूल जाता
है। वह हंसगीत की कथा उद्धव श्रीकृष्ण से पूछेंगे। वह निरूपण अत्यन्त रसीला है तथा शुद्ध ब्रह्मज्ञान है।
इसलिये श्रोतागण उधर ध्यान दें ऐसी विनती एकनाथरूपी जनार्दन कर रहे हैं।
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे एकादशस्कंधे
श्रीकृष्ण उद्धव संवादे एकाकारटीकायां द्वादशोध्यायः ॥ १२ ॥
श्री कृष्णार्पणमस्तु।

तेरहवाँ अध्याय
हे ॐकारस्वरूप अनादि हंस! हे हंसरूप जगदीश! तुम्हें नमस्कार है। हे श्रेष्ठ परमेश्वर! हे परिपूर्ण, तुम
परमहंस के भी सद्गुरु हो। विद्या-अविद्या, ज्ञान-अज्ञान, प्रकृति पुरुष आदि द्वैतभावना के बिना ही तुम्हारे दो
पंख शोभायमान हो रहे हैं, शुद्ध सत्त्व से भी सुन्दर और उज्ज्वल तुम्हारा स्वरूप है। कहते हैं कि हंस शुभ्र वर्ण
का होता है किन्तु तुम्हारा 'हंस रूप' विलक्षण है। जब सुवर्ण के कमल विकसित होते हैं तब अन्य हंस वहाँ
क्रीड़ा करते हैं लेकिन तुम प्रेम से प्रफुल्लित हृदयकमल में क्रीड़ा करते हो। हंस का रहने का स्थान मानसरोवर
है लेकिन तुम मानसविरहित (मन के सिवा) ही रहने वाले हो। हंस की उड़ान आकाश में रहती है लेकिन तुम
चिदाकाश में उड़ान भरते हो। विवेकरूपी चोंच से तुम दूध और पानी सहज ही अलग कर लेते हो और असार
का त्याग कर शुद्ध सार ग्रहण करते हो। तुम्हारे जैसे हंस के लिये चित्समुद्र के वैराग्यरूपी सीप में तैयार-मुक्तारूप
मोतियों का चारा खिलाया जाता है। पृथ्वी का स्पर्श किये बिना तुम निराधार मार्ग से हंस की गति से प्रवास करते
हो यह तुम्हारे प्रवास की कला अद्भुत है। जो स्वभाव में तुमसे भिन्न नहीं है ऐसी वाग्देवता को तुम परिचालित
करते हो। तुम्हारे अंश के कारण ही उसे हंसवाहिनी कहा जाता है। तुम कहते हो तभी सरस्वती चलती है, तुम्हारे
कहने से ही वेद बोलते हैं, जब तुम कहते हो तभी प्राण में स्पन्दन होता है और तुम्हारी वक्तृत्व शक्ति से ही
सरस्वती बोलती है। सरस्वती वाणी की देवता है लेकिन तुम्हारे ही कारण उसे वाक्शक्ति प्राप्त हुई है उसी प्रकार
जैसे बाँसुरी के स्वर मधुर रहते हैं किन्तु उसे बजाने वाला कोई और ही होता है। उसी प्रकार वाचा, वचन और
वक्ता तुम ही हो, सरस्वती तुम ही हो और बोलने वाले भी तुम ही हो। इसलिये अपने हंसरूप की कथा तुम्हीं
सहज ही बोलवा रहे हो। बड़े-बड़े कवियों को बोलने के लिये तुमने सरस्वती प्रकट की। उस हंसरूप की
अपूर्वता से अभिनव बातें ही प्रकट होती हैं। तो तुम हंसरूपी श्रीजनार्दन सर्वभूतों में एकसमान हो। उसके
श्रीचरण मस्तक पर धारण करने के कारण जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो गया। वह जब स्वयं ही भय के कारण
भाग रहा था तब उसे भ्रम के पास छिपने के लिये जगह मिल गयी और उसने जन्म के बाद मरण को वहाँ रहने
के लिये स्थान निश्चित कर दिया। इसलिये जो भ्रम में पड़ता है वह जन्म-मरण में फँस जाता है और एक बार
भ्रम के चक्र में फँसने पर उससे छूटना कठिन है। वहाँ वह रहटमाला की तरह जन्म-मरण के यंत्र में फँस जाता
है। एक के प्रहार से बचता है तो दूसरा सिर पर सवार हो जाता है। जन्म-मरण के संकट से बचने के लिये
तुम्हारे 'सोहंहंसा' का स्मरण करना पड़ता है। जब कोई सावधानी से उसका स्मरण करता है तभी उसका भ्रम
नष्ट होता है। तुम परमात्मा परमहंस हो। परब्रह्मस्वरूपी पूर्ण परमेश्वर हो। ब्रह्मदेव के पुत्र को उपदेश करने के
लिये तुम हंस बने थे। उस हंसमुख का निरूपण सुनाने के लिये ही श्रीशुक्राचार्य वक्ता बने और उस भाषण का
अर्थग्रहण कर ही परिक्षिति परम पावन हुए। उस हंस का हंसगीत श्रीकृष्ण उद्धव को सुना रहे हैं। इसलिये
श्रोतागण इधर ध्यान दें जिससे उन्हें सहज ही आत्मबोध होगा। वही यह तेरहवाँ अध्याय भगवान अत्यन्त
आस्थापूर्वक सुना रहे हैं। उसे सुनते ही उद्धव विषयों का नाश होते देख सकेगा। तेरहवें अध्याय में सत्त्वबुद्धि के
कारण का निरूपण है तथा सद्दिद्या के उद्भव का क्रमानुसार अत्यन्त सुलभ रीति से वर्णन किया गया है। उस हंस
के इतिहास का योग भगवान स्वयं बतायेंगे और उसी में चित्त को विषयों का वियोग कैसे होता है वह भी सुलभ
रीति से बताया जायगा। बारहवें अध्याय के अन्त में सद्गुरु की भक्ति कर विद्यारूपी शस्त्र प्राप्त कर जीवों में

तेरहवाँ अध्याय
३६१
वासना का ही छेद करने की बात कही गयी है। जीव का जीवत्त्व ही छेद देने पर सभी साधन छोड़ देने चाहिये,
इसलिये उद्धव ने उस पर कोई उत्तर नहीं दिया। तब उद्धव के मन के विचार, उसके अंतःकरण में चलने वाले
गूढ़ विचार आदि बातों को अच्छी तरह जानकर भगवान श्रीकृष्ण स्वयं से ही बातें करने लगे। तुम कहोगे कि
त्रिगुण का सूत्र लगने के कारण जीव में जीवंत्व आता है, तो जब तक देह में तीन गुण हैं तब तक सद्विद्या उत्पन्न
ही नहीं होगी। नारियल के मुँह पर का ढक्कन जब तक नहीं खोला जाता तब तक उसके अन्दर का पानी प्राप्त
नहीं हो सकता। इस प्रकार जब तक गुण ही समाप्त नहीं होंगे तब तक विद्या कैसे उत्पन्न होगी ? उद्धव की इसी
शंका का समाधान श्रीकृष्ण तीन श्लोकों में करते हैं।
श्री भगवानुवाच
सत्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मनः।
सत्त्वेनान्यतमौ हन्यात् सत्त्वं सत्त्वेन चैव हि ॥ १ ॥
सत्त्व, रज, तम आदि जो गुण हैं वे सचमुच मायारूपी हैं यह ध्यान में रखो। इन सब बातों का निरूपण
मैंने बारहवें अध्याय में किया ही हुआ है। अब जो सच्चिदानन्द है वह आत्मा से भिन्न नहीं है। लेकिन सभी गुण
वैसे नहीं हैं। वह प्रकृति के ही कार्य होने के कारण प्राकृत हैं। जो सत् है वही चित् है और जो चित् है वही
आनन्द है लेकिन आत्मस्वरूप में तीन प्रकार के भेद नहीं होते। वह एकमेव सच्चिदानंद स्वरूप ही है। जिस
प्रकार श्वेत, मुलायम और मीठी इन तीन गुणों से युक्त चीनी एक ही है, उसी प्रकार सच्चिदानंद यह अविकृत
वस्तु है तथा आकाररूप में भी एक है। प्रकृति ही गुणों को उत्पन्न करने वाली है और उन गुणों के कारण ही
बलवान हुई है। इसलिये हे उद्धव ! गुणों की और आत्मा की संगति कल्पांत में भी कभी नहीं होती। अब विद्या
साध्य करने का ढंग भगवान स्वयं ही बताते हैं। गुण से ही गुणों का नाश कर सद्विद्या प्राप्त करनी चाहिये यह
बात ध्यान में रखो। जब प्रेम से सत्त्व की वृद्धि होकर रज और तम पूरी तरह झड़ जाते हैं तभी सद्विद्या हाथ
लगती है और आत्मस्वरूप का बोध होने पर सत्त्व की वृद्धि भी रुक जाती है। सर्प जिसे काटता है उसे विष
खाने पर आराम मिलता है लेकिन वही विष यदि गलत दिन खा लिया जाय तो वह आत्मघात का कारण बन
जाता है। उसी प्रकार रज और तम का लोप होकर सत्त्व की वृद्धि होती है लेकिन वही सत्त्व जब बाधक हो
जाता है तब बहुत खराब रहता है। उस बाधा के बारे में तुम्हें आगे स्पष्ट करके बताऊँगा। सभी कर्मों से तथा
कार्यों से मैं अलिप्त हूँ। मैं ही ज्ञाता हूँ, मैं ही अत्यन्त सुखी हूँ ऐसी कल्पना कर ही सत्त्व ने गुण से गुणों के
कार्य में उलझा दिया है। इस प्रकार जो सत्त्वगुण बढ़ता है उसका शमन आत्मतत्त्व से ही किया जाना चाहिये।
उसका सम्पूर्ण निर्दलन करने से ही समाधान प्राप्त होता है। उद्धव ! तुम कहोगे कि जब तीनों गुण समान ही हैं तो
फिर केवल सत्त्व की ही वृद्धि क्यों होती है ? इसका उत्तर यह है कि गुण ही गुणों की रखवाली करते हैं। जब
तमोगुण बढ़ता है तो उसे ज्ञान-ध्यान अच्छा नहीं लगता, त्याग अच्छा नहीं लगता और चंदनादि सुखविलास
अच्छा नहीं लगता। निद्रा तथा जोरदार कलह अच्छा लगता है। जब रजोगुण बढ़ता है तो ज्ञान का निरूपण सुनते
हुए भी उसका मन भोग के प्रति आसक्त रहता है। उसे सदा विषय भोग का ही ध्यान लगा रहता है। दृष्टि में
धन की लालसा भरी हो तो-कोई पैर से पादत्राण भी निकाल ले तो उसे गुस्सा नहीं आता। यह रजोगुण की
विशेषता है। रजोगुणी मनुष्य स्त्री पुत्रों के प्रति अत्यन्त लालची होता है। सत्त्वगुण बढ़ने पर वह स्त्रियादि भोगों
के प्रति उदासीन हो जाता है। वह निरन्तर भगवद्चिंतन करता है। क्रोध, लोभ अथवा मोह का लक्षण सत्त्व के

३६२ श्रीमद् एकनाथी भागवत
काल में उत्पन्न नहीं होता। किन्तु अकेले सत्त्वगुण की ही वृद्धि कैसे हो? क्योंकि गुण ही गुणों की रक्षा करते हैं।
सत्त्वगुण के पीछे-पीछे तमोगुण रहता है, आगे परिपूर्ण रजोगुण रहता है और उन दोनों के बीच सत्त्वगुण फँसा
रहता है। तब वह कैसे बढ़ेगा? वह तो पूरी तरह फँसा रहता है। ऐसी शंका मन में आकर तुम सोचोगे कि
सत्त्वगुण कैसे बढ़ेगा? तो उसी सत्त्ववृद्धि का लक्षण बताता हूँ, सुनो।
सत्त्वाद् धर्मो भवेद् वृद्धात् पुंसो मद्भक्तिलक्षणः ।
सात्त्विकोपासया सत्त्वं ततो धर्मः प्रवर्तते ॥ २ ॥
इन श्लोकों का निरूपण करते समय प्रथम उत्तरार्ध का व्याख्यान सुनाता हूँ। उसमें सत्त्ववृद्धि का कारण
सात्त्विक वस्तुओं का ही सेवन बताया गया है। सात्त्विक पदार्थ ही सेवन करने से सत्त्व की ही वृद्धि होती है और
सत्त्ववृद्धि से ही आचरण करने के कारण जीवों में भी पवित्रता आती है। सत्त्व के उत्कर्ष का लक्षण है धर्मनिष्ठा
एवं स्वधर्म का आचरण। उसी प्रकार वहाँ की वासनाओं का बन्धन वह इहलोक तथा परलोक में भी नहीं चाहता।
अंतःकरण शुद्ध हो जाने पर सत्त्वगुण असीम बढ़ जाता है और पुरुषों में मेरी भक्ति का लक्षण धर्म उत्पन्न होता है।
सत्त्व से धर्म की प्रवृत्ति बढ़ने पर गुरुभजन के प्रति प्रेम स्थापित होता है। अथवा जहाँ मेरी सात्त्विक मूर्ति रहती है,
वहीं भक्ति का विकास होता है। कायिक, वाचिक एवं मानसिक कर्म वही मुझे सहज ही अर्पण करता है। मेरे
सिवा किसी और की भक्ति उनमें उत्पन्न ही नहीं होती। तब स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होने लगता है कि गुरु और
भगवान भिन्न नहीं हैं। वही अत्यन्त महान सत्त्व का लक्षण है। यह धर्म पूर्ण सात्त्विक ही है।
धर्मो रजस्तमो हन्यात् सत्त्ववृद्धिरनुत्तमः।
आशु नश्यति तन्मूलो ह्यधर्म उभये हते॥ ३ ॥
ऐसे सात्त्विक धर्मों की वृद्धि होने पर, जिन सत्त्वों में मुमुक्षुओं का विश्रामस्थल पुरुषोत्तम प्रकट होता है,
उस सर्वोत्तम सत्त्व की वृद्धि होती है। इस प्रकार सत्त्ववृत्ति में जो धर्म बढ़ता है वही तत्काल अधर्म का नाश
करता है क्योंकि अधर्म के मूल रजोगुण और तमोगुण हैं। उनका नाम भी वह नहीं रहने देता। सात्त्विक पदार्थों के
सेवन से सत्त्व की वृद्धि होती है। उस सत्त्ववृद्धि के कारण सद्विद्या प्राप्त होती है। कृपानिधि श्रीकृष्ण ने सद्विद्या
प्राप्ति का यह साधन बतलाया। अब सात्त्विक पदार्थों के सेवन के सम्बन्ध में जो बताया है वे सात्त्विक पदार्थ
क्या हैं? उनका निरूपण भी इन लक्षणों में करता हूँ।
आगमोऽपः प्रजा देशः कालः कर्म च जन्म च।
ध्यानं मन्त्रोऽथ संस्कारो दशैते गुणहेतवः ॥ ४ ॥
गुणवृद्धि का कारण आगम अर्थात् शास्त्र है यह ध्यान में रखो। आपका अर्थ है जल और मनपसन्द स्थान
है देश। अब प्रजा का लक्षण सुनो। प्रजा का अर्थ है तीन प्रकार के लोग। जिसकी जैसी संगत होती है वैसा
लक्षण उसे प्राप्त होता है। काल का अर्थ है दिन के भाग। कर्म का अर्थ है वह क्रिया जो शरीर करता है। जन्म
का अर्थ है अच्छे प्रकार की दीक्षा। मंत्र का लक्षण अपनी रुचि के अनुसार। कर्त्ता को जिसमें आदरभाव दिखायी
देता है वह है संस्कार। इसके दस लक्षण हैं। अब गुणवृद्धि सम्बन्धी विचार सुनो। यहाँ प्रस्तुत सत्त्ववृद्धि के
साधकों के लिये निवृत्तिशास्त्र (वेदांत शास्त्र) प्रमुख है। वेदांत के उपनिषद शास्त्र का मथितार्थ ग्रहण करना
चाहिये। आपका अर्थ है जल की पवित्रता। गोदावरी, भागीरथी आदि जो पवित्र नदियाँ हैं उनका एक छींटा भी

तेरहवाँ अध्याय ३६३
अकस्मात् शरीर पर गिर जाय तो पाप निःशेष हो जाता है अथवा जिसके लिये ब्रह्मादिक देवताओं की भी लार
टपकती रहती है उस मेरी प्रतिमा का चरणामृत अथवा शालिग्राम शिला का तीर्थ भी सभी पापों का विनाश करता
है। जिससे सारे तीर्थ पावन होते हैं वह ब्राह्मणों का चरणतीर्थ स्वयं नारायण शिरसावंद्य करते हैं और ब्राह्मणों के
चरण अपने वक्षःस्थल पर धारण करते हैं। पानी कहीं का भी क्यों न हो ? जो पानी सद्गुरु के चरणों से लगा है
वह सकल तीर्थों से भी श्रेष्ठ है। वह सेवन करते ही तत्काल उद्धार करता है। सत्त्ववृद्धि का कारण उदक
(जल) है। वह इस तीर्थ से पुण्य पावन होता है और उसका सेवन करने से सत्त्ववृद्धि का स्वरूप अपने आप
प्रकट होता है। प्रजा का अर्थ है श्रेष्ठ लोग। साधु तथा बैरागी पुरुषों की सेवा करनी चाहिये, क्योंकि इससे जड़
जीवों का उद्धार होता है। सत्त्ववृद्धि का प्रमुख कारण सत्संगति है, यह समझ लो। इस सत्संगति का वर्णन
बारहवें अध्याय में हुआ है। अब देश का अर्थ है नैमिषारण्यादि पुण्यभूमि अथवा सत्पुरुषों द्वारा सिद्धि प्राप्त करने
के लिये स्थापित किया हुआ सिद्धिस्थान। वह स्थान निर्जन, एकान्त तथा ऐसा हो जहाँ बैठने से तत्काल सत्त्व
को अधिक से अधिक बल प्राप्त होता है। एकांत में आसन लगा कर बैठने का अभ्यास पूर्ण हो जाय और चिद्धन
अर्थात् परब्रह्म प्राप्त करने के प्रति रुचि उत्पन्न हो जाय तो यह सत्त्वगुण अपने आप बढ़ता है। उसी प्रकार
साधकों के लिये उत्तम समय है बाह्य मुहूर्त—भोर। यही समय पूरी तरह योग्य और अनिवार्य है। अथवा जिस
समय मन उद्वेगरहित तथा हर्षयुक्त हो वह काल भी उपयुक्त है। प्रेमपूर्ण अंतःकरण से कीर्तन श्रवण करने में जो
काल व्यतीत होता है, अथवा जयंती आदि अवसरों पर महापूजा करने में, एकादशी को जागरण करने में जो
काल व्यतीत होता है, वही समय की उत्तम सार्थकता है। हरिकीर्तन में गाने में अथवा नाचने में जो समय व्यतीत
होता है उस काल की महिमा का वर्णन मैं भी नहीं कर पाऊँगा। अभिमानरहित होकर कीर्तन करना, निर्लोभ से
गाना और नाचना इसमें जो समय व्यतीत होता है उस काल को मैं श्रीकृष्ण भी प्रणाम करता हूँ। उसकी महिमा
का वर्णन कौन करे ? जो कर्म आशारहित हो, फलरहित हो अथवा निष्काम कर्म हो उसी को कर्म कहना चाहिये
अथवा जो क्रिया उपकार के लिये की जाती है वही वास्तव में सात्त्विक कर्म है। गुरु से दीक्षा ग्रहण करने में
पुरुष को मानों एक नया जन्म ही मिलता है, इसे स्मरण रखो। उद्धव ! गुरु ही माँ-बाप हैं। उसका भी लक्षण
सुनो। सचमुच जन्म लेने वाले बालक को भी पाँच प्रकार के पिता होते हैं। एक जन्म देनेवाला, दूसरा उपनयन
करने वाला और तीसरा अन्न खिलाकर पोषण करने वाला। जो भय से छुड़ाता है, जो बन्धन से मुक्त करता है
और जो देह को मरने से बचाता है वह भी शास्त्रों के अनुसार पिता ही है। इसके अलावा एक पाँचवाँ पिता भी
है। वह पंचमहाभूतों का विनाश करता है, वह मृत्यु से छुड़ाता है और गर्भवास के दुःख का निवारण करता है
जिनके चरणों का दर्शन करने से संसार बन्धन पीड़ा नहीं दे सकता वह सद्गुरु पिता है। वह भाग्य के बिना नहीं
मिलता। जन्म लेने वाले बालक के लिये माता और पिता अलग-अलग रहते हैं। बाप वीर्य प्रदान करता है और
उस वीर्य को धारण कर उससे होने वाले गर्भ का पोषण करने का कार्य माँ का होता है। सद्गुरु उस प्रकार का
पिता नहीं है। अपना वीर्य प्रदान किये बिना और योनिद्वार से जन्म दिये बिना वह स्वयं माँ और बाप बनता है।
उदर से बाहर आने के बाद माँ के हृदय में पुत्रस्नेह उमड़ पड़ता है। लेकिन जो बाहर है उसे पेट में डालकर
गुरुमाता सच्ची आमीयता से महान बन गयी है। इसलिये शिष्य के लिये सद्गुरु ही सचमुच माता-पिता हैं। वही
अपनी ममता से उसका पोषण करता है और अभिन्न भाव के कारण गुरु शिष्य में एकत्व उत्पन्न होता है। इससे
पहले जिन चार पिताओं का वर्णन किया उन सबको सौतेला बाप समझो। माता और पिता जब अलग-अलग हैं
तो वे सगे कैसे हुए ? इसलिये जो दयालु सद्गुरु है वही सच्चे शिष्य का सगा पिता है। इसीलिये उन दोनों में

३६४ श्रीमद् एकनाथी भागवत
थोड़ा भी विकल्प उत्पन्न नहीं होता। उस सद्गुरु से ही शैवी अथवा वैष्णवी दीक्षा प्राप्त होती है अथवा वह गुरु
आत्मज्ञान से चैतन्यघन अथवा निर्गुण का उपदेश करता है। अब दीक्षा का लक्षण सुनो। जो चारों प्रकार के
पुरुषार्थ और चारों मुक्ति प्रदान करती है और अविद्या की स्थिति को पूर्णतया विलुप्त करती है उसी का नाम
वात्सव में दीक्षा है। इस प्रकार हे उद्धव! दीक्षा रूप जन्म की कथा वास्तव में दीक्षा है। इस प्रकार हे उद्धव !
दीक्षा रूप जन्म की कथा तुम्हें यथातथ्य बतलायी। अब ध्याननिष्ठ नाम से जो सात्त्विकता होती है उसके सम्बन्ध
में सुनो। वास्तव में जिसका शरीर सत्त्वोपाधिक और जिसका स्वरूप ज्ञानमय होता है वही श्रीविष्णु इन सात्विकों
का ध्येय है। उसका ध्यान करें। अथवा जो गौ के दुग्ध की तरह शुभ्र अथवा कर्पूर की तरह गौर वर्ण है उस
पंचमुखी श्रीशंकर का भवसागर के उस पार जाने के लिये ध्यान करना चाहिये। उस मूर्ति का ध्यान करने से
ध्येय, ध्यान और ध्याता यह सारा नष्ट हो जाता है और अंतःकरण में ज्ञानस्वरूप स्थापित हो जाता है। सात्विकता
का ध्यान यही है। जैसी दीक्षा वैसा ही ध्यान यही आगम शास्त्र का सिद्धान्त है और ज्ञानस्वरूप तक पहुँचना
यही उस ध्यान की परिणति है। जो ज्ञान का भण्डार है वही सद्गुरु का स्वरूप है। निरन्तर उसी का अनुसंधान
कर ध्यान करना चाहिये। पंचभूतात्मक देह का साँचा बना कर उसमें ब्रह्मरूपी रस उड़ेलने से सुन्दर गुरुस्वरूप
तैयार होता है। इसलिये दिन-रात उसी का ध्यान करना चाहिये। हे उद्धव! यही सात्त्विकों का ध्यान है यह
स्मरण रखो। अब मंत्रों का ग्रहण किस प्रकार होता है इसका भी निरूपण सुनो। जो सभी मंत्रों की माँ है, जो
ब्राह्मण को तत्काल द्विजता प्रदान करती है उस गायत्री के मंत्र को ग्रहण करने से ब्राह्मणों को ब्राह्मण होने का
अधिकार प्राप्त होता है। जो सभी मंत्रों का राजा है, जो ब्राह्मणों के हिस्से में आयी है, जिसके भय से मुझ
श्रीकृष्ण को भी ब्राह्मणों की पूजा करनी पड़ती है, वह गायत्री ब्राह्मणों को सहज ही प्राप्त हुई है। लोभ के कारण
उसकी उपेक्षा कर ब्राह्मण दरिद्र हो गये हैं। जो ब्राह्मण गायत्री पर निष्ठा रखता है उसके चरणों का मैं वंदन
करता हूँ। मंत्रों में गायत्री मंत्र श्रेष्ठ हैं ऐसा वेदों का प्रामाणिक मत है। गायत्री मंत्र का प्रवेश हुए बिना अन्य मंत्रों
का वेद में प्रवेश सम्भव ही नहीं था। मुख्यतयः सारे मंत्र गायत्री के पास एकजुट होकर निवास कर रहे हैं। यदि
गायत्री मंत्र का सम्बन्ध न हो तो ब्राह्मणों के मुख में वेद प्रवेश कर ही नहीं सकते। फिर दूसरे मंत्रों की बात क्या
करें ? सारांश वेदों के लिये गायत्री वंदनीय है। गायत्री मंत्र का एकमात्र गोपनीय तथ्य ज्ञानस्वरूप परब्रह्म ही है।
वह मंत्र ब्राह्मणों को ही सुलभ है। लेकिन वे भी उसका मर्म भूल गये। इस प्रकार गायत्री मंत्र पूर्ण रूप से
ब्रह्मस्वरूप है और सभी सिद्धियों को उत्पन्न करने वाला है। शैव अथवा वैष्णव मंत्रों को ग्रहण करने पर भी
गायत्री मंत्र से ही तत्काल सत्त्वशुद्धि होती है। सत्त्व की शुद्धि हो जाने के बाद सहस्रों शैव मंत्र अथवा वैष्णव
मंत्रों की प्राप्ति होती है और उस सत्त्वशुद्धि से ही साधकों को तत्काल आत्मदृष्टि प्राप्त होती है। हे उद्धव !
मंत्रग्रहण करने का यह सही ढंग है। अब संस्कार के बारे में सुनो। मन के संकल्प और विकल्प तोड़ने का प्रयत्न
जो उत्कट इच्छा और लगन से करता है उसमें वैसे तो संकप उत्पन्न ही नहीं होता और अगर हुआ भी तो उसे
वह वहीं कुचल देता है। वह सदा विचार दृष्टि से ही देखता रहता है इसलिये वह मन से भी स्वतंत्र रहता है।
परमात्मा निष्ठा के कारण वह मन को नियंत्रण में रखता है, उसे इधर-उधर भटकने नहीं देता। मन को
कुशलतापूर्वक स्मरण में ही फँसाये रखता है। वैराग्य के बल पर वह मन का दमन करता है और उसी के भय से
हरि का चिन्तन करता है। जिस प्रकार दासी स्वामी की किसी भी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करती, उसी प्रकार
वह अपने मन को ईश्वरनाम स्मरण के अधीन कर देता है। इन्द्रिय अनेक प्रकार के पदार्थों को देखते रहते हैं
लेकिन मन किसी अन्य विषय को नहीं देखता। वह जागृत अवस्था में तथा स्वप्न में भी स्वाभाविक रूप से हरि

तेरहवाँ अध्याय ३६५
का स्मरण करता रहता है। मन जब इस प्रकार सुसंस्कारित हो जाता है तो वह प्रत्येक क्षण हरि का ही चिन्तन
करता है। श्वासोश्वास चलते समय भी 'परब्रह्म मैं ही हूँ' का ध्यान लगा रहता है। सहज ही भगवान के
नामस्मरण का आदर करने को आत्मसंस्कार कहते हैं। आत्मशुद्धि का जो प्रमुख कारण है उसे दस लक्षणों के
साथ बतलाया। साधक भी उसका सेवन करें इसलिये मैंने भी उसका अधिक स्पष्टीकरण किया। अब जिसके
कारण तमोगुण जोर से बढ़ता है उसके भी दस लक्षण हैं। उसका पूरी तरह त्याग करना चाहिये। उसका शास्त्र
आभिचारिक है। वह मार्ग वेदों द्वारा निषिद्ध माना गया है। उसमें दारू, मद्य, ताड़ी आदि का अनिवार्य रूप से
सेवन किया जाता है। जो इहलोक और परलोक में भ्रष्ट हुए रहते हैं, पाखंडी तथा बहुरूपिया होते हैं और मुण्डन
किये रहते हैं उनसे इनकी संगति रहती है और जहाँ वेदविधियों का विरोध होता है, द्वेष, जुआ अथवा परस्त्री
जैसे दुर्व्यसन हों वहीं इनकी बैठक होती है और उनका समय मध्यरात्रि का रहता है। उस समय उस कर्म का
विधि चलता है। उस कर्म का प्रारम्भ जारण, मारण, मोहन, स्तंभन, उच्चाटन अथवा वशीकरण रहता है। ये सब
तामस कर्म हैं। जन्म का अर्थ है दीक्षाग्रहण। इसलिये प्रेतभूत पिशाच विद्या से प्रेतभूतों की आराधना करने से
तामसों को भी प्रेत का ही जन्म प्राप्त होता है। जिसमें तामस गुण प्रमुख रूप से रहता है वह पुरुष क्रोधयुक्त
होकर निरन्तर शत्रु की ही टोह में रहता है और उसका विनाश करने के लिये प्रवृत्त रहता है। उसके मंत्र तामसी
होते हैं और देवता गूँगी, मैली (गन्दी), उच्छिष्ट चांडालिन अथवा प्रेतों की देवता कंकाली होती है और उनकी
मंत्रयोजना भी वैसी ही रहती है। पत्थर और मिट्टी से बना घर मेरा है, यह जमीन मेरी है यही लगन रहती है।
नींद में, स्वप्न में भी दीवारें उठाता रहता है, इतनी घर के प्रति आसक्ति रहती है। मकान बनाने की क्षमता भले
ही न हो लेकिन पत्थर मिट्टी आदि का संग्रह करता रहता है। किसी चिड़िया को भी वहाँ नहीं आने देता। जिस
देह के लिये घर बनाया जाता है उस देह को भी वह असह्य कष्ट देता रहता है। तामस संस्कारों के योग से घर
की आसक्ति के कारण वह लगभग पागल हुआ रहता है। घर के लिये वह मरने तक प्रयास करता रहता है। यही
उसका तामस संस्कार है और उसका संसार है सिर्फ मिट्टी। जिसके कारण तमोगुण बढ़ता है उनके ये दस लक्षण
हैं। अब राजस का स्वरूप सुनो। उसका स्वरूप इससे अलग रहता है। सत्त्वगुण को स्वीकार करना चाहिये और
तमोगुण का त्याग करना चाहिये। अब आगे से काटने वाले और पीछे से लात मारने वाले रजोगुण के बारे में
सुनो। जरा सुनो, चतुर और छिनाल औरत अपने पति को प्रसन्न रखती है और फिर उसे धोखा देकर व्यभिचार के
लिये बाहर जाती है। उसी प्रकार यह रजोगुण है। जिस प्रकार कोई अड़ियल टट्टू देखने में बहुत सुन्दर रहता है
लेकिन बीच रास्ते में अड़ जाता है और पैर आगे नहीं बढ़ाता बल्कि पीछे हटने लगता है, उसी प्रकार रजोगुण
की स्थिति है। वहाँ कल्पांत में भी त्याग की सम्भावना नहीं है। ऐसा मनुष्य केवल दांभिक भावना से ही धर्म
करता है और मन में काम के प्रति आसक्ति रहती है। साथ में चलने वाला चोर सर्वस्व लूटने के लिये चाकर
बनकर साथ-साथ दौड़ता रहता है। वही स्थिति रजोगुण की है। वह भी इच्छा का संसार बढ़ाता रहता है।
इसलिये मनुष्य काम की आसक्ति से धर्म करता है, किये हुए कर्म का निश्चयपूर्वक उपभोग करता है और इस
प्रकार स्वयं ही जन्म-मरण के भँवर में फँस जाता है। कल्पांत में भी उससे छूट नहीं पाता। सात्त्विक लोग मेरी
भक्ति से तर जाते हैं, तामस लोग मेरी विरोध भक्ति से तर जाते हैं। किन्तु राजस लोगों की जन्म-मरण की यात्रा
रजोगुण के कारण कभी समाप्त नहीं हो पाती। रजोगुण की बाढ़ जिसके कारण प्रबल होती है वे दस लक्षण तुम्हें
बताता हूँ। काम्य कल्पना पूरी तरह छोड़ देने के लिये यह निरूपण भी सुनो। राजस लोगों का शास्त्र केवल
प्रवृत्ति पर आधृत है। वह केवल वासनामय होता है। जिससे इहलोक में और परलोक में सुख मिले ऐसी ही