श्रीमद् एकनाथी भागवत (सन्त एकनाथ - श्रीमद्भागवत एकादश स्कन्ध उद्धव गीता सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Shrimad Eknathi Bhagavat (Hindi) by N.V. Sapre
सन्त एकनाथ महाराज (अनुवादक: एन. वी. सप्रे) द्वारा
पृष्ठ 377, कुल 869 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवाँ अध्याय
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वासना का ही छेद करने की बात कही गयी है। जीव का जीवत्त्व ही छेद देने पर सभी साधन छोड़ देने चाहिये,
इसलिये उद्धव ने उस पर कोई उत्तर नहीं दिया। तब उद्धव के मन के विचार, उसके अंतःकरण में चलने वाले
गूढ़ विचार आदि बातों को अच्छी तरह जानकर भगवान श्रीकृष्ण स्वयं से ही बातें करने लगे। तुम कहोगे कि
त्रिगुण का सूत्र लगने के कारण जीव में जीवंत्व आता है, तो जब तक देह में तीन गुण हैं तब तक सद्विद्या उत्पन्न
ही नहीं होगी। नारियल के मुँह पर का ढक्कन जब तक नहीं खोला जाता तब तक उसके अन्दर का पानी प्राप्त
नहीं हो सकता। इस प्रकार जब तक गुण ही समाप्त नहीं होंगे तब तक विद्या कैसे उत्पन्न होगी ? उद्धव की इसी
शंका का समाधान श्रीकृष्ण तीन श्लोकों में करते हैं।
श्री भगवानुवाच
सत्वं रजस्तम इति गुणा बुद्धेर्न चात्मनः।
सत्त्वेनान्यतमौ हन्यात् सत्त्वं सत्त्वेन चैव हि ॥ १ ॥
सत्त्व, रज, तम आदि जो गुण हैं वे सचमुच मायारूपी हैं यह ध्यान में रखो। इन सब बातों का निरूपण
मैंने बारहवें अध्याय में किया ही हुआ है। अब जो सच्चिदानन्द है वह आत्मा से भिन्न नहीं है। लेकिन सभी गुण
वैसे नहीं हैं। वह प्रकृति के ही कार्य होने के कारण प्राकृत हैं। जो सत् है वही चित् है और जो चित् है वही
आनन्द है लेकिन आत्मस्वरूप में तीन प्रकार के भेद नहीं होते। वह एकमेव सच्चिदानंद स्वरूप ही है। जिस
प्रकार श्वेत, मुलायम और मीठी इन तीन गुणों से युक्त चीनी एक ही है, उसी प्रकार सच्चिदानंद यह अविकृत
वस्तु है तथा आकाररूप में भी एक है। प्रकृति ही गुणों को उत्पन्न करने वाली है और उन गुणों के कारण ही
बलवान हुई है। इसलिये हे उद्धव ! गुणों की और आत्मा की संगति कल्पांत में भी कभी नहीं होती। अब विद्या
साध्य करने का ढंग भगवान स्वयं ही बताते हैं। गुण से ही गुणों का नाश कर सद्विद्या प्राप्त करनी चाहिये यह
बात ध्यान में रखो। जब प्रेम से सत्त्व की वृद्धि होकर रज और तम पूरी तरह झड़ जाते हैं तभी सद्विद्या हाथ
लगती है और आत्मस्वरूप का बोध होने पर सत्त्व की वृद्धि भी रुक जाती है। सर्प जिसे काटता है उसे विष
खाने पर आराम मिलता है लेकिन वही विष यदि गलत दिन खा लिया जाय तो वह आत्मघात का कारण बन
जाता है। उसी प्रकार रज और तम का लोप होकर सत्त्व की वृद्धि होती है लेकिन वही सत्त्व जब बाधक हो
जाता है तब बहुत खराब रहता है। उस बाधा के बारे में तुम्हें आगे स्पष्ट करके बताऊँगा। सभी कर्मों से तथा
कार्यों से मैं अलिप्त हूँ। मैं ही ज्ञाता हूँ, मैं ही अत्यन्त सुखी हूँ ऐसी कल्पना कर ही सत्त्व ने गुण से गुणों के
कार्य में उलझा दिया है। इस प्रकार जो सत्त्वगुण बढ़ता है उसका शमन आत्मतत्त्व से ही किया जाना चाहिये।
उसका सम्पूर्ण निर्दलन करने से ही समाधान प्राप्त होता है। उद्धव ! तुम कहोगे कि जब तीनों गुण समान ही हैं तो
फिर केवल सत्त्व की ही वृद्धि क्यों होती है ? इसका उत्तर यह है कि गुण ही गुणों की रखवाली करते हैं। जब
तमोगुण बढ़ता है तो उसे ज्ञान-ध्यान अच्छा नहीं लगता, त्याग अच्छा नहीं लगता और चंदनादि सुखविलास
अच्छा नहीं लगता। निद्रा तथा जोरदार कलह अच्छा लगता है। जब रजोगुण बढ़ता है तो ज्ञान का निरूपण सुनते
हुए भी उसका मन भोग के प्रति आसक्त रहता है। उसे सदा विषय भोग का ही ध्यान लगा रहता है। दृष्टि में
धन की लालसा भरी हो तो-कोई पैर से पादत्राण भी निकाल ले तो उसे गुस्सा नहीं आता। यह रजोगुण की
विशेषता है। रजोगुणी मनुष्य स्त्री पुत्रों के प्रति अत्यन्त लालची होता है। सत्त्वगुण बढ़ने पर वह स्त्रियादि भोगों
के प्रति उदासीन हो जाता है। वह निरन्तर भगवद्चिंतन करता है। क्रोध, लोभ अथवा मोह का लक्षण सत्त्व के